पहले के जमाने में लोग सूर्य ग्रहण को बुरा शकुन मानते थे। उन्हें लगता था कि यह किसी बड़ी विपत्ति का संकेत है। लेकिन समय के साथ यही सूर्य ग्रहण इंसानों के लिए ज्ञान का बड़ा स्रोत बन गए। कई खास ग्रहणों ने वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को आसमान और ब्रह्मांड को समझने में मदद की। दुनिया में 10 ऐसे महत्वपूर्ण सूर्य ग्रहण हुए हैं, जिनसे ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को समझने में वैज्ञानिकों को काफी मदद मिली है।

इन 10 सूर्य ग्रहण पर शोध करने से कई नई जानकारियां सामने आई हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक अब ग्रहण से कोई भय या घबराहट नहीं होती है, बल्कि कुछ नया सीखने को मिलता है।

उगारित का ग्रहण – सीरिया, 1223 ईसा पूर्व

करीब 3000 साल पहले मेसोपोटामिया के खगोलविद आसमान का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करते थे। उस समय लोग मानते थे कि ग्रहण और धूमकेतु राजा और राज्यों की किस्मत बदल सकते हैं। सीरिया के प्राचीन शहर उगारित में एक मिट्टी की तख्ती मिली, जिस पर कीलाक्षर लिपि में एक सूर्य ग्रहण का वर्णन था। 1989 में नेचर (Nature) पत्रिका में छपे अध्ययन के अनुसार यह ग्रहण 5 मार्च 1223 ईसा पूर्व को हुआ था। इसमें लिखा है कि दिन में अंधेरा छा गया और मंगल ग्रह दिखाई देने लगा। यह इतिहास के सबसे पुराने दर्ज वैज्ञानिक रिकॉर्ड में से एक है।

आन्यांग का ग्रहण – चीन, 1302 ईसा पूर्व

चीन के आन्यांग शहर में कछुए के खोल पर लिखी गई प्राचीन लिपि में एक सूर्य ग्रहण का उल्लेख मिला। इसमें लिखा था कि “तीन लपटों ने सूरज को खा लिया और बड़े तारे दिखे।” वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पूर्ण सूर्य ग्रहण था। 1989 में NASA के जेट प्रपोल्शन लैब के वैज्ञानिकों ने इसकी तारीख 5 जून 1302 ईसा पूर्व तय की। इससे यह भी पता चला कि हजारों सालों में पृथ्वी की घुमाव गति थोड़ी धीमी हुई है।

थेल्स का ग्रहण – 585 ईसा पूर्व

यूनानी दार्शनिक Thales of Miletus के बारे में इतिहासकार हेरोडोट्स (Herodotus) ने लिखा कि उन्होंने एक सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी की थी। यह ग्रहण 28 मई 585 ईसा पूर्व को हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि यह ग्रहण युद्ध के दौरान हुआ और दोनों सेनाओं ने लड़ाई रोक दी। इसे इतिहास की पहली सफल वैज्ञानिक भविष्यवाणी माना जाता है।

एनाक्सागोरस का ग्रहण – 478 ईसा पूर्व

दार्शनिक एनाक्सागोरस (Anaxagoras) ने सबसे पहले समझाया कि सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य की रोशनी को ढक देता है। पहले लोग सोचते थे कि सूरज खुद बदल रहा है। 17 फरवरी 478 ईसा पूर्व का ग्रहण शायद वही था जिससे उन्हें यह समझ मिली। उन्होंने सूर्य और चंद्रमा के आकार का भी अनुमान लगाया।

हिप्पार्कस का ग्रहण – 189 ईसा पूर्व

खगोलविद हिप्पार्कस (Hipparchus) ने 14 मार्च 189 ईसा पूर्व के ग्रहण का उपयोग करके पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी का अनुमान लगाया। उन्होंने ग्रीस और मिस्र में दिखे ग्रहण के अंतर को देखकर गणना की। उनका अनुमान आधुनिक माप से केवल लगभग 11% ज्यादा था — जो उस समय के हिसाब से अद्भुत था।

हैली का ग्रहण – इंग्लैंड, 1715

जर्मन वैज्ञानिक जोहांस केपलर (Johannes Kepler) ने ग्रहण की समझ विकसित की, लेकिन सही भविष्यवाणी का श्रेय अंग्रेज खगोलविद एडमंड हैली (Edmund Halley) को जाता है। उन्होंने 3 मई 1715 के ग्रहण की सटीक भविष्यवाणी की। उनकी गणना सिर्फ कुछ मिनट और लगभग 30 किलोमीटर की गलती से चूकी — जो हाथ से की गई गणना के लिए बहुत सटीक थी।

बेली के दाने – 1836

ग्रहण के समय चंद्रमा के किनारों से सूरज की रोशनी छोटे-छोटे मोतियों जैसी दिखती है। इसे “बेली के दाने” कहा जाता है। यह नाम अंग्रेज खगोलविद फ्रांसिस बेली (Francis Baily) के नाम पर पड़ा, जिन्होंने 1836 में स्कॉटलैंड में यह दृश्य देखा। हालांकि एडमंड हैली (Edmund Halley) ने इसे पहले नोट किया था, लेकिन नाम बेली के नाम पर ही पड़ा।

उत्तरी यूरोप का ग्रहण – 1851

28 जुलाई 1851 का ग्रहण कई मायनों में खास था। यह पहला अवसर था जब रायल एस्ट्रोनामिकल सोसायटी (Royal Astronomical Society) ने अंतरराष्ट्रीय अभियान भेजा। इसी ग्रहण के दौरान पहली बार सूर्य के ऊपरी वातावरण “क्रोमोस्फीयर” को ठीक से देखा गया। इसी साल सूर्य ग्रहण की पहली फोटो भी ली गई।

हीलियम की खोज – भारत, 1868

16 अगस्त 1868 को फ्रांसीसी खगोलविद (Jules Janssen) ने भारत में ग्रहण के दौरान सूर्य के प्रकाश का अध्ययन किया। उन्होंने एक नई गैस की पहचान की। बाद में अंग्रेज वैज्ञानिक नार्मन लॉकेयर (Norman Lockyer) ने इसे “हीलियम” नाम दिया। यह तत्व पहले सूर्य में मिला, बाद में पृथ्वी पर खोजा गया।

आइंस्टीन का ग्रहण – 1919

वैज्ञानिक एल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) ने कहा था कि भारी वस्तुएं प्रकाश को मोड़ सकती हैं। 1919 के सूर्य ग्रहण में इस सिद्धांत की जांच हुई।ब्रिटिश खगोलविद आर्थर एडिंगटन (Arthur Eddington) ने अफ्रीका में ग्रहण के दौरान तारों की तस्वीरें लीं। पाया गया कि तारों की रोशनी सच में सूर्य के पास मुड़ रही थी। इससे आइंस्टीन का सिद्धांत सही साबित हुआ। इन सभी सूर्य ग्रहणों ने अंधविश्वास से विज्ञान की ओर इंसान की यात्रा में बड़ी भूमिका निभाई। आज हम ग्रहण को डर से नहीं, बल्कि ज्ञान और उत्सुकता से देखते हैं।

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आर्यभट (Aryabhata), प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री, ने ग्रहण (सूर्य और चंद्र ग्रहण) की गणना करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी प्रसिद्ध रचना “आर्यभटीय” (Aryabhatiya), जो 5वीं शताब्दी में लिखी गई थी, में खगोलीय गणनाओं और ग्रहणों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। आर्यभट ने सूर्य और चंद्र ग्रहण के कारणों को वैज्ञानिक रूप से समझाया। उन्होंने बताया कि ग्रहण चंद्रमा की छाया (पृथ्वी पर सूर्य ग्रहण के लिए) या पृथ्वी की छाया (चंद्रमा पर चंद्र ग्रहण के लिए) के कारण होता है। यह उस समय की एक क्रांतिकारी समझ थी, क्योंकि उस युग में कई संस्कृतियों में ग्रहण को अंधविश्वास या दैवीय घटनाओं से जोड़ा जाता था। क्या आर्यभट पहले थे? पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक

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अल्बर्ट आइंस्टीन किसी पहचान के मोहताज नहीं है। उन्हें मॉडर्न साइंस का सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिक माना जाता है। उनका जन्म 14 मार्च, 1879 को जर्मनी के उल्म (Ulm) शहर में हुआ था। बचपन में वे बोलने में धीमे थे, लेकिन गणित और फिजिक्स में उनकी रुचि बहुत गहरी थी। उनकी इसी रुचि ने उन्हें पहचान दिलाई। हालांकि, वो 1919 मई महीने में लगे सूर्य ग्रहण के बाद विश्व-भर में फेमस हो गए। ऐसा क्यों आइये पढ़ते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक