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गूगल दे रहा मशीनों को ट्रेनिंग, करेंगी मरीजों की मौत की भविष्यवाणी

गूगल ने कुछ दिन पहले इस एल्गोरिदम को एक महिला मरीज पर टेस्ट भी किया था। टेस्ट की प्रक्रिया के दौरान उसके 1,75,639 डेटा प्वॉइंट्स सामने आए थे। साथ ही पता लगा था कि उसे 19.9 फीसदी का डेथ रिस्क है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

मरीज कितने दिन जिएगा, यह बात मालूम चल सकेगी। अमेरिकी इंटरनेट सर्च इंजन गूगल इस काम कर रहा है। वह खास किस्म की मशीनों को इसके लिए ट्रेनिंग दे रहा है। ट्रेनिंग के बाद वे मशीनें मरीजों की मौत की भविष्यवाणी करेंगी। वे बताएंगी कि मरीज के पास कितना समय बचा है। कंपनी ने इस पूरी प्रक्रिया के तहत एक किस्म का एल्गोरिदम तैयार किया है। मरीज पर इसी के जरिए टेस्टिंग की जाती है, जिसमें रीडिंग बताती है कि मरीज को कितना डेथ रिस्क है।

गूगल ने कुछ दिन पहले लिए एक शोध किया, जिसमें स्तन कैंसर से पीड़ित एक महिला को खोजा था। डॉक्टरों ने उसका रेडियोलॉजी स्कैन किया था। रिपोर्ट्स में पता चला कि उसे 9.3 फीसदी डेथ रिस्क है। बाद में अपनी एल्गोरिदम तकनीक से उस मरीज पर टेस्ट किए।

टेस्ट की प्रक्रिया के दौरान उसके 1,75,639 डेटा प्वॉइंट्स सामने आए थे। साथ ही पता लगा था कि उसे 19.9 फीसदी का डेथ रिस्क है। महिला के ऊपर किए गए उस टेस्ट के चंद दिनों बाद ही उसकी मौत हो गई थी। मई में उस महिला को लेकर गूगल ने खबर भी प्रकाशित की थी।

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रिपोर्ट में एक आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर का जिक्र भी किया गया था। बताया गया था कि गूगल उस टूल के जरिए मरीजों की मौत की भविष्यवाणी कर सकेगा, जिसमें यह भी पता लग सकेगा कि मरीज कितने दिन और अस्पताल में भर्ती रहेगा या फिर उसे हालत बिगड़ने पर कब दोबारा भर्ती कराना पड़ेगा। मेडिकल एक्सपर्ट्स भी गूगल के इस प्रयोग को लेकर चकित हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले कुछ दिनों तक गूगल इसे छोटे-छोटे क्लीनिक्स तक पहुंचा देगा।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर निगम शाह ने कहा कि इस मॉडल के अंतर्गत मरीज के पास बचे समय और उसकी सेहत को लेकर अनुमान लगाया जाता है। हालांकि, इसे और बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है। वहीं, कुछ डॉक्टरों की टीमें भी सालों से इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड पर काम कर रही हैं।

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