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प्लास्टिक कचरे से बनेगा विमान का ईंधन

‘अप्लाइड एनर्जी’ जर्नल में प्रकाशित शोध में बताया गया कि इस तकनीक में कम घनत्व की पॉलीथिन, पानी और दूध की बोतलों, प्लास्टिक बैग आदि को तीन मिलीमीटर तक के छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है।

Author June 11, 2019 2:23 AM
प्लास्टिक कचरे से जेट विमानों का ईंधन बनाया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने रोजाना घरों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे (पानी की बोतल, प्लास्टिक बैग आदि) से निजात पाने का एक अनोखा तरीका विकसित किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, नई तकनीक के जरिए प्लास्टिक कचरे से जेट विमानों का ईंधन बनाया जा सकता है। अमेरिका में वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी (डब्ल्यूएसयू) के शोधकर्ताओं ने जेट ईंधन के उत्पादन के लिए प्लास्टिक कचरे को सक्रिय कार्बन के साथ उच्च तापमान पर पिघलाया। डब्ल्यूएसयू में एसोसिएट प्रोफेसर हनवु लेई के मुताबिक, दुनिया भर में प्लास्टिक कचरा बहुत बड़ी समस्या है। इस कचरे को रिसाइकल कर उपयोग में लाने का सबसे अच्छा तरीका विकसित किया गया है। ‘अप्लाइड एनर्जी’ जर्नल में प्रकाशित शोध में बताया गया कि इस तकनीक में कम घनत्व की पॉलीथिन, पानी और दूध की बोतलों, प्लास्टिक बैग आदि को तीन मिलीमीटर तक के छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है। इसके बाद प्लास्टिक के इस कचरे को एक ट्यूब रिएक्टर में 430 डिग्री सेल्सियस से लेकर 571 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सक्रिय कार्बन के ऊपर रखा जाता है।

कार्बन एक उत्प्रेरक होता है, जो रासायनिक क्रिया को बढ़ावा देता है। प्लास्टिक का केमिकल बांड को तोड़ना कठिन होता है, इसलिए इसमें उत्प्रेरक को शामिल करना पड़ता है। प्लास्टिक में बहुत सारे हाइड्रोजन होते हैं, जो ईंधन के प्रमुख घटक होते हैं। इतने तापमान पर जब कार्बन उत्प्रेरक काम करता है तो प्लास्टिक के घटक अलग-अलग हो जाते हैं। विभिन्न तापमानों में कई अलग-अलग उत्प्रेरकों के साथ परीक्षण करने के बाद शोधकर्ताओं ने 85 फीसद जेट ईंधन और 15 प्रतिशत डीजल ईंधन प्राप्त किया। शोधकर्ताओं ने पानी की बोतलों, दूध की बोतलों, प्लास्टिक बैग आदि जैसे उत्पादों को तीन मिलिमीटर या चावल के दाने जितना महीन पीस लिया। इन दानों को एक ट्यूब संयंत्र में 430 से 571 डिग्री सेल्सियस जैसे उच्च तापमान पर एक एक्टिवेटेड कार्बन के ऊपर रखा गया। इसमें आगे की शोध जारी है। अगर बड़े स्तर पर यह शोध कामयाब होता है तो पर्यावरण बचाने की मुहिम में बड़ी कामयाबी होगी।

भारत में भी इस तरह के आंशिक प्रयोग के दावे सामने आए हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ पेट्रोलियम, देहरादून ने एक ऐसे ही प्रयोग को सत्यापित किया है। इंदौर की संस्था ग्रीन अर्थ इनोवेशंस (जीईआई) ने दावा किया है कि हमने प्लास्टिक से ईंधन बनाने के लिए रसायनिक प्रक्रिया को पलट दिया है। प्लास्टिक हाइड्रोकार्बन का उत्पाद है। हमने अपनी तकनीक में एक उत्प्रेरक के जरिए प्लास्टिक का डी-पॉलीमराइजेशन करते हुए उससे तेल उत्पादन की प्रक्रिया ईजाद की है। इस संस्था के मनोज शर्मा के मुताबिक, हमारी तकनीक के जरिए प्लास्टिक से निकाले गए ईंधन का प्रयोग भारत स्टेज-2 वाहनों को चलाने में किया जा सकता है। इसके अलावा डीजी सेट्स संचालन, भारी पंप, हॉट मिक्स प्लांट आदि चलाने जैसे औद्योगिक कार्यों में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। प्लास्टिक कचरे से निकाला गया ईंधन डीजल के समतुल्य होता है। मनोज शर्मा और जादवपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर नीलाचल भट्टाचार्य ने संयुक्त रूप से मध्य प्रदेश के इंदौर के बाहरी क्षेत्र में 10 मीट्रिक टन क्षमता का प्लांट स्थापित किया है। वहां प्रायोगिक तौर पर वाहनों के लिए ईंधन विकसित करने का काम चल रहा है।

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