वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण पेश कर दिया है। वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण में बढ़ती अनिश्चितताओं और सीमित संसाधनों के बीच भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रति एक सतर्क रुख अपनाने की वकालत की गई है। इसमें कहा गया है कि देश की एआई रणनीति को सावधानीपूर्वक चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए ताकि समय से पहले किसी टेक्नोलॉजी,प्रीमैच्योर लॉक-इन या बहुत ज्यादा नियामक हस्तक्षेप से बचा जा सके।

इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत के सामने कोई एकल नीतिगत प्रश्न (single policy question नहीं रखती, बल्कि बढ़ी हुई अनिश्चितता और संसाधनों की सीमाओं के बीच किए जाने वाले ऑप्शन्स की एक सीरीज की तरह है।”

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संस्थान और बाजार साथ-साथ विकसित हों

आज संसद में पेश किए गए सर्वे के मुताबिक, भारत को सबसे पहले कोऑर्डिनेशन स्थापित करना चाहिए। उसके बाद क्षमता बनाने पर ध्यान देना चाहिए और आखिर में बाध्यकारी नीतिगत हस्तक्षेप (बाइंडिंग पॉलिसी लीवरेज) अपनाना चाहिए ताकि संस्थान और बाजार साथ-साथ विकसित हो सकें। जैसा कि हमने बताया संसद में वित्त मंत्री ने इस सर्वेक्षण को पेश किया था। इस सर्वेक्षण को मुख्य आर्थिक सलाहकार की देखरेख में वित्त मंत्रालय की इकोमॉनिक डिविजन द्वारा तैयार किया गया है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत की एआई रणनीति के पहले चरण में पहले से घोषित संस्थानों को क्रियान्वित करने और प्रयोग को सक्षम होना चाहिए। और इसके लिए इन्सेन्टिव्स से ज्यादा कॉर्डिनेशन पर ध्यान देना चाहिए।

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सर्वे में कहा गया, ”नीति को IndiaAI मिशन के तहत मौजूदा साझा इन्फ्रास्ट्रक्चर के दायरे को एक्सपेंड करके बॉटम-अप इनोवेशन को सक्षम बनाना चाहिए। इसमें सरकार द्वारा होस्ट किया गया, कम्युनिटी-क्यूरेटेड कोड रिपॉजिटरी और सार्वजनिक डेटासेट्स तक साझा एक्सेस शामिल है। जिसे कंप्यूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर तक साझा एक्सेस इनेबल करने के लिए पहले से चल रही पहलों के जरिए आसान बनाया जा रहा है। अनुप्रयोग या क्षेत्र-विशेष, छोटे और ओपन-वेट मॉडल्स पर स्पष्ट फोकस संसाधनों के कुशल इस्तेमाल को संभव बनाएगा।”

इसके अलावा, सर्वेक्षण ने संसाधनों के प्रभावी और कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए अनुप्रयोग या क्षेत्र-विशेष, छोटे और ओपन-वेट मॉडल्स पर स्पष्ट ध्यान देने की सिफारिश की। ”

सर्वेक्षण में कहा गया, “डेटा गवर्नेंस को भी डीपीडीपी (DPDP) ढांचे के तहत अधीनस्थ कानूनों के जरिए विकसित किया जाना चाहिए। ताकि विशेष रूप से बड़े पैमाने पर एआई प्रशिक्षण के लिए फंक्शनल डेटा वर्गीकरण और ऑडिटबिलिटी से जुड़ी जरूरतों को लागू किया जा सके। इसके साथ ही घरेलू मूल्य संरक्षण (डोमेस्टिक वैल्यू रिटेंशन) के लिए इन्सेन्टिव बेस्ड मैकेनिज्म को भी पूरक रूप से अपनाया जाना चाहिए जैसे कि पहले दिखाए गए मेन्यू-बेस्ड कॉन्ट्रिब्यूशन मार्ग।”

सर्वेक्षण ने यह भी सुझाव दिया कि एआई रेगुलेशन को रिस्क बेस्ड और अनुपातिक आधार पर औपचारिक रूप दिया जाना चाहिए। जिसमें एआई कंपनियों की जिम्मेदारियां उनके इस्तेमाल के पैमाने और क्षेत्र के अनुसार कोडिफाइड की जाएं।

सर्वेक्षण में कहा गया, “निगरानी (ओवरसाइट) को किसी एक समग्र एआई कानून के जरिए लागू करने के बजाय मौजूदा सेक्टर रेगुलेटर्स के तहत ही फॉर्मलाइज़ किया जाना चाहिए। एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट की भूमिका को विश्लेषण तक सीमित न रखते हुए संरचित परिदृश्य परीक्षण (सीनारियो टेस्टिंग), रेड-टीमिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग तक एक्सपेंड किया जाना चाहिए। इसे साथ ही हाई-रिस्क एप्लिकेशंस के लिए स्पष्ट रूप से परिभाषित नॉन-नेगोशिएबल बाउंड्री तय की जानी चाहिए,”

भारत की एआई रूपरेखा (रोडमैप) पर सर्वेक्षण की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब देश अगले महीने एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की मेज़बानी करने जा रहा है। यह शिखर सम्मेलन 15 से 20 फरवरी के बीच नई दिल्ली में आयोजित होगा और पहली बार यह फोरम ग्लोबल साउथ में हो रहा है। यह समिट का चौथा एडिशन होगा। इससे पहले यूनाइटेड किंगडम (ब्लेचली पार्क), दक्षिण कोरिया (सियोल) और फ्रांस (पेरिस) में आयोजित किया जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे और उनके द्वारा एक डिनर की मेज़बानी करने व सीईओ राउंडटेबल को संबोधित करने की भी संभावना है।