ऑकस पनडुब्बी सौदों का विवाद : भारत के लिए क्या हैं संकेत

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुई परमाणु पनडुब्बियों के सौदे को लेकर नए सिरे से विवाद उठ खड़ा हुआ है।

(ऊपर) अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडन। (बाएं) नीचे से गौतम मुखोपाध्याय, अफगानिस्तान और सीरिया में भारत के पूर्व राजदूत, केपी फाबियान, पूर्व राजनयिक। फाइल फोटो।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुई परमाणु पनडुब्बियों के सौदे को लेकर नए सिरे से विवाद उठ खड़ा हुआ है। ‘ऑकस’ गठबंधन के एलान और अमेरिका ऑस्ट्रेलिया में करार होने के बाद न केवल चीन बल्कि यूरोप के कई देश भी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खड़े हो गए हैं। फ्रांस ने तो इसे पीठ में चाकू घोंपना करार दिया है। ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बी देने का सौदा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता के मद्देनजर किया गया है। चीन इस समय भारत के लिए भी हिंद महासागर में मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भी अपनी नौसेना में परमाणु पनडुब्बियों की संख्या को बढ़ाना चाहिए। परमाणु पनडुब्बियों के लिए भारत की अभी रूस पर निर्भरता है। अफगानिस्तान के घटनाक्रम को लेकर गठित ‘विस्तारित त्रोइका’ में चीन और पाकिस्तान के साथ रूस अहम भागीदार है। इस कारण माना जा रहा है कि भारत को अब फूंक-फूंककर कदम उठाने होंगे।

क्या है ऑकस, फ्रांस क्यों है नाराज

ऑस्ट्रेलिया , इंग्लैंड और अमेरिका के बीच एक समझौता हुआ है। इसे आॅकस नाम दिया गया है। इसमें ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी बनाने की तकनीक दी जाएगी। इस करार से फ्रांस बेहद नाराज है। क्योंकि, इस करार के बाद फ्रांस और आॅस्ट्रेलिया के बीच 2016 में हुआ 12 पनडुब्बी बनाने का सौदा खत्म हो गया है। यह सौदा अरबों डॉलर का था। इसके तहत आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस को 90 अरब आॅस्ट्रेलियाई डॉलर चुकाने वाला था। दुनिया में कोई भी रक्षा सौदा केवल हथियार की अच्छी गुणवत्ता को देखकर नहीं किया जाता है। इसके पीछे भू राजनीतिक स्थिति और कूटनीति का अहम भूमिका भी रहती है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया को चीन से बढ़ते खतरे को कम करने के लिए हर हाल में अमेरिका की जरूरत है। फ्रांस चाहकर भी प्रशांत महासागर और हिंद महासागर में चीन की आक्रामकता का सामना नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, वह ऑस्ट्रेलिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतनी मजबूती नहीं प्रदान कर सकता है जितना कि अमेरिका के पास ताकत है।
ऑस्ट्रेलिया की मजबूती का सवाल
चीन के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिए भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और आॅस्ट्रेलिया ने मिलकर क्वाड समूह बनाया है। इन चारों देशों में सैन्य शक्ति के तौर पर ऑस्ट्रेलिया बेहद कमजोर देश है। ऑस्ट्रेलिया का रक्षा बजट केवल 35 बिलियन अमेरिका डॉलर है। जबकि भारत का बजट 65 अरब डॉलर, अमेरिका का 740 अरब डॉलर और ब्रिटेन का 778 अरब डॉलर है। ऑस्ट्रेलिया के पास इस वक्त एक भी परमाणु पनडुब्बी नहीं है। अमेरिका और ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया की नौसेना को मजबूत करने के लिए ऑकस करार किया है। इससे चीन को दक्षिण चीन सागर में सीधे चुनौती मिलेगी।
भारत के पास एक परमाणु पनडुब्बी
वर्तमान में भारतीय नौसेना में ‘आइएनएस अरिहंत’ नाम की परमाणु पनडुब्बी कार्यरत है। इससे पहले रूस से लीज पर ली गई ‘आइएनएस चक्र’ परमाणु पनडुब्बी भारतीय समुद्री क्षेत्र की रखवाली करती थी। लेकिन 10 साल की लीज पूरी होने के बाद जून शुरुआत में भारत ने आइएनएस चक्र को वापस कर दिया था। इसके बाद दोबारा रूस से एक नई परमाणु पनडुब्बी को लीज पर लेने के लिए बातचीत की जा रही है। अगर सबकुछ सही रहा तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आगामी भारत दौरे के समय इस डील पर हस्ताक्षर भी कर दिए जाएंगे। अब विस्तारित त्रोइका और आॅकस के गठन के बाद के घटनाक्रमों को लेकर परमाणु पनडुब्बी करार को लेकर विदेश मंत्रालय सतर्क बताया जाता है।
परमाणु पनडुब्बी सौदे की कवायद
वर्ष 2019 में खबरें आईं कि भारत ने रूस के साथ परमाणु पनडुब्बियों की खरीद को लेकर एक गोपनीय करार किया था। यह करार तीन अरब डॉलर का था। इसके तहत 2025 में भारत को रूस से एक परमाणु पनडुब्बी मिलेगी, जिसे आइएनएस चक्र के नाम से जाना जाएगा। यह पनडुब्बी भी पूर्ववर्ती आइएनएस चक्र की तरह भारतीय नौसेना में अगले 10 साल तक सेवा देगी। भारत को जो पनडुब्बी मिलने वाली है वह रूस की अकूला क्लास की के-322 काशालोत है। इसमें एकीकृत सोनार प्रणाली लगी हुई है, जो काफी दूर से बिना किसी हलचल के दुश्मन का पता लगा लेता है। भारत के आइएनएस अरिहंत में भी ऐसी ही प्रणाली लगाई गई है। नौसेना की ताकत में इजाफा करने के लिए भारत छह परमाणु शक्ति चलित पनडुब्बियों को नौसेना में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। 1.2 लाख करोड़ के इस सौदे को जल्द ही सरकार की तरफ से मंजूरी दी जा सकती है। ये पनडुब्बियां पारंपरिक हथियारों जैसे तारपीडो और मिसाइलों से लैस होंगी।

ऑकस : क्या खासियत

ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने ब्रिटेन और अमेरिका के साथ जो रक्षा समझौता किया है, उसके तहत परमाणु ताकत से लैस पनडुब्बियों का बेड़ा तैयार किया जाएगा पनडुब्बियां आॅस्ट्रेलिया के तटीय इलाकों और उसके जल क्षेत्र की सुरक्षा और निगरानी के काम लाई जाएंगी। परमाणु ताकत से लैस पनडुब्बी का ये मतलब नहीं है कि वो कोई परमाणु हथियार है। प्रमुख अंतर ऊर्जा का है, जिससे ये चलती हैं। परमाणु पनडुब्बी के भीतर न्यूक्लियर रिएक्टर लगा होता है और वही उसकी ऊर्जा का स्रोत होता है। परमाणु ऊर्जा से लैस पनडुब्बियों में ईंधन के लिए यूरेनियम का इस्तेमाल होता है।

परमाणु पनडुब्बी का फायदा यह है कि उन्हें फिर से ईंधन की जरूरत नहीं पड़ती। परमाणु पनडुब्बी में यूरेनियम की इतनी मात्रा होती है कि वह 30 साल तक सक्रिय रह सकती है। यह स्पष्ट नहीं है कि आॅस्ट्रेलिया के लिए जो परमाणु पनडुब्बियां बनाई जाएंगी, उसका ईंधन कहां से आएगा।
आॅस्ट्रेलिया के पास यूरेनियम के भंडार पहले से मौजूद हैं। ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु हथियारों के प्रसार पर रोकथाम लगाने वाली कई संधियों पर हस्ताक्षर किए है और वह परमाणु हथियार नहीं बना सकता।

क्या कहते हैं जानकार

एक बात जो फिलहाल स्पष्ट लग रही है, वह यह है कि आॅस्ट्रेलिया की नई विदेश नीति में परमाणु ऊर्जा को लेकर पूर्ण स्वीकार्यता की भावना है। कवायद पुरानी है। आॅस्ट्रेलिया में साल 2015 में न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल रॉयल कमीशन का गठन किया गया था।

  • गौतम मुखोपाध्याय, अफगानिस्तान और सीरिया में भारत के पूर्व राजदूत

हमें दो बातों का ध्यान ऑकस समझौते का यह मतलब नहीं कि ऑस्ट्रेलिया अपने जल क्षेत्र में परमाणु हथियारों की तैनाती करने जा रहा है। अगर वो ऐसा करता है तो इसके लिए हथियार श्रेणी के यूरेनियम की जरूरत पड़ेगी। उसके पास इनके संवर्धन की क्षमता नहीं है।

  • केपी फाबियान,पूर्व राजनयिक

पढें टेक्नोलॉजी समाचार (Technology News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट