ब्रह्मोस : क्षेत्रीय सुरक्षा देने और बाजार बनाने में जुटा भारत

खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अहम क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता के तौर पर स्थापित करने और एक रक्षा निर्यातक के तौर पर विश्वसनीयता बनाने के लिए भारत ने अपनी महत्त्वाकांक्षी ब्रह्मोस परियोजना को जरिया बनाया है।

खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अहम क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता के तौर पर स्थापित करने और एक रक्षा निर्यातक के तौर पर विश्वसनीयता बनाने के लिए भारत ने अपनी महत्त्वाकांक्षी ब्रह्मोस परियोजना को जरिया बनाया है। ब्रह्मोस की अत्याधुनिक और शक्तिशाली क्षमताएं न केवल भारतीय सेना को ताकतवर बनाती हैं बल्कि अन्य देशों के लिए इसे बेहद वांछित उत्पाद बनाती हैं। भारत ने इससे 2025 तक पांच अरब डालर के रक्षा निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही भारत की हैसियत एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में बढ़ेगी। वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने इस मिसाइल प्रणाली को खरीदने में रुचि दिखाई है। हाल के दिनों में इन दिनों के ब्रह्मोस प्रणाली को लेकर रक्षा करार पर दस्तखत किए गए हैं। आने वाले दिनों में कई और देशों के साथ ऐसे करार होने हैं।

ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के शोध और विकास का काम ब्रह्मोस एअरोस्पेस लिमिटेड करता है, जो भारत के रक्षा अनुसंधान और शोध संगठन (डीआरडीओ) और रूस के एनपीओ मैशिनोस्त्रोयेनिया (एन पीओएम) का एक संयुक्त उपक्रम है। यह पहली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारतीय सेना इस्तेमाल करती है। यह 2.8 मैक की स्पीड (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना) से वार करने के सक्षम है। इसका रेंज कम से कम 290 किलोमीटर है। इस वेग से वार करने की क्षमता का मतलब है कि ब्रह्मोस जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से युक्त किसी हवाई सुरक्षा प्रणाली की पकड़ में नहीं आएगा, जबकि उसके (ब्रह्मोस) के लिए चीन के जे20 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों (जिनकी रफ्तार 2.0 मैक से कम है) को मार गिराना आसान है।

अगले संस्करणों में मिसाइल की रफ्तार और दायरा बढ़ाने की योजना है। इसकी रफ्तार 5.0 मैक के बराबर या उससे अधिक और रेंज 1500 किलोमीटर करने का लक्ष्य तय किया गया है। पहले ही ब्रह्मोस के नौसैनिक और थल सैनिक संस्करण की सेवा ली जा रही है। भारतीय नौसेना में इसे 2005 और थल सेना में 2007 में शामिल किया गया था। इसके बाद हवा से वार करने वाले संस्करण का नवंबर 2017 में सफल परीक्षण किया गया। यह परीक्षण भारतीय वायुसेना ने सुखोई-30 एमकेआइ लड़ाकू विमान से किया।

वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में इस मिसाइल के लिए भारत ने बाजार तलाश लिया है। फिलीपींस के ब्रह्मोस आयात करने वाला पहला देश बनने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक रणनीतिक परिणामों का अनुमान लगाया जा रहा है। चीन के साथ फिलीपींस का दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय संघर्ष चल रहा है। यह बेजिंग के आक्रामक रुख के लिए प्रतिरोधक के रूप में कार्य करेगा। वास्तव में यही कारण है कि चीन आसियान देशों को ब्रह्मोस जैसे सुरक्षा उपकरण खरीदने को लेकर चेताता रहा है। इस कारण भारत को लगता है कि जो देश चीन से चुनौती महसूस कर रहे हैं, वे ब्रह्मोस को अपने शास्त्रागार में शामिल करने के लिए आगे आ सकते हैं।

रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बनने के साथ ही खुद को एक अहम रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित कर रहा है। इस रास्ते में बड़ी बाधा अमेरिका का प्रतिबंध अधिनियम यानी सीएएटीएसए है। इसे 2017 में कानून का शक्ल दिया गया। इसके तहत उन व्यक्तियों और संस्थाओं को प्रतिबंधित करने का प्रावधान है जो एक सूचीबद्ध संस्था के साथ एक अहम लेनदेन करते हैं। अभी तक तुर्की और चीन को रूस से एस-400 ट्रायंफ हवाई रक्षा प्रणाली खरीदने के लेकर सीएएटीएसए के तहत दंडित किया गया है।

भारतीय ब्रह्मोस एअरोस्पस लिमिटेड में 49.5 फीसद हिस्सेदारी रखने वाली कंपनी एन पीओएम एक सूचीबद्ध रूसी कंपनी है। यह कंपनी ब्रह्मोस में इस्तेमाल होने वाले 65 फीसद उपकरण (जिसमें रैमजेट इंजन और रडार भी शामिल हैं) उपलब्ध करवाती है। ऐसे में इस मिसाइल प्रणाली के निर्यात में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका, भारत का एक अहम रक्षा साझेदार है। विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय विभिन्न संवाद मंचों के जरिए अमेरिका के साथ भारत द्वारा एस-400 की खरीद, एके 203 एसाल्ट राइफल के लाइसेंस के तहत उत्पादन के अलावा ब्रह्मोस के निर्यात को लेकर भी वार्ता जारी रखे हुए हैं। भारत के तहत सीएएटीएसए छूट लेने की कोशिश में है।

कीमत और ताकत

ब्रह्मोस के एक रेजिमेंट की खरीद पर करीब 27.5 करोड़ डालर यानी करीब 2000 करोड़ रुपए का खर्च आता है। एक रेजिमेंट में एक मोबाइल कमान पोस्ट, चार मिसाइल लांचर, कई मिसाइल कैरियर और 90 मिसाइलें शामिल होती हैं। भारत ने वियतनाम और फिलीपींस को क्रमश: 50 करोड़ डालर और 10 करोड़ डालर के उधार का प्रस्ताव दिया है। वहीं फिलीपींस ब्रह्मोस की कम मात्रा (केवल एक बैटरी, जिसमें तीन मिसाइल लांचर और 2-3 मिसाइलें हों) खरीदने के बारे में विचार कर रहा है। भारत अपने अन्य घरेलू रक्षा उत्पादों जैसे आकाश हवाई रक्षा प्रणाली, हवा से हवा में मार करने वाली एस्ट्रा मिसाइल, एचएएल के ध्रुव हेलीकाप्टर को निर्यात के लिए बाजार में उतारना चाहता है।

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