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आधी दुनिया: चलीं अकेली घूमने

हाल ही में एक परिचित अविवाहित लड़की से बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई। पता चला कि उसने अपनी पहले वाली नौकरी छोड़ दी है। अपनी नई नौकरी पर जाने से पहले उसने तीन महीने का ब्रेक लिया था।

कुछ साल पहले एक यात्रा कंपनी ने सर्वेक्षण किया था, जिसमें बताया गया था कि अकेली घूमने वाली लड़कियों की संख्या पूरी दुनिया में लगातार बढ़ रही है।

हाल ही में एक परिचित अविवाहित लड़की से बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई। पता चला कि उसने अपनी पहले वाली नौकरी छोड़ दी है। अपनी नई नौकरी पर जाने से पहले उसने तीन महीने का ब्रेक लिया था। फिर अकेली ही यूरोप घूमने निकल पड़ी। फेसबुक और अन्य सोशल साइटों के जरिए वह अपने मित्रों-परिचितों को बताती रही कि कहां-कहां जा रही है, क्या खा रही है, किस-किस जगह पर जा रही है। किस देश की कौन-सी बात उसे सबसे अधिक पसंद आई। वहां की संस्कृति में कौन-सी बातें उसे अच्छी लगीं। वहां की यात्रा सुविधाएं कैसी हैं। लोग कैसे हैं, उनका व्यवहार कैसा है।

लौटने पर जब उसकी सहेली ने उससे पूछा कि आखिर घूमने के लिए इतना पैसा कहां से आया, तो उसने कहा कि जब एअरलाइंस की टिकटें सस्ती मिल रही थीं तो उसने पूरा ट्रेवल प्लान खरीदा था। फिर नौकरी छोड़ने के बाद पीएफ का जो पैसा मिला उसे उसने घूमने में खर्च कर दिया। अब घूम कर वह तरोताजा हो चुकी है और पूरे जोश से नई नौकरी पर जाने को तैयार है। एक दूसरी लड़की ने अंतधर्मीय विवाह किया था, लेकिन जल्दी ही दोनों में मामूली बातों पर विवाद होने लगा। इसमें गलती पति की थी या पत्नी की दोनों तय नहीं कर पाते थे। छोटी-छोटी बातें बड़े झगड़े का कारण बन जाती थीं। परिवार वालों ने तो पहले ही साथ छोड़ दिया था। दोनों ने परिवारों में सुलह कराने की भी कोशिश की, मगर दोनों ही के घर वाले अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे। अंत में इन युवा पति-पत्नी ने अलग होने का फैसला किया। लड़की इस निर्णय से बहुत परेशान थी। अपने माता-पिता के पास जा नहीं सकती थी। वे तो पहले ही कह चुके थे कि अगर अपनी मर्जी से शादी कर रही हो तो यहां कभी लौट कर मत आना। उसने दफ्तर से छुट्टी ली और क्रूज पर दुनिया की सैर पर निकल पड़ी। लौट कर उसने वह शहर ही छोड़ दिया जहां की कड़वी स्मृतियां वह साथ नहीं रखना चाहती थी। फिर एक दूसरे बड़े शहर में वह नौकरी करने चली गई।

ऐसी ही बहुत-सी घटनाएं पिछले दिनों देखने में आई हैं। जहां लड़कियां न केवल मनोरंजन और एडवेंचर के लिए अकेली घूमने निकलती हैं, बल्कि वे जीवन की त्रासद घटनाओं और मुसीबतों से निजात पाने का बड़ा साधन घूमने को समझती हैं। ये लड़कियां अब अकेली घूमने से घबराती नहीं हैं। इन्हें किसी अड़ोसी-पड़ोसी के परेशान करने वाले सवालों की भी चिंता नहीं है। ये अपने पांवों पर खड़ी हैं, तो पैसे भी हैं। भविष्य के लिए बचत करने की खास चिंता उन्हें नहीं है। क्योंकि इनके अनुसार जब जिंदगी भर नौकरी करनी ही है तो बचत करने के लिए तो पूरी उम्र पड़ी है।

वह दौर चला गया, जब लड़की को घर से बाहर निकलने तक के लिए अपने साथ एक पुरुष का साथ चाहिए था। चाहे वह गोद में उठाने लायक छोटा भाई ही क्यों न हो। इन लड़कियों की कहानियां पढ़-सुन या देख कर क्वीन फिल्म याद आती है, जिसमें लड़के के शादी से इनकार करने पर लड़की थोड़े दिन तो परेशान होती है, फिर अकेली ही फ्रांस और अन्य देशों की यात्रा पर निकल पड़ती है। और जब वही लड़का शादी करने के लिए वापस आता है, तो उसके प्रस्ताव को ठुकरा देती है। यह इस दौर की लड़की है, जो बदली हुई है।

लड़कियों की यह बदली दुनिया उनके बढ़े आत्मविश्वास को तो बताती है, यह भी बताती है कि अब वे डर कर घर में बंद होना नहीं चाहतीं। किसी परेशान करने वाली घटना से परेशान होकर अवसाद में न जाकर, उससे निपटने के तरीके ढूंढ़ती हैं। उनकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता ने उनके निर्णय लेने की ताकत को बढ़ाया है और समाज में उनके निर्णयों को स्वीकार करने की आदत भी बढ़ी है। ये लड़कियां कौन-सी नौकरी करें, क्या पढ़ें, किससे शादी करें, कब करें, कहां घूमने जाएं, किसके साथ जाएं या अकेली जाएं, शादी न चल रही हो, तो उससे मुक्ति पाएं, लेकिन शादी टूटने के बाद अफसोस न मनाती रहें या अपनी तकदीर को न कोसती रहें यह भी इनके व्यवहार, बातचीत, और हर हाल में कुछ कर दिखाने की चाहत से पता चलता है।

अब अकेली घूमने वाली लड़कियों को यह डर भी नहीं सताता कि लोग क्या कहेंगे। क्योंकि अरसे तक समाज में यह सोच रहा है कि अकेली घूमने वाली लड़कियां अच्छी नहीं होतीं। उनके अकेली घूमने से परिवार की बदनामी होती है। इसके अलावा वे असुरक्षित भी होती हैं। सूरज छिपने से पहले लौटने की घरवालों की हिदायतें भी पीछे छूट गई हैं। इसका एक कारण यह भी है कि रोजगार की तलाश में लड़कियां अपने गांव-कस्बों को छोड़ कर उन शहरों का रुख कर रही हैं, जहां उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें काम मिल सके। इन शहरों में अक्सर वे अकेली ही रहती हैं। अपने दम पर अपना जीवन चलाती हैं, इससे खुद निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ती है। बड़े शहरों में लड़कियों की जो दृश्यमानता बढ़ी है, उससे छोटे शहरों की लड़कियों को भी हौसला मिलता है। वे भी बाहर निकल कर कुछ करने की सोचती हैं।

कुछ साल पहले एक यात्रा कंपनी ने सर्वेक्षण किया था, जिसमें बताया गया था कि अकेली घूमने वाली लड़कियों की संख्या पूरी दुनिया में लगातार बढ़ रही है। 2013 में जहां यह सैंतीस प्रतिशत थी वहीं एक साल के भीतर 2014 में इकतालीस प्रतिशत हो गई थी। इस सर्वेक्षण में दस देशों की दस हजार चार सौ इक्यासी अकेली घूमने वाली औरतों ने भाग लिया था। इनमें तेरह सौ भारत की थीं। भारत के अलावा जिन देशों की औरतों ने सवालों के जवाब दिए, वे थे- आस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, स्पेन, रूस और दक्षिण पूर्व एशिया। कंपनी का मानना है कि अकेली घूमने वाली औरतों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

अब तो अकेली स्त्रियों के लिए यात्रा कंपनियां समूह में यात्रा करने की योजनाएं भी पेश करती हैं। और ये ग्रुप टूर हर उम्र की औरतों को लिए अलग-अलग तरीके से भी आयोजित किए जाते हैं। इनमें उनकी रुचियों को भी ध्यान में रखा जाता है कि वे क्या देखना पसंद करेंगी। जैसे कि बहुत-सी स्त्रियां धार्मिक स्थलों पर जाना चाहती हैं, तो कोई समुद्र के तट पर, तो कोई ऐतिहासिक इमारतों को देखने में दिलचस्पी रखती हैं। यहां तक कि महिलाएं बसों, रेलगाड़ियों में भी समूहों में यात्रा करने लगी हैं। देश-विदेश में अकेली महिलाओं के घूमने के बहुत से और अलग-अलग कारण हैं। बहुत सी लड़िकयां कहती हैं कि परिवार के सभी लोगों के साथ घूमने का समय एक साथ नहीं मिल पाता। इसलिए बेहतर है कि जब जिसे समय मिले और साधन भी हों तो वह घूम ले। फिर कई बार इतने पैसे भी नहीं होते कि सबका खर्चा उठाया जा सके, इसलिए जब घूमने लायक पैसे हों, तो घूमने की योजना बनानी चाहिए। और अकेली घूमने में कोई हर्ज भी नहीं। लड़कियों की सुरक्षा के प्रश्न जरूर होते हैं, लेकिन इनसे भी वे निपटती ही हैं। उनका कहना है कि कब तक वे डर कर घर के अंदर बैठी रहें। डरतीं तो नौकरी करने बाहर ही नहीं निकलतीं। और डर से हमेशा लड़ना पड़ता है, तभी वह हारता है।

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