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योग दर्शन: त्रिदोष और योग

आयुर्वेद में त्रिदोष का सिद्धांत महत्त्वपूर्ण है। वात, पित्त और कफ जब कुपित हो जाते हैं तो शरीर असंतुलित और रोग बढ़ने लगते हैं। इसलिए इन तीनों दोषों का सम रहना ही स्वस्थ होने की पहचान है।

yog divas, international yod divasशरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग और संयम आवश्यक हैं।

डॉ. वरुण वीर
वायु: पित्तं कफश्चोक्त शारीरो दोषसंग्रह:।
मानस: पुनरुदिष्टो रजश्च तम एव च।।
शरीर के स्तर पर तीन दोष वात, पित्त और कफ तथा मन के स्तर पर दो दोष रजस तथा तमस होते हैं। वात दोष सभी दोषों में प्रमुख तथा प्रभावशाली है। बचपन में कफ, जवानी में पित्त और बुढ़ापे में वात दोष की अधिकता मिलती है। इसी प्रकार सुबह कफ, दोपहर में पित्त तथा रात को वात दोष प्रबल होता है।

आयुर्वेद में त्रिदोष का सिद्धांत महत्त्वपूर्ण है। वात, पित्त और कफ जब कुपित हो जाते हैं तो शरीर असंतुलित और रोग बढ़ने लगते हैं। इसलिए इन तीनों दोषों का सम रहना ही स्वस्थ होने की पहचान है। जिज्ञासु पूछते हैं कि इन्हें दोष क्यों कहा जाता है? वस्तुत: जब वात, पित्त और कफ विकृत हो जाते हैं तो शरीर रोगी होने लगता है। इसी कारण इन्हें दोष कहा जाता है।

वायु वात का परिचायक और संवाहक है। सूर्य पित्त तथा समुद्र जल का संवाहक है। जिस प्रकार से पृथ्वी पर जल की जितनी मात्रा है, उतनी ही मात्रा जल की शरीर में है। सूर्य की ऊर्जा से जो भी प्रकृति में उत्पन्न हो रहा है, वैसी ही ऊर्जा शरीर में जठराग्नि तथा मानसिक भावों के द्वारा उत्पन्न हो रही है। जिस प्रकार से संपूर्ण पृथ्वी पर वायु का आवागमन तथा जहां भी रिक्तता है वहां वायु उपलब्ध है।

उसी प्रकार से शरीर में भी वायु व्याप्त है। प्राण वायु शरीर में अनेक स्थान तथा उसके कर्म के कारण अलग-अलग पांच प्राणों में विभक्तकिया गया है। ये पांच प्राण हैं- प्राण, उदान, समान, अपान और व्यान। प्राण हृदय में, उदान कंठ में, समान नाभि में, अपान मूलाधार में तथा व्यान समस्त शरीर में व्याप्त होकर कार्यरत है। वायु दूसरे दोषों और रस, रक्त, मांस, मेद आदि धातुओं को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाली, जल्दी चलने वाली है।

यह रजोगुण युक्त, सूक्ष्म, हल्की, रूखी तथा चंचल है। वायु धातु इंद्रियों की रक्षा तथा इंद्रियों को हृदय और चित्त में धारण करती है। यह जिसके साथ मिलती है उसी के जैसी हो जाती है। सूर्य से मिलती है तो गर्म तथा चंद्रमा से मिलती है तो शीतल करती है। पित्त के साथ मिलकर पित्त जैसे काम करती है तथा कफ के साथ मिलकर कफ जैसे काम करती है। वायु के बिना जीवन कुछ क्षण भी नहीं चल सकता है।

शरीर के लिए बाहरी तथा भीतरी वायु दोनों की ही आवश्यकता है। बाहरी वायु से जीवन चलता है तथा भीतरी वायु से धातु इधर से उधर आते-जाते हैं। यह शरीर में सफाई करती है, शरीर के मलों को बाहर निकालती है। केवल वायु के कारण ही शरीर की सभी धातुएं कार्य करती हैं अन्यथा सभी धातुएं अपाहिज ही हैं। यह वायु जहां भी चाहती है वहां इन्हें ले जाती है। जैसे वायु बादलों को यहां से वहां ले जाती है, उसी प्रकार शरीर के भीतर की वायु भी धातुओं को यहां से वहां ले जाती है।

वात दोष बिगड़ने के कारण
चरक संहिता के अनुसार अत्यधिक वमन, मल, मूत्र, जम्हाई आदि शारीरिक वेगों को रोकना, लंबा या अधिक उपवास, चोट लगना, अधिक स्त्री संभोग, चिंता, तनाव, रात्रि में अधिक जागना इत्यादि कारणों से वात असंतुलित हो जाता है।
हारीत संहिता के अनुसार रूखी, चटपटी, कड़वी चीजों का अत्यधिक सेवन, अधिक कसैले कड़वे पदार्थों का सेवन, अधिक बोलना, खाना तथा अधिक चलना, मसूर, मटर, मोठ, ज्वार, काला अन्न, लाल अन्न, गाजर, प्याज तथा शाकों के अधिक सेवन से भी वायु दोष होता है।

वात दोष संतुलित करने के योग
आसन : मुख्य रूप से वे आसन जो शरीर प्राण तथा मन में वायु को संतुलित करते हैं, जैसे- एकपाद आसन, ताड़ासन, नटराज आसन आदि।
प्राणायाम : बाह्य कुंभक तथा अभ्यांतर कुंभक, जितनी शक्ति तथा इच्छा हो उतनी देर तक श्वास को रोकें और कम से कम दोनों कुंभक प्राणायाम को तीन-तीन बार करें। नाड़ी शोधन प्राणायाम कुंभक का भी अभ्यास करें। त्राटक ध्यान प्रतिदिन पांच से आठ मिनट तक करें।

पित्त
यह एक पतला तरल द्रव्य है तथा गर्म है। यह अग्नि तथा जल तत्त्व से मिलकर बनता है। वात की ही तरह यह पांच प्रकार का होता है और शरीर के अलग-अलग स्थानों में रहता है। ये पांच प्रकार हैं- पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और भ्राजक। यह अग्नाशय, यकृत, प्लीहा, हृदय, दोनों नेत्र, संपूर्ण देह तथा त्वचा में रहता है। आमाशय में पाचक, यकृत और तिल्ली में रंजक, हृदय में साधक, दोनों नेत्रों में आलोचक तथा सारे शरीर में भ्राजक रहता है। जैसे वायु दोष का बढ़ना और घटना होता है, उसी प्रकार से पित्त भी बढ़ता एवं घटता है। जब पित्त कम होता है तो शरीर की गर्मी कम तथा रौनक घट जाती है।

जब इसकी वृद्धि होती है तो ठंडी चीजों की इच्छा होती है, शरीर पीला हो जाता है, नींद कम आती है, बल की हानि होती है। इसके कई कारण होते हैं। खासतौर पर भय, शोक, क्रोध, अधिक परिश्रम, जले पदार्थों का सेवन, अधिक मैथुन, नमकीन, तिल, तेल, मूली, सरसों, हरी सब्जियां, मछली, शराब तथा धूप आदि से पित्त कुपित होता है।

पित्त संतुलन के लिए योग
आसन : जानुशीरासन, पश्चिमोत्तानासन, रीढ़ संचालन, त्रिकोण, त्रियक त्रिकोणासन, अर्धमत्स्येंद्रासन। इसके अलावा जिस आसन में रीढ़ की हड्डी बाएं से दाएं तथा दाएं से बाएं मुड़ती हो, ऐसे आसन लाभकारी हैं। यों भी कहें कि जैसे कपड़े को निचोड़ा जाता है, उसी तरह जो आसन रीढ़ की हड्डी को मोड़ते हों, वे आसन लाभकारी हैं। प्राणायाम : नाड़ी शोधन प्राणायाम, शीतली, शीतकारी तथा उज्जाई प्राणायाम लाभकारी हैं। कुंभक प्राणायाम करने से बचें।

कफ
जल तथा पृथ्वी तत्त्व को मिलाकर कफ का निर्माण होता है। यह मधुर, शीतल, चिकना, सफेद तथा भारी होता है। कफ के भी पांच प्रकार हैं। क्लेदन कफ का स्थान आमाशय है। अवलंबन कफ का स्थान हृदय है। रसन कफ का स्थान कंठ है। स्नेहन कफ स्थान का स्थान सिर और श्लेष्मण कफ का स्थान संधियां हैं।

कफ प्रकोप के लक्षण
भारीपन, नींद अधिक आना, मुंह का स्वाद मीठा होना, मुंह से पानी गिरना, बार-बार कफ निकलना, बार-बार शौच जाना और आंखें सफेद होना आदि लक्षण कफ प्रकोप के हैं। कफ दोष को संतुलित करने के लिए रूखे, ठीक से गर्म पदार्थों का सेवन करना चाहिए। वमन क्रिया कफ संतुलित करने की सर्वोत्तम विधियों में से एक है।
आसन : सूर्य नमस्कार, चक्की चालन क्रिया, उष्ट्रासन, भुजंगासन, नौका आसन पेट व कमर के बल, धनुरासन आदि।
प्राणायाम : एक हजार बार कपालभाती अर्थात लगभग 12 से 15 मिनट तक। भस्त्रिका प्राणायाम पांच से सात मिनट करना।

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