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योग दर्शनः आत्म-निरीक्षण

उपवासकाल में सभी प्रकार के विचारों की संख्या को गिनें और ईश्वर से प्रार्थना करते जाएं कि वह जीवन के सभी नकारात्मक विचार व कर्मों को ना करने की प्रेरणा दे तथा साहस व आत्मिक बल से सत्कर्म करने की भावना से भरे।

Author Published on: August 2, 2020 2:40 AM
अंत में परमात्मा की शरण में तीनों ही गुणों का लोप हो जाना ही साक्षात्कार की स्थिति निर्मित करेगा।

डॉ. वरुण वीर

आधुनिक समाज में मनुष्य यह जानने का प्रयास कर रहा है कि मेरा जन्म क्यों हुआ है? मेरे जन्म का रहस्य क्या है? लेकिन वही व्यक्तिइस विचार का चिंतन कर रहा है जिसने भौतिक जगत को भली-भांति भोग लिया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जीवन का परम सुख खाना-पीना, धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा या राजसिक अथवा तामसिक सुख ही है? पूरा जीवन भोगों को भोगने के बाद भी मन में उन्हें भोगने की लालसा बनी रहती है।

मेरे कई विद्यार्थी आते हैं और पूछते हैं कि हम अपने जीवन को समझ नहीं पाए कि यह क्यों है? क्या है? इसका उद्देश्य क्या है? मैं यही कहता हूं कि सुख भौतिक जगत में भी है और आध्यात्मिक जगत में भी क्योंकि दोनों ही जगत परमात्मा के बनाए हुए हैं। सत्व, रजस और तमस भाव होने से सभी मनुष्य न तो भौतिक जगत में सुखी-संतुष्ट हो सकते हैं और न ही सत्व को छोड़कर रज-तम आध्यात्मिक जगत की ओर बढ़ सकते हैं। रजस व तमस विचारों को निरुद्ध कर सात्विक विचार व कर्मों को जीवन में बढ़ाना ही मूल व स्थिर सुखों का कारण है।

अंत में परमात्मा की शरण में तीनों ही गुणों का लोप हो जाना ही साक्षात्कार की स्थिति निर्मित करेगा। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए ‘आत्म-निरीक्षण’ के पथ पर प्रतिदिन चलना आवश्यक होगा। आत्म-निरीक्षण से ही उन प्रश्नों का समाधान होगा, जो आजकल नौजवानों के मन को आंदोलित कर रहे हैं।

यदि व्यक्तिको ईश्वर को जानना है तो पहले उसे अपने आप को जानना-पहचानना चाहिए, इसलिए आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता है। जो भी जीवात्मा ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है वह अपनी क्षमता, गुण तथा स्वभाव को जाने बिना ईश्वर को नहीं जान सकता है। शीशे के सामने खड़े होकर जो व्यक्तिकहता है कि मैं काला, गोरा, लंबा, पतला, मोटा या स्त्री-पुरुष हूं, तो यह अज्ञान है। आत्मा का कोई लिंग नहीं होता है।

भारत को छोड़कर दूसरे देशों में उत्पन्न हुए संप्रदायों या मत-मतांतरों में आत्मा के विषय में बहुत कम बातें लिखी गई हैं। एक रोचक बात एक पुस्तक में लिखी है जिसका नाम है ‘501 आश्चर्यजनक तथ्य’, उसमें लिखा है कि जीवात्मा का भार 21 ग्राम होता है। कुछ वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग मरते हुए व्यक्ति पर किया। उसे एक बॉक्स में बंद करके तोला गया। थोड़े समय के बाद वह व्यक्ति मर गया अर्थात आत्मा निकल गई। फिर उसको तोला गया। उसके शरीर का वजन 21 ग्राम कम था तो उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि आत्मा का वजन 21 ग्राम होता है। अब यदि ध्यान से सोचा जाए तो 21 ग्राम का अंतर कई कारणों से संभव है। दरअसल, आत्मा का कोई वजन, रंग या रूप नहीं होता है ।

आत्मा का स्वरूप
जीवात्मा नित्य, अनादि, काल की दृष्टि से अनंत, निर्विकार और अल्पज्ञ है। मनुष्य का शरीर जड़ है और आत्मा चेतन। इच्छा, प्रयत्न, ज्ञान आदि आत्मा के गुण हैं। कर्म उसकी शक्तिहै। अहंज्ञान उसका स्वरूप बोधक है।

जीवात्मा भी अनादि है और मोक्ष प्राप्त करना उसके स्वरूप का लक्षण है। वह कर्म अनुसार अनेक लोक में भ्रमण करती है और मोक्ष प्राप्त कर ईश्वर में विश्राम करती है। इन सभी विषयों को ध्यान में रखते हुए अपने गुण, कर्म तथा स्वभाव का निरीक्षण करना ही आत्म- निरीक्षण है।

आत्म-निरीक्षण : विधि-एक

प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व उसी स्थान पर शांत भाव से बैठें। पूरे दिन में होने वाली गतिविधि का निरीक्षण करें। देखें दिन में कितने भाव और किस-किस प्रकार के भाव मन में उठे? कितने भाव-विचार सकारात्मक थे, कितने नकारात्मक? क्या आपने किसी कर्म से किसी को कोई शारीरिक या मानसिक दुख तो नहीं पहुंचाया? इस प्रकार से विचारों की संख्या पर ध्यान देना है। प्रतिदिन इस प्रकार से आत्मनिरीक्षण करने से स्वाभाविक रूप से नकारात्मक भाव अपने आप कम होते चले जाते हैं और जीवन में सकारात्मक परोपकारी धार्मिक विचारों की संख्या बढ़ती चली जाती है।

आत्म-निरीक्षण : विधि-दो

महीने में एक बार एक दिन का उपवास रखें और उस उपवास के समय मन में आने जाने वाले विचार तथा कर्मों का निरीक्षण उसी समय करते जाएं। उपवास के समय केवल जल ही ग्रहण करें और कुछ भी न लें। यदि किसी रोग से पीड़ित हैं तो चिकित्सक के अनुसार उपवास क्रिया को करें।

उपवासकाल में सभी प्रकार के विचारों की संख्या को गिनें और ईश्वर से प्रार्थना करते जाएं कि वह जीवन के सभी नकारात्मक विचार व कर्मों को ना करने की प्रेरणा दे तथा साहस व आत्मिक बल से सत्कर्म करने की भावना से भरे।

आत्म-निरीक्षण करने से आत्मा दोषमुक्त हो जाती है। आत्मा प्रत्येक कर्म को ध्यानपूर्वक कर अपने को परमात्मा के निकट पाती है। योग में आत्म-निरीक्षण क्रिया ही आत्म-साक्षात्कार के निकट ले जाती है।

 

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