ताज़ा खबर
 

जनसत्ता रविवारी योग दर्शन: आत्मनिरीक्षण का अवसर

आजकल पुस्तक पढ़ने की परंपरा समाप्त हो चुकी है। सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान को हम इंटरनेट पर सरसरी निगाह से देख लेते हैं। इससे थोड़ी-बहुत ही जानकारी मिल पाती है। जब तक आप पुस्तकों का गहरे रूप से अध्ययन नहीं करेंगे तब तक आत्मशांति नहीं मिलेगी। इसलिए प्रतिदिन एक घंटा पुस्तकों के अध्ययन में और एक घंटा स्वयं के अध्ययन में लगाना लाभकारी होगा।

योग दर्शन।

डॉ. वरुण वीर
संपूर्ण भारत में पूर्णबंदी का अच्छा असर देखने को मिल रहा है। मैं 2003 से करीब नौ वर्ष हांगकांग में रहा। उस दौरान सार्स की महामारी उसी तरह चरम पर थी जैसे आज कोरोना महामारी। फिर भी हांगकांग में इस तरह की पूर्णबंदी नहीं की गई थी, जिस प्रकार की बंदी भारत में है। भारत और हांगकांग के जनमानस, रहन-सहन, चलने-फिरने, उठने- बैठने तथा कार्यशैली में बड़ा अंतर है। हांगकांग सत्तर लाख लोगों की भीड़भाड़ वाली आबादी का शहर है। भारत के किसी भी शहर में क्षेत्रफल के हिसाब से इतनी भीड़ नहीं मिलेगी जितनी कि वहां। यही स्थिति सिंगापुर की भी है। दोनों शहरों में पूर्णबंदी नहीं किया गया है। लगातार ‘योगा सेंटर’ खुले हैं और अधिकतर लोग घरों से ही काम कर रहे हैं। लेकिन भारत में पूर्णबंदी करना जरूरी इसलिए था कि यहां पर आम नागरिक प्रशासन की बात को गंभीरता से नहीं लेता है। वह सोचता है कि इससे कुछ नहीं होगा। इसी सोच को देखते हुए सरकार ने पूर्णबंदी का आदेश दिया है, जिसके बाद भी जगह-जगह लोगों ने इसका पालन नहीं किया। इसका कारण धैर्य का न होना है।

परिस्थितियों को समझ कर उससे लड़ने के बजाय पलायन तथा अत्यधिक भयग्रस्त होने का भाव सभी मनुष्य में होता है लेकिन यदि इस महामारी को चेतावनी के रूप में लिया जाता और जो जहां है वहीं रुक कर अपने जीवन को समझने और जानने की कोशिश करता तो बहुत ही स्वर्णिम अवसर अपने जीवन तथा अपने को पहचानने का मिलता। वैसे उन लोगों का भी इतना बड़ा दोष नहीं कहा जा सकता जो पलायन कर रहे थे। वे जहां भी काम करते थे उनके मालिकों ने धन का नुकसान न हो इस कारण से उन्हें बीच राह में छोड़ दिया। भारतीयों में विनम्र तथा परोपकारियों की संख्या में बड़ी कमी आई है। थोड़े ही लोग हैं, जो अपना नुकसान उठाकर अपनों की सहायता करते हैं। गैरों की सेवा-सहायता करने वाले तो विरले ही मिलते हैं।

इस परिस्थिति में व्यापारियों तथा उनके कर्मचारियों के लिए योग के सिद्धांत लाभकारी साबित हो सकते हैं। सत्य तो यह है कि जीवन सुरक्षित है तो सब कुछ है। यह सभी के लिए आत्मचिंतन का अच्छा अवसर है। चाहे गरीब हो या अमीर, मालिक हो या मजदूर, सरकारी कर्मचारी हो या निजी कर्मचारी सभी को सकारात्मक दृष्टि से कार्य करना चाहिए। आज सभी के हाथ में मोबाइल फोन है, सभी कोई न कोई वीडियो साझा कर रहे हैं, यहां तक तो ठीक है। लेकिन जब इतना लंबा समय कुछ न करने का मिला है तो सभी को योग के नियम ‘स्वाध्याय’ को अपनाना चाहिए, जिससे अपने आप को पहचानने में भी सहायता मिलेगी। धार्मिक तथा आध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन तथा स्वयं का अध्ययन करें।

आजकल पुस्तक पढ़ने की परंपरा समाप्त हो चुकी है। सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान को हम इंटरनेट पर सरसरी निगाह से देख लेते हैं। इससे थोड़ी-बहुत ही जानकारी मिल पाती है। जब तक आप पुस्तकों का गहरे रूप से अध्ययन नहीं करेंगे तब तक आत्मशांति नहीं मिलेगी। इसलिए प्रतिदिन एक घंटा पुस्तकों के अध्ययन में और एक घंटा स्वयं के अध्ययन में लगाना लाभकारी होगा।

स्वयं को जानने की विधि
सुबह जल्दी उठकर एकांत शांत स्थान में बैठकर या रात को सोने से पहले अपने बिस्तर पर बैठ कर इस क्रिया को किया जा सकता है। जैन शास्त्रों में इसे ‘प्रेक्षा ध्यान’ कहा गया है। प्रेक्षा ध्यान की भी कई विधियां तथा स्तर है। एक ‘श्वास प्रेक्षा’ है, जिसमें शांत भाव से केवल अपने श्वास की गति को देखना है। आरंभ में श्वास को अधिक से अधिक गहरा रखना है। शुद्ध प्राणवायु को फेफड़ों की जड़ तक अनुभव करना है और श्वास छोड़ते समय फेफड़ों में रिक्त स्थान (वैक्यूम) अनुभव करना है।

लगातार यह क्रिया करने से मन में एकाग्रता तथा शांति का भाव आने लगता है जो कि अच्छी नींद लाने में भी सहायक है। इसके पश्चात आप अपने पूरे दिन भर के कर्म को याद करें कि किसी प्रकार के कर्म, व्यवहार या विचार से सामना करना पड़ा तथा उसमें क्या कर्म ठीक था और क्या कर्म ठीक नहीं था? मन के भाव किस प्रकार के थे? विचारों व कर्म में सत्व, रजस तथा तम की मात्रा कितनी थी? आपके व्यवहार से किसी को लाभ या हानि तो नहीं हुई? ये सब सोचना आत्मनिरीक्षण कहलाता है।

करोना विषाणु मनुष्य की मूर्खता तथा तामसिक स्वभाव का परिणाम है लेकिन जब समस्या आ ही गई है तब करोना के कारण कई सकारात्मक परिवर्तन भी दिख रहे हैं। विश्व के अधिकतर देशों में पूर्णबंदी होने के कारण चोरी, हत्या, बलात्कार, हिंसा, अपराध के साथ तथा जलवायु और ध्वनि सभी प्रकार के प्रदूषण में कमी आई है। आज आप दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर में शाम होते-होते आकाश में तारे दिखाई देने लगते हैं। ऐसा लग रहा है जिस तरह से तीस-चालीस साल पहले दिल्ली प्रदूषण से रहित थी, आज वैसा ही हो गया है। पेड़-पौधे मुस्करा रहे हैं, पक्षी प्रसन्नतापूर्वक स्वच्छ आकाश में उड़ कर गुनगुना रहे हैं। मानो जहर की वर्षा रुक गई हो और अमृत की वर्षा हो रही हो, कोर्ट तथा पुलिस स्टेशन खाली पड़े हैं, चारों ओर शांति तथा सुकून दिखाई पड़ रहा है। खूबसूरत जिंदगी पता नहीं किस दिशा में बेवजह भागी जा रही थी। वैसे इस पूर्णबंदी का असर व्यापारियों पर तथा काम करने वाले करोड़ों लोगों पर पड़ेगा जिससे बचा भी नहीं जा सकता। लेकिन जरा ध्यान से शांत बैठ कर सोचें तो क्या हम सिर्फ पेट पालने के लिए ही इस धरती पर आए हैं?

जीवन को चलाने के लिए पेट भरना जरूरी है लेकिन क्या मनुष्य का केवल एक यही लक्ष्य है कि जन्म से मृत्यु तक पेट को ही भरते हुए यहां से चले जाएं? मनुष्य के जीवन का क्या और भी कुछ लक्ष्य है या केवल यही है। ‘खाओ पियो ऐश करो’ जैसी जीवनशैली का विकास पश्चिम से हुआ, जहां व्यक्ति ही सर्वोपरि है। व्यक्ति का सुख, उसका आराम, उसकी इच्छाओं की पूर्ति कैसे भी हो। हर स्थिति में जीवन सभी प्रकार के भौतिक सुख-साधनों से सजा हुआ होना चाहिए। अधिक से अधिक भोग के साथ जीवन को जिया जाए, यही सोच सबसे ज्यादा प्रभावी है। त्याग, तपस्या, समर्पण, ईश्वर भक्ति, सात्विकता, अपरिग्रह और संतोष आदि का स्थान न के बराबर है।

स्वर्णिम अवसर
एक बार भयंकर तूफान में एक नाव डूब गई। जो एक व्यक्ति बचा, वो किसी निर्जन स्थान पर जा पहुंचा। व्यक्ति विचार करने लगा कि वह जिस बड़ी दुनिया से आया है, उसे वहां से ढूंढते हुए कोई जरूर आएगा। हफ्ते, महीने तथा वर्ष बीत गए। कोई नहीं आया। व्यक्ति ने भी प्रतीक्षा करनी छोड़ दी। पांच वर्ष बाद एक जहाज उस निर्जन स्थान पर आया और उस आदमी को लोगों ने कहा कि हम तुम्हें लेने आए हैं। व्यक्ति भूल गया था कि उसे किसी का इंतजार है या फिर वापस जाना है। वह जाने के लिए हां न कर सका। लोगों ने कहा कि सोचते हो क्या हो, चलना नहीं है क्या? व्यक्ति बोला जिस जहाज से तुम मुझे खोजने आए हो ,उस पर कुछ समाचार पत्र जरूर होंगे क्या मैं जाने से पहले उन्हें देख सकता हूं? उसने समाचार पत्र देखे और बोला मुझे नहीं जाना उस दुनिया में । वो दुनिया आज भी वैसी की वैसी ही अशांति से भरी है। तुम लोग सोच भी नहीं सकते कि मैंने इन पांच वर्षों में सुख शांति और आनंद का कितना अनुभव किया है। तुम सभी नर्क में जी रहे हो। जीवन क्या है? इसका तुम्हें आभास भी नहीं है। तुम अपने अखबार संभालो और अपनी दुनिया भी। मैंने जो शांति इन पांच वर्षों में पाई हैं, वहपचास वर्षों में भी महसूस न कर सका था।

इस पूर्णबंदी ने हमें अपने भीतर गहरी शांति को पहचानने का अवसर दिया है। मैं तो यह कहूंगा कि जो भी व्यक्ति या व्यापारी अपने घर बैठकर भी काम कर रहे हैं या फिर इंटरनेट या किसी भी माध्यम से अपने को व्यस्त रख रहे हैं, उन्हें अब सब कुछ छोड़कर पूरी तरह से खाली हो जाना चाहिए। यह खाली होने का अवसर शायद आपको जीवन में दोबारा नहीं मिलेगा। अपने आप को पहचानने का यह स्वर्णिम अवसर है। पूरी तरह से खाली रह कर, अपने मन में खालीपन को स्थान दें। अंकुरित करें कुछ नए विचार या मन को रिक्त कर दें और शून्य को महसूस करें। यह शून्य ही आपको अपने निकट पहुंचा देगा। शांति और आनंद के लिए हम जीवन भर भागते-दौड़ते रहते हैं और सोचते हैं कि रिटायरमेंट होने के बाद शांति से जीवन का आनंद उठाएंगे। दरअसल, ऐसा समय कभी भी नहीं आता, यह एक भ्रम ही है।

प्रकृति ने हम सभी को यह अवसर दिया है कि कुछ समय के बाद स्थिति बिल्कुल सामान्य हो जाएगी और यह समय हमारे हाथ से निकल जाएगा तथा वैसे ही आपाधापी वाला जीवन शुरू हो जाएगा। आत्मनिरीक्षण तथा आत्म प्रकाश को प्राणायाम के द्वारा ध्यान लगाकर लाभ उठाएं। यह अवसर आपको जीवन के सन्मार्ग पर ले जाएगा। इस अवसर को सकारात्मक दृष्टि से देखें।

Next Stories
1 जनसत्ता रविवारी: बदलाव – अकेले हैं तो क्या गम है
2 जनसत्ता रविवारी सेहत: सेहत की हो गरज तो रहें बाजार के खाने से दूर
3 जनसत्ता रविवारी: दाना-पानी – स्वाद भी परंपरा भी
ये पढ़ा क्या?
X