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योग केवल आसन नहीं, शरीर के कोशों को स्वस्थ बनाने का आसान तरीका

हमारे शरीर में पांच शरीर हैं। योग की भाषा में इन्हें कोश कहा गया है- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा आनंदमय कोश। योग पांचों कोशों को पूर्णतया शुद्ध और स्वस्थ बनाने का कार्य करता है।

Author January 13, 2019 1:56 AM
हमारे शरीर में पांच शरीर हैं। योग की भाषा में इन्हें कोश कहा गया है।

योग शब्द सुनते ही ध्यान केवल योगासन पर चला जाता है। वर्तमान समय में योग शरीर तक ही सीमित रह गया दिखता है। जबसे संयुक्त राष्ट्र ने योग दिवस की घोषणा की है, तबसे विश्व के सभी देशों की राजधानियों और अन्य बड़े शहरों में विशाल संख्या में लोग योगासन करते दिखाई देते हैं। आज विश्व का एक भी ऐसा देश नहीं है, जो योग से परिचित न हो, लेकिन परिचय केवल योगासन तक सीमित है। अगर थोड़ी गहराई से देखें तो अमेरिका, जापान और इस्राइल ने योगासनों से थोड़ा आगे जाने का प्रयास किया है, जो वास्तव में योग है, जहां प्राणायाम, धारणा और ध्यान की बात के साथ-साथ अभ्यास भी किया जाता है, अन्यथा सभी अन्य देशों में योग केवल आसनों तक सीमित दिखता है।

आज भी भारत में योग की विशुद्ध परंपरा जीवित है, जहां योग केवल आसन नहीं, बल्कि आसन भी योग का एक अभिन्न अंग समझा जाता है। हमारे शरीर में पांच शरीर हैं। योग की भाषा में इन्हें कोश कहा गया है- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा आनंदमय कोश। योग पांचों कोशों को पूर्णतया शुद्ध और स्वस्थ बनाने का कार्य करता है। महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार योग के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। तीसरा नियम आसन है, लेकिन पतंजलि ने केवल ध्यानात्मक आसन की चर्चा की है- ‘स्थिरसुखमासनम’(साधनपाद-46)। योग में ध्यान के लिए वही उचित आसन है, जिसमें स्थिरता पूर्वक तथा सुख से रहा जा सके। पर गोरक्षनाथ और घेरंड संहिता में अनेक आसनों का वर्णन है, जो केवल ध्यानात्मक नहीं, बल्कि शरीर के रोगों को दूर करने में लाभकारी सिद्ध होते हैं। आसन के माध्यम से शरीर यानी अन्नमय कोश को लचीला, पुष्ट तथा बलवर्धक बनाया जा सकता है। शरीर जितना लचीला होगा, स्नायु तंत्र उतना ही स्वस्थ होगा। शरीर में ग्यारह तंत्र होते हैं और आसन शरीर के सभी तंत्रों को स्वस्थ बनाने में कारगर सिद्ध होते हैं। मुख्य रूप से चौरासी आसन माने जाते हैं, लेकिन आज के विकासशील समाज में अनेक नए आसनों की खोज पर परीक्षण चल रहे हैं। आसनों को सावधानी पूर्वक अपना कर अपने शरीर को स्वस्थ बनाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। प्रतिदिन एक घंटा आवश्यक रूप से हमें अपने शरीर के लिए निकालना चाहिए, क्योंकि यह शरीर अन्य कोशों का आधार है, इसलिए इसको स्वस्थ रखने के लिए योगासन के साथ-साथ शुद्ध सात्विक आहार भी जरूरी है। आयुर्वेद के अनुसार ऋतुभुक, हितभुक, मितभुक भोजन के अनुसार शरीर को स्वस्थ रख कर ही प्राण, मन, बुद्धि तथा आत्मा को प्रसन्न और संतुलित रखा जा सकता है। योगासनों के माध्यम से शरीर के रोगों को दूर कर तथा आने वाले रोगों से शरीर को बचाया जा सकता है। इसी प्रकार प्राणमय कोश, जो कि अन्नमय कोश से सूक्ष्म है। पूरे शरीर में प्राणवायु का संचार सुचारु रूप से चलता रहे तथा शुद्ध प्राण वायु (आॅक्सीजन) शरीर के कोने-कोने तक रक्त धमनियों के माध्यम से फैलती रहे, जिससे कि प्राणमय कोश स्वस्थ बना रहे और प्राणायाम के माध्यम से प्राणमय कोश को अत्यधिक शक्तिशाली एवं शुद्ध बनाया जा सकता है। आज के इन प्रदूषित नगरों में हमारा प्राण कितना अशुद्ध और कमजोर पड़ गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पैदा होते ही बच्चों को अस्थमा, त्वचा रोग और फेफड़ों से संबंधित बीमारियां हो जाती हैं। प्राणायाम केवल प्राणमय कोश के लिए लाभकारी नहीं है, बल्कि मनोमय कोष यानी मन और विज्ञानमय कोश यानी बुद्धि को तीव्र और स्थिर करने में अत्यंत उपयोगी है।

प्रतिदिन दस से पंद्रह मिनट प्राणायाम करने से उच्च रक्तचाप, तनाव, अनिद्रा तथा हृदय से संबंधित रोगों से मुक्ति मिल सकती है। शरीर तथा प्राण जितना शुद्ध होगा उतना ही मनोमय और विज्ञानमय कोश स्वस्थ होगा। योग में हम जितना स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलेंगे, योग उतना ही सिद्ध होता चला जाएगा। योग में मंत्रों का उच्चारण और त्राटक आदि क्रियाएं मनोमय तथा विज्ञानमय कोश को स्थिर करने वाली क्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मन में विचारों का प्रवाह सदैव बना रहता है। जिस प्रकार जन्म से मृत्यु तक शरीर में प्राण का संचार बना रहता है उसी प्रकार जन्म से मृत्यु तक मन में विचारों का आवागमन लगातार बना रहता है। चाहे स्थिति जागने की हो या सोने की मन स्थिर, नियंत्रित, शांत तथा आनंद में बना रहे, इसके लिए मन के स्तर पर यौगिक क्रियाओं को करना आवश्यक है। योग के भीतर नाद योग, मंत्र योग तथा त्राटक आदि अनेक यौगिक क्रियाओं को लगातार करने से मनोमय कोश स्वस्थ और शक्तिशाली होता है। योगासन के आरंभ और अंत करने से पहले ओम ध्वनि का लंबा उच्चारण इसलिए किया जाता है कि ध्यान आसनों पर केंद्रित रहे और करने के पश्चात लंबे समय तक ध्यान शरीर तथा मन में होने वाले परिवर्तन पर बना रहे, जिसे ‘दृष्टा’ की अवस्था कहते हैं। मन में आने वाले विचारों को केवल दृष्टा भाव से देखना धारणा की एक स्थिति है। इससे विचार में न्यूनता आती है। मन में विचार जितने न्यून और सात्विक होंगे, मन उतना ही शांत तथा आनंद में रहेगा। अन्नमय कोश से सूक्ष्म प्राणमय कोश, उससे सूक्ष्म मनोमय कोश, इससे सूक्ष्म विज्ञानमय और अंत में आनंदमय कोश सभी से अत्यंत सूक्ष्मतर है।

विज्ञानमय कोश में बुद्धि तत्त्व आता है। सुख-दुख, मान-अपमान, हानि-लाभ जो भी द्वंद्व हैं वे बुद्धि के स्तर पर ही गणना होकर आंनदमय कोश को अनुभव के लिए भेजे जाते हैं। आनंदमय कोश यानी शरीर के भीतर वह शक्ति, जिसके निर्देशन में यह शरीर, प्राण, मन और बुद्धि कार्य कर रहे हैं। शरीर, प्राण, मन और बुद्धि जितने शुद्ध सात्विक और स्वस्थ होंगे, आनंदमय कोश यानी आत्मा उतना ही गहरे आनंद में बना रहेगा। ध्यान की अनेक क्रियाओं के माध्यम से अंतिम लक्ष्य तक आनंदमय कोश का साक्षात्कार किया जा सकता है, जिसे यौगिक भाषा में आत्म-साक्षात्कार कहा जाता है। तत्पश्चात योग का अंतिम ध्येय सिद्ध होता है, जिसे महर्षि पतंजलि कृत योग दर्शन में ‘तदा द्रष्टु: स्वरूपेऽवस्थानम्’ यानी जीवात्मा परमात्मा के स्वरूप में अवस्थित होती है आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर लेती है, जो कि योग का अंतिम लक्ष्य है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को या जो भी योग को मानने या करने वाला साधक हो उसको योग के सत्य स्वरूप को संपूर्ण विश्व तक पहुंचाने का कार्य करना चाहिए। योग केवल आसन नहीं, योग विद्या अत्यंत विशाल है और समूची मानव जाति के लिए है।

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