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यादः एक गुमशुदा कलमकार

यह अविश्वसनीय लगता है, पर तथ्य है। किसी एक नाटक को देश में चार हजार बार खेला गया। यह सिलसिला जारी है।

Author नई दिल्ली | May 29, 2016 5:43 AM
स्वदेश दीपक (फाइल फोटो)

 

यह अविश्वसनीय लगता है, पर तथ्य है। किसी एक नाटक को देश में चार हजार बार खेला गया। यह सिलसिला जारी है। चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में गत वर्ष इस नाटक की सौवीं प्रस्तुति दी गई। यह नाटक ‘कोर्टमार्शल’, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ, काठमांडो और जयपुर में भी बार-बार खेला गया। मगर लेखक लापता है।

दो जून, 2006 की सुबह वह रोज की तरह सुबह की सैर को निकला। अक्सर यह सैर अंबाला छावनी के मालरोड के दोनों छोरों तक सीमित रहती। लगभग एक-दो घंटे की सैर के बाद वह अक्सर मालरोड स्थित अपने आवास में लौट आता था। आते ही सिगरेट के कश और चाय के बाद थोड़ी देर मेज पर बैठ कर लिखता। फिर नहाने के बाद नाश्ता, अखबारों को खंगालना और थोड़ी देर के लिए सुस्ताने का सिलसिला।
उस दिन वह घर नहीं लौटा। दोपहर तक प्रतीक्षा के बाद तलाश शुरू हुई। पूरा मालरोड और आसपास की सड़कों, पार्कों और कोठियों की खाली जमीन नापी गई। दोपहर के बाद पुलिस में भी चर्चा दर्ज हुई और सघन तलाश चली। मगर कहीं भी उसका कोई सुराग नहीं मिला। दोस्त वीएन राय उन दिनों हरियाणा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे। मगर दीपक की तलाश के सारे पुलिसिया प्रयास भी विफल रहे। देश भर में फैले प्रशंसकों, मित्रों से संपर्क के अलावा उन केंद्रों को भी छाना गया, जो दीपक के प्रिय स्थल थे। मसलन, ऋषिकेश, शिमला और दिल्ली। मगर पिछले दस वर्ष से इस लेखक के बारे में कुछ भी पता नहीं चल पाया।

अपनी कृतियों, जिंदगी जीने के सलीके और अपने व्यवहार के कारण वह दो जून, 2006 की सुबह तक चर्चा में बना रहा। उसे बेहद चाहने वालों और उसके कड़े आलोचकों की संख्या कमोबेश बराबर थी।

1939 में जन्मे दीपक का परिवार भारत-पाक विभाजन के बाद राजपुरा में आकर बस गया। वहां मैट्रिक तक की शिक्षा पाने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए हर रोज रेल से अंबाला छावनी जाता। अंबाला से ही उसने अंगरेजी और हिंदी में एमए किया।

दीपक उन दिनों भी विभाजन की विभीषिका से मुक्त नहीं हो पाया था। उसने और उसकी बहन ने सात दिनों तक अपने घर की छत से दंगाइयों के हाथों सैकड़ों लोगों को कत्ल होते देखा था। उन दिनों मरने वालों की आंखों में दहशत, फैली हुई पुतलियां और लुटी हुई आबरू के किस्से चौबीसों घंटे घर में चलते।

दीपक ने एक शाम बताया था कि कैसे भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट ने सभी हिंदुओं को बचाया और सभी को वहां के कस्बों, गांवों से ट्रकों द्वारा कुरुक्षेत्र में स्थापित शरणार्थी शिविरों में ले जाया गया। उसे अजब लगता था कि कैसे उर्दू और फारसी पढ़ाने वाले उसके शांत स्वभाव के शिक्षक पिता को भी उन दिनों परिवार की रक्षा के लिए बंदूक उठानी पड़ी थी। बाद में वहां से ऐसे लगभग सभी परिवार राजपुरा आकर बस गए, जो बहावलपुर, रावलपिंडी, बलोचिस्तान और मुल्तान से आए थे।

दीपक की शुरुआती दौर की कहानियां, जालंधर से प्रकाशित हिंदी मिलाप और वीरप्रताप में छपीं। उन दिनों वह दीपक भारद्वाज के नाम से लिखता था। स्वदेश दीपक के रूप में साहित्यिक पत्रिकाओं में शुरुआत मनोहर कहानियां से हुई, जिसमें दीपक की पहली कहानी ‘लाल फीते का टुकड़ा’ छपी थी। साहित्यिक जगत में उसकी हलचल का सिलसिला 1960 में ‘ज्ञानोदय’ में प्रकाशित उसकी कहानी ‘संता सिंह का बेटा बंता सिंह’ से चला था। ये वे दिन थे, जब निर्मल वर्मा, अज्ञेय, राजेंद्र यादव, प्रभाकर माचवे, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि स्थापित हो चुके थे। उन दिनों ‘साठोत्तरी हिंदी कहानी’ एक आंदोलन-सा बन गई थी। उन्हीं दिनों ‘सारिका’ में दीपक की पहली कहानी ‘अश्वारोही’ छपी। जम कर चर्चा हुई। ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित उसकी पहली कहानी ‘अहेरी’ थी। उसके साथ ही दीपक का नाम कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी की पंक्ति में शामिल हो गया। उन्हीं दिनों उसकी बेहद चर्चित कहानियों में ‘एक मुट्ठी चावल’, ‘बदलती राहें’ और ‘रिफूजी’ शामिल थीं। दीपक का पहला कहानी संग्रह था ‘अश्वारोही’, जिसमें उसे कहानी लेखन में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित कर दिया। उसके चर्चित कहानी संकलनों के नाम हैं, ‘लालफीते का टुकड़ा’, ‘संता सिंह का बेटा बंता सिंह’, ‘बदलती राहें’ आदि। दरअसल, अश्वारोही (1973) के माध्यम से ही दीपक ने अपने अभिनव लेखनशैली की गंध पूरे कथाजगत में फैला दी थी।

‘जंगल’, ‘मरा हुआ पक्षी’, ‘मातम’, ‘जय हिंद’, ‘क्योंकि मैं उसे जानता नहीं’, ‘किसी एक पेड़ का नाम लो’, ‘क्योंकि हवा पढ़ नहीं सकती’, ‘तमाशा’, ‘पापी पेट, ‘क्या कोई यहां है?’ आदि अपने प्रकाशन के बाद से महीनों तक गहन चर्चा का विषय बने रहे।
1976 में ‘धर्मयुग’ में उसकी एक कहानी ने देश के लेखन जगत में तूफान मचा दिया। उन दिनों आपातकाल लगा हुआ था। प्रकाशन के लिए जाने वाली पूरी सामग्री पहले ‘सेंसर’ होती थी और बाद में उसे प्रकाशित करने की अनुमति मिलती थी।

दीपक ने अपनी एक कहानी ‘क्या कोई यहां है?’ धर्मयुद्ध में छपने के लिए भेजी। संपादक धर्मवीर भारती ने परंपरा और प्रक्रिया के अनुसार उसे ‘सेंसर’ अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया। उन्हें लगता था, ‘सेंसर अधिकारी’ बगावती तेवर वाली उस कहानी के प्रकाशन की अनुमति नहीं देंगे। लेकिन सतही स्तर वाले सेंसर कर्मियों को उपरोक्त कहानी की संवेदनशीलता समझ नहीं आ पाई। उन्होंने प्रकाशन की अनुमति दे दी। मगर प्रकाशित होते ही केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इसका कड़ा नोटिस लिया। ‘कहानी’ के प्रकाशन की अनुमति देने वाले दोनों ‘सेंसर कर्मियों’ को निलंबित किया गया।

दीपक के दो उपन्यास ‘नंबर-5 स्क्वैड्रन’ और ‘मायापोत’ भी खूब चर्चा में रहे। दीपक के लेखन-जिंदगी का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था उसका नाटक ‘कोर्टमार्शल’। 2014 तक संकलित आंकड़ों के अनुसार यह नाटक देश भर में 4060 बार खेला जा चुका था। अलग-अलग प्रस्तुतियों में इसका निर्देशन करने वालों में अरविंद गौड़, रणजीत कपूर, उषा गांगुली, अभिजीत चौधरी आदि शामिल थे। चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में पिछले वर्ष उसकी सौवीं प्रस्तुति दी गई। ‘कोर्टमार्शल’ के अलावा उसके बेहद चर्चित नाटकों में ‘सबसे उदास कविता’, ‘जलता हुआ रथ’, ‘काल कोठरी’, ‘बाल भगवान’ आदि शामिल हैं।

1990 के बाद इस अनूठे लेखक की जिंदगी में एक विलक्षण बदलाव आया। उसने दो बार आत्महत्या का भी प्रयास किया और इसी बीच कुछ मानसिक रोगों के इलाज के लिए उसे पीजीआइ चंडीगढ़ में दाखिल रहना पड़ा। अवसाद और मनोरोग उपचार के इन दिनों में भी दीपक को लेखन ने ही बांधा और उसने ‘आत्मा और मस्तिष्क’ के ‘डार्करूम’ को एक उपन्यास का रूप दिया जो पहले ‘कथादेश’ में धारावाहिक रूप में छपा और फिर सजकमल प्रकाशन ने उसे ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ नाम से प्रकाशित किया।

साहित्य जगत में तो उथल-पुथल मची ही, मनोरोग विशेषज्ञों ने इस कुछेक मानसिक रोगों के अध्ययन का एक प्रामाणिक और अनुभूत दस्तावेज भी माना। अनेक चिकित्सा सेमिनारों में भी इस पर भरपूर चर्चा हुई। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मनोरोग चिकित्सकों एनएन विज और वीके वर्मा ने ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ के लेखक के रूप में स्वदेश दीपक की भरपूर सराहना की।

दीपक की कृतियों में से अधिकतर ‘दुखांत’ पर समाप्त होती हैं, मगर अक्सर आलोचकों का यही मत रहा है कि लेखक हर रचना में अपने पात्रों के साथ-साथ भरी हुई बंदूक या पिस्तौल लेकर चलता दिखता है।

लीक से पूरी तरह हट कर चलने वाले इस लेखक से मेरा समीप्य 1966 में तब हुआ जब मैं वहां एक दैनिक के समाचार संपादक के रूप में नियुक्त हुआ। उससे पहले उसी अखबार के साहित्य संपादक के रूप में मैं ‘स्वदेश भारद्वाज’ के नाम से दीपक की प्रारंभिक कहानियां प्रकाशित कर चुका था। उन दिनों दीपक एअरफोर्स के एक स्कूल में पढ़ाता था। बाद में उसे अंबाला छावनी के ही जीएमएन कॉलेज में नौकरी मिल गई। हालांकि मेरी अखबारी जिंदगी शाम से शुरू होती थी, मगर दीपक से मुलाकात कमोबेश रोज का सिलसिला थी। उन दिनों अंबाला छावनी में एक अन्य लेखक राकेश वत्स भी बेहद सक्रिय थे। मगर दोनों में सृजन और कहानी आंदोलन को लेकर भीषण टकराव रहता था। राकेश भी उतना ही गरममिजाज था, जितना कि दीपक। एक-दूसरे पर तंज भी कसे जाते। मगर ऐसे भी लम्हे आते, जब दोनों एक-दूसरे की सृजनशीलता की तारीफ भी करते।

दोनों को हरियाणा का सर्वोच्च ‘सूरदास सम्मान’ मिला, और बाद में दीपक को केंद्रीय संगीत-नाटक अकादमी से भी नवाजा गया। संवेदनशीलता का यह भी एक चरम है कि दोनों की स्मृति या उपलब्धि पर कभी कोई संगोष्ठी या शोध कार्य, सरकार या अकादमियों ने नहीं किया। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि दोनों की कोई भी कृति, सर्वोच्च सम्मान पाने के बावजूद अकादमियों ने प्रकाशित नहीं की।

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