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चिंताः कार्टूनों का प्रभाव

ब च्चे हमारे परिवाररूपी उपवन के कोमल फूल हैं। ऐसे फूल जो खिले-खिले और रंग-बिरंगे होते हैं।

Author April 2, 2017 1:56 AM
बच्चों के मनोरंजन के नाम पर कई चैनल लगातार कुछ-न-कुछ परोसते रहते हैं। ये चैनल बच्चों को एक ऐसे मायावी संसार में ले जा रहे हैं जो यथार्थ से कोसों दूर है।

ब च्चे हमारे परिवाररूपी उपवन के कोमल फूल हैं। ऐसे फूल जो खिले-खिले और रंग-बिरंगे होते हैं। संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म होने के साथ ही बच्चों के लिए परिवार के सभी सदस्यों से खुद को जोड़ पाना अब असंभव हो गया है। आज का दौर एकल परिवार का हो चुका है। इस स्थिति का फायदा टीवी चैनलों को खूब मिला। इन परिवारों के बच्चे अब ज्यादातर अपना समय टेलीविजन के सामने ही गुजारते हैं। दादा-दादी, नाना-नानी के किस्सों की अवधारणा को चैनलों ने वस्तुस्थिति को देखते हुए लगभग खत्म ही कर दिया है। बच्चों के मनोरंजन के नाम पर कई चैनल लगातार कुछ-न-कुछ परोसते रहते हैं। ये चैनल बच्चों को एक ऐसे मायावी संसार में ले जा रहे हैं जो यथार्थ से कोसों दूर है। कथा-कहानियों के बहाने ‘कार्टून’ की सोच को सामने लाया गया। बच्चों के बीच ये कार्टून चरित्र लोकप्रिय होते गए। चैनलों द्वारा इसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए कई कार्टून-चरित्र विकसित किए गए। बच्चे भी इन फंतासियों में बड़ी आसानी से फंसते गए। सबसे ज्यादा फायदा व्यावसायिक चैनलों ने उठा। इन चैनलों ने बच्चों के कोमल मन को आसानी से अपनी गिरफ्त में लेने के लिए जिस संजीदगी से इसका जाल फैलाया, उसमें बच्चे इस कदर फंस गए कि लाख चाहने पर भी वे बाहर नहीं आ पा रहे हैं।

दो-चार बच्चे जब कहीं मिल जाते हैं तो उनके बीच के वार्तालाप के विषय अक्सर कार्टून होते हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए जो कार्टून फिल्में बनाई जा रही है, उसमें दो ही तरह के चरित्र देखे जा रहे हैं। पहला जो सकारात्मक किरदार होता है या यों कहें कि जो हीरो होता है और दूसरा जो नकारात्मक किरदार होता है या खलनायक होता है। दोनों ही किरदारों के साथ सहनायक या सहखलनायक के किरदार जुड़े होते हैं। इन सभी के बीच कथा का विस्तार देकर मार-धाड़ दिखाई जाती है। छोटी-छोटी बातों के लिए मारपीट का दृश्य बेहद डरावना होता है। क्या ऐसी कार्टून फिल्मों या धारावाहिकों में मार-पीट के दृश्य बच्चों को हिंसक नहीं बनाते? आज बच्चे भी कोरी-कल्पना और चमत्कार में खोते जा रहे हैं। उसे लगता है कि काश! वह भी समोसा खाता, तो उसमें अथाह शक्ति आ जाती। उसके पास भी ऐसी साइकिल होती जो उड़ सकती, पानी पर तैरती हुई चलती जाती। ऐसी अनावश्यक कल्पना से हम आखिर बच्चों को क्या देने पर उतारू हैं? कुछ लोग मानते हैं कि बच्चों को यथार्थ नहीं दिखाया जा सकता है, उसे तो कल्पना के पंख ही फैलाने दीजिए। लेकिन हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इन चरित्रों को देखने की इतनी ललक बच्चों में प्रवेश कर गई है कि वे अब ड्राइंग-रूम से बाहर गलियों में, पार्कों में या खेल के मैदानों में आने से कतराने लगे हैं। घर में बैठे-बैठे फरमाइश करते हुए वे फास्ट-फूड मांग रहे हैं। मम्मी-पापा भी बच्चों की जिद के सामने बेबस नजर आते हैं। टीवी और फास्ट-फूड बच्चों को शक्तिहीन बनाने के खतरनाक माध्यम बन चुके हैं। खेल के मैदानों में आने से जहां बच्चे शारीरिक तौर पर मजबूत बनते थे, धूल-मिट्टी और घास के खेल मैदानों में दौड़ने-भागने से उनके अंदर जो स्फूर्ति बनी रहती थी, उसकी जगह शारीरिक शिथिलता ने ले ली है।

आजकल बच्चों में क्षणिक उत्तेजना भी बढ़ रही है। यह आवेग उन्हें विभिन्न कार्टून किरदारों से ही मिल रहा है। जिसमें वह अपने भीतर का हीरो देखता है, वह हीरो तो यथार्थ से दूर काल्पनिक पात्र है, लेकिन बच्चे यह समझ नहीं पा रहे हैं। यहां गौर करने की बात है कि अभिभावकों को भी इतना समय नहीं है कि वे बच्चों की हर गतिविधियों पर नियंत्रण रखे। ऐसे कार्टून चैनलों को वे सहजता से स्वीकारते भी हैं। बच्चों की मांग पर ‘किड्स पैक’ तैयार हो रहे हैं। लगता है कि अभिभावक अभी इसके हानि-लाभ की फिक्र से दूर हैं। माता-पिता तो बस इतने में ही खुश हैं कि उनके बच्चे कम-से-कम उन्हें तंग तो नहीं करते।

आज तरह-तरह के सुपरमैन ने भारतीय लोकनायकों के चरित्रों को धुंधला कर दिया है। बच्चे राम, कृष्ण, गांधी, गौतम, महावीर, दयानंद, विवेकानंद, सुभाष, मौलाना आजाद, कलाम आदि के चारित्रिक पहलुओं की ओर नहीं भागते, उन्हें तो आज बस टॉम, जैरी, आॅगी, मोटू, बेन टेन, पतलू, बबलू, डबलू, डोरा, जॉन, झटका जैसे किरदारों की कहानियां खूब याद है। ऐसा किसके कारण है? क्या सिर्फ ये चैनल ही दोषी हैं? क्या ये बाजार ही दोषी है? क्या हम दोषी नहीं? आज का परिवार दो बच्चों से अधिक की इच्छा नहीं रखता है।
शोधों से पता चला है कि जो बच्चे लगातार दो से तीन घंटे टीवी स्क्रीन के सामने रोजाना अपना समय बिताते हैं, उनमें एकाकी होने की बहुत आशंका रहती है। आंखें खराब होती हैं, सो अलग। और तो और ये कार्टून चरित्र क्या बच्चों को कोई संस्कार दे पा रहे हैं?

वै से कुछ चरित्र सार्थक भी हैं। अगर बच्चों को कार्टून चरित्र ही अधिक भाते हैं तो विकल्प के तौर पर क्यों न इन कार्टून पात्रों के स्थान पर यथार्थ चरित्रों को ही सामने लाया जाए। छोटे-बच्चों से ही अभिनय कराते हुए यथार्थ फिल्मों का ही निर्माण किया जा सकता है। विभिन्न महापुरुषों के बचपन के जीवन-प्रसंगों को परदे के माध्यम से ही दिखाया जाए। कम-से-कम कल्पनालोक में बच्चों को विचरण कराने से यह तो अच्छा होगा कि वे यथार्थ की नजर से अपने जीवन को इन आदर्शों के साथ जोड़ सकेंगे।
टीवी से चिपके रहने के कारण आज बच्चों में सामाजिकता का भी सर्वथा अभाव होता जा रहा है। हमें वक्त रहते इस विषय को लेकर व्यावहारिक होना होगा। हमें बचपन को इस सही दिशा में मोड़ना होगा, ताकि बचपन, बचपन ही बना रहे। बच्चों की मासूमियत फूलों की मानिंद बरकरार रहे। गलत कार्टून बच्चों पर पर गलत प्रभाव डालते हैं। बच्चों में स्वयं सही-गलत का फर्क करने की समझ नहीं होती, इसलिए यह बड़ों की जिम्मेदारी है कि उनके लिए जो चीजें तैयार की जाएं, वे सुविचारित हों, न कि पैसा कमाने के लिए। हम बच्चों को तकनीकी तौर पर स्मार्ट होने के साथ-साथ भावनाओं, परंपराओं और मूल्यों को लेकर भी स्मार्ट बनने को प्रेरित करें। चरित्रों के इस ह्रास काल में नैतिकता की महती आवश्यकता है। इसलिए कार्टूनों को बच्चों जैसा बनाना होगा। १

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