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समकालीन सिनेमा में स्त्री-मुक्ति

सिनेमा ‘आम’ जनता के लिए बनाया जरूर जाता है पर उसका उद्योग पूंजीवादी है जो अपने अंदर प्रवेश करने के लिए सिर्फ प्रतिभा की डिमांड नहीं करता है।

Author March 19, 2017 5:50 AM
आखिरी बार तापसी फिल्म रनिंग शादी डॉट कॉम (2017), द गाजी अटैक (2017) और नाम शबाना (2017) में नजर आई थीं।

रमा

हिंदी सिनेमा के इन सौ बरसों में निर्देशकों की नजर एक ओर जहां भारतीय समाज की विडंबनाओं और उपलब्धियों को अभिव्यक्ति देने में रही, वहीं फिल्मों में तमाम साहित्यिक और सामाजिक विमर्शों को भी जगह मिली। ‘दलित विमर्श’ और ‘आदिवासी विमर्श’ के साथ ‘स्त्री विमर्श’ ने भी इस बीच हिंदी सिनेमा में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। बहुत दिन नहीं हुए जब नायिकाओं को मात्र नाचने-गाने, नायक के पीछे घूमने वाली प्रेमिका या मनोरंजन का साधन समझा जाता था। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में ही सिनेमा ‘स्टार’ से टूट कर ‘आम’ तक पहुंच गया। आज भी सिनेमा को मनोरंजन का साधन मानने वालों की संख्या अधिक है और इसके लिए वे फिल्मकार जिम्मेदार हैं जो दिमाग ताख पर रख कर फिल्म देखने की अपील करते हैं। लेकिन,आज भी कुछ निर्देशक हैं जो फिल्मों को एक सामाजिक जिम्मेदारी समझ कर उसका निर्माण करते हैं। ‘लीक नहीं पीटते’, बल्कि ‘लीक को तोड़ते’ हैं और मनोरंजन के नाम पर दर्शकों का नैतिक पतन नहीं करते हैं। भारतीय सिनेमा में स्त्री जीवन की छवि को समझने के दो कोण है महत्त्वपूर्ण हैं। पहल, वे फिल्में जो स्त्री-समस्याओं को ध्यान में रखकर ईमानदारी से बनाई जा रही हैं । दूसरा, सिनेमा में स्त्री को अपनी जगह बनाने के लिए किए गए संघर्ष और समझौते। जाहिर है कि सिनेमा ‘आम’ जनता के लिए बनाया जरूर जाता है पर उसका उद्योग पूंजीवादी है जो अपने अंदर प्रवेश करने के लिए सिर्फ प्रतिभा की डिमांड नहीं करता है।

‘डिमांड’ शब्द, सिनेमा का ‘छिपा रुस्तम’ है। समय-समय पर यह डिमांड यौन-शोषण से बलात्कार तक की यात्रा करता है। सिनेमा उन्मुक्त विधा का साधन है। सफलता के लिए उन्मुक्तता और दैहिकता का प्रचुर मात्रा में प्रयोग होता है। लेकिन, बहस इस पर भी नहीं है। लेकिन, सवाल उनके लिए है जो अपनी साफ-सुथरी छवि के साथ और अपनी प्रतिभा के दम पर सिनेमा में अपनी जगह बनाना चाहती है। यहीं पर संघर्ष और समझौते का सवाल उठाना लाजिमी हो जाता है। किसी भी व्यक्ति का संघर्ष जब समझौते में तब्दील होता है तो नैतिकता, सभ्यता और संस्कृति जैसे शब्द या तो अपना अर्थ खो देते हैं या फिर दर्शकों में संवेदनाओं को लुभाने का साधन बन जाते हैं। कई भाषाओं की फिल्में हिंदी भाषा में अनुवाद होकर आने लगीं हैं। जहां तक भारतीय सिनेमा में तमिल, तेलुगू और भोजपुरी सिनेमा (इनका बाजार अरबों में है) को छोड़ दें तो हिंदी और बांग्ला में स्त्री विमर्श के बिंदुओं पर बात हो सकती है। तमिल, तेलुगू और भोजपुरी सिनेमा में नायिका की भूमिका नायक के तनाव और खुशी को नाच गा कर बांटने से अधिक नहीं है। भोजपुरी समाज में, जहां नैतिकता और संस्कृति की बात सबसे अधिक की जाती है, वहां पर अश्लीलता और उत्तेजना कुछ ज्यादा ही है, लेकिन इसके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं होता।

बं गाल का सिनेमा स्त्री मुक्ति के अनसुलझे प्रश्नों को सुलझाने में अग्रणी रहा है। इसकी वजह साफ है कि वहां शिक्षा और विद्रोह हमेशा से रहा है। यह क्षेत्र अपने समाज, संस्कृति, साहित्य और भाषा के प्रति जागरूक रहा है। उसकी यह जागरूक चेतना बांग्ला फिल्मों में भी दिखती है। साहित्य और सिनेमा के संबंध हमेशा से रहे हैं, इस नजर से देखें तो बांग्ला साहित्य की कई रचनाओं पर क्लासिकल फिल्मों का निर्माण भी हुआ। शरतचंद्र इसके सबसे जीवंत और प्रभावशाली उदाहरण हैं। उनकी रचनाओं पर बनी फिल्मों में मध्यमवर्गीय समाज की स्त्रियों के अंत:स्थल में उतारकर देखा जा सकता है। वह अपने जीवन के प्रति आने वाली अवरोधों और संघर्षों से घबरा कर नायक के सीने से दुबक कर सिसकती नहीं हैं बल्कि उसके लिए अपने आपको मानसिक रूप से तैयार करती हैं। बांग्ला फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा में भी बहुमूल्य योगदान दिया है। सत्यजित रे, बिमल राय, ऋतुपर्णा सेन, अपर्णा सेन आदि फिल्मकारों ने यथार्थवादी सिनेमा की परंपरा को जो मजबूती दी, उससे हिंदी सिनेमा ने बहुत कुछ सीखा।

हिंदी सिनेमा में स्त्री-विमर्श को जो स्पेस मिला, उसमें समांतर सिनेमा कि बहुत बड़ी भूमिका है। ऐसा पहली बार हुआ कि जब स्त्री समस्याओं को उसी तरीके से दिखाने कि कोशिश कि गई जिस तरह कि जेनुइन समस्याएं उनकी हंै। कला सिनेमा ने स्त्री जीवन के उस यथार्थ को उजागर करने कि कोशिश की, जो परदे के अंदर घुटन कि तरह थी। श्याम बेनेगल इस सिनेमा के केंद्र बिंदु हैं। उन्होंने पुराने से सीखा और नए को सिखाया। समांतर सिनेमा में स्त्री के उस समाज की समस्याओं को भी जगह मिली जिन्हें हम अनैतिक या गैर रूरी कह कर समझ कर टाल रहे थे। विधवा समस्या, वेश्या जीवन की समस्या और उन तमाम स्त्रियों की समस्या को स्पेस मिला जिन्हें कभी इंसान ही नहीं समझा गया। सभ्यता और नैतिकता के नाम पर समाज के हाशिए पर खड़ी स्त्रियों के अंदर के इंसान को समझने से नकारते हुए हिंदी सिनेमा उसे सिर्फ आदर्शवादी और ममतामयी मां, बहन और बेटी के रूप में गढ़ते-स्थापित करते हुए चुपचाप आगे बढ़ रहा था। इससे पहले, मुख्यधारा की फिल्में-मदर इंडिया, औरत, साहब बीवी और गुलाम पाकीजा आदि में भी स्त्री जीवन के यथार्थ को दर्शाया गया है। लेकिन, यह फिल्मीं भी एक रूमानी भावुकता के साथ खत्म होती हैं। समांतर सिनेमा उसके आगे की कड़ी है। मंडी, बाजार, भूमिका, उमराव जान, मायामेम साहब से होते हुए फायर, वाटर, फिजां, लज्जा, पिंजर आदि तक आते हुए नैतिकता; (जिसे कटु भाषा मे थोथी नैतिकता कहते हैं) का लबादा हट गया। दबी हुई आवाजें चीखती हैं, इसलिए ‘हाइवे’ की नायिका (जिसका शोषण उसके चाचा ही करते हैं और मां सब जानते हुए भी चुप) अंत में मौका मिलता है तो कुछ कहती नहीं सिर्फ चीखती है। यह कोई मामूली चीख नहीं है बल्कि उन चुप्पियों के खिलाफ है, जिसने हमारे घरों में हमें बेगाना बना दिया है।
दो हजार के बाद की फिल्मों में महिलाओं के जीवन की प्रस्तुति में जिस तरह का बदलाव हुआ, वह तमाम विवादों के बावजूद स्वागत योग्य है। बात स्त्री-मुक्ति और संघर्ष की हो तो इस बाजारू समय में थोड़ा सा उत्तर-आधुनिक होने में भी कोई बुराई नहीं है। दरअसल, औरत की जिस यौनिकता का हमेशा दोहन किया जाता रहा है, वही अब उसकी ढाल है। महिलाओं के लिए सिनेमा की दुनिया में पूछ तभी तक है जब तक उनका सौंदर्य और उन्मुक्तताउनके साथ है। स्त्रियों ने यह बखूबी समझ लिया है। इसलिए वह खुलकर उसका उपयोग कर रही हैं। जिस उद्योग में ‘जो दिखता है वो बिकता है’ और ‘यहां सिर्फ सेक्स और शाहरुख बिकता है’, टैग लाइन हो, वहां अश्लीलता का सवाल न हो, ऐसा हो नहीं सकता। लेकिन, सबकुछ के बावजूद स्त्री के लिए हमेशा कछ न कुछ बेहतर होता रहा है। तकनीकी और संसाधनों ने उनके सपनों के सामने कई विकल्प रख दिए हैं। सिनेमा में स्त्री शोषण की एक बहुत बड़ी वजह उसका सिर्फ नायिका होना था और यह कि सिनेमा बनाना सिर्फ पैसे वालों का काम है, लेकिन अब ऐसा नहीं। कुछ वर्षों में स्वयं स्त्रियों ने निर्देशन और लेखन की भी बागडोर संभाली है । मेघना गुलजार, लीना यादव, रीमा कातगी, किरण खान, जोया अख्तर जैसी संवेदनशील स्त्री फिल्मकारों ने महिलाओं की आंतरिक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी है। मेघना गुलजार की ‘फिलहाल’ में ऐसा लगता है जैसे दो दोस्तों की ऐसी कहानी पढ़ रहे हैं जिन्हें एक दूसरे की परवाह इस कदर है कि उन्हें अपनी दुनिया के गम छोटे लगते है। ‘पिंक’ हमारे समय और समाज का ऐसा सच दिखाती है जिसमें झूठ का घुन चिपका हुआ है। पिंक देखने से पहले मन में अचानक ख्याल उठा था कि कहीं यह फिल्म ‘गुलाब गैंग’ का विस्तार तो नहीं है। ‘पिंक’ में जिस ‘न’ की व्याख्या की गई है वह सिर्फ नकार और नकारात्मकता का प्रतीक नहीं है बल्कि नकार के विपक्ष में मजबूत गवाही है।

सिनेमा दरअसल नैतिकता और परंपरा के तमाम बाड़ेबंदिया तोड़ चुका है। ‘रॉकस्टार’ की नायिका, नायक से अश्लील फिल्म देखने, शराब पीने के बाद जब खुलती है और यह कहती है ‘वापस आकर खूब गंद मचाएंगे’, तो उसे सुनकर बुरा नहीं लगता, बल्कि उममें हम स्त्री को मुक्त होते हुए देखते हैं। इतना ही नहीं, हम जिस नायिका के छुई-मुई और शरमाते-लजाते रूप से प्रेम करते हैं उसे ‘दबंग’ का नायक जब कहता है-‘भयंकर खूबसूरत लग रही हो’ तो सुंदरता की उस सीमा तो तोड़ देता है जिसे भारतीय दर्शक देखने की आदत डाल चुका है। नायक के पीछे भागती और उसके गाना गाती ‘दबंग’ कि नायिका जब यह कहती है, ‘मार से नहीं प्यार से डर लगता है साहब’ तो वह हिंदी सिनेमा के उन तमाम नायिकाओं पर भारी पड़ जाती है जो प्यार में अपने आपको न्योछावर करती फिरती हैं। १

 

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