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‘आधी आबादी’ कॉलम में कुलीना कुमारी का लेख : लेखन में महिलाएं

ये सब बातें अपनी जगह हैं, मगर बदलते समय के साथ न केवल महिलाओं के कार्यक्षेत्र बढ़ रहे हैं बल्कि पुरुष भी बदल रहे हैं और महिलाओं के प्रति उनमें उदारता बढ़ती दिख रही है।

women, journalism, kuleena kumari, article, aadhi aabadi, column, jansatta, ravivariचित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

चाहे धर्मग्रंथ किसी का भी हो, मुख्य भूमिका में पुरुष ही दिखाई पड़ते हैं। पुरुषवादी सत्ता का प्रभुत्व, उनके तिकड़म, किसी भी रूप में महिला को जीतना, बहुपत्नी प्रथा का बोलबाला, अपने रिश्तेदारों या पड़ोसियों से लड़ाई और विजयी की यशगाथा…आदि कुछ भी विषय हो, सब जगह लेखक के तौर पर पुरुषों का ही वर्चस्व दिखाई पड़ता है।

इन धर्मग्रंथों में महिला के लिए मां के रूप को ही जैसे इज्जत दी गई है, बाकी रूप गौण…। प्राचीन गं्रथों की ये सब बातें हमें बताती हैं कि उस काल में लेखिकाओं की संख्या नगण्य सी रही होगी, तभी महिलाओं की आवाज इन ग्रंथों में उभरकर नहीं आई। हां, गार्गी और मैत्रेयी जैसी कुछ स्त्रियों के नाम जरूर लिए जाते हैं, मगर उस युग के हिसाब से ये तो उदाहरण मात्र हैं।
हां, आगे चलकर- मीरा का नाम जरूर कुछ अलग हटकर और महिला की सशक्त आवाज के रूप में लिया जा सकता है। उन्होंने अपने परिवार या ससुराल वालों के विरोध के बावजूद न केवल साधु-संन्यासियों की संगत स्वीकार की, बल्कि कृष्ण-प्रेम पर अपनी प्रमुख रचनाएं या गीत लिखकर अपनी छाप समाज पर छोड़ी।

आजादी से पहले अंग्रेजों के प्रभाव और शासन में देश में कई बदलाव आए, जहां सती-प्रथा और छुआछूत जैसी कुरीति को बंद किया गया। बड़ी संख्या में स्कूल खोले गए और लड़कियों के लिए भी शिक्षा का द्वार आसान हो पाया। गांधीजी के आह्वान पर न केवल महिलाएं भी आजादी के आंदोलन में अपनी भूमिकाएं निभार्इं बल्कि लेखन के क्षेत्र में भी लेखिकाओं का एक प्रमुख वर्ग तैयार हुआ। महादेवी वर्मा हिंदी कविता के छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। सुुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ लिखकर जैसे महिला की यशगाथा लिखने की नई परंपरा की शुरुआत की।

आज के दौर में भी कई लेखिकाओं ने अपनी भूमिका निभाई है। मृदुला गर्ग, मन्नू भंडारी, सुधा अरोड़ा जैसी अनेक महिलाओं ने लेखन क्षेत्र में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। वैसे मैत्रेयी पुष्पा, रमणिका गुप्ता और बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने साहसी लेखिका के तौर पर अपनी पहचान बनाई है और उनकी लेखनी में अक्सर एक धार पाई जाती है। समकालीन लेखन में दलित स्त्री विमर्श भी मुख्य रूप से उभरा है। विमल थोराट, अनीता भारती, रजनी तिलक, रजत रानी मीनू जैसे नाम इस क्षेत्र में अपनी विशेष भूमिका निभाती हुई नजर आ रही हैं।

समकालीन लेखन में महिलाएं पीछे नहीं है मगर अधिकतर लेखिकाएं कुछ गिने-चुने क्षेत्रों में ही अपनी कलम चलाती हैं,जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों संबंधी क्षेत्र में। ज्यादातर लेखिकाएं प्रेम, सेक्स, महिला-पुरुष की समानता, अपराध और धर्म जैसे विषयों पर या तो चुप रहती हैं या समाज में चल रही लीक का पालन करती हैं। हां मां की महानता और महिला की पीड़ा को खूब व्यक्त किया जा रहा है, मगर इसके समाधान या विकल्पहीनता के साथ। पत्र-पत्रिकाओं में लेखिकाओं की भागीदारी कम दिखती है तो इसकी कई वजहे हो सकती हैं।

पुरुषों को जिस तरह से लिखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, वैसा माहौल और प्रोत्साहन महिलाओं को नहीं मिलता। अगर महिला घरेलू है तो घर के काम से फुरसत नहीं मिलती और बाहर की भी जिम्मेवारी है तब तो और दिक्कतें हैं समय निकाल पाना। इसीलिए कितनी ही महिलाएं जिनमें लिखने की अच्छी समझ और क्षमता होती है, दबी रह जाती हैं या लेखकीय योगदान की वह बहुत हिस्सेदार नहीं बन पातीं। जबकि पुरुष के लिए सिर्फ बाहर की भूमिका तय होती है, घर आने पर भी वे घरेलू जिम्मेदारी से मुक्त रहते हैं। इसीलिए लेखन में अधिक भागीदार हो पाना पुरुषों के लिए ज्यादा संभव हो पाता है।

बहुत से पुरुष मानसिकता के शिकार लोग नहीं चाहते हैं कि उनकी पत्नियां लिखें या लेखिका बनें क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं उनके दुराचार को वे अपनी लेखनी के माध्यम से बाहर न निकाल दें। इसीलिए वे पत्नी को इसकी इजाजत नहीं देते और इसीलिए भी महिलाएं हतोत्साहित हो जाती हैं। लेखिकाओं को अपने लेखन के विस्तार और प्रचार के लिए अन्य लेखिकाओं के साथ-साथ पुरुष लेखकों से भी मिलना पड़ सकता है, जो उन्हें पसंद नहीं होता, इसलिए भी लेखन के क्षेत्र में महिला पिछड़ी रह जाती है।

अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं के मालिक-संपादक पुरुष ही होते हैं और वे आसानी से महिला लेखकों को अपने पत्र पत्रिकाओं में जगह नहीं देते। इस कारण भी महिला लेखन हतोत्साहित होता है। मगर तमाम कमियों के बावजूद एक कमी खुद महिला की इच्छाशक्ति और प्रयास की भी होती है। एक कमी यह भी है कि आज भी हिंदी लेखन के क्षेत्र में मानदेय नहीं दिए जाते या दिए भी जाते हैं तो बहुत कम। यह वजह भी उत्साहहीनता के बड़े कारणों में शामिल है। जब लेखकों को जरूरत के हिसाब से कमाई न हो तो फिर लिखने की वजह और उसके लिए उत्साह बन नहीं पाता।

ये सब बातें अपनी जगह हैं, मगर बदलते समय के साथ न केवल महिलाओं के कार्यक्षेत्र बढ़ रहे हैं बल्कि पुरुष भी बदल रहे हैं और महिलाओं के प्रति उनमें उदारता बढ़ती दिख रही है। हमारे राजनेता और प्रमुख पदों पर कायम पुरुषों का एक वर्ग आज भी समय-समय पर महिलाओं पर विवादास्पद बयान देकर अपनी सोच जाहिर करने में पीछे नहीं रहता। मगर महिला अब इन सबसे डरने वाली नहीं। अपने अनोखे और नई सोच के साथ अपनी कलम की धार बढ़ाकर वह दिनोंदिन सशक्त हो रही है। न केवल उसके लेखकीय प्रभाव से सामान्य महिलाओं में बदलाव होगा, कुरीतियां और उसकी गुलामी की बेड़ियां टूटेंगी। आने वाले दिन लेखन के क्षेत्र में महिलाओं के लिए और भी खास होंगे।

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