ताज़ा खबर
 

नगालैंड की कविता में स्त्री-विमर्श

यह सही है कि हाल ही में हुए स्त्री-मुक्ति आंदोलनों या साहित्यिक कृतियों के बल पर नगा नारीवाद, काले नारीवाद की तरह अभी कोई खास ताकत नहीं बन पाया है, फिर भी स्त्री-मुक्ति की एक लहर जरूर नगा-स्त्री के मानस को छू गई है।

Author July 31, 2016 1:59 AM

रमणिका गुप्ता

आज नगा नारीवाद दृढ़ता से युवाओं और महिलाओं की कविताओं और निबंधों में अभिव्यक्त हो रहा है। यह नगालैंड की जनता का ही नहीं बल्कि नगालैंड के बाहर भी लिंग आधारित हिंसा और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर प्रश्नों पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।

यह सही है कि हाल ही में हुए स्त्री-मुक्ति आंदोलनों या साहित्यिक कृतियों के बल पर नगा नारीवाद, काले नारीवाद की तरह अभी कोई खास ताकत नहीं बन पाया है, फिर भी स्त्री-मुक्ति की एक लहर जरूर नगा-स्त्री के मानस को छू गई है। नगा पुरुषों के इस दावे के खिलाफ कि नगा प्रथागत कानून में स्त्रियों को नीति-निर्धारक निकायों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, ने नगा आदिवासी महिलाओं की संस्थाओं को नब्बे के दशक में स्त्री-अधिकारों की मांग उठाने के लिए उद्वेलित किया। नतीजतन, उन्होंने स्त्रियों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
नगा महिलाएं, विशेषकर प्रबुद्ध और शिक्षित महिलाएं, जैसे तेमसुला आओ, ईस्टराईन इरालू, मोनालिसा चंगकिजा और केखरीबाउन योमे अपने लेखन में स्त्री अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक रही हैं। उन्होंने अपनी साहित्यिक कृतियों-गद्य और कविता के माध्यम से नगा महिलाओं को नारीवादी विचारधारा और विमर्श से परिचित कराया है।
नगालैंड पितृसत्ता का गढ़ है। इसमें नारीवादी चिंतन का उभरना एक अत्यंत ही मुश्किल कार्य है। दरअसल नगा नारीवाद, जिसे ईस्टराईन इरालू ने अपनी कृति ‘टैरीबल मैट्रीआरकी’ (भयानक मातृसत्ता) में परिभाषाषित भी किया है, नगा मातृसत्ता की प्रतिनिधि मां या दादी की संकीर्ण सोच से इरालू अत्यंत आहत और गुस्सा है। इस नगा मातृसत्तात्मक सोच के तहत कथानायिका डिलीनयू , एक लड़की, जो नगा स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है के प्रति अंत-अंत तक भेदभाव बरता जाता है। इतना ही नहीं यह भेदभाव और हिंसा केवल पुरुषों द्वारा ही नहीं बल्कि नगा संदर्भ में घर की महिलाओं मां, दादी भी इसे प्रोत्साहित करती हैं और इस हिंसा में बराबर की साझेदारी करती हैं।
आज नगा नारीवाद दृढ़ता से युवाओं और महिलाओं की कविताओं और निबंधों में अभिव्यक्त हो रहा है। यह नगालैंड की जनता का ही नहीं बल्कि नगालैंड के बाहर भी लिंग आधारित हिंसा और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर प्रश्नों पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
देर जरूर हो गई है, पर महिला अधिकारों का यह आंदोलन अफ्रीकी-अमेरीकी सिविल डिफेंस और राजनीतिक अधिकारों के आंदोलन के समकक्ष ही है। इसी आंदोलन से जोरा ईस्ट जैसी हस्तियां उबरीं, जिन्होंने एलिस वाकर और अन्य युवा लेखिकाओं को प्रेरित किया। लेकिन इन दोनों में अंतर यही है कि काली अमेरिकी औरतों का अपने अधिकारों और लिंग विभेद के विरुद्ध आंदोलन एक शांतिपूर्ण देश में हुआ, जबकि नगा नारीवादी आंदोलन आधी शताब्दी बीत जाने के बाद तब हुआ जब नगालैंड में सशस्त्र राजनीतिक हिंसा और आत्मनिर्णय आंदोलन अपने चरम पर था। इसके चलते जब नगा स्त्रियों को दोहरी हिंसा के मुकाबिल होना पड़ रहा था। बलात्कार से उभरती चीत्कारों और भारतीय सेना के अत्याचारों की हिंसा के विरोध में नगालैंड की लेखिकाओं का लेखन भरा पड़ा है।
नगा महिलाओं में सबसे अधिक मजबूत है राजनीतिक चेतना, जो उनमें प्राकृतिक रूप से सन्निहित है। एलिस वाकर महिलाओं की पहचान की खोज में उनकी यौनिकता और अध्यात्मकता को मिश्रित करते हैं। एक पिता अपनी बेटी को विकसित और बढ़ते हुए देखता है और याद करता है पिता-पुत्री का सगोत्रगामी रिश्ता, उसका समलैंगिक प्रेम। वह महसूसता है एक जवान होती लड़की की मासूमियत और उसकी दिव्य गुणवत्ता और कामुकता के अन्वेषणों के प्रति उसकी ललक। एलिस ने इन सबको पिता की ही आवाज में शक्तिशाली ढंग से दर्ज किया है।
समकालीन नगा महिला लेखिकाएं कई मुद्दों पर एलिस से भिन्न हैं और उससे मतभेद भी रखती हैं। कुछ विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को छोड़ कर ये महिलाएं एलिस की तरह मुखर और मजबूत भी नहीं हैं। नगालैंड की महिलाएं गिरजाघर, पितृसत्ता और पारंपरिक मातृसत्ता सहित कई शक्तियों से प्रभावित हैं। लेकिन इन सभी शक्तियों के बावजूद परिवर्तन नजर आ रहा है।
जहां तक नगा परिवार और समाज की संरचना का प्रश्न है वह पितृप्रधान समाज है। उनके समाज में लड़की की मर्जी नहीं चलती, माता-पिता द्वारा लड़की की शादी तय की जाती है। 1950 में डिनियू ने समाज, जीवन और प्रकृति को अपनी कविता का विषय बनाया। उनकी ‘हमारी जिंदगी’ कविता में जिंदगी के विभिन्न पक्ष और अर्थ गूंजते हैं, जो केवल दार्शनिक ही नहीं बल्कि ऐसी सक्षम स्त्री की आवाज है, जो सकारात्मक बदलावों में विश्वास रखती है और उन बदलावों से अपनी नियति को बदलती है। वे कहती हैं-‘हम अपनी जिंदगी को सवेरा भी बना सकते हैं और रात में भी बदल सकते हैं। हम खुद ही ये सब बदलाव ला सकते हैं।’ डिनियू ने अपनी कविताओं में अपने समाज पर सवाल उठाए हैं। उनकी हर कविता में जिंदगी प्रतिध्वनित हुई है।
नगा लेखिकाएं जैसे-तेमसुला आओ, मोनालिसा चंककिजा, निनि विन्गूरियू लुंगालांग
अपने सृजनात्मक साहित्य के माध्यम से दबी महिलाओं की आवाज बनकर उभरी हैं।
तेमसुला आओ
तेमसुला आओ के चार काव्य संग्रह हैं। बहुत से गीत शोकजनक, असीम आनंद और उल्लास, यंत्रणा और कवयत्री की दुखद यादों से भरे हैं।
चालीस की उम्र/ एक चांदी की रेखा/ मेरे बालों में से गुजरती/ रेखाएं धावा बोलतीं/ मेरे मुख पर/ मैं अक्सर सोचती/ मैं जवान हुई/ इक्कीस वर्ष की आयु में/ कितना भयानक होगा/ मैंने सोचा/ चालीस की उम्र का होना/ एक आयु इतनी दूर/ इतनी परे/ युवावस्था से!
‘ए लवर्स प्रेयर’ (एक प्रेमी की प्रार्थना) में वे प्रेम के युवा स्वप्न की यंत्रणा को व्यक्त करती हैं।
अगर कभी तुम स्वप्न देखो मेरे प्रिय / उन लपटों का जिन्होंने तुम्हें जलाया / झुलसाया / या कुछ ऐसा जो कभी नहीं जगमगाया/… लेकिन जब तुम जगे/ तो पाया / स्वप्न जा चुके थे / पछतावा हुआ / तुम्हें दरकार हुई होगी न, तब किसी एक की/ जो तुम्हारी राह रोशन करे!
अपने स्त्रीत्व और स्त्रियों के उत्पीड़न पर कवयित्री सदैव निगरानी रखती है। वे प्रतिक्रिया में कहती हैं-
बारह लंबे दुखद वर्षों के लिए/ मेरी जिंदगी दूसती रही/ मेरे स्त्रीत्व को भीतर तक/ सारा सुख और आनंद सोखती रही/ अस्तित्व को करती रही दागदार/ कोढ़ उभरता रहा/ न भरने वाले जख्मों का।
जिंदगी का कठोर यथार्थ उनकी कविताओं में प्रवाहित होता है। अपने लयात्मक लेखन और सुरीले गीतों की वजह से ही उन्हें पूर्वोत्तर की कोकिला भी कहा जाता है।
निनि विन्गूरियू लुंगालांग
निनि विन्गूरियू लुंगालांग 1948 में पैदा हुर्इं। ये एक मूल निवासी कवयित्री हैं। ये शिक्षिका हैं। ये अपनी कविताओं में जीवन, आदिवासियों की जीवनशैली, उपेक्षित लोगों अपने युवा दिनों के लिए चिंतित दिखती हैं। अपनी शुरुआती जिंदगी के प्रति उनकी अपनी जिद और एक राय है।
अपनी एक कविता में वह कहती हैं-
मैं अपने सुबह के वर्षों को देखती हूं/ जो पानी की तरह टपकते रहे
मेरी लापरवाह उंगलियों के बीच/ जब मैं होती थी आनंदित स्पर्श और
स्वाद से/ गरम और ठंडे से/ धूप से रोशन उन/ चिरस्थायी दिखते दिनों से।
मां-बेटी का यकसां दिखना भी उनकी कविता का विषय है। वे भावनात्मक रूप से उद्वेलित हो जाती हैं और आईने के प्रतीक से इसे यों व्यक्त करती हैं-
तो देखो तुम, मैं अपनी मां जैसी ही दिखती हूं/ वह मेरी आत्मा में भीतर तक
रच-बस गई है/ उन सब चीजों के साथ जो उसकी हैं/… हां! मैं बहुत हद
तक मां की तरह ही दिखती हूं/ और मेरी बेटियां भी दिखती हैं/ बहुत कुछ मेरी
ही तरह।
एक कवि के नाते निनी प्रकृति की पुजारी हैं और महिलाओं और सबआल्टर्न की समर्थक हैं।
मोनालिसा चंककिजा
मोनालिसा चंककिजा ‘नगालैंड पेज’ अखबार की संपादक हैं। वे पक्की नारीवादी हैं। अपनी कई कविताओं में मोनालिसा ने गैरबराबरी, यौनिक भेदभाव आदि सवाल प्रमुखता से उठाए हैं। वे सदा से दमित, शोषित महिलाओं के लिए न्याय की मांग करती हैं।
वे कहती हैं-
अगर खुदा ने पुरुष को बनाया/ अपनी ही प्रतिकृति/ तो किससे न्याय मांगें / फूटी किस्मत वाले?
वे औरतों और सबाल्टर्न की जीत के प्रति आश्वस्त हैं। औरत के उत्पीड़न और असुरक्षा को वे उसकी कमियां नहीं मानतीं, उसे वे पुरुष की हिंसा, प्रभुत्व, जुल्म और पुरुष की कमियां मानती हैं। वे औरतों की पीड़ा और यंत्रणा भरे भाग्य पर अत्यंत संवेदनशील हैं। बहुत भावुक होकर वह लिखती हैं-
हिंसा से प्रेरित गर्भपात/ आंखों के गिर्द काले निशान/ और खून से लिथड़े होंठ/ नीली खरोंचें और टूटी पसलियां/ सब के सब शादी के पवित्र बंधन/ और घर की सुरक्षा के दायरे में हैं/ यह अलिखित सूचियां हैं/ मनुष्य की प्रगति और विकास की/ इस पीड़ित भूमंडल के पन्ने पर!
अपने कविता-संग्रह ‘वैपन्स आॅफ वर्ड्स आॅन पेजिस आॅफ पेन’ (पीड़ा के पृष्ठों पर हरफों के हथियार) में मोनालिसा नगा समाज में घरेलू हिंसा और औरतों के खिलाफ शारीरिक हिंसा की सचाई को भी उकेरती हैं। नगा घरों और नगा शादियों का हृदय-विदारक सत्य भी उनकी कविताओं में गूंजता है। नगा समाज के पितृसत्तात्मक चरित्र को वह चिह्नित करती हैं, जिसमें औरतों के खिलाफ भारी शारीरिक हिंसा होती है।
मर्दाना हाथ/ बरसते औरत की/ कोमल देह पर।

मोनालिसा अपनी सारगर्भित सुथरी भाषा में पुरुषों की पशुता और स्त्रियों की शक्ति पर एकदम सुस्पष्ट है और उन्हें विश्वास है कि स्त्रियों की इस ताकत की कहानियां ही शब्दों की हथियार बनेंगी। उनकी पुस्तक ‘मॉनसून मॉर्निंग’ की अधिकांश कविताएं नगा, उनकी धरती और औरतों पर ही केंद्रित हैं। युद्धरत नगालैंड में उत्पीड़ित महिलाओं के खौफनाक हालात की दशा उन्हें उद्वेलित करती है और वह कहती हैं-
हमारे भाई युद्ध पर हैं/ हमारी धरती खून से नहाई है/ हमारे धनखेतों को देखभाल की जरूरत है/ और बच्चों को दरकार है स्नेह की /
फिर भी शांति का सपना बरकरार है। उनकी कविता में ‘फील्ड आॅफ बेबीज ब्रेथ’ (बेबी की सांसों के दायरे में) एक स्त्री की इच्छा को देखिए-
काश मैं पहन सकती/ हल्के गुलाबी रंग की एक खूबसूरत/ एड़ियों तक की लंबी कैलिको ड्रैस/ खूब झालरों, घेरों और लैसों वाली/ कोलाहल करते हुए बेबी के सांसों के दायरे में ।
पत्रकार होने के नाते कई आतंकवादी गुटों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। ‘उरू मेल’ के संपादक की हत्या से भी वे बहुत दुखित हुर्इं। वे अपनी कविता-‘नॉट टू डेड’ (मरे हुए को नहीं) में लिखती हैं-
अगर कल/ मेरा शरीर/ गोलयों से/ छलनी हो जाए/ तब भी मैं मरूंगी नहीं/ न ही मैं/ हारूंगी और न ही रहूंगी चुप!
हथियारबंद लोगों के फतवों के खिलाफ भी वह विद्रोह करती हैं और अपनी कविता ‘आॅफ ए पीपल अनआन्सर्ड’ (लोग जिन्हें जवाब नहीं मिला) में लिखती हैं-
अपना समय नष्ट मत करो/ निर्देश और/ गाइडलाइनें दे देकर/ या मुझे कैसे अपनी जिंदगी जीनी है/ अथवा मेरे निजी राजनीतिक मामलों पर/ और/ बंद करो यह दुस्वप्न/ जहां मुझे लिखना पड़े एक और बच्चे के अनाथ होने पर/ एक और लड़की के बलात्कृत या एक और औरत के विधवा होने पर!
मोनालिसा उस धरती और उसके लोगों के ठोस यथार्थ पर लिखती हैं, जो आए दिन बंदूकों और फतवों से त्रस्त हैं। वे उन हथियारबंद लोगों के खिलाफ आवाज उठाती हैं, जो देश और कौम के नाम पर घूमते हैं, जो व्यक्तिगत राय रखने की इजाजत नहीं देते।
आगे बढ़ो, गोली दागो, बम से उड़ाते रहो हमें अनंत तक/ मैं वादा करती हूं हम हिलेंगे तक नहीं/ न ही अपने इरादे से और न ही/ तुम्हारा ध्यान बंटाने के लिए/ शूट करो-क्या रोक रहा है तुम्हें?

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X