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आधी दुनियाः सुंदरता और उत्पीड़न

स्त्री को यों प्रकृति की सुंदर और रहस्यमय रचना कहा जाता है। कई मायनों में वह है भी। इस धारणा के आधार पर कुछ स्त्रियों के लिए उनकी सुंदरता गर्व का विषय भी होती है। पर इस सुंदरता का एक पक्ष और है। यह पक्ष स्त्री के प्रति उन पुरुषों के नजरिए का है, जिनके […]

Author September 16, 2018 6:23 AM
पश्चिमी समाज-मनोविज्ञानी नाओमी वुल्फ ने लिखा है कि अगर कोई मर्द किसी स्त्री की सुदंरता का उद्धरण देता है, उसकी प्रशंसा करता है, तो इस प्रकार के ज्यादातर मामलों में वह स्त्री को कोई यौन संदेश देने की कोशिश करता है।

स्त्री को यों प्रकृति की सुंदर और रहस्यमय रचना कहा जाता है। कई मायनों में वह है भी। इस धारणा के आधार पर कुछ स्त्रियों के लिए उनकी सुंदरता गर्व का विषय भी होती है। पर इस सुंदरता का एक पक्ष और है। यह पक्ष स्त्री के प्रति उन पुरुषों के नजरिए का है, जिनके लिए स्त्री की हैसियत आज भी सुंदर गुड़िया जैसी है। इस नजरिए में एक स्त्री की जिंदगी का मकसद मर्दों का मन बहलाना है। हालांकि तमाम मोर्चों पर पुरुषों की बराबरी पर आ जाने के बाद स्त्री के लिए सुंदर दिखने की वह शर्त खत्म मान ली जानी चाहिए थी, जो आदिम समाज में मर्दों को रिझाने के आधार पर ही उसके वजूद को सुनिश्चित करती थी। लेकिन विडंबना है कि स्त्री को सुंदर दिखना है ताकि पुरुष तबका उसे निहारते हुए अपनी कुंठा शांत कर सके। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो कई मामलों में देखा गया है कि वह स्त्री को उसकी सुंदरता के लिए लांछित और उत्पीड़ित करता है।

इस विरोधाभास के कई उदाहरण जब-तब देखने को मिल जाते हैं जब किसी स्त्री को उसकी आकर्षक देहयष्टि और सुंदरता के कारण प्रताड़ित किया गया। हाल में एक घटना मुंबई में घटित हुई। एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी का चेहरा इस आशंका में बुरी तरह खरोंच दिया कि कहीं उसकी अनुपस्थिति में कुछ लोगों की गंदी नजर तो उस पर नहीं पड़ रही है। यह व्यक्ति खुद मुंबई में रहता है, जबकि पत्नी मध्यप्रदेश के जबलपुर में अपनी ससुराल में रहती है। करीब बारह साल शादी को हो चुकने के बाद भी इस व्यक्ति को यह डर था कि उसकी पत्नी पर कुछ लोग बुरी नजर डाल सकते हैं। इससे बचाव के लिए उसने पत्नी को कुरूप बनाने की कोशिश की। महिलाओं को लेकर इस व्यक्ति की बीमार मानसिकता का पता इस रूप में भी चला है कि मुंबई में इसके खिलाफ बलात्कार और उत्पीड़न के दो और मामले दर्ज हैं। इन मामलों में इसने छोटी बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की थी।

एक वाकया उत्तर प्रदेश का है। पीलीभीत में एक महिला ने शादी के दो साल बाद अपना चेहरा इसलिए जला लिया, क्योंकि पति समेत दूसरे लोग उसे ताना मारते थे कि वह अपनी सुंदरता के बल पर हर जगह आकर्षण का केंद्र बन जाती है और लोग उसे पति से ज्यादा तवज्जो देते हैं। इन घटनाओं के संदर्भ भले शहरी और कस्बाई जीवन से जुड़े हों, पर इस सोच का दायरा शहरों से होते हुए पूरे समाज में पसरा हुआ है। दफ्तरों में किसी ओहदे पर बैठी महिला को अक्सर ऐसी ही टीका-टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है कि यह तरक्की तो असल में उसने अपनी सुंदरता या ऐसे ही कारणों से हासिल की है, किसी वास्तविक योग्यता के बल पर नहीं।

निस्संदेह प्रकृति ने स्त्रियों को ऐसा बनाया ही है कि वे सुंदर दिखना चाहती हैं। यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। लेकिन उसकी इस चाहत का अभिप्राय कोई बढ़त पाना या किसी को नीचा दिखाना नहीं है। पर अफसोस कि पुरुषवादी समाज महिलाओं को उनकी सुंदरता या उनके शारीरिक सौंदर्य से आंकने की ही गलती कर रहा है। इससे यही साबित हो रहा है कि ज्यादातर मर्द स्त्री को उसकी देह से परे नहीं देख पाते हैं। असल में मुद्दा उस सामाजिक व्यवहार का है, जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच टीका-टिप्पणियों और परस्पर बर्ताव से सवाल उठ खड़े होते हैं। एक तरफ पुरुषों को लगता है कि अगर किसी स्त्री को सुंदर कहा जाए और देहयष्टि के आधार पर उसकी तारीफ की जाए, तो वह प्रसन्न होगी। दूसरी तरफ ऐसे पुरुष इसे लेकर भी भयभीत रहते हैं कि कहीं स्त्री अपनी सुंदरता के बल पर कुछ अतिरिक्त न हासिल कर ले या उनके शिकंजे से बाहर न चली जाए।

पश्चिमी समाज-मनोविज्ञानी नाओमी वुल्फ ने लिखा है कि अगर कोई मर्द किसी स्त्री की सुदंरता का उद्धरण देता है, उसकी प्रशंसा करता है, तो इस प्रकार के ज्यादातर मामलों में वह स्त्री को कोई यौन संदेश देने की कोशिश करता है। यानी स्त्री की सुंदरता के उल्लेख के पीछे अमूमन पुरुष उसके शरीर का यौनिक आकलन करता और फिर उसे आमंत्रित करता, समर्पण के लिए कहता या उसे बलात हासिल करने की चेष्टा करता है। अगर वह अपने इस मंसूबे में विफल रहता है तो वह पूरी कोशिश करता है कि वह स्त्री किसी दूसरे पुरुष के आकर्षण या मोहपाश में न बंध जाए। ऐसी स्थिति में वह या तो तेजाब डाल कर उसका चेहरा विकृत कर देता है या फिर हत्या ही कर देता है। कुंठित पुरुषों की इस मनोवृत्ति का एक अनुक्रम है।

दीपा नारायण ने अपनी किताब ‘चुप: ब्रेकिंग द साइलेंस अबाउट इंडियाज’ में छह सौ महिलाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण का उल्लेख किया है, जिसमें नब्बे फीसद महिलाओं ने कहा था कि उन्हें अपने शरीर से नफरत है, क्योंकि पुरुष उनकी देहयष्टि, सुंदरता, अच्छे पहनावे को यौन-आमंत्रण मान लेता है। दीपा ने लिखा कि महिलाओं के जीवन में सात बातें ऐसी हैं, जिन्हें वे ताउम्र ढोती हैं। उनका शरीर, उनकी चुप्पी, दूसरों को खुश रखने की उनकी चाहत, उनकी यौनिकता, अकेलापन, लगाव या चाहत और दायित्व के बीच का द्वंद्व और दूसरों पर उनकी निर्भरता। इनमें सबसे ज्यादा प्रताड़ना उन्हें शरीर के स्तर पर ही झेलनी पड़ती है।

एक आम स्त्री को सिर्फ उसकी सुंदरता से आंकने का एक सीधा मतलब यह भी है कि उसकी वास्तविक योग्यताओं और क्षमताओं को कम या नगण्य करके देखा जा रहा है। आज महिलाओं को घर से लेकर कार्यस्थलों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें अगर सिर्फ स्त्री की सुंदरता संबंधी केंद्रित और प्रचलित धारणा में सिकोड़ कर देखा जाएगा तो उन चुनौतियों का सही समाधान हरगिज नहीं मिल सकेगा। अब तय करना होगा कि समाज को आखिर स्त्री की किस सुंदरता को देखना-परखना चाहिए। स्त्री के सौंदर्य को हम दो पैमानों पर आंक सकते हैं। एक है उसकी देह का सौंदर्य, यानी जो शरीर और सुंदरता हमें स्वाभाविक रूप से मिली है, और दूसरी है उसकी सांस्कृतिक देह (कल्चरल बॉडी)। वक्त की जरूरत स्त्री की सांस्कृतिक देह को तवज्जो देने की है, जिसमें उसकी योग्यता, समझदारी और तरक्की को जांचा जाता है। भारत जैसे देश में, जहां अभी तक स्त्री को सिर्फ शारीरिक सुंदरता के पैमाने से देखा जाता है, स्त्री को उसकी सांस्कृतिक देह में ढाल कर देखने की सख्त जरूरत है अन्यथा किसी भी मसले पर टिप्पणी करते वक्त खुद को समझदार मानने वाला शख्स वही गलतियां कर सकता है, जो आपराधिक मानसिकता के लोगों समेत एक आम पुरुष और कई बार बड़े-बड़े अधिकारी और राजनेता तक करते रहे हैं।

दरअसल, समाज और कार्यक्षेत्र में कामयाबी या स्त्री के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को देह की सुंदरता से जोड़े रखने की मानसिकता रखने वाले मर्द यह देख पाने में विफल हैं कि जिन ऊंचे मुकामों पर स्त्रियां हैं, वहां वे अपनी जेहनियत की वजह हैं, न कि शारीरिक सौंदर्य के बल पर। जो स्त्री योग्यता और मेहनत के बल पर किसी मुकाम पर पहुंची हो, उसकी प्रशंसा देह की सुंदरता से की जाए या उसका संदर्भ गहनों और चेहरे की सुंदरता से दिया जाए- तो यह बेहद कष्टकारी है। इससे भी बड़ा कष्ट वह है जब सुंदरता को ही उसकी असली ताकत मान कर बीमार मानसिकता वाले कुछ पुरुष उसे नष्ट-भ्रष्ट करने पर तुल जाते हैं।

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