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आधी दुनिया: दो पाटन के बीच

बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं हो पा रही थी। अधिकतर लड़कियों के साथ यही हो रहा है। शादी के समय ग्यारह प्रतिशत लड़कियां नौकरी छोड़ देती हैं। कइयों के साथ शर्त होती है कि लड़का बहुत ऊंचे पद पर है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

आखिर करना तो यही है। यह एक ऐसा वाक्य है जो माएं अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही बेटियों के लिए प्रयोग करती हैं। आज लड़कियां शिक्षित, प्रशिक्षित होकर ऊंचे पदों पर, कॉरपोरेट, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बैंकिंग और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं, पर घरेलू परिस्थितियों के चलते काम छोड़ भी रही हैं। जब भी युवा पीढ़ी से भेंट होती है, उनसे बात होती है। एक लड़की से पूछा तो उसने बताया कि उसने मार्केटिंग में एमबीए किया है। नौकरी भी की, पर छोड़ दी। बच्चे छोटे हैं। पूछा कि घर में कौन-कौन हैं? उसने कहा- परिवार है, परिवार में सभी हैं, पर बच्चों की देखभाल के लिए यही ठीक लगा।

एक दूसरी लड़की ने बताया कि उसने बर्कले यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की है। एक कंपनी के साथ कानूनी सलाहकार के रूप में काम कर रही थी, पर अब छोड़ दी। बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं हो पा रही थी। अधिकतर लड़कियों के साथ यही हो रहा है। शादी के समय ग्यारह प्रतिशत लड़कियां नौकरी छोड़ देती हैं। कइयों के साथ शर्त होती है कि लड़का बहुत ऊंचे पद पर है। शादी के बाद वह ऑफिस नहीं जाएगी। घर संभालेगी। इसके अलावा शादी के बाद बच्चे होने पर तेईस प्रतिशत लड़कियां नौकरी छोड़ देती हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, लड़कियों को लेकर परंपरागत मानसिकता काम करती है। माता-पिता का तर्क होता है- करना तो यही है। यानी शादी के बाद संभालना तो घर ही है। मतलब, उच्च शिक्षा का भी कोई अर्थ नहीं। लड़की के सोच-विचार, बुद्धि की सक्रियता, मस्तिष्क की श्रमशीलता का कोई मतलब नहीं। आज भी सोचने-समझने, तर्क और सवाल करने वाली, अपने निर्णय लेने वाली लड़कियों को नकार दिया जाता है, उनकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है। क्योंकि वे अच्छी लड़की और अच्छी मां की परिभाषा पर खरी नहीं उतरतीं। अच्छी लड़की, अच्छी मां वह मानी जाती है, जो बिना प्रश्न किए सब कुछ करती जाए। सब कुछ सहे, कभी विरोध न करे। चुप रहे, कभी सवाल न उठाए। जो कभी न थके, न बीमार हो, न उसकी कोई पसंद हो, न उसका कोई लक्ष्य हो। बिना सोचे-समझे समाज और परिवार के बताए गए रास्ते पर चले।

यही सदियों से चलता अ रहा है। स्त्रियां समाज और परिवार की सुनती आ रही हैं। मगर आश्चर्य कि आज की युवा पीढ़ी भी अपनी इस स्थिति को स्वीकार कर रही है। एक सवाल है कि जो इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, एमबीए करके कॉरपोरेट जगत में लड़कियां काम शुरू करती और फिर छोड़ देती हैं, उन्हें यह सब पढ़ाई करने की जरूरत ही क्या थी। कॉलेज में दाखिले के लिए उन सीटों पर उनको आने दिया जाए, जो इन क्षेत्रों में वास्तव में काम करते रहना चाहती हैं। अगर ‘आखिर करना यही है’ की मानसिकता को ही आगे बढ़ाना है, तो बीए तक की शिक्षा काफी है। इस पर गंभीर चिंतन और क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
आखिर परिवार के बीच रह कर लड़कियां क्यों इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंसी, मैनेजमेंट, बैकिंग और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी नहीं कर पातीं। वहां काम के लंबे घंटे होते हैं। छोटे बच्चों के लिए सरकारी स्तर पर सही और पर्याप्त पालनाघर यानी के्रच नहीं हैं।

स्वाधीनता के बहत्तर वर्षों बाद भी सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर कामकाजी औरतों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वे नहीं हैं। सिंगापुर में हर ब्लॉक के नीचे एक क्रेच है। दूसरे देशों में, विश्वविद्यालयों, बड़ी कंपनी के दफ्तरों में, सब जगह क्रेच की सुविधा है। वहां दफ्तरों में और काम की जगहों पर क्रेच अनिवार्य हैं। साथ ही ऑफिस में निश्चित समय पर जाना अनिवार्य नहीं। काम के खुले घंटे हैं। दिन में, शाम को, किसी भी समय दफ्तर जाकर छह-सात घंटे काम करके वापस आया जा सकता है। पति अगर सुबह जाता है, तो पत्नी दोपहर बाद काम पर जाती है। साथ ही घर से ऑनलाइन काम करने की सुविधा भी है। इससे भी जरूरी है बच्चों के लिए ‘डे-स्कूल’। आज डे स्कूल की अनिवार्यता बढ़ गई है। कामकाजी माएं अपने बच्चों को डे-स्कूल में भेज कर निश्चिंत हो सकती हैं। इस तरफ ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इससे कामकाजी मांओं के बच्चों की सुरक्षा और देखभाल की समस्या सुलझ जाती है। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि औरतें अपनी इन मांगों को लेकर आंदोलन करें। जुलूस निकालें, जनमत संग्रह करें। ताकि समाज का और सरकार का ध्यान इस तरफ जाए कि उच्च शिक्षा प्राप्त औरतों को नौकरी छोड़ कर घर पर न बैठना पड़े। या नई पीढ़ी में आए परिवर्तन में वे बच्चा ही पैदा नहीं करना चाहते। क्योंकि इसमें घर की सारी व्यवस्था ही उल्ट-पुलट हो जाती है। यह सोच देश और समाज के लिए घातक है।

इसलिए अब समय आ गया है कि कामकाजी औरतों की अनुकूलता में, ऐसी व्यवस्था बने कि घर और बाहर की जिंदगी में समरसता और सामंजस्य बना रहे। साथ ही इस धारणा से मुक्त भी होना होगा कि नौकरी सिर्फ धनार्जन के लिए होती है। किसी व्यवसाय की उच्च शिक्षा, उच्च तकनीकी शिक्षा लेकर उसका उपयोग न करना मस्तिष्क और बुद्धि को भी निष्क्रिय कर देता है। औरत के लिए भावात्मक और विचारात्मक सक्रियता की अनिवार्यता को समझा और माना जाना आज अनिवार्य है। इस सबके लिए अब एक ही रास्ता है जुलूस और जन-आंदोलन, ताकि समाज और सरकार जागृत हों। नारा हो ‘काम के खुले घंटे’, हर मोहल्ले में डे-स्कूल, काम की जगहों पर क्रेच अनिवार्य, घर से काम करने की सुविधा, ताकि पुरातन अंधेरे की सोच को नई रोशनी से बेधा जा सके। कामकाजी औरतों की स्थिति को लेकर समाज में जागृति लाई जा सके। स्वयंसेवी संगठनों की इसमें एक बड़ी भूमिका हो सकती है। ताकि यह जन-आंदोलन बन सके।

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