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जब बच्चों को पढ़ाने बैठें तो इन बातों को रखें खास ख्याल

हर माता-पिता अपने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर सावधान रहता है। हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा पढ़ाई से लेकर जीवन के हर क्षेत्र में अव्वल आए, एक आदर्श बच्चा बने। इसके लिए कुछ माता-पिता अपने बच्चे पर कुछ सख्त नजर भी रखते हैं। पर अगर बच्चे की पढ़ाई के वक्त माता-पिता खुद भी उसके साथ बैठें और उसे पढ़ाने या किसी भी तरह की मदद करने का प्रयास करें, तो बच्चा उनसे न सिर्फ लगाव महसूस करता, बल्कि बहुत आसानी से चीजें सीख और समझ जाता है। मगर जब बच्चे को पढ़ाने बैठें तो किन बातों का ध्यान रखें, पेश हैं रवि डे के सुझाव।

Author December 9, 2018 1:27 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

रवि डे

बच्चों की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। ऐसे मौके पर माता-पिता का तनाव बढ़ जाता है। वे हर समय बच्चे की पढ़ाई को लेकर चिंतित रहते हैं। कई माता-पिता बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ट्यूटर या कोचिंग केंद्रों के जिम्मे छोड़ कर निश्चिंत होने का प्रयास करते हैं। पर बच्चों के साथ खुद माता-पिता बैठें और उनकी पढ़ाई-लिखाई में मदद करें या सिर्फ उन पर नजर रखें, तो बच्चे ठीक से पढ़ते और समझते हैं। दरअसल, जो आत्मीयता और जिम्मेदारी बच्चे माता-पिता के साथ महसूस करते हैं, वह किसी ट्यूटर या कोचिंग केंद्र के अध्यापक के साथ नहीं करते। बल्कि बहुत सारे बच्चों को ट्यूटर बहुत बुरे लगते हैं। वे प्राय: उनकी बातों को नजरअंदाज करने का प्रयास करते हैं। इस तरह ट्यूटर और बच्चे के बीच एक तनावपूर्ण रिश्ता बन जाता है। इसका असर यह होता है कि बच्चा ट्यूटर को चिढ़ाने के लिए या फिर जान बूझ कर उसकी बताई बातों को न समझने का नाटक करने लगते हैं। इस तरह ट्यूटर या तो उसे डांटने-फटकारने या फिर माता-पिता से उसके बारे में नकारात्मक बातें बताना शुरू कर देता है। इस तरह कई बार बच्चे का किताब में मन लगने के बजाय उससे मन उचटने लगता है और परीक्षा में उसका प्रदर्शन खराब हो जाता है।

इसलिए जब बच्चे पढ़ने बैठें तो उनके साथ माता-पिता को भी बैठना चाहिए। जरूरी नहीं कि वे बच्चे की पढ़ाई संबंधी समस्याएं हल करने में दक्ष हों, केवल उनके साथ बैठ कर उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहने से भी उनका मनोबल बढ़ता है। आपका उनके साथ बैठना ही बहुत बड़ा समर्थन है। बेशक आप उनके पास बैठ कर अपने काम करते रहें, जैसे सब्जी काटना, सिलाई करना वगैरह। मगर देखा गया है कि कई माताएं टीवी चला लेती हैं और बच्चों को पढ़ने बिठा देती हैं। खुद फोन पर किसी से बात करती रहेंगी और बच्चों से कहेंगी कि पढ़ो। इसी तरह कई पिता अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी लेने का अर्थ यह समझते हैं कि बच्चे में क्या-क्या कमियां हैं, वह कहां-कहां कमजोर साबित हो रहा है, उसके बारे में लंबे-लंबे भाषण दे डालो। माता-पिता की ऐसी गतिविधियों से बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वह लगाव महसूस नहीं करता, इसलिए जब भी माता-पिता उन्हें पढ़ने को कहते हैं, तो वे कोई न कोई बहाना बना कर पढ़ने से बचने का प्रयास करते हैं या फिर दिखावे के लिए पढ़ने बैठ तो जाते हैं, पर उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता। उनका ध्यान माता-पिता की गतिविधियों की तरफ रहता है। इसलिए जरूरी है कि आप न सिर्फ बच्चे की पढ़ाई का टाइम टेबल बनाएं. उसे समय पर पढ़ने बिठाएं, बल्कि यह भी जरूरी है कि आप उसे जाहिर करें कि उसकी पढ़ाई को लेकर संजीदा हैं। उसकी पढ़ाई में आपकी दिलचस्पी है।

डांट-डपट न करें
कई माता-पिता समझते हैं कि बच्चों को अनुशासन में रखा जाए, तभी वे ठीक से पढ़-लिख पाते हैं। इसलिए वे हर बात पर बच्चों को रोकते-टोकते, डांट-डपट करते या फिर लंबे-लंबे उपदेश देते रहते हैं। इन बातों का बच्चे के मन पर बुरा असर पड़ता है। हर किसी को अपनी तारीफ अच्छी लगती है, बच्चे तो अपनी तारीफ के कुछ ज्यादा ही भूखे होते हैं। इसलिए जब भी स्कूल से उनके बारे में कोई नकारात्मक संदेश आता है, पढ़ाई-लिकाई में उसकी किसी कमजोरी को रेकांकित किया जाता है या फिर उसके दोस्त उसकी किसी बात को लेकर शिकायत करते हैं, तो उन्हें नजरअंदाज बेशक न करें, पर तूल भी न दें। ऐसे मामलों में भी बच्चे की कोई खूबी जाहिर करें और फिर उससे ऐसी गलती न होने का भरोसा आप खुद ही जता दें। जब बच्चा पढ़ रहा हो, तो उससे बीच-बीच में उसके पढ़े हुए पाठ के बारे में पूछें, उससे कहें कि उसने जो पढ़ा है, वह आपको समझाए। फिर उसमें से उसकी किसी बात को रेखांकित करते हुए तारीफ करें। उसकी लिखावट या चित्र बनाने की तारीफ करें। इस तरह बच्चे को प्रोत्साहन मिलता है और वह बेहतर करने को प्ररित होता है। अगर आपको लगता है कि बच्चा किसी बात को ठीक से नहीं समझ पा रहा या कहीं गलत कर रहा है, तो उसे बड़े सलीके से बताएं कि अगर ऐसा हो, तो अच्छा हो। ऐसा नहीं कि उसकी गलती या गलत समझ लेने या गलत उत्तर देने पर उसे कोसना शुरू कर दें, उसे भला-बुरा सुनाने लग जाएं। शिक्षाविदों का कहना है कि बच्चा कभी कोई उत्तर गलत नहीं देता, बस वह हमारे तय किए हुए उत्तर से भिन्न बात कह देता है। क्योंकि उसने अपने दिमाग में जिस तरह से प्रश्न को समझा होता है, उसका अपनी तरफ से बेहतर जवाब ही देता है।

अपना उदाहरण दें
पढ़ाई करते समय जब बच्चे के साथ बैठें और उसकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में बात करें, तो कभी-कभार अपने बच्चपन के भी अनुभव बताएं। अपनी शरारतों के बारे में बताएं। अपने अध्यापकों के बारे में बताएं। किसी सवाल को हल करने के अनुभव साझा करें। इस तरह बच्चे को लगता है कि किसी बात या सवाल को लेकर उलझन सिर्फ उसके मन में नहीं है, ऐसी समस्याएं सबके जीवन में आती हैं। मगर इसका यह भी अर्थ नहीं कि आप हर वक्त अपने बचपन की बातें सुना-सुना कर यह साबित करने का प्रयास करें कि आप अपने बच्चे से बेहतर थे, श्रेष्ठ थे। बार-बार अपने अनुभव बताने से भी बच्चे ऊबने लगते हैं, इसलिए उचित मौका देख कर ही ऐसा करें। फिर ऐसा कभी न करें कि आप अपने बचपन की तुलना अपने बच्चों के बचपन से करते हुए उनकी आदतों की निंदा ही करें। इससे बच्चे आपका ही मजाक बनाना शुरू कर देते हैं।

नकारात्मक तुलना न करें
बच्चों को प्रेरित करने के लिए कुछ बेहतर लोगों के जीवन-प्रसंगों, उनकी अच्छाइयों, गुणों आदि के बारे में भी बताया जाना चाहिए। मगर इसमें यह सावधानी जरूर बरती जानी चाहिए कि कहीं भी बच्चे को ऐसा न लगे कि उन्हें प्रोत्साहित करने, प्रेरित करने के बजाय उनकी गलतियों, कमजोरियों को अधिक रेखांकित किया जा रहा है। कई माता-पिता बच्चों को उनके दोस्तों का उदाहरण देते हुए ताना मारने के अंदाज में अक्सर कहते सुने जाते हैं कि देखो, फलां बच्चा कितना अच्छा काम करता है, कितना अच्छा लिखता है, कितने सलीके से बात करता है, और एक तुम हो कि उसके बिल्कुल उलट हो। ऐसी तुलनाएं बच्चे के मन पर हथौड़े की तरह पड़ती हैं। इसका मनोवैज्ञानिक असर यह भी देखा जाता है कि वह उस बच्चे से चिढ़ने लगता है। इसी तरह बहन-भाइयों के बारे में भी इस तरह की नकारात्मक तुलनाएं कभी न करें। इससे वे दूसरे की तरह अच्छा करना सीखने के बजाय उससे चिढ़ने लगते हैं और उन्हें लगता है कि माता-पिता मुझे नहीं, जिसकी तारीफ करते हैं, उससे ज्यादा प्यार करते हैं, उससे उनका अधिक लगाव है। इस दोनों के बीच एक तनावपूर्ण रिश्ता विकसित होने लगता है। इसीलिए कहते हैं कि बच्चों को पढ़ाना जितना आसान लगता है, उससे कहीं ज्यादा मुस्लि होता है। बच्चे के साथ बच्चा बन कर ही उसे पढ़ाया जा सकता है। उसके मन को समझते हुए ही उसे कुछ अच्छा सिखाया जा सकता है।

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