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शख्सियतः मंटो ने जब बीस रुपए में बेची कहानी

सआदत हसन मंटो को भारतीय उपमहाद्वीप का महान उर्दू कहानीकार माना जाता है। उनकी कहानियां भारत-पाक विभाजन के दंश का प्रामाणिक दस्तावेज हैं।

Author Updated: October 28, 2018 6:50 AM
सआदत हसन मंटो

सआदत हसन मंटो को भारतीय उपमहाद्वीप का महान उर्दू कहानीकार माना जाता है। उनकी कहानियां भारत-पाक विभाजन के दंश का प्रामाणिक दस्तावेज हैं। मिर्जा गालिब के बाद शायद वे पहले लेखक हैं, जिन पर फिल्म भी बनी है। उनकी एक कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ करोड़ों पाठकों ने पढ़ी और उस पर आधारित अनेक नाटकों का मंचन हो चुका है। नाटककार आत्मजीत ने इसी कहानी पर आधारित अपने एक नाटक की सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां दी हैं। वे एक प्रस्तुति तो वह ‘वाघा सीमा’ पर ‘नो मैन्स लैंड’ में भी दे चुके हैं। उस बार सीमा के उस पार लाहौर से हजारों की संख्या में लोगों ने उस नाटक का पूरा पाठ पाकिस्तानी सीमा के करीब खड़े होकर सुना।

मंटो को तब यही कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ एक प्रकाशक को सिर्फ बीस रुपए में बेचनी पड़ी थी, जबकि वे पचास रुपए के लिए इसरार करे थे। उन्हें उस वक्त पैसों की सख्त जरूरत थी। प्रकाशक बीस रुपए पर अड़ा रहा। वह शायद जानता था कि मंटो की मजबूरी के मद्देनजर कहानी सस्ते में मिल जाएगी। आखिर मंटो ने पहले चालीस रुपए और फिर तीस रुपए का इसरार किया। जब प्रकाशक टस से मस न हुआ, तो मंटो ने बीस रुपए ही ले लिए। मंटो की पूरी उम्र कहानियां, रेडियो नाटक, रेखाचित्र, संस्मरण और लेख लिखने, शराब पीने और मुकदमे लड़ने में कटी। वे सिर्फ बयालीस वर्ष जिए और इतनी छोटी उम्र में ही बाईस कहानी संग्रह, एक उपन्यास, पांच रेडियो-नाटक, तीन लेख-संग्रह और दो रेखाचित्र-संकलन अदब की दुनिया को सौंपे। लोग हैरान होते थे कि यह शख्स लिखता कब है?

11 मई, 1912 को चंडीगढ़-लुधियाना रोड पर स्थित समराला शहर के एक गांव ‘पपरौदी’ में जन्मे मंटो रोजी-रोटी के लिए फिल्मों की पटकथाएं और संवाद लिखते रहे। मंटो पर अश्लील लेखन के आरोप में छह मुकदमे चले। तीन मुकदमे ब्रिटिश भारत में और तीन पाकिस्तान बनने के बाद लाहौर में चले। मगर किसी भी मुकदमे में उन्हें सजा नहीं हो पाई। पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के पिता हीरालाल सिब्बल लाहौर में मंटो के वकील होते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था, ‘मेरी फीस उन दिनों भी बहुत होती थी। मंटो जब पहली बार एक दोस्त के साथ मेरे पास मुकदमे की पैरवी के लिए आया तो मैंने उससे वह कहानी मांगी, जिसके आधार पर सरकार ने अश्लील लेखन का मुकदमा दायर किया था। उसकी वह कहानी और कुछ अन्य कहानियां पढ़ने के बाद मैंने उसका कंधा थपथपाया और कहा कि मैं मुकदमा लड़ूंगा। उसका कहना था कि वह फीस नहीं चुका पाएगा। मैंने उसे आश्वस्त किया कि वह फीस की फिक्र न करे, सिर्फ अपनी चंद किताबें पढ़ने के लिए दे जाए।’

सिब्बल ने बताया कि उन्हीं दिनों इस्मत चुगताई पर भी लाहौर की उसी अदालत में अश्लील लेखन के आरोप में मुकदमा चल रहा था। बहस भी खूब होती थी। मगर दिलचस्प बात यह रही कि मंटो तो बरी हो गया, लेकिन इस्मत चुगताई के खिलाफ फैसला आया। उन्हें नगद जुर्माना चुकाना पड़ा और कार्यवाही तक जेल में रहने की सजा दी गई। फरवरी 1934 में मंटो अलीगढ़ मुसलिम युनिवर्सिटी में आगे की पढ़ाई के लिए चले गए। वहीं उनकी मुलाकात अली सरदार जाफरी से हुई। मंटो की एक दूसरी कहानी ‘इंकलाब पसंद’ उन्हीं दिनों मार्च 1935 में छपी थी।भारत-पाक विभाजन से मंटो को ढेरों मलाल थे। सबसे बड़ा मलाल अशोक कुमार और अभिनेता श्याम से गहरी दोस्ती खोने का था। फ़ैज़ और मंटो गहरे दोस्त थे और दोनों के बीच टकराव भी था। मंटो पर जब पहला मुकदमा चला, तो उसमें फ़ैज़ को भी बतौर गवाह पेश किया गया। फ़ैज़ ने मंटो की कहानी ‘ठंडा गोश्त’, जिसके आधार पर मुकदमा चला था, के बारे अपनी गवाही में कहा था, ‘ठंडा गोश्त’ कोई उच्चस्तरीय रचना नहीं है, मगर यह भी साफ जाहिर है कि कहानी को अश्लील नहीं ठहराया जा सकता।

वर्ष 1948 में जब मंटो मुंबई से लाहौर लौटे, तो वहां भी हताशा ने घेर लिया। लाहौर में आए तो थे बेहतर जिंदगी की तलाश में, मगर विभाजन की दास्तानों ने उन्हें हिला कर रख दिया। शारीरिक तौर पर भी बेहद कमजोर पड़ गए थे। दो जवान होती बेटियों के लिए भी बेहतर हालात दरकार थे। उधर, प्रगतिशील लेखक संघ ने 1949 में उन्हें संगठन से ही निकाल दिया। प्रगतिशील लेखक संघ दो कारणों से उनसे दूरी बनाए रखना चाहता था। पहला कारण था मंटो की नई कृति ‘सियाह हाशिए’ और दूसरा कारण था साहित्यिक पत्र ‘उर्दू अदब’। मंटो ने उस पत्रिका में सभी विचारों के लेखकों को शामिल कर लिया था। वामपंथियों को यह बात पसंद नहीं थी। अहमद नदीम कासमी उन दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की पंजाब शाखा के महासचिव थे। कासमी, मंटो के कड़े आलोचक भी थे, मगर साथ ही उन्हें बचाने का भी प्रयास करते। वे मंटो को ढेरों बुजुर्गाना नसीहतें दे डालते।

उसी वर्ष प्रगतिशील लेखक संघ ने कुछ लेखकों के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पारित किया। इस फेहरिस्त में मंटो, हसन असगरी और कुर्रतुल ऐन हैदर का नाम शामिल था। मंटो ने तब एक लेख लिखा ‘जेबे कफन’। उसमें उन्होंने शिकायत की, ‘मुझे इस बात पर गुस्सा आ रहा है कि कासमी साहब ने भी मुझे गलत समझा। वे भी मेरी सोच और नीयत पर शक करने लगे हैं। मैं बेहद हताश हूं। मैं अपने दिन-रात के लेखन से रोटी-रोजी चलाता हूं। मेरी बीवी है, बच्चे हैं। अगर वे बीमार पड़ गए और मुझे उनके इलाज के लिए कई दरवाजों पर पैसे के लिए दस्तकें देनी पड़ें, तो बिल्कुल ही टूट जाऊंगा। कला और साहित्य का क्षेत्र स्वायत्त होता है। इस पर किसी विचारधारा विशेष का ठप्पा नहीं लग सकता। सरकार मुझे कम्युनिस्ट मानती है और कम्युनिस्ट मुझे प्रतिक्रियावादी मानते हैं।’ ऐसे माहौल में मंटो, मिर्जा गालिब के एक शेर का उद्धरण देते हैं- ‘या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात/ दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबां और।’

‘उर्दू अदब’ विवादों के बीच जल्दी ही बंद हो गया। पहले दो अंकों के बाद ही प्रगतिशील लेखक संघ ने बकायदा एक प्रस्ताव पारित करके उस पत्रिका के बहिष्कार की घोषणा की। लेखकों ने अपनी रचनाएं वापस मांग लीं। कासमी साहब ने मंटो से अपनी पत्रिका ‘नुकूश’ के लिए पत्र लिख कर एक कहानी की मांग थी। उन्होंने भी लिखित रूप से अपना आग्रह वापस ले लिया। मंटो ने अपनी कहानियों, लेखों या अपनी पत्रिका में कभी भारत-पाक विभाजन का समर्थन नहीं किया था। इस सवाल पर वे वामपंथियों के साथ खड़े थे। मगर उन दिनों वामपंथियों में भी ढेरों विरोधाभास थे। प्रगतिशील और वामपंथी होते हुए भी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने विभाजन के समय एक सैनिक अधिकारी होने के नाते पाकिस्तानी फौज का हिस्सा बनना पसंद किया था। बाद में ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के संपादक के रूप में भी उन्होंने कायदे आजम जिन्ना के गीत गाए थे। मगर वे फिर भी कामरेड कहलाए।

मंटो ने जहां अंतिम सांस ली, वह आवास लक्ष्मी मेंशन रोड पर स्थित है। बेटियां अब बूढ़ी हो चुकी हैं। मंझली बेटी बताती है, ‘अब्बा जान अम्मी जान से कहते थे, मैंने इतना कुछ लिखा है कि उसकी आमदनी से तुम्हारी पूरी जिंदगी आराम से कट जाएगी। मगर बदकिस्मती ऐसी रही कि प्रकाशकों ने कोई मुआवजा नहीं दिया।’ यह भी एक हकीकत है कि इस उपमहाद्वीप में मंटो सबसे ज्यादा छपे, सबसे ज्यादा पढ़े गए। पहले पहल उनकी किताबें छिप कर पढ़ी जातीं थीं। मगर अब हर प्रबुद्ध शख्स अपनी निजी लाइब्रेरी में मंटो को जरूर रखना चाहता है।

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