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पंकज रामेंदु की कलम से: पानी, सियासत और फिल्म

1980 से 1986 तक जब सौराष्ट्र में भीषण अकाल पड़ा था तो उस दौरान वहां का सबसे बड़े शहरों में से एक राजकोट पूरी तरह से प्यासा हो गया था।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 08:51 am
दरअसल पानी को लेकर जो सियासत रची जा रही है वह सिर्फ ध्यान भटकाने का मामला है।

हॉलीवुड की एनीमेशन फिल्म रैंगो का एक सीन है जिसमें मेयर (कछुआ) के दफ्तर में जब रैंगो (गिरगिट) मिलने जाता है तो मेयर उसे एक बोतल से पानी निकाल कर देता है। सीन में पानी को पेश करने का तरीका बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई सिंगल मॉल्ट विह्स्की किसी देसी ठर्रा पीने वाले के सामने रखे। ‘रैंगो’ एक ऐसे शहर की दास्तान है जहां पानी की भीषण कमी है, जहां हर बुधवार को शहर का मेयर यहां जनता के लिए पानी का नल खोलता है। फिल्म में नल खोलने का सीन आपको होंठों पर जबान फेरने के लिए मजबूर कर देता है, वहीं जब नल में से पानी की जगह कीचड़ गिरता है तो आपको एक पल को अपना हलक सूखता सा महसूस होता है। पूरी फिल्म एक मेयर के अपनी जनता को धोखा देने और पानी पर कब्जा कर उनकी जमीन हथियाने की कहानी कहती है। रैंगो को 2011 में बेस्ट एनीमेशन फिल्म का आॅस्कर पुरस्कार मिला था।

इस साल कंप्यूटर ग्राफिक्स से लेकर मेकअप, एडिटिंग के साथ 6 आॅस्कर अवॉर्ड बटोरने वाली ‘मैड मैक्स फ्यूरी रोड’ भी पानी पर सत्ता की सियासत को बयान करती है। हाल ही में रिलीज हुई ‘जंगल बुक’ में भी पानी की कमी पड़ने और जल संधि लागू होने की बात बताई गई जिसके तहत जंगल के सारे जानवर एक साथ एक पोखर से पानी पीते हैं और कोई भी मांसाहारी किसी शाकाहारी का शिकार नहीं करता है।

सिनेमा की यह काल्पनिक दुनिया दरअसल उस यथार्थ का बयान कर रही है जो हमारे इर्दगिर्द रचा जा रहा है। हर साल गर्मी पड़ना और फिर पानी पर चर्चा का गर्म होना अब एक खबर का हिस्सा सा लगने लगा है। ऐसा नहीं है कि पानी को लेकर खून बहाना आज की खबर है। बीते कई सालों से इस तरह के संघर्ष की कहानी बार बार सुनने को मिल रही है। लेकिन इतने सालों में अगर कुछ बदला है तो वह है सिर्फ सत्ता और पानी को लेकर चिंता करने का तरीका। हालांकि गौर से देखे तो यह चिंता साल भर मौज कर परीक्षा से एक रात पहले होने वाली चिंता जैसी है।

हाल ही में लातूर में पानी के विकट संकट को देखते हुए जल दूत नाम की ट्रेन चलाई गई जो पांच लाख लीटर पानी लेकर रोज वहां पहुंचेगी। यह ट्रेन रोजाना कई किलोमीटर का सफर तय करेगी और इस पानी को पहुंचाने में लगभग तीन करोड़ का खर्चा होगा। इसी तरह की एक ट्रेन चौदह साल पहले राजस्थान के अजमेर से भीलवाड़ा इलाके में भी चलाई गई थी जो रोजाना पच्चीस लाख लीटर पानी लेकर जाती थी। वैसे तो पानी ले जाने वाली ट्रेन का इतिहास तीस साल पुराना है। 1980 से 1986 तक जब सौराष्ट्र में भीषण अकाल पड़ा था तो उस दौरान वहां का सबसे बड़े शहरों में से एक राजकोट पूरी तरह से प्यासा हो गया था। उसकी प्यास को बुझाने के लिए 1986 में पहली पानी की ट्रेन चलाई गई थी। इन तीस सालों में कई सत्ताएं बदलीं, कई तकनीकें बदली हम आधुनिकता की चरम पर पहुंचे और पानी का दोहन भी बदस्तूर जारी रहा। संचयन को भूल कर हमने हर स्रोत का दोहन किया।

मसलन, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल जिसे तालों का शहर कहा जाता है, जहां ले दे कर दो तालाब बचे हैं, बाकी तालाबों पर कब भूमाफियाओं का कब्जा हो गया किसी को भनक तक नहीं लगी। भोपाल के तीन सीढ़ीदार तालाब जो उस दौर की इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना थे। भोपाल के पहाड़ पर बने ईदगाह से जब बारिश का पानी बहता था तो उस एक पतनाले के जरिए ताजुल मस्जिद के पीछे बने मोतिया तालाब में इकट्ठा कर लिया जाता था। जब यह तालाब लबालब हो जाता था तब एक ठेले वाली सड़क से होता हुआ पानी थोड़ी से ढलान पर बने सैय्यद सिद्दीक हुसैन के तालाब को भरता था और इस तालाब के भर जाने के बाद पानी मुंशी हुसैन खां के तालाब में पहुंचता था और वहां से बेनजीर कॉलेज के पीछे बने पतनाले में छोड़ दिया जाता था। आज इन तालाबों का बस जिक्र भर बचा है क्योंकि अब इन तालाबों में पानी नहीं मकान नजर आते हैं।

भारत में तालाब बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। 1800 में मैसूर राज के दीवान ने वहां 39,000 तालाब बनाए थे। देश की राजधानी दिल्ली में ही लगभग 350 तालाब हुआ करते थे। लेकिन आज ढूंढ़ने जाएंगे तो एक तालाब भी बमुश्किल मिल पाएगा। इंदौर के पास देवास में बीते तीस सालों में छोटे बड़े सभी तालाब भू-माफियाओं के कब्जे में हैं और बताया जाता है कि 1990 से यहां रोजाना ट्रेन पानी लेकर आती है।

वर्तमान सरकार ने पानी पर चिंता जाहिर करने में एक कदम आगे बढ़ते हुए गंगा एवं जल संसाधन मंत्रालय बना दिया। लेकिन मंत्रालय ने बीते एक साल में जबानी खर्च करने के अलावा कुछ भी नहीं किया। गंगा के उद्धार के लिए बना मंत्रालय बीते सालों में गंगा को ठीक करने के लिए बैठक पर बैठक करता रहा है, योजनाओं पर योजनाएं बना रहा है। उत्तराखंड से लेकर गंगा बेल्ट पर बांध बनने का सिलसिला भी उतनी ही तेजी से चल रहा है। 250 करोड़ की लागत से गंगोत्री से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर बने लाहोरी नागपाल बांध को बंद तो कर दिया गया लेकिन जिन पहाड़ों में छेद किए गए थे और नहरें बनाई गई थीं, उन्हें भरने के बजाय उस पर गेट लगा दिया गया है।

इससे सरकार की नीयत साफ होती है। वहीं यमुना के किनारे श्रीश्री रविशंकर के कार्यक्रम को करवाने वाली सरकार मृत होती यमुना को लेकर कितनी चिंतित है साफ नजर आता है। सरकार की दूरअंदेशी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूखती गंगा और मरती यमुना को छोड़कर वह सरस्वती को ढूंढ़ने में पैसा और वक्त जाया करने में लगी हुई है। इसके लिए सरस्वती के रास्ते पर हर पचास किलोमीटर की दूरी पर कुएं खुदवाए जा रहे हैं जिससे जमीन के नीचे के पानी की जांच करके यह पता किया जा सके कि सरस्वती का अस्तित्व है या नहीं।

दरअसल पानी को लेकर जो सियासत रची जा रही है वह सिर्फ ध्यान भटकाने का मामला है। जो नदी मर रही है उसी जीवित करने के बजाय जो नहीं है उसकी खोज चल रही है। नए तालाब बनाने के बजाय जो अस्तित्व में थे उस जमीन को भी बेचा जा रहा है। लातूर तक तीन करोड़ रुपए खर्च कर ट्रेन चलाई जा रही है लेकिन समुद्र के पानी को पीने के लायक बनाने की तकनीक पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। नहीं तो दुनिया भर के चक्कर लगाने वाले देश के नेता एक चक्कर इजराइल का भी लगा आते और उनसे समुद्र के पानी को साफ करने की तकनीक ले लेते।

दरअसल पानी का बाजार आज सबसे बड़ा है। चाहे फिर वह बोतल में बंद पीने का पानी हो या सॉफ्ट ड्रिंक, जो प्यास बुझाने का दावा करते हैं । दरअसल रैंगो का मेयर कछुआ हो या मैड मैक्स फ्यूरी का राजा जो चिरयौवन के लिए मां के दूध से नहाता है, यह किरदार उन सत्ताधारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कछुए की तरह लंबी उम्र की कामना करते हैं और जनता के सामने खुद को भगवान की तरह पेश करके सारे स्रोतों पर कब्जा जमाए बैठे हैं।

ये करोड़ों का खर्चा करके ट्रेन चला कर अपनी चिंता जाहिर करते रहेंगे लेकिन सुधार के बारे में विचार नहीं करेंगे। हो सकता है लातूर जाने वाली ट्रेन किसी फिल्म निर्माता को जरूर कोई कहानी का विचार दे दे और इस बार काकोरी कांड की तरह पानी की ट्रेन लूटने पर कोई फिल्म बन जाए…

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