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पानी ने बिगाड़ी कहानी

ज्यादातर शहरों में बगल की नदियों से जलापूर्ति होती है। इन नदियों का पानी बेहद प्रदूषित हो चुका है, यहां तक कि इनमें पानी भी नहीं होता।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 04:57 am
केंद्रीय जल आयोग के 2014 के आंकड़ों के मुताबिक देश के ज्यादातर बड़े जलाशयों का जलस्तर बेहद कम था।

भारत में पानी की अकूत संपदा बिखरी है, लेकिन विडंबना है कि कुप्रबंधन की वजह से कई राज्य और कई महानगरों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई है। केंद्र सरकार पानी की समस्या पर विधेयक लाने की तैयारी में है तो कई जगह अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। पानी की समस्या पूरे देश में किसी और समस्या से ज्यादा विकराल होती जा रही है। महाराष्ट्र में झड़पों से बचने के लिए धारा 144 लगानी पड़ी है। उत्तर प्रदेश के बदायूं में कुछ दिन पहले सरकारी नल से पानी भरने को लेकर हुए विवाद में एक पैंतीस साल के युवक की हत्या कर दी गई। मध्य प्रदेश के रायसेन में पानी को लेकर हुए खूनी संघर्ष में तीन महिलाओं समेत आठ लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे।

जी हां, यह अपने देश की जमीनी हकीकत है। देश के तमाम हिस्सों में पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। लातूर एक बार फिर खबरों में है। इस बार भूकम्प की वजह से नहीं, पानी के गंभीर संकट की वजह से। यहां फिलहाल 31 मई तक धारा 144 लगा दी गई है। यानी यह आशंका है कि पानी को लेकर यहां हिंसक संघर्ष हो सकता है। पानी संकट की वजह से महाराष्ट्र से आईपीएल के मैच रद्द करके सुप्रीम कोर्ट ने इसकी गंभीरता पूरे देश को बताने की कोशिश की है। लेकिन इसके बावजूद आलम यह है कि लातूर में कोई मंत्री दौरा करता है तो उसके लिए हेलीपैड बनाने में ही हजारों लीटर पानी बहा दिया जाता है।

आज पानी को लेकर हाहाकार मचा है वह अचानक नहीं है। बरसों से पानी सियासत का एक अहम मुद्दा रहा है। लोगों को साफ पानी मुहैया कराने के नाम पर कितनी सरकारें आर्इं और गर्इं, लेकिन आज भी हालात जस के तस हैं। देश के सुदूर इलाकों को तो छोड़ दीजिए, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में भी पानी का घोर संकट दिखता रहता है। ढेर सारे बर्तनों, डिब्बों और कंटेनरों के साथ जनता लंबी कतारों में खड़ी नजर आती है। पानी के टैंकर का इंतजार, टैंकर के आगे लंबी कतारें…इसे लेकर होने वाले झगड़े और यहां तक कि पानी के विवाद में मौत तक की खबरें अक्सर सुनने को मिल जाती हैं। टीवी चैनलों के लिए तो ये दृश्य आम हैं। सरकारी महकमों के लिए भी ‘पानी बचाओ’ या ‘जल ही जीवन है’ या ‘जल है तो कल है’ जैसी सूक्ति दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर और सिर पर बरतन लादे महिलाएं कई इलाकों में नजर आती हैं। गांवों में तमाम जलस्रोत सूखे पड़े हैं। हैंडपम्प या तो बेकार हैं या उनमें पानी नहीं आता। कुएं, ताल-तलैए और यहां तक कि कई छोटी नदियों में पानी नहीं है। पानी को लेकर गंभीर संकट का आलम इस बार फरवरी-मार्च से ही यों ही नहीं शुरू हो गया है। आखिर क्यों देश में अभी से ही सूखे के हालात हैं और तकरीबन 12 राज्य गंभीर रूप से सूखे की चपेट में आ चुके हैं? पिछले कई सालों से बारिश के बेहद कम होने और मौसम के बदलते मिजाज ने पानी के इस संकट को और ज्यादा बढ़ाया है। सरकारों ने इस बारे में कोई ठोस योजना बनाने की जगह पानी को राम भरोसे छोड़ रखा है।

भारत में नदियों को बचाने की कोशिशों में लगे मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह हमेशा से यह कहते रहे हैं कि हमें भूमिगत जल संरक्षण या जल-भंडारण की दीर्घकालिक नीति बनानी पड़ेगी। लेकिन इसके बारे में अभी तक ठीक से सोचा भी नहीं गया है। उनके अनुसार बुंदेलखंड, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे रेतीले और परती इलाकों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है। राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके तो पानी की समस्या के लिए हमेशा से ही कुख्यात रहे हैं और यहां के लिए इसे एक आम समस्या मान लिया गया है। राजेंद्र सिंह इस बात से भी नाराजगी जता चुके हैं कि पानी का धंधा करने वाली तमाम कंपनियों को पानी के दोहन का आसानी से लाइसेंस मिल जाता है जबकि किसान को ट्यूबवेल की मंजूरी नहीं दी जाती।

जाहिर है यह समस्या कोई नई नहीं है और न ही इसे लेकर हाहाकार कोई आज मचा है। सरकारें कोई भी रही हों, पानी, बिजली और सड़क सरकार के लिए सबसे अहम मुद्दे रहे हैं। हर चुनाव में उठाए जाने वाले मुद्दों में भी यही सबसे प्रमुखता से उठाए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं दिखता है। बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं प्रकृतिजनित हैं और इससे निपटने के तौर तरीके सरकारों को ढूंढ़ने होते हैं। जान माल की हिफाजत से लेकर लोगों को खाना-पानी और मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराना सरकार का काम है लेकिन तमाम सरकारें इस प्रबंधन में इसलिए नाकाम रहती हैं क्योंकि इसे लेकर न तो गंभीरता है और न ही आम आदमी की जायज चिंता।

दरअसल पिछले कुछ सालों से होता यह आया है कि हम हर समस्या को ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ देते हैं। ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसा शब्द है जो समस्या से निपटने के तरीके ढूंढ़ने से बचने का एक मजबूत हथियार मुहैया करा देता है। देश के औद्योगिक विकास के साथ साथ बढ़ते प्रदूषण को ग्लोबल वार्मिंग की बड़ी वजह माना जाता है। लेकिन न तो विकास की रफ्तार रोकी जा सकती है और न ही लोगों को प्यासा मारा जा सकता है। प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता।

हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने पानी के संकट को लेकर गंभीर चिंता जताई है। इससे पहले बांबे हाई कोर्ट ने 2014 में और केरल हाईकोर्ट ने 1990 में साफ पानी को नागरिकों का हक बताया था। लेकिन साफ पानी की तो छोड़िए कई राज्यों में लोगों को बूंद-बूंद पानी को तरसना पड़ रहा है। दूसरी तरफ ऐसे सुविधाजीवी लोगों की भी कमी नहीं है जो पानी बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। निजी बंगलों, बगीचों, भव्य फ्लैटों, होटलों, वाटर पार्क, स्वीमिंग पूल और कारखानों में पानी बेरहमी से बहाया जाता है।

उनके लिए पानी जरूरत की नहीं विलासिता की चीज है। इनके लिए ग्लोबल वार्मिंग का कोई बहाना नहीं चल पाता। उन्हें इस बात की परवाह नहीं कि इस साल मार्च में ही देश के 91 प्रमुख जलस्रोतों में पानी बेहद कम हो चुका है। और अगर बारिश ठीक से नहीं हुई तो यहां एक बूंद पानी भी नहीं बचेगा। केंद्रीय जल आयोग के 2014 के आंकड़ों के मुताबिक देश के ज्यादातर बड़े जलाशयों का जलस्तर बेहद कम था। आयोग के अनुसार देश के बारह राज्यों- हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, त्रिपुरा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के जलाशयों के जल-स्तर में काफी गिरावट दर्ज की गई थी। 2015 में भी लगभग यही स्थिति रही है और इस साल हालात और बिगड़ने की आशंका है।

पिछले चार सालों से देश में जल सप्ताह मनाया जाता है। इस बार भी इस जल सप्ताह के दौरान पानी को लेकर बड़ी बड़ी बातें हुई हैं और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे एक अहम पहल बताया। बेशक दुनिया के तमाम देशों के प्रतिनिधियों के बीच जल संरक्षण के तमाम तरीके सीखने समझने का यह एक बेहतर प्लेटफॉर्म है। इस बात पर भी सबने जोर दिया कि पानी एक साझी विरासत है और इसके इस्तेमाल को लेकर सबको सावधानी भी बरतनी चाहिए और सबको जरूरत के मुताबिक पानी मिल सके इसकी कारगर कोशिश भी होनी चाहिए। ‘वाटर एक्सपो’ के दौरान 20 देशों ने यह बताने की कोशिश की कि किस तरह पानी बचाया जाए, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके कैसे साफ पानी आम लोगों को मुहैया कराया जाए।

पानी की गंभीर समस्या को देखते हुए सरकार ने पिछले साल ही एलान किया था कि पानी के इस्तेमाल की सीमा तय करने के लिए कानून बनाया जाएगा। और अब इस दिशा में एक मसविदा तैयार किया जा रहा है। माना जा रहा है कि संसद के आगामी सत्र में इस बारे में एक विधेयक भी लाया जाएगा, जिसमें सरकार पानी का भंडारण सुनिश्चित करके इसके प्रभावी प्रबंधन को लेकर भी दिशा निर्देश तय करेगी। हालांकि पानी को हमेशा से ही राज्य का विषय माना गया है इसलिए अगर कानून बना भी तो राज्य सरकारें इसे लागू करेंगी या नहीं, यह सवाल बना हुआ है। जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सफाई मंत्री उमा भारती यह बात कई बार कह चुकी हैं कि जल संरक्षण को लेकर ठोस योजना बनाने और उसे लागू करने की जरूरत है और इसके लिए हर राज्य सरकार को गंभीर होना पड़ेगा। इन तमाम दावों और कोशिशों के बावजूद आज भी देश में आठ करोड़ से ज्यादा लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पा रहा। दिल्ली में लोगों को मुफ्त पानी का दावा किया गया था, लेकिन तमाम इलाके आज भी पानी के संकट से जूझ रहे हैं।

हालांकि, लोगों ने ऐसी मिसालें भी कायम की हैं जिससे पानी का संकट कम करने में मदद मिली है। कई स्वंयसेवी संगठन गांवों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए काम कर रहे हैं और सरकार पर निर्भर हुए बगैर इस गंभीर समस्या से छुटकारा दिलाने के रास्ते तलाश रहे हैं। ताजा मिसाल राजस्थान के बलरामपुर जिले के बीजाडीह गांव की ही है। इस गांव के लोगों ने दो साल की मेहनत के बाद करीब डेढ़ किलोमीटर पहाड़ी रास्तों से खुद पाइपलाइन बिछाई और पहाड़ के एक जलस्रोत से गांव तक पानी पहुंचा दिया। इससे पहले यहां के लोगों को पानी के लिए लंबा पहाड़ी रास्ता तय करना पड़ता था। ऐसी कई मिसालें उत्तराखंड में भी दिखाई पड़ती हैं।

जाहिर है कुछ गांव के लोगों ने अपनी पंचायतों की मदद से या फिर वहां काम कर रहे गैरसरकारी संगठनों की मदद से कुछ हद तक तो पानी की समस्या सुलझा ली है लेकिन इससे सरकारी जिम्मेदारियां कम नहीं हो जातीं। मौसम और प्रकृति की मार और साल के नौ-दस महीनों तक चलने वाला पानी का संकट बरसों से कड़वी सच्चाई बना हुआ है। मॉनसून चक्र के बदलने और इसके उल्टे सीधे अनुमानों से भी मुश्किलें बढ़ी हैं। शायद इसीलिए हर सरकार जनवरी के बाद से ही ज्यादातर शहरों में पानी की कटौती शुरू कर देती है। आंकड़े बताते हैं कि आज देश के करीब दस करोड़ घरों में पानी का संकट है। बच्चे गंदा और दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और हर साल लाखों बच्चे इसकी वजह से बीमारियों के शिकार होते हैं और अपनी जान तक गंवाते हैं। अप्रैल, मई और जून तक गर्मी बढ़ने के साथ ही जलस्रोत सूखते जाते हैं।

ज्यादातर शहरों में बगल की नदियों से जलापूर्ति होती है। इन नदियों का पानी बेहद प्रदूषित हो चुका है, यहां तक कि इनमें पानी भी नहीं होता। गंगा, यमुना, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी जैसी बड़ी और विशाल नदियों के किनारे बसे शहरों में अभी से टैंकर लगाए जा चुके हैं। बेतरतीब तरीके से बसाए गए शहरों की वजह से हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। औद्योगिक घरानों को पानी का मालिक बना देने वाली नीति ने पानी को आम जनता से दूर कर दिया है। बोतल में बंद पानी, प्लास्टिक की थैलियों में बिकने वाला पानी और इसके लिए लगने वाले बड़े बड़े उद्यम किसके हितों के लिए हैं? बाजारीकरण के इस दौर में पानी को लेकर सरकार की यह नीतियां लोगों को प्यासा मार रही है। ऐसे में जरूरत है कि पानी का मालिकाना हक तय किया जाए। पानी को लेकर कई राज्यों में संघर्ष के हालात तो बनते जा रहे हैं। इस स्थिति को यथाशीघ्र हल करने की जरूरत है।

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