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ललित-प्रसंग: सांस्कृतिक समृद्धि का संवत्सर

ब्लर्ब: नव संवत्सर आते ही लगता है जैसे शुभ्र चांदनी नहीं, वरन स्वर्ग की स्वर्णमुखी अप्सराएं ही खेतों में लहलहाती जौ-गेहूं की बालियों में उतर आती हैं। इन महकती बालियों में सृष्टि के पवित्र कौमार्य और रंग-रूप की अपार धारा बहती है।

Author April 14, 2019 1:44 AM
चित्र: नरेंद्रपाल सिंह

शास्त्री कोसलेंद्रदास

विक्रम संवत्सर का संबंध कालगणना से ही नहीं, बल्कि सुदीर्घ साहित्य और आंचलिक जीवन की विविधता से है। ईश्वर ने अपनी एकता को अनेकता में बदलने के लिए जिस दिन को चुना वह जगत का उत्पत्ति दिवस है। शास्त्रीय मान्यता है कि भारतीय परंपरा सृष्टि के उत्पत्ति दिवस को संवत्सर के प्रथम दिवस के रूप में मनाती है। जगतपिता ब्रह्मा ने सृष्टि का आरंभ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अत: नव संवत का प्रारंभ इसी दिन से होता है। इस प्रकार यह दिन है एक, पर इसके अनेक नाम और रूप हैं। यह कई संवत्सरों का शुरुआती दिन है। नक्षत्र संवत, श्रीराम संवत, युधिष्ठिर संवत, विक्रम संवत्सर और शक संवत। भारतीय परंपरा में हरेक वर्ष का एक स्वतंत्र नाम होता है। इस बार के नव संवत का नाम है- परिधावी। यह साठ संवत्सरों में छियालीसवां है। भारतीय परंपरा में समस्त धार्मिक कार्यों के आरंभ में संकल्प करते समय संवत्सर की संख्या और उसके नाम का उच्चारण अवश्य किया जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संवत्सर साठ हैं, जो बीस-बीस के क्रम में समान रूप से ब्रह्म विंशति, विष्णु विंशति और शिव विंशति में बंटे हैं। जब साठ संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर से पहले नाम वाले संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है। एक मान्यता है कि महाराज विक्रमादित्य के उज्जैन नगरी में सम्राट के रूप में विराजमान होने पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत्सर की घोषणा हुई। विक्रमादित्य की दिग्विजय यात्रा के इतिहास से जुड़े इस संवत को अब 2076 वर्ष हो गए हैं।शकों को जीत लेने पर शक संवत शुरू हुआ, जिसका आरंभ भी नव संवत्सर वाले दिन ही होता है। इस बार 2041 वां शक संवत शुरू हुआ है। यही शक संवत भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत हमारा राष्ट्रीय वर्ष है। विक्रम संवत्सर केवल भारत में नहीं, बल्कि नेपाल, म्यांमा, थाईलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में भिन्न-भिन्न मान्यताओं के साथ अगाध श्रद्धा से मनाया जाता है। भारतीय संवत्सर उस परंपरा का निर्वाह करता है, जिसमें बाहरीपन से दूर सांस्कृतिक समृद्धि का महाभाव छिपा है। यह ऐसी आध्यात्मिक चेतना एवं ऊर्जा देता है, जो अर्थ और काम ही नहीं, मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है। वैदिक साहित्य से लेकर अब तक समय को मापने के लिए काल गणना की अवधि निश्चित की गई है। इस हिसाब से ‘कल्प’ सबसे बड़ी इकाई है। इसके बाद महायुग और युग है। एक इकाई सवंत्सर है। संवत्सर के बाद अवरोही क्रम में अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, प्रहर, मुहूर्त और घटी आदि हैं।

विक्रम संवत गणित से जुड़ा है। विभिन्न धार्मिक मान्यताओं में संवत्सर या मास की गणना करने में कहीं सूर्य तो कहीं चंद्रमा की गति को कारण माना जाता है। इसलिए वहां प्राय: यह समस्या होती है कि लगभग हरेक महीने में कभी दिन कम हो जाते हैं तो कभी ज्यादा। इसके ठीक विपरीत भारतीय काल गणना में सूर्य और चंद्रमा दोनों ही समय की गणना में सहायक हैं। चांद्र एवं सौर मास, दोनों काल गणना में मुख्य हैं। इस नाते तिथियों का निर्धारण सूर्य और चंद्र की गति से होता है। पूर्णिमा चंद्रमा के प्रभाव को प्रकट करती है, तो अमावस्या उसके अभाव को। प्रत्येक तिथि का एक-एक अधिष्ठाता देवता होता है। मेष-वृष आदि राशियां बारह हैं। इनमें सूर्य प्रत्येक राशि में एक मास तक रहता है, जिससे हरेक वर्ष में बारह महीने होते हैं। सूर्य को राशियों का एक चक्र पूरा करने में बारह मास लगते हैं, जो एक संवत्सर होता है। गणित की यही अमर परंपरा सारे संसार में मानी जाती है। हिंदू परंपरा ही नहीं, जैन, बौद्ध और सिखों में तिथि, मास और वर्ष इसी संवत्सर के सहारे माने जाते हैं। हमारे सारे उत्सव, पर्व और त्योहार इसी संवत्सर के हिसाब से आते-जाते हैं। इसके अनुरूप ही हमारा आहार-विहार ढला है। अब भले अंग्रेजी नववर्ष को ‘हैप्पी न्यू ईयर’ कह कर मनाएं, पर सही मायने में हमारा असली नववर्ष यही विक्रम संवत्सर है। पता नहीं किस ऋषि ने चैत्र मास के इस अलौकिक दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत की चांदनी रात से ही नए साल की शुरुआत मानी होगी। अभी सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित हो रही है। पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में और वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में। इस संवत के आरंभ में चारों ओर पकी फसल का दर्शन आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई, हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। भारत के आभा मंडल के पर, बस चहुं ओर आनंद ही आनंद।

नव संवत्सर आते ही लगता है जैसे शुभ्र चांदनी नहीं, वरन स्वर्ग की स्वर्णमुखी अप्सराएं ही खेतों में लहलहाती जौ-गेहूं की बालियों में उतर आती हैं। इन महकती बालियों में सृष्टि के पवित्र कौमार्य और रंग-रूप की अपार धारा बहती है। शास्त्र कहते हैं कि चैत के महीने में तैयार इस फसल में ‘माता गौरी’ का निवास है। तभी तो घर-घर में नई फसल के आ जाने से चैत की प्रतिपदा से लेकर दुर्गाष्टमी तक, तो कहीं महानवमी तक अन्न और जीवन देने वाली पृथ्वी का पूजन ही माता दुर्गा के रूप में हर तन-मन में होता है। अष्टमी-नवमी को महादेवी के चरणों में इस अन्न को चढ़ा कर कन्या से उसे जूठा करवा कर फिर पूरे वर्ष देवी के प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। यह है हमारी जीवन परंपरा और अध्यात्म की धारा, जिससे हमारा नया साल आ जुड़ता है। परंपरा में इस विक्रम संवत्सर के चेहरे पर जो चमक है, वह अध्यात्म और भारत के पुरातन इतिहास की है। तभी तो देखिए, जब भी नया वर्ष शुरू होता है, तो सारे काम छोड़ कर घर-घर में पूजा-पाठ और वंदना। आम-अशोक के नए पत्तों की सुंदर बंदनवारें। चहुं ओर महकता धूप का सौरभ और सुनाई देती मंत्रों की भाव ध्वनि। व्रत-जप-दान-संयम-नियम और निराहार रह कर श्रीराम के अयोध्या में उतर आने की उत्कट प्रतीक्षा। इसी कारण परंपरा में नववर्ष ‘भोग’ के लिए नहीं वरन ‘योग’ के लिए है।

संवत्सर की विशिष्टता है कि परम पुरुष अपनी प्रकृति से मिलने जब भी आता है, तो सदा चैत्र में ही आता है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया। न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऐसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म की धरती पर सरयू किनारे श्रीराम उतर आए। श्रीराम का अवतार चैत्र की नवमी को होता है। साथ ही सृष्टि का जन्मोत्सव जिस दिन मनाया जाता है, वह दिन है-चैत्र शुक्ल प्रतिपदा। यह संवत्सर हमारे जीवन में आने-जाने वाला काल मात्र नहीं है। बल्कि यह तो हमारे जीवन में और हमारे साहित्य में पूरी तरह से रचा-बसा है। इसलिए अंजलि में अक्षत, पुष्प और नया अनाज लेकर इस संवत्सर का अभिनंदन और अभिवंदन करना आवश्यक है। इसे पाद्य, अर्घ्य, आचमन और मन मंदिर में बैठाने के लिए स्वर्ण का सुंदर आसन भेंट करना जरूरी है, जिससे ‘परिधावी’ नाम का यह संवत्सर हमें सुख, शांति और समृद्धि का ऐसा आशीर्वाद दे, जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।

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