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‘शिक्षा’ कॉलम में विजन कुमार पांडेय का लेख ‘कहां से लाएं कुशल शिक्षक’

आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर देश में स्कूली शिक्षा को पटरी पर नहीं लाया जा सका है तो यह एक बेहद चिंताजनक विषय है।
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

आज भी देश में एक लाख से अधिक स्कूल सिर्फ एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। केवल एक शिक्षक पूरे स्कूल के छात्रों को कैसे पढ़ा लेता होगा, सोचने वाली बात है। यह रिपोर्ट देश में स्कूली शिक्षा की बदहाल तस्वीर पेश करती है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बारे में संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की हालत सबसे खराब है। आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर देश में स्कूली शिक्षा को पटरी पर नहीं लाया जा सका है तो यह एक बेहद चिंताजनक विषय है। केवल एक शिक्षक कितनी जिम्मेदारी से पढ़ाता होगा और छात्रों को उनकी बात कितनी समझ में आती होगी, यह सोचने वाली बात है। इस रिपोर्ट से साफ है कि शिक्षा को लेकर सरकारें गंभीर नहीं हैं। ये विडंबनापूर्ण स्थिति इसलिए है क्योंकि नीति और उसे लागू करने के बीच काफी बड़ी खाई है। शिक्षा के प्रसार के लिए जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम लाया गया उसके अनुसार प्रति 30-35 छात्र पर एक शिक्षक होना चाहिए। लेकिन, इस अनुपात को लागू करने में बहुत विषमता है। जहां बड़ी संख्या में स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, वहीं तमाम स्कूल ऐसे भी हैं जहां शिक्षक ज्यादा हैं, मगर छात्र कम। हालांकि, यह स्थिति कम ही स्कूलों में है। ऐसे हालात में इन शिक्षकों की नियुक्ति वहां की जानी चाहिए जहां बच्चे ज्यादा और शिक्षक कम हों।

किसी भी लोकतंत्र के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य- दो सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण विषय होते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने जो सहस्राब्दी लक्ष्य तय किए हैं उनमें शिक्षा भी एक है। एनसीईआरटी और गैर सरकारी संगठन ‘प्रथम’ ने स्कूलों और सीखने की गुणवत्ता पर एक सर्वेक्षण किया जिससे हताश कर देने वाले आंकड़े सामने आए। इस रिपोर्ट के अनुसार आठवीं कक्षा के पच्चीस प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जो दूसरी कक्षा की किताबें पढ़ नहीं पाते हैं। दूसरी कक्षा के बत्तीस प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो हिंदी अंग्रेजी की वर्णमाला ठीक ढंग से नहीं पढ़ पाते हैं। पांचवीं कक्षा पचास प्रतिशत से अधिक बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने वे बुनियादी कौशल भी नहीं सीखे हैं जो उन्हें दूसरी कक्षा में ही सीख लेने चाहिए थे। इससे भी अधिक आठवीं के आधे से अधिक बच्चे बुनियादी गणित करने में भी सक्षम नहीं हैं। यही कारण है कि अधिक से अधिक लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। इस कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर निजी स्कूल खुलते जा रहे हैं लेकिन उनमें भी शिक्षा की कोई गुणवत्ता नहीं है। वहां शिक्षा को एक कारोबार बना दिया गया है। जिसमें पैसे वालों की पूछ होती है गरीबों की नहीं।

दरअसल, बच्चा एक अनगढ़ पत्थर की तरह होता है जिसमें सुंदर मूर्ति छिपी होती है, जिसे शिल्पी की आंख ही देख पाती है। वह उसे तराश कर सुंदर मूर्ति में बदल सकता है। इसी प्रकार माता-पिता, शिक्षक और समाज भी बच्चों को संवार कर उन्हें खूबसूरत व्यक्तित्व प्रदान कर सकते हैं। आज देश को एक नई शिक्षा नीति की जरूरत है। 1986 की शिक्षा नीति भारत में शिक्षा की मार्गदर्शक रही है। इस नीति की समीक्षा करके 1992 में इसे अपना लिया गया और आज भी यही लागू है। जबकि देश के आर्थिक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इन व्यापक बदलाव आया है। दरअसल उदारवादी आर्थिक नीतियों और विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के चक्कर में सरकारें सामाजिक दायित्वों से मुंह मोड़ रही हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषय आज उनकी प्राथमिकता नहीं रह गए हैं।

आ ज समाज में जो वातावरण बच्चों को मिल रहा है, वहां नैतिक मूल्यों के स्थान पर भौतिक मूल्यों को महत्त्व दिया जाता है, जहां एक अच्छा इंसान बनने की तैयारी की जगह वह एक धनवान, सत्तावान समृद्धिवान बनने की हर कला सीखने के लिए प्रेरित हो रहा है ताकि समाज में उसकी एक ‘स्टेटस’ बन सके। माता-पिता भी उसी दिशा में उसे बचपन से तैयार करने लगते हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं का अधिक से अधिक अर्जन ही व्यक्तित्व विकास का मानदंड बन गया है। आत्म-संयम, सेवा भावना, कर्तव्यबोध, श्रम, त्याग, समर्पण आदि गुणों से बना सादा जीवन उनका आदर्श नहीं रहा। आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को सही प्रेरणा, सही मार्गदर्शन और सही परामर्श के साथ स्वस्थ पारिवारिक और सामाजिक वातावरण मिले। शिक्षा संस्थाओं की भी यह जिम्मेदारी है कि वे बालकों और किशोरों की ऊर्जा और क्षमता को सही रचनात्मक दिशा दें। ताकि वे भौतिक और आत्मिक विकास में संतुलन बनाने की कला सीख सकें।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी जिस तरह बच्चों के मन-मस्तिष्क को प्रदूषित कर रहा है वह भी चिंता का ही विषय है। विश्व में बढ़ती हिंसा, अपराध के नए-नए तरीके, क्रूरता, नफरत, भौंडा अंग-प्रदर्शन और केबल संस्कृति बच्चों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। विदेशी चैनलों और विदेशी फिल्मों के जरिए परोसी जा रही अश्लील संस्कृति भी बच्चों को बिगाड़ रही है।
किसी भी राष्ट्र की प्रगति ही नहीं, वरन उसका अस्तित्व भी बालशक्ति के प्रभावशाली उपयोग में निहित है। आज के बच्चे जो कल के नागरिक होंगे, उनकी क्षमताओं, योग्यताओं का शीघ्र पता लगाकर उनको वैसा प्रशिक्षण देकर ऐसी दिशा में मोड़ा जाए, जिससे केवल उन्हें ही आत्म-संतुष्टि न हो बल्कि राष्ट्र की समृद्धि में उनका समुचित योगदान मिल सके।
प्रशासन के लाख दावों के बावजूद एक बार फिर निजी स्कूलों की मनमानी अभिभावकों पर भारी पड़ रही है। निजी स्कूलों की शिक्षण सामग्री चुनिंदा दुकानों पर मनमाने दाम में बिकती है। सीमित स्थानों पर उपलब्धता के कारण अभिभावकों को मजबूरी में महंगे दाम पर किताबें खरीदनी पड़ती हैं।

कई स्कूलों में निजी प्रकाशकों की किताबें चलती हैं। इनके दाम एनसीईआरटी की किताबों से कई गुना ज्यादा होती हैं। निजी प्रकाशकों और स्कूल संचालकों के गठजोड़ से चलाई जा रही इन किताबों से अभिभावकों की जेबें ढीली हो रही हैं। दूसरी ओर शिक्षा विभाग ऐसे निजी स्कूलों की मनमानी पर नकेल कसने में नाकाम साबित हो रहा है। गरीब अभिभावकों को रोज वही डर सताता है कि वे अपने बच्चे को आगे पढ़ा पाएंगे कि नहीं। प्रवेश शुल्क से लेकर किताब-कापियों के दामों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी से लोगों के घर का बजट तो बिगड़ ही रहा है साथ में गरीब बच्चों का भविष्य भी अंधकार में है। यह कैसा सपना सरकार दिखा रही है? अभी हाल ही में गाजियाबाद के एक निजी स्कूल में पढ़ने वाली लड़की ने महज इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके पिता दो महीने से उसकी फीस नहीं भर पा रहे थे। क्यों सरकारें ऐसे स्कूल चला रही हैं, जहां खानापूर्ति के लिए कक्षाएं चल रही हैं और शिक्षकों को तनख्वाह मिल रही है। हमारी शिक्षा व्यवस्था का इस तरह बिगड़ना घोर चिंता का विषय है, लेकिन नीतिकार और योजनाकार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

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