चिंता : गरीबी का दुश्चक्र

हमारे देश में खानपान को भी कई तरीके से परिभाषित किया जाता है। हम अक्सर अपने बूढ़े-बुजुर्गों से सुनते रहते हैं कि हमारा खानपान अच्छा होना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ भोजन..

Author नई दिल्ली | Updated: November 22, 2015 9:10 AM
Poverty in india, Poverty Line, Poverty Line in India, Povertyसामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

हमारे देश में खानपान को भी कई तरीके से परिभाषित किया जाता है। हम अक्सर अपने बूढ़े-बुजुर्गों से सुनते रहते हैं कि हमारा खानपान अच्छा होना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ भोजन से स्वस्थ शरीर का और स्वस्थ शरीर से स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण होता है। लेकिन उनका क्या जिनके पास खाने को दो रोटी नहीं है। उनके शरीर और मस्तिष्क का निर्माण कैसे होगा? उनके मस्तिष्क में अच्छे विचार कहां से प्रस्फुटित होंगे? देश में अन्न खरीदने वाला व्यक्ति तो संपन्न बन सकता है लेकिन अन्न पैदा करने वाला किसान अपना पेट भरने के लिए तरसता है।

आज देश की ऐसी हालत आजादी के अड़सठ वर्ष बीत जाने पर भी है। वैश्विक स्तर पर आई रिपोर्ट का कहना है कि भारत भूखे लोगों का घर है, विश्व की सबसे अधिक भूख से पीड़ित जनसंख्या यहां निवास करती है। यूनाइटेड नेशन द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को पूरा करने में नाकाम रहा। हालांकि इतना जरूर हुआ है कि दस वर्षों में गरीबी आधी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 27 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे निवास करते हैं, इनकी कमाई 1.25 डॉलर प्रतिदिन से कम है। यहां की एक चौथाई जनसंख्या कुपोषण का शिकार है और लगभग एक तिहाई जनसंख्या भूख से पीड़ित है।

विश्व में सामाजिक सुरक्षा के तहत रोजगार प्रदान करने में विश्व बैंक ने मनरेगा को पहले स्थान पर माना है। कहा गया है कि मनरेगा भारत के पंद्रह करोड़ लोगों को रोजगार देता है। मिड डे मील के लिए भी विश्व बैंक ने भारत की पीठ थपथपाई और कहा की यह विश्व में चलाई जाने वाली इस तरह की सबसे बड़ा विद्यालयी कार्यक्रम है, इससे भारत में 10.5 करोड़ बच्चे लाभान्वित होते हैं। लेकिन, यह सिक्के का एक पहलू भर है। दूसरा पहलू देखने पर पता चलता है की मनरेगा और मिड डे मील भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। देश में एक तरफ स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया की बात हो रही है तो दूसरी ओर करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं।

गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण किसी भी देश के विकास के मार्ग की बाधाएं हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रेगनर नर्कसे ने कहा है कि कोई व्यक्ति गरीब है, क्योंकि वह गरीब है यानी गरीब व्यक्ति गरीबी की वजह से ठीक से भोजन नहीं कर पाता, इसलिए उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, जिसकी वजह से वह कुपोषण का शिकार रहता है। आखिरकार वह ठीक से काम नहीं कर पाता, फिर वह खर्च नहीं कर पाता, इस प्रकार गरीबी का दुश्चक्र चलता रहता है और गरीब व्यक्ति गरीब बना रहता है।

हमारी सरकार गरीबी को कम करने के लिए हमेशा स्वयं को सजग दिखाती रही है। समय-समय पर तरह-तरह की योजनाओं का क्रियान्वयन करती रही है। पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम इसी दिशा में चलाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम था। गरीबी की गणना के लिए सरकार तरह-तरह की समितियों का गठन करती रहती है। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है की क्या सरकार वाकई में प्रतिबद्ध है गरीबी को कम करने के लिए?

क्योंकि कई बार सरकार द्वारा जारी आंकड़े ही इनके क्रियाकलापों की पोल खोलते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक 1999-2000 में जहां देश में निर्धनता का प्रतिशत 26.1 फीसद था वह 2004-05 में घटकर 21.8 फीसद रह गया था। लेकिन 2008 में सरकार द्वारा गठित तेंदुलकर समिति ने माना था कि निर्धनता का प्रतिशत 37.2 था।

2013 में जारी आमदनी और खर्च संबंधी एनएसएसओ सर्वे में यह बात सामने आई कि करीब 60 फीसद ग्रामीण आबादी रोजाना 35 रुपए से भी कम पर गुजर-बसर करने को मजबूर थी। इनमें से भी दस फीसद लोगों की हालत तो और बदतर थी। जीने के लिए वे सिर्फ पंद्रह रुपए ही रोजाना खर्च कर पाते थे। यूपीए सरकार तमाम योजनाओं के जरिए गरीबी दूर करने के दावे कर रही थी, लेकिन खुद उसी के आंकड़े ही इन दावों की पोल खोल रहे थे।

एनएसएसओ की ओर से जुलाई 2009 से जून 2010 के बीच कराए गए सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में एक व्यक्ति का औसत मासिक खर्च 1,054 रुपए था। वहीं शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 1,984 रुपए मासिक था। इस हिसाब से शहरवासी औसतन 66 रुपए रोजाना खर्च करने में सक्षम था। वैसे दस फीसद शहरी आबादी भी मात्र बीस रुपए में गुजारा कर रही थी। यह राशि ग्रामीण इलाकों से थोड़ी ही ज्यादा थी। इसी सर्वे की मानें तो महीने के इस खर्च के मामले में बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों की की हालत सबसे ज्यादा खराब थी, जहां लोग करीब 780 रुपए महीने पर अपना भरण पोषण कर पाते थे। यह रकम महज छब्बीस रुपए रोजाना बैठती थी। इसके बाद ओडिशा और झारखंड का स्थान था, जहां प्रति व्यक्ति 820 रुपए महीने का खर्च था। खर्च के मामले में केरल अव्वल था। यहाँ के ग्रामीण 1,835 रुपए मासिक खर्च करते थे। शहरी आबादी के मासिक खर्च में महाराष्ट्र शीर्ष पर था। यहां प्रति व्यक्ति खर्च 2,437 रुपए था। बिहार इस मामले में भी सबसे पिछड़ा हुआ था। यहां की शहरी आबादी मात्र 1,238 रुपए महीने पर पेट पालती थी।

यूपीए-दो सरकार के समय 2013 में एनएसएसओ के अनुमान पर ही योजना आयोग ने शहरी इलाकों में 28.65 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 22.42 रुपए रोजाना कमाने वालों को गरीबी रेखा से नीचे रखा था। खर्च के इस स्तर को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी ने खूब बवाल मचाया था। लेकिन 2014 में भाजपा नीत राजग के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद योजना आयोग ने 32 रुपया ग्रामीण और 47 रुपया शहरी इलाकों में दैनिक खर्च तय किया। यह भी किसी मजाक से कम नहीं था। वर्तमान में दाल, सब्जी तेल आदि के भाव आसमान छू रहे हैं। इन सबके बीच ये आंकड़े इन गरीबों का उपहास उड़ाने के अलावा कुछ नहीं है।

आज भारत में विश्व की सबसे अधिक कार्यबल जनसंख्या मौजूद है लेकिन वे बेरोजगार हैं। उनकी क्षमता का दोहन नहीं हो पा रहा है। नतीजतन वे चोरी, डकैती, लूटपाट जैसे अपराधों की ओर भाग रहे हैं। इनकी जमापूंजी भी कुछ नहीं बन पाती। कल को जब यह जनसंख्या बुजुर्ग होगी और इनके पास कार्य करने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब इनका भरण-पोषण कौन करेगा। सड़क के किनारे, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड आदि कितनी ही जगहों पर भीख मांगने वालों की लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलती है। ऐसे में भारत को विकसित देश की कतार में लाना मुश्किल जान पड़ता है। देश को विकसित बनाने के लिए देश के लोगों को सामाजिक सुरक्षा देना बहुत आवश्यक है। आज सरकार को मजबूत इरादों और ईमानदारी के साथ इन समस्याओं से निपटने की प्रतिबद्धता दिखाते हुए समावेशी विकास पर जोर देने की जरूरत है। (वंदना सिंह)

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