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बिसरती गायकी विधाएं

गायन की अनेक विधाएं अब लुप्त होने की कगार पर हैं। ऐसा नहीं कि अब उन्हें सुनने वाले नहीं रहे, बल्कि आधुनिक शैलियों के छा जाने की वजह से परंपरागत लोकगायकों और शास्त्रीय विधाओं को पोसने-प्रसारित करने वालों को गुजारे लायक आमदनी भी नहीं हो पा रही, इसलिए वे उन्हें छोड़ रहे हैं।

Author July 29, 2018 5:57 AM
कव्वाली के अब पहले जैसे मुकाबले नहीं होते, गजल की नजाकत कहीं गुम हो गई है और टप्पा की तैयारी दम तोड़ने लगी है।

गायन की अनेक विधाएं अब लुप्त होने की कगार पर हैं। ऐसा नहीं कि अब उन्हें सुनने वाले नहीं रहे, बल्कि आधुनिक शैलियों के छा जाने की वजह से परंपरागत लोकगायकों और शास्त्रीय विधाओं को पोसने-प्रसारित करने वालों को गुजारे लायक आमदनी भी नहीं हो पा रही, इसलिए वे उन्हें छोड़ रहे हैं। कुछ साल पहले तक लोकप्रिय कव्वाली और गजल गायकी जैसी विधाएं भी अब हाशिये पर पहुंच गई हैं। गायकी की विलुप्त होती परंपराओं का विश्लेषण कर रहे हैं रघुवीर सिंह

कव्वाली के अब पहले जैसे मुकाबले नहीं होते, गजल की नजाकत कहीं गुम हो गई है और टप्पा की तैयारी दम तोड़ने लगी है। त्रिवट और चतुरंग के रंग बे-रंग हो गए हैं, तो बिरहा विरह-वेदना झेल रहा है और आल्हा के वीर स्वर इतिहास के पन्नों में कैद हो चुके हैं। होरी और चैती को तो शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायकों ने बचा लिया, लेकिन फाग और कजरी अपनी ऋतुओं में भी बेमौसमी हो गए हैं। राजस्थान के मांड का जोश अब खत्म हो गया है, तो हरियाणा के सांग की मस्ती भी न जाने कहां खो गई है! जीवन के प्रत्येक कार्य और अवसर पर लोगों को प्रोत्साहन, जोश और सुकून देने वाले तमाम भारतीय शास्त्रीय और लोकगायन के स्वर थमते जा रहे हैं, लेकिन नई पीढ़ी उनको अपने गले में पिरोने को तैयार नहीं है। उचित मान-सम्मान और गुजारा करने लायक पैसा तक न मिलने के कारण इन पारंपरिक शैलियों के गायक भी यह कला अगली पीढ़ी को स्थानांतरित नहीं करना चाहते हैं।

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मान्यता है कि प्रकृतिजन्य, नैसर्गिक रूप से लोककलाएं पहले उपजीं, परंपरागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और फिर अपनी उच्चतम गुणवत्ता के साथ वे शास्त्रीय रूप में ढल गर्इं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ पंचम वेद माना जाता है। इसमें भरतमुनि ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्त्वों को नियमों में बांध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। चैती, कजरी, फाग, होरी गीतों के लोक स्वरूप में ताल पक्ष के चुंबकीय गुण के कारण ही ये सभी उपशास्त्रीय संगीत में स्थान पा सके। पुष्प मंजरी, बसंत की अंगड़ाई, पछुआ हवा की सरसराहट तो आज भी फागुन का स्पष्ट संकेत देती हैं, मगर फाग का राग शहर तो दूर, गांवों की चौपालों पर भी कहीं सुनाई नहीं देता।

फाग में धमार, कबीरा, जोगीरा, उलारा, बेलार, बेलवरिया आदि गीत गाए जाते थे। मार्कंडेय पुराण, भविष्य पुराण, जयद्रथतंत्र और आल्हखंड में अपना प्रकाश फैलाने वाली कजरी भी अब गुमनामी के अंधेरों में भटक रही है। ‘कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी’- शायद काले बादलों के बीच गाए जाने के कारण ही इसका नाम कजरी पड़ा था। वर्षा ऋतु में स्त्रियों द्वारा गाई जाने वाली कजरी में प्रेम, मिलन, विरह, सुख-दुख, समाज की कुरीतियों, विसंगतियों को लेकर लोक चेतना के पुनरुत्थान और जनजागरण के स्वर गुंजित होते थे। होरी तो धमार का संग-साथ पाकर फाग के रंग में मस्ती भरने लगी, लेकिन चैत्र मास में गाई जाने वाली चैती पहले जितना नहीं इतराती। चैती चौदह मात्राओं की चांचर ताल में गाई जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा बजती है। पूरब अंग की ठुमरी में भी चौदह मात्राओं की दीपचंदी के साथ अंत में कहरवा की लग्गी लगती है। इसी गुण के कारण चैती उपशास्त्रीय गायकों के गले का हार तो बनी, लेकिन ठुमरी की जगह नहीं ले पाई।

भारतीय संगीत में रागों का निर्माण ऋतुओं और समय के अनुसार हुआ, तो लोक संगीत में संस्कार, आनुष्ठानिक, क्रिया, खेत गीत आदि बने, लेकिन अब इन गीतों की शृंखला टूट चली है। बच्चे के जन्म, मुंडन, कनछेदन, जनेऊ के समय गाया जाने वाला सोहर अब सुनाई नहीं देता। शादी के वक्त गाए जाने वाले धोबिया, बनरा, गारी, अचरी, परछन, कलेवा, मंत्री पूजन, माटी मांगल्य के बोल भी अब सुनाई नहीं पड़ते। तीज-त्योहारों पर बरुआ, भीखी को तो जड़ से खत्म कर दिया गया है। हिदुली, संबनियां, झूला गीत अब ऋतुओं का स्वागत नहीं करते, तो बारहमासा, देवी, भैरव, संन्यासी भी रसातल में जा चुके हैं। चहका, चौताल और ढोल की थाप पर तेज स्वरों और धीमे आरोह-अवरोह में गाई जाने वाली नारदी भी अब लुप्त हो चली है। भोजपुरी लोक शैली के बिरहा का विरह कोई नहीं समझता, निर्गुण के गुण को नहीं जानना चाहता और झूमर भी अब नहीं झूमता है।

बिरहा के बारे में कहते हैं कि कृष्ण जब गोपियों को छोड़ कर चले गए, तो उनके विरह में उन्होंने जो गाया, वही बिरहा का आरंभ था। ढोलक की थाप, हारमोनियम की धुन और करताल की खनखन पर गाए जाने वाले बिरहा ने लंबा सफर तय किया और अपने अंदर आस्था, प्रेम, लोकरंजन, विरोध, जनवाद सभी रूप समाहित किए- ‘न बिरहा की खेती करै भैया, न बिरहा फरै डार; बिरहा बसलै हिरदया में हो राम, जब तुम गैले तब गाव।’ बिरहा के साथ पूर्वांचल के चोलर, कराही, पूर्वी, कहरवा, सोहनी, रोपनी, दादरा, नटका के स्वरों की गूंज भी अब सुनाई नहीं देती है।

हिंदीभाषी क्षेत्रों में रामचरित मानस के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय बारहवीं शताब्दी की बुंदेलों की शौर्यगाथा आल्हा के स्वर भी कभी प्राणों में चेतना, बाजुओं में फड़कन और रक्त में उबाल पैदा करते थे। बुंदेली, कन्नौजी, अवधी, भोजपुरी में ढोलक, नगाड़े की थापों पर गाए जाने वाली इस विधा की लय भी अब बिगड़ने लगी है। इलाहाबाद के युवा शास्त्रीय गायक विवेक विशाल कहते हैं, ‘संस्कृति विभाग से साल में एकाध कार्यक्रम ही इन बुंदेले अल्हैतों (आल्हा गायकों) को मिलता है। परिवार चलाने को वे आल्हा गायकी छोड़ कर दूसरा रोजगार करते हैं, तो नई पीढ़ी उनकी दुर्दशा देख कर इस बुंदेली विधा से दूर होती जा रही है।’

बुंदेलखंड के हरदौल, पंवारा, ब्रज के लंगुरिया और रसिया, रुहेलखंड के लवाणी, बहतर बील, पश्चिमी यूपी के रागिनी, ढोला और कौरवी के मल्हार की तान भी अब नहीं लगती। लमटेरा, कछियाई, कुम्हरई, कोलहाई, सैरो, छठी, डंडा पाई, गाथा, तंबूरा और गम्मत गायन के स्वर भी क्षीण हो चुके हैं। भजन की जिकड़ी और पचरा गायन शैलियों के भी इक्का-दुक्का गायक ही शेष बचे हैं।

मध्यप्रदेश के मंडला, मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड में चांग और डफ की धुन पर गाए जाने वाले कलगीतुर्रा का जोश ठंडा पड़ गया है। चंदेरी राजा शिशुपाल के शासनकाल में जन्मे कलगीतुर्रा में महाभारत और पुराणों की कथाएं भी अब जोश नहीं भरतीं। मालवा में दीपावली पर ढोलक, नगाड़ा और बांसुरी की धुन पर देवरी गीत गाने का रिवाज है, तो मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि पर बुंबुलिया गीत और वर्षा ऋतु में बरसाती बरता गाने का। हिड गायन को कलाकार पूरे गले की आवाज में शास्त्रीय शैली में आलाप लेकर गाते हैं। बघेलखंड में बासदेव गायकों की जोड़ी सारंगी और चुटकी पैंजन के साथ रामायण, भोलेनाथ, श्रवण कुमार, कर्ण, मोरध्वज, भर्तृहरि की कहानियां सुनाते हैं। इन सभी गायन शैलियों के साथ प्रेम, बिछोह और पुनर्मिलन के गीतों से सजी बिदेसिया संरक्षण की बाट जोह रही है।

छत्तीसगढ़ के तो बाशिंदे ही सुरीले कहे जाते हैं। दीपावली पर गोंड जाति की नारियों द्वारा गाया जाने वाला करुण गीत सुआ, करमा, डंडा, पंथी आदि नृत्य के साथ गाए जाते हैं, तो गोवर्धन पूजा के दिन राउत जाति के लोग वीर रस युक्त पौरुष प्रधान राउर गीत गाते हैं, जिसमें तुरंत दोहे बनाए जाते हैं। लोक गायिका तीजनबाई ने पंडवानी और ममता चंद्राकर ने सुआ, गौरा-गौरी, बिहाव, ददरिया को संरक्षित किया है, लेकिन भोजली, जस, चनौनी, बांस, देवार, भरथरी, छत्तीसगढ़ी प्रेम गीत, जन्म के गीत, संस्कार गीत अब भी अपने लिए फनकारों की राह देख रहे हैं।

राजस्थान के मांड में नौ रसों का समावेश है। मन की बात कहने वाले मांड की उम्र करीब पांच सौ साल हो चुकी है। दादरा और दीपचंदी तालों में गाए जाने वाले मांड ने ‘ढोला हालो ऐ सावन आयो रे’ जैसे सावन, विवाह, स्वागत, चित्रण आदि हर अवसर के लगभग ढाई हजार गीत दिए, मगर डेढ़ हजार गीत अब लुप्त हो चुके हैं। महज पांच गीत प्रचलन में हैं, जिनमें उसकी पहचान केवल ‘केसरिया बालम’ तक सिमट कर रह गई है।

हरियाणवी लोक संस्कृति में तो चालीस से अधिक गायन विधाएं रही हैं। सांग को 1206 में बिहारीलाल पंडित ने जन्म दिया था, जिसने बाद में कोलकाता, मुंबई, चेन्नई तक आकार लिया। किसी पात्र के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने को दर्शाने के लिए काफिया शैली बनी, तो चौबोला में कई किस्में- थानेसरी, पानीपती, हाथरसी चौबोला आदि निकलीं। अली बख्श गायन शैली मुसलिम कलाकार अली बख्श के नाम पर है, जिसने सांग-तमाशा के जरिए धन जुटा कर शिव मंदिर बनवाया था। बहर-ए-तवील सोलह मात्राओं की ताल पर गाई जाती है। इन गायन शैलियों के साथ शिव स्तुति, राधेश्याम, जोगी या जंगम जोगी, दोहा, छंद, रागिनी, दीपक, झूलना, दौड़, निहाल दे, साका, नसीरा, उलट-बांसी आदि तेईस गायकी विधाएं अब पूरी तरह खामोश हो चुकी हैं।

उत्तराखंड में आषाढ़ और सावन में हुड़की बौल के स्वर इतिहास की वस्तु बनते जा रहे हैं। रोपाई के समय संगीत और श्रम के अद्भुत मेल की प्रचलित परंपरा रहे हुड़की बौल में भूमिया देवता से प्रार्थना की जाती थी कि सबका भला हो- ‘रोपारो, तोपारो बरोबरी दिया हो, हलिया बल्द बरोबरी दिया हो, हाथ दिया छाओ, बियो-दियो फारो हो, पंचनामा देवा हो।’ पिछले बीस सालों में बैर गाने वालों का तो नामो-निशान मिट चुका है। करुण गीत खुदेड़, ऋतु गायन, बसंत, चौमासा, बारामासा, न्यौली, झोड़ा जैसी गायकी विधाओं के अब केवल नाम शेष है, इनके पोषक गिनती के भी नहीं।

ये विधाएं भी संकट में

कई शास्त्रीय और लोकप्रिय उपशास्त्रीय गायकी विधाएं भी अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रही हैं। बंदिश, सरगम तथा तबले या पखावज के बोल से सजा त्रिवट और इन तीनों के साथ तराने का रंग लिए चतुरंग अब कभी-कभार ही किसी मंच पर सुनाई देता है। तराने की तान भी हांफने लगी है। रामपुर-सहसवान घराने के उस्ताद निसार हुसैन खां जैसे शास्त्रीय गायक अब गिनती के मिलेंगे। उपशास्त्रीय शैली में पंजाब का टप्पा कभी-कभार ही किसी गायक की गायकी का हिस्सा बनता है। टप्पा का अर्थ है- मंजिल तय करना। हीर-रांझा, सोहिनी-महिवाल की प्रेमगाथाओं के लोकगीतों को गुलाम नबी शोरी ने पंजाबी या टप्पा, पश्तो, अद्धात्रिताल, सितारखानी तालों और खमाज, भैरवी, काफी, तिलंग, पीलू, झिंझोटी, सिंदूरा, देस जैसे खास रागों के स्वरों में बांधा। पंजाब, लखनऊ, बनारस और ग्वालियर घराने की शोभा बने टप्पा को विशेष तैयारी के साथ गाया जाता था।

आठवीं शताब्दी में शुरू हुई कव्वाली ईरान से भारत आई, तो यहां अमीर खुसरो ने उसे लोकप्रिय बनाया। कव्वाली में कव्वाल जैसे-जैसे शब्दों को दोहराते जाते हैं, शब्द बेमायने हो जाते हैं और श्रोताओं के लिए एक पुरसुकून एहसास बाकी रह जाता है। पाकिस्तान के नुसरत फतेह अली खान और भारत के वडाली बंधुओं (पूरनचंद व प्यारेलाल) ने अलग शैली रच कर इसे लोकप्रिय बनाया, लेकिन अब इसके भी गिने-चुने कार्यक्रम देखने-सुनने को मिलते हैं। हजार साल पुरानी गजल का जन्म अरब देशों में हुआ। पहली गजल अरबी में कही गई और फिर सीमाएं लांघ कर फारसी, उर्दू और अब हिंदी में भी दखल रखती है। मीर तकी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब ने अल्फाज और बेगम अख्तर, मेहदी हसन, गुलाम अली, जगजीत सिंह ने स्वर देकर इसे लोकप्रिय बनाया, लेकिन अब गजल गायकी अपना मर्सिया पढ़े जाने का इंतजार कर रही है। दीवाने हालांकि मौजूद हैं, लेकिन गजल को हमसफर फनकार नहीं मिल रहे।

बॉलीवुड में भी सन्नाटा

याद कीजिए, पिछले दस वर्षों में आपने हिंदी फिल्मों में जन्माष्टमी, रामनवमी, महाशिवरात्रि जैसे धार्मिक उत्सवों से संबंधित उत्साह जगाते कितने गीत, कीर्तन, कितने भजन, किनती मधुर कव्वालियां, कितने शास्त्रीय गीत सुने हैं? अब वह दौर याद कीजिए, जब ‘दिल ही तो है’ का कल्याण थाट में शास्त्रीय रंग बिखेरता ‘लागा चुनरी में दाग’ और अंत में द्रुत लय का तराना सिंधु भैरवी के साथ जन-जन में फैल मन्ना डे को अमर कर गया था। रोशन की इस धुन में चतुरंग के चार रंगों से भी अधिक रंग समाए थे और इसीलिए यह आज तक सदाबहार बना हुआ है।

वैसे फिल्मों में बिरहा का उपयोग न के बराबर हुआ है, लेकिन 1955 में फिल्म ‘मुनीमजी’ में बिरहा का अत्यंत मौलिक रूप में प्रयोग किया गया। सचिन देव बर्मन ने हेमंत कुमार से बिरहा गवाया, जिसमें शिव विवाह का प्रसंग था। 1963 में बनी फिल्म ‘गोदान’ में पं. रविशंकर ने मुकेश से लोकशैली में चैती ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा’ गवा कर अद्भुत प्रयोग किया। ठुमरी अंग में आशा भोसले ने फिल्म ‘नमकीन’ में चैती गाई, जिसके बोल थे- ‘बड़ी देर से मेघा बरसा हो रामा, जली कितनी रतियां।’ ऐसे गीत अब बॉलीवुड में भी दिखाई-सुनाई नहीं पड़ते हैं।

ऑक्सीजन दे रहीं ये संस्थाएं

शास्त्रीय और लोक संगीत की विधाओं को विलुप्त होने से बचाने में कई संस्थाएं जुटी हैं। उत्तर प्रदेश का लोक संस्कृति शोध संस्थान फाग, चैती, कजरी, सावन गीतों की कार्यशालाएं आयोजित करा रहा है। संस्थाध्यक्ष केवल कुमार ने अपनी पुस्तक ‘लोक परंपरा’ के पहले भाग में जन्म संस्कार के बावन अवधी लोकगीतों को स्वरलिपि सहित संकलित कर महत्त्वपूर्ण काम किया है। पुस्तक में देवी गीत, सरिया, सोहर, छठी, बरही, नजर, काजल, सोंठ, जीरा, हरीरा, गोंद, पालना, खिलौना, बधइया, बधावा, अन्नप्राशन, झलरिया, मुंडन, कनछेदन और जनेऊ आदि लोकगीत समाहित हैं। संस्था सचिव सुधा द्विवेदी कहती हैं कि संस्थान लोक संस्कृति की सभी विधाओं- लोकगीत, लोकगायन, लोकवाद्य, लोकनृत्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

चित्रकूट का अखिल भारतीय समाजसेवा एवं अंत्योदय संस्थान भी पिछले कई वर्षों से लोक-लय समारोह आयोजित कर लुप्त हो रही लोक कलाओं के संरक्षण के लिए प्रयासरत है। संस्थान बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश की लोकगायन के राग-अनुराग को बिसरने से बचाने में जुटा है। शाहजहांपुर का ओमश्री संगीत विद्यालय तो चतुरंग, तराना जैसी प्राचीन शास्त्रीय गायन शैलियों को जीवन देने की ललक लिए नई पीढ़ी को तैयार करने में जुटा है।

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