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उपासना बेहार की लिखी कहानी : दाखिला

मां ने कहा-डॉक्टर साहब हम दोनों को ही पढ़ना नहीं आता है, आप ही पढ़ कर बता दें कि इसमें क्या लिखा है और कहां अंगूठा लगाना है।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 3:28 AM
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रोशनी अपने परिवार के साथ मानपुर गांव में रहती थी। उसका एक बड़ा भाई सोनू था। रोशनी के पिता पुराने ख्यालों के थे। वे लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। इसी सोच कर वे रोशनी को स्कूल नहीं भेजना चाहते थे लेकिन रोशनी की मां ने कहा लड़की को कम से कम इतना तो पढ़ा देते हैं कि वह अपना नाम लिखना जान जाए। इस तरह रोशनी को बड़े बेमन से उसके पिता ने स्कूल में दाखिला कराया।

दोनों भाई बहन पढ़ाई में अच्छे थे। धीरे-धीरे दोनों बच्चे बड़े होने लगे। जब रोशनी ने पांच कक्षा पास कर ली तो उसके पिता ने उसकी पढ़ाई बंद करा दी और कहा कि अब से वह घर के कामों को सीखेगी। रोशनी बहुत रोई, अपने पिता से बहुत मिन्नतें कीं कि पिताजी मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। मैं स्कूल जाने से पहले और स्कूल से आने के बाद घर के काम में मां का हाथ बंटा दिया करूंगी। पर रोशनी के पिता नहीं माने और उन्होंने रोशनी का स्कूल जाना बंद करा दिया।

रोशनी सुबह उठते ही घर के कामों में जुट जाती। वह रोज अपने सोनू भैया का स्कूल बैग ठीक करती, उसे यूनीफार्म देती, नाश्ता कराती और उसे स्कूल जाते देखती। भाई के स्कूल जाने के बाद वह अकेले में रोती और सोचती काश, मैं भी फिर से स्कूल जा पाती। रोशनी का स्कूल तो छूट गया लेकिन उसमें पढ़ने की ललक और लगन कम नहीं हुई। उसने एक उपाय निकाला। वह घर का काम करने के बाद दोपहर में अपने भाई की किताबें उठा कर चुपके चुपके पढ़ने लगी, रात में भी सब के सो जाने के बाद वह चुपके से किताबें पढ़ा करती।

सोनू की परीक्षाएं हो चुकी थीं। आज रिजल्ट का दिन था। सोनू सुबह से ही बहुत चिंतित था-भैया इसमें डरने की क्या बात है देखना तुम बहुत अच्छे नंबर से पास हो जाओगे। रोशनी ने कहा। सोनू रिजल्ट लेने स्कूल गया। वह सेकेंड डिवीजन से पास हुआ था, सभी बहुत खुश हुए। रोशनी के पिता मोहल्ले में मिठाई बांटने निकल पड़े, वही मां खीर बनाने रसोई में चली गर्इं।
रोशनी गुमसुम सी एक कोने में बैठ कर मन ही मन पिछले साल के इसी समय को याद करने लगी, जब वह स्कूल से अपना रिजल्ट लेकर आई थी और उसने कहा था- पिता जी देखो मैं कक्षा में प्रथम आई हूं। तब उसके पिताजी ने कोई खुशी और उत्साह नहीं दिखाया था और उसके कुछ दिन बाद ही उन्होनें हिटलरी एलान कर दिया था कि अब रोशनी आगे पढ़ाई नही करेगी।

कुछ साल यों ही गुजर गए। इस साल गर्मी बहुत पड़ रही थी। सोनू भैया के स्कूल की छुट्टी थी इस कारण वह मामा के गांव घूमने गया था। एक रात जब रोशनी के पिता सो रहे थे तो उनके पेट में बहुत दर्द हुआ, रोशनी की मां घबरा गई। पिताजी को तत्काल अस्पताल ले जाना था, रोशनी बिना घबराए तुरंत आटो स्टैंड से आटो ले आई।

मां और रोशनी उन्हें अस्पताल ले गर्इं। अस्पताल में डॉक्टर ने पिता की हालत देखी और रोशनी की मां से कहा-बहनजी, इनका अपेंडिक्स फट गया है और तत्काल आपरेशन करना पड़ेगा, कुछ कागज हैं, जिस पर आपरेशन से पहले आपको हस्ताक्षर करने पड़ेंगे। रोशनी ने कहा-डॉक्टर सर, मेरी मां को हस्ताक्षर करना नही आता है वह अंगूठा लगा देगी।

मां ने कहा-डॉक्टर साहब हम दोनों को ही पढ़ना नहीं आता है, आप ही पढ़ कर बता दें कि इसमें क्या लिखा है और कहां अंगूठा लगाना है। तब रोशनी ने वे कागज अपनी मां के हाथ से लिया और उसे पढ़ कर मां को अच्छे से समझाया। रोशनी के पिता का आपरेशन सफल रहा। दूसरे दिन जब उन्हें होश आया तब डॉक्टर ने उनसे कहा-आप बड़े भाग्यशाली हैं कि आपको रोशनी जैसी बेटी मिली।

आज अगर आपकी जान बची है तो उसकी वजह आपकी बेटी है, रोशनी तो बहुत बहादुर और बुद्धिमान लड़की है। रातदिन एक कर दिया आपकी तीमारदारी में। डॉक्टर रोशनी को पिताजी को देने वाली दवाइयों के नाम और समय समझाने लगे, तभी उसके पिता ने कहा-डॉक्टर साहब इसे ये सब मत समझाएं, यह तो ठीक से पढ़ना भी नहीं जानती है। इसकी समझ में नहीं आएगा। मुझे गलत दवाइयां दे देगी। आपको किसने कहा कि इसे पढ़ना नहीं आता है, यह तो बहुत अच्छे से सब कुछ पढ़ लेती है।

इसी ने तो आपके आपरेशन से संबंधित सारे कागज पढ़ कर अपनी मां को समझाया, आपकी सारी दवाई यही खरीद कर लाई और आप कहते हैं इसे पढ़ना नही आता है। रोशनी के पिता डॉक्टर की बात सुन कर हैरान रह गए और मन ही मन शर्मिंदगी महसूस करने लगे। उन्हें बहुत दुख हुआ कि उन्होंने हमेशा सोनू और रोशनी में फर्क किया। रोशनी पढ़ने में तेज थी फिर भी उसे पढ़ने जाने नहीं दिया। ये सब सोच कर उनकी आखें नम हो गर्इं।

उन्होनें रोशनी से कहा-मुझे माफ कर दो बेटी। मैं सोचता था लड़कियां ज्यादा पढ़ कर करेगी क्या, उन्हें तो शादी कर बच्चे संभालना और चूल्हा चौका ही करना है, लेकिन आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं।

मैं गाव में सभी लोगों को भी इस बात के लिए जागरूक करूंगा कि वे भी लड़के और लड़कियों के साथ भेदभाव न करें और अपनी लड़कियों को खूब पढ़ाए। मैं ठीक होते ही सबसे पहले तुम्हें स्कूल में दाखिला कराऊंगा। पिता की बात सुन कर रोशनी बहुत खुश हुई और अपने पिता के गले लग गई।

(उपासना बेहरा)

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