ताज़ा खबर
 

संस्कृति: टूटना एक साझे पुल का

भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में तनाव के बावजूद जो शख्सियत एक साझे पुल का काम कर रही थी, उसने भी कुछ दिनों पहले आखिरी सांस ले ली। फन यानी कला और अदब की दुनिया में लड़खड़ाते पाकिस्तान के अदीबों, बुद्धिजीवियों और कला-प्रेमियों के लिए यह दूसरा बड़ा सदमा है।

मदीहा के जो नाटक दोनों देशों में लोकप्रिय रहे उनमें ‘टोबा टेक सिंह’, ‘दारा शिकोह’, ‘मेरा रंग दे बसंत आई’, ‘दुख दरिया’ और ‘एक थी नानी’ शामिल थे।

भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में तनाव के बावजूद जो शख्सियत एक साझे पुल का काम कर रही थी, उसने भी कुछ दिनों पहले आखिरी सांस ले ली। फन यानी कला और अदब की दुनिया में लड़खड़ाते पाकिस्तान के अदीबों, बुद्धिजीवियों और कला-प्रेमियों के लिए यह दूसरा बड़ा सदमा है। कुछ माह पहले ही अस्मां जहांगीर की मौत ने वहां के बुद्धिजीवियों को हिला कर रख दिया था, अब मदीहा गौहर के जाने से उनके बीच खालीपन और बढ़ गया है।

‘अजोका थियेटर’ के नाम से गठित अपने रंगमंच के कलाकारों को साथ लेकर मदीहा बरसों तक नियमित रूप से अमृतसर आती रहीं। उनके ज्यादातर नाटक या तो दोनों मुल्कों के बीच साझे रिश्तों पर आधारित होते थे या फिर ‘बुल्लेशाह’ सरीखे साझे सूफी फकीरों को समर्पित। उनके नाटकों में अक्सर दबे-कुचले शोषित किसानों और मेहनतकश मजदूरों की बातें शामिल रहतीं, हालांकि पूरे उपमहाद्वीप में अब ऐसे विषयों पर बातचीत कमोबेश अप्रासंगिक हो चुकी है। अपने एक नाटक की प्रस्तुति के लिए कुछ वर्ष पहले वे चंडीगढ़ भी आई थीं। एक बार दिल्ली में भी उनका नाटक ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन’ देखने का अवसर मिला था। चंडीगढ़ में बातचीत के दौरान मदीहा ने कहा था, ‘यहां आने पर कुछ वैसा ही अहसास होता है, जैसे लंबे अंतराल के बाद मायके आने या किसी बिछड़े पुराने दोस्त के घर आने का अहसास हो।’

आप यकीन नहीं मानेंगे, उन्होंने कई बार अपने नाटकों की प्रस्तुति भारत-पाक सीमा पर ‘नो-मैन्स लैंड’ के करीब की और अपने पात्रों की बुलंद आवाज के माध्यम से ‘माइक’ के जरिए सीमा के इस पार के लोगों से संवाद स्थापित किया। पाकिस्तान में जिया उल-हक के शासन में जब कलाकारों पर शख्त पाबंदियां थीं, तब भी वे अपने प्रतीकात्मक नाटकों के माध्यम से कभी नुक्कड़-नाटक, तो कभी रंगमंच पर अपनी बात बुलंद आवाज में कह देती थीं। पिछले साल दिसंबर में वे चंडीगढ़ में नीलम मानसिंह के एक नाटक ‘डार्क बार्डर्स’ (काली सरहदें) की रिहर्सल देखने के लिए विशेष रूप से चंडीगढ़ आई थीं। इससे पहले भी उनके प्रयासों से भारत और पाकिस्तान के बच्चों की एक साझी वर्कशाप आयोजित हुई थी और साझे कलाकारों द्वारा ‘बार्डर-बार्डर’ की प्रस्तुति की गई थी।

पिछली मुलाकात में उन्होंने बताया था कि एक बार भारतीय पंजाब के बहुचर्चित रंगकर्मी और लेखक डॉ. आत्मजीत के एक नाटक ‘रिश्तों का क्या रखें नाम’ की प्रस्तुति को महसूस करने और सुन पाने के लिए विशेष रूप से वाघा-बार्डर आई थीं। तब यह नाटक भी भारत-पाक के इस पार की ‘नो मैन्स लैंड’ पर डॉ. आत्मजीत और उनके साथियों ने खेला था। पिछली बार अमृतसर आई थीं तो वहां स्थापित ‘पार्टीशन म्यूजियम’ को देख कर वे फूट-फूट कर रो पड़ी थीं। उन्होंने रोते-रोते ही सवाल किया था, ‘आखिर दस लाख लोगों को इस तरह क्यों मरना पड़ा था?’ अगर अलग होना जरूरी भी था तो क्या यह इतनी वहशियाना दौर के बिना नामुमकिन था?

मदीहा के जो नाटक दोनों देशों में लोकप्रिय रहे उनमें ‘टोबा टेक सिंह’, ‘दारा शिकोह’, ‘मेरा रंग दे बसंत आई’, ‘दुख दरिया’ और ‘एक थी नानी’ शामिल थे। ‘एक थी नानी’ नाटक में वे इस महाद्वीप के सबसे चर्चित रंगकर्मियों- जोहरा सहगल और उजरा बट्ट- को पहली बार एक ही रंगमंच पर ले आई थीं। ‘उजरा बट्ट’ और जोहरा दोनों सगी बहनें थीं। विभाजन के बाद उजरा पाकिस्तान चली गई थीं, जबकि जोहरा दिल्ली में रह गई थीं। दोनों बहनें पचास बरस तक रंगमंच की साझेदारी से वंचित रहीं। मदीहा ने दोनों को एक साथ ‘एक थी नानी’ के मंचन से लाहौर और दिल्ली में पेश किया। उनका नाटक ‘दुख दरिया’ भी मीरपुर की एक औरत शहनाज परवीन की वास्तविक जीवन गाथा पर आधारित था।

शहनाज परवीन बच्चा पैदा न कर पाने पर अपने परिवार में प्रताड़ित की जाती रही थी। उसने तंग आकर दरिया में छलांग लगा दी। मगर दरिया के दूसरे किनारे पर उसे भारतीय लोगों ने बचा लिया और छानबीन के लिए पुलिस के हवाले कर दिया। यहां उसे जेल में डाल दिया गया, जहां दो जेल-वार्डनों ने उसके साथ बलात्कार किया। वह गर्भवती हो गई। उसने जेल में ही एक बच्चे को जन्म दिया। इसी बीच उसकी सुनवाई और जांच पूरी हुई, तो उसे वापस अपने देश पाकिस्तान भेजने का फैसला सुना दिया गया। उसके साथ असल त्रासदी तब हुई जब पाक प्रशासन ने उसे तो वापस लेने पर सहमति दे दी, मगर उसके बच्चे को लेने से इनकार कर दिया। एक औरत की इसी त्रासदी को अपने नाटक का आधार बनाया था मदीहा ने।

कराची में 21 सितंबर, 1956 को पैदा हुई मदीहा ने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। वहीं पर बाद में ‘थियेटर साइंस’ में भी एमए किया और वर्ष 1983 में स्वदेश लौटने के बाद अपने पति शाहिद नदीम के साथ मिल कर ‘अजोका थियेटर’ के नाम से रंगमंच की स्थापना की। इसमें अन्य विषयों के अलावा मदीहा ने ‘भांड और नौटंकी’ की परपरा को भी पुनर्जीवित किया। उनके नाटकों ने ब्रिटेन, हालैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के अलावा बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में भी खूब धूम मचाई। उसका पूरा नाट्य कर्म आधुनिकतम थियेटर तकनीक के साथ-साथ मानवीय मूल्यों, सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर केंद्रित रहा।

वर्ष 2007 में उनके एक नाटक ‘बुर्का बोनांजा’ ने पूरे पाकिस्तान और कुछ अन्य मुसलिम देशों में खूब तहलका मचाया। इस नाटक के सारे पात्र बुर्के में ही थे और वे लिंगभेद, असहिष्णुता और संकीर्ण सांप्रदायिकता सरीखे मुद्दों को उठा रहे थे। पाकिस्तान की संसद में इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठी। वहां की सरकार ने मदीहा को चेतावनी दी कि अगर इस नाटक का पुन: मंचन हुआ तो ‘अजोका थियेटर’ पर पाबंदी लगा दी जाएगी। लेकिन मदीहा ने अपना सफर और कर्म जारी रखा। नाटक का अंग्रेजी और फ्रेंच में अनुवाद किया गया और उसे अलग किस्म के दर्शकों को परोस दिया गया। वे पिछले तीन बरस से कैंसर से पीड़ित थीं। उसके बावजूद उनका एक ही वाक्य होता, ‘दी शो मस्ट गो ऑन’। वे बार-बार यही कहती थीं कि अगर इरादे बुलंद हों तो सेना और कठमुल्लापन के खिलाफ रंगमंच और अदब के माध्यम से जंग जारी रखी जा सकती है। उनके शौहर और दोनों बच्चों- ‘सारंग’ और ‘निर्वाण’- ने उनकी कब्र की मिट्टी हाथ में लेकर कसम खाई है कि वे मदीहा के ‘अजोका थियेटर’ और वैचारिकता को जिंदा रखेंगे।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App