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राजनीति में महिला भागीदारी, दूसरे देश काफी आगे

विधायिका में महिलाओं की एक तिहाई हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के मकसद से तैयार किया गया तैंतीस फीसद आरक्षण संबंधी विधेयक आज तक संसद में पारित नहीं हो सका है। हालांकि इस विधेयक को लेकर सभी राजनीतिक दलों में सहमति है, पर किसी न किसी बहाने इस पर मंजूरी के वक्त कन्नी काट ली जाती है। अभी स्थिति यह है कि भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी पंद्रह फीसद भी नहीं है, जबकि आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े दुनिया के अनेक देश इस मामले में हमसे बहुत आगे हैं। महिला आरक्षण पर राजनीतिक दलों के रुख और इससे संबंधित विधेयक के पारित न हो पाने के पीछे की वजहों, दुनिया की विभिन्न संसदों में महिलाओं की स्थिति आदि का जायजा ले रहे हैं श्रीश चंद्र मिश्र।

लोकसभा के पिछले दो कार्यकाल की बात करें तो 2009 में महिला सांसदों की संख्या उनसठ थी, जो 2014 में बढ़ कर इकसठ हो गई।

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजे आ गए। स्वाभाविक ही महिला सांसदों की संख्या पर सबकी नजर टिक गई। मगर इस बार भी संतोषजनक स्थिति नहीं है। लंबे समय से दावा और वादा महिलाओं को हर क्षेत्र में तैंतीस फीसद आरक्षण दिलाने का होता आ रहा है, लेकिन सड़सठ साल के संसदीय इतिहास में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पंद्रह फीसद तक भी न पहुंच पाना एक अलग ही संकेत देता है। लोकसभा के पिछले दो कार्यकाल की बात करें तो 2009 में महिला सांसदों की संख्या उनसठ थी, जो 2014 में बढ़ कर इकसठ हो गई। यानी कुल सांसदों का करीब-करीब ग्यारह फीसद। इस बार संसद में कुल अठहत्तर महिलाएं चुनाव जीत कर पहुंची हैं। ऐसे में महिलाओं के तैंतीस फीसद आरक्षण का सवाल जस का तस बना हुआ है।

राज्य विधानसभाओं में भी स्थिति कोई ज्यादा अलग नहीं है। नगालैंड की विधानसभा में पिछले चौवन साल में एक भी महिला विधायक का प्रवेश नहीं हो पाया है। वहां पिछले साल हुए चुनाव में उस समय इतिहास बनने की संभावना जगी, जब पांच महिला उम्मीदवारों में से फकत एक एनडीपीपी की उनतालीस साल की अवान कोनयाक ने अबोइ निर्वाचन क्षेत्र से शुरुआती बढ़त ले ली, लेकिन आखिरकार वे 905 वोटों से हार गर्इं। नगालैंड से अब तक लोकसभा में भी सिर्फ एक महिला रानो एम शैजा पहुंच पाई हैं। वे भी 1977 की जनता लहर में किसी तरह जीत गई थीं। यह हालत तब है जब नगालैंड में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से ज्यादा है। मामला सिर्फ एक राज्य का नहीं है। बाकी राज्यों में आंकड़े अपेक्षाकृत कुछ बेहतर जरूर हैं, लेकिन कुल मिला कर आधी आबादी को संसद और विधानसभाओं में वह नुमाइंदगी नहीं मिली है, जिसका वादा बरसों से हर राजनीतिक पार्टी करती आ रही है। सवाल है कि महिलाओं को विधायिका में तैंतीस फीसद आरक्षण देने का लक्ष्य पूरा न हो पाने के पीछे आखिर अड़चन क्या है?

राजनीतिक मानसिकता बाधा

पिछले साल तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर महिला आरक्षण बिल लोकसभा में तत्काल पास कराने का आग्रह किया था। उस पर कोई पहल न होनी थी, न हुई। सोनिया गांधी भी उस औपचारिक अपील के बाद मौन हो गर्इं। विपक्ष में इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की। मामला फिर नेपथ्य में चला गया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। विधायिका में महिलाओं को तैंतीस फीसद आरक्षण देने की बात तो सालों से हो रही है, पर उसे अमली जामा पहनाने में हमेशा कोई न कोई अड़चन आती रही है। राजनीतिक मतभेद इस मुद्दे पर उभरते ही रहे हैं। 2016 में स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को तैंतीस फीसद आरक्षण दिए जाने के विरोध में नगालैंड में जिस तरह हिंसा हुई, उससे साफ हो गया कि समाज भी महिलाओं की राजनीति में भागीदारी स्वीकार करने को राजी नहीं है। खास बात यह है कि विरोध उस पूर्वोत्तर राज्य में हुआ, जहां जन जातीय गुटों में महिला प्रधान पारिवारिक व्यवस्था को कथित रूप से मान्यता मिली हुई है।

राजनीतिक नजरिया भी इस मामले में अलग नहीं है। सैद्धांतिक रूप से हर पार्टी महिलाओं को तैंतीस फीसद सीटें दिए जाने के पक्ष में है। लेकिन इस पर अमल नहीं होता। इस समय संसद में पंद्रह फीसद से भी कम महिलाएं हैं। देश की विधानसभाओं में उनका फीसद सिर्फ नौ ही है। राजनीति में वही महिलाएं आ पा रही हैं, जो किसी राजनीतिक परिवार की हैं या उन्हें किसी बड़े राजनेता का संरक्षण प्राप्त है। राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर विभिन्न पार्टियों का रुख एक जैसा है। महिला सशक्तिकरण पर जब भी बहस छिड़ती है, अक्सर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस जताया जाता है। समाज और राजनीति में महिलाओं को बराबर की हिस्सेदारी देने की बात सार्वजनिक मंचों पर आए दिन होती है, लेकिन उस पर अमल करने में सभी पार्टियां उदासीनता बरतती आई हैं। यह असलियत है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में विधायिका स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है। हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जारी होने वाली इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन (आईपीयू) की रिपोर्ट यही बताती है कि भारत की संसद या विधानसभा में महिला जनप्रतिनिधियों की काफी कम उपस्थिति महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है। 2015 की आईपीयू की रिपोर्ट में इस मोर्चे पर भारत को एक सौ तीनवें नंबर पर रखा गया। इस सूची में पहले दस नंबर पर रवांडा, बोलिविया, अंडोरा, क्यूबा, सेशेल्स, स्वीडन, सेनेगल, फिनलैंड, इक्वेडोर और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश हैं। पड़ोसी देशों में सिर्फ श्रीलंका से बेहतर स्थिति में भारत है। 2014 में आईपीयू ने 189 देशों की संसद में महिला प्रतिनिधियों की संख्या के आधार पर जो वरीयता सूची बनाई थी, उसमें भारत का स्थान एक सौ ग्यारहवां था। तब भी और आज भी सीरिया, नाइजर, बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान के अलावा चीन और सिएरा लियोन जैसे देश इस मामले में भारत से आगे हैं।

सुधार हुआ, मगर मामूली

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2014 के चुनाव तक महिला सांसदों की संख्या बेहद धीमी रफ्तार से बढ़ी है। 1952 में बीस महिला चुनाव जीत पार्इं। यह संख्या लोकसभा के कुल सदस्यों का 4.1 फीसद थी। बाद के चुनाव में महिलाओं के मैदान में उतरने की संख्या तो बढ़ती गई, लेकिन उस अनुपात में वे लोकसभा तक नहीं पहुंच सकीं। 1957 में पैंतालीस महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जिसमें से बाईस ने चुनाव जीत कर सदन में अपनी उपस्थिति 4.5 फीसद दर्ज कराई। तीसरे आम चुनाव में 1962 में इकतीस महिलाएं संसद में पहुंची, जो कुल सांसदों का 6.3 फीसद थीं। तब छियासठ महिलाएं चुनाव मैदान में उतरी थीं यानी कुल उम्मीदवारों का महज 3.2 फीसद। 1967 में तो यह फीसद 2.8 रह गया, लेकिन सड़सठ महिलाओं ने चुनाव लड़ा। यह बात अलग है कि उनमें से उनतीस ही जीत पार्इं और लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट कर 5.6 फीसद रह गया। यह 1971 में गिर कर 4.1 फीसद रह गया। कुल उम्मीदवारों की तीन फीसद यानी छियासी महिलाओं ने चुनाव लड़ा, लेकिन जीत सकीं इक्कीस ही। 1977 में तो स्थिति और गड़बड़ा गई। महिलाओं की उम्मीदवारी सिकुड़ कर 2.9 फीसद पर आ गई। सत्तर महिलाओं में से उन्नीस ही जीत पार्इं और लोकसभा में उनका हिस्सा सबसे कम 3.5 फीसद रहा। 1980 का चुनाव इस मायने में अहम रहा कि पहली बार महिला उम्मीदवारों की संख्या ने सौ का आंकड़ा पार कर लिया। उस साल 143 महिलाओं ने चुनाव लड़ा। हालांकि यह संख्या कुल उम्मीदवारों का 3.1 फीसद ही था। अट्ठाईस महिलाएं चुनाव जीत पार्इं। उसके बाद से महिला उम्मीदवारों की संख्या लगातार बढ़ती गई। हालांकि कुल उम्मीदवारी में उनका फीसद कम ही बढ़ा।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में 162 महिलाएं यानी कुल उम्मीदवारों का तीन फीसद मैदान में उतरीं। बयालीस को सफलता मिली, जिसके बल पर लोकसभा में उन्होंने अपनी हिस्सेदारी 8.2 फीसद कर ली। 1989 में कुल उम्मीदवारों में 3.2 फीसद यानी 198 महिला उम्मीदवार थीं। लेकिन जीत पार्इं केवल उनतीस ही और पिछली बार लोकसभा में हिस्सेदारी का फीसद 8.2 से घट कर 5.5 पर आ गया। 1991 में कुल 326 महिलाएं मैदान में थीं। उम्मीदवारी में 3.8 फीसद का यह हिस्सा सैंतीस सीटों पर जीत के साथ लोकसभा में महिलाओं की 7.1 फीसद उपस्थिति दर्ज हुई। 1996 में चालीस महिलाएं लोकसभा पहुंची। यह कुल सदस्य संख्या का 7.4 फीसद था। लेकिन तब पांच सौ निन्यानबे महिलाओं ने चुनाव लड़ा था। और कुल उम्मीदवारों में उनका फीसद पहली बार चार को पार कर 4.3 हुआ था। 1998 में महिला उम्मीदवारों की संख्या घट कर 274 रह गई, लेकिन उस चुनाव में तिरालीस महिलाओं ने जीत दर्ज कर लोकसभा में अपनी हिस्सेदारी 7.9 फीसद कर ली।

यह सिलसिला 1999 में भी जारी रहा। तब चुनाव हालांकि 284 महिलाओं ने ही लड़ा, लेकिन कुल उम्मीदवारी में अपना हिस्सा 6.1 फीसद कर लिया। तीन साल में तीन चुनाव होने की वजह से कुल उम्मीदवारों की संख्या वैसे भी उस साल कम रही थी। बहरहाल, 1999 में उनचास महिलाओं ने चुनाव जीता और अपना हिस्सा नौ फीसद कर लिया। 2004 में 355 महिलाएं चुनाव लड़ीं और पैंतालीस (कुल सांसदों का 8.3 फीसद) जीत गर्इं। 2009 में हुए आम चुनाव में 556 महिलाएं मैदान में उतरीं। यह संख्या कुल उम्मीदवारों का 6.9 फीसद थी। खास बात यह है कि पहली बार महिलाओं ने पचास का आंकड़ा पार कर उनसठ सीटें जीतीं और पहली बार लोकसभा में उनकी उपस्थिति दहाई तक पहुंच कर 10.9 फीसद हो गई। 2014 में लोकसभा में महिलाओं का फीसद ग्यारह को पार कर गया। इस बार उनकी संख्या चौदह फीसद से कुछ ऊपर है। इस तरह बासठ साल के सफर में महिला सांसदों की संख्या बीस से अठहत्तर हो पाई है।

यह सिर्फ लोकसभा की तस्वीर नहीं है। कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में तो ऐसे मौके भी आए हैं, जब एक भी महिला चुनाव नहीं जीत पाई। केरल, उत्तराखंड, नगालैंड और मेघालय जैसे राज्य जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में अग्रणी माने जाते हैं वहां की विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सबसे कम है। अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर व मेघालय के किसी भी विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या कभी भी दहाई तक नहीं पहुंच पाई है। सफलता के मामले में रिकार्ड बना 2013 में हुए मेघालय विधानसभा चुनाव में, जहां चार महिलाएं चुनाव जीत कर विधायक बनीं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की विधानसभा में सिर्फ एक बार महिलाओं का प्रतिनिधित्व क्रमश: नौ और आठ फीसद रहा। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या केरल में ज्यादा है। वहां भी विधानसभा में महिलाओं की उपस्थिति आमतौर पर अपवाद के रूप में 1996 को छोड़ कर छह फीसद के आसपास ही रही है।

कई देश काफी आगे

राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को ज्यादा उम्मीदवार बनाने में विशेष रुचि नहीं लेतीं। पूरी दुनिया में राजनीति में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। आईपीयू की वरीयता सूची में रवांडा आश्चर्यजनक रूप से पहले स्थान पर है। सितंबर 2013 में वहां हुए चुनाव में 63.8 फीसद महिलाएं जीतीं। यह पूरी दुनिया में पहला मौका था, जब किसी देश में महिला सांसदों की संख्या साठ फीसद के पार पहुंची। बाद के नौ स्थानों पर अंडोरा, क्यूबा, स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका, सेशेल्स, सेनेगल, फिनलैंड इक्वेडोर और बेल्जियम जैसे देश हैं। इस सूची में कनाडा का चौवनवें और अमेरिका का बहत्तरवें स्थान पर होना भारतीय राजनीति के पैरोकारों को सुखद लग सकता है, लेकिन दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों से तुलना की जाए तो श्रीलंका को छोड़ कर बाकी सभी देशों की स्थिति भारत से बेहतर है। श्रीलंका की 225 सदस्यों वाली संसद में महिलाओं की संख्या केवल तेरह है। यह हालत तब है, जब श्रीलंका में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का पद महिला संभाल चुकी हैं। नेपाल की संसद में तीस फीसद महिलाएं हैं। सूची में उसका स्थान पैंतीसवां है। नेपाली संसद में हर तीन सांसद में एक महिला है। चीन में करीब पच्चीस फीसद सांसद महिलाएं हैं। रैकिंग में वह तिरपनवें नंबर पर निचले सदन में चौबीस फीसद महिलाओं की वजह से है। जहां तक महिला अधिकारों और समानता की बात है, मुसलिम बहुल दो पड़ोसी देशों- बांग्लादेश और पाकिस्तान की स्थिति अच्छी नहीं मानी जाती, लेकिन संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने के मामले में ये दोनों देश भारत से आगे हैं। पाकिस्तान में ऊपरी सदन में सत्रह फीसद और निचले सदन में इक्कीस फीसद महिलाएं हैं। बांग्लादेश में बीस फीसद सांसद महिला हैं। अरसे से राष्ट्राध्यक्ष के पद पर दो बेगमों के होने को देखते हुए यह संख्या ज्यादा नहीं है, लेकिन भारत के ग्यारह फीसद से तो यह ज्यादा है ही।

अफगानिस्तान के दोनों सदनों में सत्तानबे महिला प्रतिनिधि हैं। पिछले पांच साल में वैश्विक स्तर पर महिलाओं की राजनीति में स्थित सुधरी है। जिन सदनों में महिलाओं की नुमाइदंगी तीस फीसद से ज्यादा है, उनकी संख्या पांच साल में पांच से बढ़ कर बयालीस हो गई है। चालीस फीसद से ज्यादा महिला प्रतिनिधियों वाले सदनों की संख्या इस अरसे में एक से तेरह हो गई है। चार सदनों में महिलाओं की संख्या पचास फीसद से ज्यादा है। बहरहाल, यूरोप के विकसित देशों में स्थिति अब ज्यादा अच्छी नहीं रही है। 1995 में आईपीयू की सूची में पहले दस स्थान पर यूरोपीय देशों का दबदबा था। 2015 की रिपोर्ट में पहले दस देशों में चार सब सहारा अफ्रीका के हैं। 1995 की सूची के फिनलैंड, सेशेल्स और स्वीडन जैसे देश ही 2015 में टॉप टेन में अपनी जगह बचाए रख पाए।

महिला आरक्षण बिल पर अमल से इस स्थिति को सुधारा जा सकता है। महिलाओं को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में तैंतीस फीसद आरक्षण देने के लिए लगभग हर पार्टी सैद्धांतिक रूप से सालों से सहमत है। सार्वजनिक मंच पर इसे वैचारिक बहस का मुद्दा जरूर बना दिया जाता है, लेकिन जब इस पर कानून बनाने की बात आती है, तो सभी बगलें झांकने लगते हैं। आधे-अधूरे तर्कों के सहारे महिला आरक्षण का विरोध किया जाता है और उसके पैरोकार इसी को बहाना बना कर कदम पीछे खींच लेते हैं। कुछ समय के लिए सत्ता में रही एचडी देवगौड़ा सरकार ने 1996 में पहली बार लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश किया। 1997 में लोकसभा भंग होने के साथ ही बिल भी मर गया। अगली बार भी यही हुआ। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने बिल पेश किया लेकिन अप्रैल 1999 में लोकसभा भंग हो जाने की वजह से बिल अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनी। 2004 में कार्यकाल खत्म होने से कुछ पहले ही बिल पेश करने की रस्मअदायगी कर दी गई। बिल पर और धूल जमती चली गई। यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में 2008 में कहीं जाकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिल पेश किया। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में 2010 में राज्यसभा ने बिल पास कर दिया। मामला लोकसभा में अटक गया। और तबसे अटका हुआ है।

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