There is no relation to the color of beauty, it depends on climate and catering - समाज काले हैं तो क्या हुआ... - Jansatta
ताज़ा खबर
 

समाज काले हैं तो क्या हुआ…

सौंदर्य का रंग से कोई संबंध नहीं होता है। यह तो हर देश की जलवायु और वहां के खानपान पर निर्भर करता है। पर बाजार में गोरे रंग को ही सुंदरता का पर्याय माना जाता है। विभिन्न उत्पादों के माध्यम से बाजार के जरिए लोगों का आर्थिक दोहन किया जा रहा है, जिससे भारतीय समाज को बाहर आना होगा।

Author February 18, 2018 4:23 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुनीता मिश्रा

अमेरिका-यूरोप में एक समय में रंगभेद अपने चरम पर था। वहां अफ्रीकी देशों से काले रंग के लोगों को गुलामी करने के लिए लाया जाता था। उन्हें तरह-तरह की प्रताड़नाएं दी जाती थीं, पशुओं की तरह मारा-पीटा जाता और बाकायदा बाजार में खड़ा करके नीलाम किया जाता था। लेकिन अब सैद्धांतिक तौर पर वहां से रंगभेद लगभग खत्म हो चुका है। सैद्धांतिक तौर पर तो यह भी माना जाता है कि भारत में रंगभेद है ही नहीं, लेकिन यह सच नहीं है। दरअसल, हमारे समाज में हमेशा से रंगभेद रहा है और अब भी कायम है, पर हमारा समाज इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। विज्ञापन की दुनिया से लेकर सिनेमा, सियासत, मॉडलिंग के क्षेत्र में काबिलियत के बजाय गोरे रंग को अब भी अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है।

विज्ञापन की दुनिया में चाहे प्रिंट हो या फिर टीवी दोनों में गोरी महिलाओं को ही प्रमुखता दी जाती है। आपको अभिनेत्री यामी गौतम का फेयर ऐंड लवली वाला विज्ञापन याद ही होगा, जिसमें वह कुछ ही दिनों में क्रीम से गोरा होने की बात कहती हैं। पर यह विज्ञापन भी उनके जैसे गोरे रंग वाली अभिनेत्री से ही कराया जाता है। बात केवल इस विज्ञापन की नहीं। काले, सांवले इंसान को गोरा बनाने का दावा करने वाली तमाम चीजें बाजार में बिक रही हैं और इन्हें बनाने वाली कंपनियां अरबों-खरबों रुपयों का कारोबार करती हैं। ऐसा हो भी क्यों न, जब समाचार पत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों, वेबसाइटों और पंजीकृत विवाह संस्थाओं में भी लड़की के रंग के बारे में विशेष तौर पर पूछा जाता है। जबकि प्रतिभा का रंग से कोई लेना-देना नहीं है। मॉडलिंग के क्षेत्र की बात करें तो वहां हाल ही में काले रंग की एक मॉडल ने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरीं। दरअसल, काले रंग की वजह से इसे ब्लैक बार्बी के नाम से बुलाया जाता है। लोलिता नाम की इस मॉडल का रंग काला होने के बावजूद सोशल मीडिया पर उसके लाखों फॉलोवर्स हैं। अमेरिकी अफ्रीकी मॉडल हेना मोंटाना की तरह लोलिता भी देखने में खूबसूरत हैं, जिनसे लोगों की नजरें हटती नहीं हैं। पर हमारे देश में अब भी श्वेत वर्ण वाली मॉडलों को पहले अवसर दिया जाता है।

यही कहानी फिल्मी दुनिया की है। हिंदी फिल्मों में सांवली और गहरे रंग की अभिनेत्रियों को उनका रंग गोरा करके दिखाया जाता रहा है। अब तो बॉलीवुड की तरह राजनीति का क्षेत्र भी ग्लैमर से अछूता नहीं है। यहां भी गोरे रंग का दबदबा दिखता है। समाचार चैनलों में कई राजनीतिक हस्तियां चर्चा के लिए कार्यक्रमों में आती हैं, जिनमें विभिन्न दलों की खूबसूरत महिला प्रवक्ताएं भी दिखाई देती हैं। मानें या न मानें, लेकिन यहां भी प्राय: गोरे रंग वाली और खूबसूरत महिलाओं को ही पहले अवसर दिया जाता है। इस क्षेत्र में अब राजनीतिक सूझबूझ के साथ गोरा रंग प्राथमिकता है। जबकि प्रतिभा का रंग से कोई मतलब नहीं है, फिर भी आजकल सोशल मीडिया का चलन अपने चरम पर है और यूट्यूब, फेसबुक, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे माध्यमों पर कई संस्थाएं और कारोबारी खूबसूरत और गोरी महिलाओं से अपने डिजिटल उत्पादों का प्रचार-प्रसार कराते हुए दिख जाएंगे। उदाहरण के लिए अंग्रेजी सिखाने वाले ऐप का प्रचार करने वाली महिला। कल्याण ज्वैलर्स जैसे बड़े कारोबारी का अपने उत्पादों की बिक्री के लिए बॉलीवुड की खूबसूरत अभिनेत्रियों जैसे ऐश्वर्या राय बच्चन और करीना कपूर खान को बुलाना, उनसे विज्ञापन करवाना। मीडिया में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। टीवी पर बुलेटिन पढ़ने वाली एंकर में से ज्यादातर को डार्क मेकअप करके कैमरे के सामने अत्यधिक गोरा बना कर दिखाया जाता है। क्रिकेट का आधुनिक अवतार कहे जाने वाले आईपीएल का भी यही हाल है। आईपीएल के मैचों में आपने चीयर लीडर्स तो देखी ही होंगी, आपको इनमें से एक भी गहरे और काले रंग की नहीं दिखी होगी। आईपीएल से सबसे अधिक खिलाड़ियों और खेल संस्थाओं को ही फायदा होता है, ऐसे में वे इस खेल को पूरा ग्लैमर से भर देते हैं और बाउंड्री पार करते ही चीयर लीडर्स के हवा में हाथ लहराने से दर्शक काफी आनंदित होते हैं।

बहरहाल, यह सर्वविदित है कि हमारे देश में राम से लेकर कृष्ण और शिव से लेकर माता काली, सभी का श्याम वर्ण है और श्रद्धालु भी इन्हें पूरी श्रद्धा के साथ पूजते हैं। लेकिन पुरुषों की तुलना में यहां महिलाओं से रंग को लेकर काफी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है। हाल ही में एक महिला का रंग काला होने के कारण उसके पति ने उसे तालाक दे दिया। लेकिन पितृसत्तात्मक इस समाज में रंग को ताक पर रख कर प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण जैसी अभिनेत्रियों ने देश के साथ विदेश में भी अपनी कामयाबी का लोहा मनवाया है। वहीं सेरेना विलियम्स और मिशेल ओबामा हैं, जिन्होंने एक मिसाल कायम की है कि रंग नहीं, काम का महत्त्व होता है। दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया शख्सियत ओपरा विनफ्रे भी काली हैं। चूंकि रंगभेद बाजारवाद से गहरा प्रभावित है, इसलिए सोशल मीडिया और टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में गोरे रंग को ही सुंदरता का पैमाना माना जाता है। कहा जाता है कि हर विज्ञापन में एक संदेश छिपा होता है। लेकिन बाजारों में काले से गोरा बना देने वाले उत्पादों और उनके विज्ञापनों को गलत तरीकों से दिखाने की वजह से काले रंग के लोग हीनभावना का शिकार होते हैं। इन्हें देखने के बाद कहीं न कहीं उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।

भारत चांद पर पहुंच गया है। आधुनिकता के युग में वह कई बड़े देशों को भी पीछे छोड़ चुका है। इसके बावजूद शिक्षित लोगों में काले और गोरे रंग में भेदभाव किया जाता है। न केवल प्रदर्शन संबंधित क्षेत्र इससे प्रभावित होते हैं, बल्कि ग्रामीण और शहरी इलाकों में भी विवाह और नौकरियों में अड़चनें पैदा होती हैं। दरअसल, सौंदर्य का रंग से कोई संबंध नहीं होता है। यह तो हर देश की जलवायु और वहां के खानपान पर निर्भर करता है। जैसे अफ्रीका की जलवायु के अनुसार वहां काले रंग के लोग होते हैं, वहीं ब्रिटेन, अमेरिका और इंग्लैंड में गोरे रंग के लोग होते हैं, लेकिन बाजार में गोरे रंग को ही सुंदरता का पर्याय माना जाता है। विभिन्न उत्पादों के माध्यम से बाजार के जरिए लोगों का आर्थिक दोहन किया जा रहा है, जिससे भारतीय समाज को बाहर आना होगा। खैर, काबिलियत रंग से नहीं काम से तय होती। आज के युग में रंगभेद एक मानसिक समस्या है, जिससे मुक्ति के बिना समाज का समग्र विकास संभव नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App