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कहानी: सलमबाई

यह कोई 1993 का साल रहा होगा, मैं इंटर बोर्ड की परीक्षा दे चुकी थी। बीए में दाखिला ले लिया था और बेमन से उन विषयों को पढ़ रही थी, जिन्हें पढ़ने का मन नहीं था।

Author Published on: June 23, 2019 1:21 AM
चित्र: नरेंद्रपाल सिंह

सोनी पांडेय

यह कहानी स्त्रियों की अकथ प्रेम की पीर-सी चुभती रही है मन में, बचपन से। घूंघट की ओट से ताकती नवेली दुल्हनों की आंख में ओस की बूंद-सी अटकी नैहर के प्रेम की पीर को देखना हो तो कभी दरवाजे से हांक लगा देखिए- माधोपुरवालीऽऽऽ! देखो तो तुम्हारे गांव का है फेरीवाला। वह बर्तन-बासन छोड़ कर भागेगी, गुड़ भेली संग लोटा भर पानी सास से बिना पूछे पिला देगी, न जात पूछेगी न पांत पूछेगी। सास की अग्नि-दृष्टि से चाहे जो भस्म हो, ये औरतें जीते-जी एक ही राग गाएंगी कि ‘नइहर गंगा छूटत नाहींऽऽऽ।’

यह कोई 1993 का साल रहा होगा, मैं इंटर बोर्ड की परीक्षा दे चुकी थी। बीए में दाखिला ले लिया था और बेमन से उन विषयों को पढ़ रही थी, जिन्हें पढ़ने का मन नहीं था। विश्वविद्यालय में पढ़ने के सपने टूटने के साथ सैकड़ों सपने मर गए थे उम्मीद के। बस जीना था और बेमन से जीवन की चादर को सीना था। लगी थी जैसे-तैसे। अबकी जाड़े की छुट्टियों में गांव में अम्मा संग रह रही थी। अम्मा कटिया-पिटिया देखतीं और मैं टोले भर की लड़कियों संग गीत शायरी पढ़ती-लिखती। लड़कियों संग फिल्मी धुन पर खूब बियाह के गीत रचे जाते। लड़कियों को लड़के मौका मिलते ‘आई लव यू’ कह कर ऐसे निकलते जैसे पाकिस्तान की सीमा पर युद्ध फतह कर आए हों। कभी-कभी लड़कियों के जनरल डायर सरीखे पिता-भाइयों से जम कर कुटम्मस के शिकार भी हो जाते, पर प्रेम तो प्रेम था। पुरोहित जी के शब्दों में ऐसा भूत, जो न लात से उतरता, न बात से और न किसी ओझा-सोखा से। अब समझ लीजिए की इन विकट परिस्थितियों में प्रेम को पाना और संजोना कितना मुश्किल होता है कि मेरी सखी माया को प्रेम हो गया। बेचारी को बुखार कम, पेट दर्द ज्यादा होता। सिर छूकर बुखार उतारने वाले देसी वैद्य पूरे टोले में भरे पड़े थे, पर पेट दर्द का सही-सही आकलन थोड़ा मुश्किल काम था। जब दर्द हींग, फिटकिरी, पेट मलने, नारा बैठाने, सेंकने से भी नहीं ठीक होता, तो किसी का हांका भूत जरूर सिद्ध हो जाता और मजबूरी में पहले त्वरित लाभ के लिए डॉक्टर फिर ओझा-सोखा को दिखाया जाता। एक शाम ऐसा ही दर्द, बड़ी बेदर्दी से मेरी सखी को उठा और वह तड़पत माछर-माटा हुई जा रही थीं- आही रे माई!ऽऽऽ माई रे माई।ऽऽऽ ‘ए बुच्ची! लीजिए ई गरम पानी की बोतल और पेट सेंकिए। मुंह दबा के तनी सोने का कोशिश करिए। ई कुल तो जवानी में लगा ही रहता है और आप हैं कि बुक्का फाड़ के गांव भर को जना रहीं हैं कि आ गया है। अरे तनी भाई-बाप का भी लेहाज किया जाता है। चार बार आपके भइया पूछ गए हैं कि बुचिया काहें चिल्ला रही है।’

माया की भाभी समझा रही थी। इधर मां की चिंता थी कि बढ़ती ही जा रही थी। ‘हे माधोपुरवाली! अपना मुंह बंद करो। लड़की दरद से बेजार है और तुम हो कि गियान बघारने में लगी हो।’ माया की माता जी को बहू का यह ज्ञान बघारना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। बहूरानी भी कम न थी, तमक उठी ज्यों झांसी की रानी। ‘काहें नहीं अम्मा जी, काहें न बोलें? हमको का है, चढ़ाइए कपार पर। आपे के काम आएगा, अरे हम लोग भी झेलते हैं, का मजाल कि कोई उफ्फ सुन ले और ई हैं कि कपारे पर गांव उठा लेती हैं।’ सास ने हाथ जोड़ लिया, ‘अच्छा अब चुप हो जाओ और जाओ रसोई में, सांझ हो रही है।’ जानती थीं कि बहू खुल गई, तो फटे ढोल-सी बजने लगेगी और इधर जवान बेटी के पेट में दर्द उठा था। ‘हं हं जाते हैं… जाते हैं। हमारी बात तो सबको कटहा कुकुर की भाउं-भाउं है… डंडा ले खेदिया लो।’ बहू बड़बड़ाती रसोई में चली गई। माया निखहरे खटिया पर पेट पकड़े रो रही थी। मां ने सिर में चुरुआ भर कडुवा तेल डाल कर थाप लगाई और लाल मिर्च ओंइछ कर दुवार पर जलाने चली गर्इं। अंधेरा घिर आया था। माघ का महीना। जाड़ा अपने चरम पर। सबके आंगन-दुवार से चूल्हा और कउड़ा का धुंआ उठने लगा। माया की बेचैनी बढ़ रही थी। पलट कर देखा, भाभी खाना बनाने में लगी थीं। आज अकेले काम करने से इतनी रुष्ट थी कि बीच-बीच में अपने दोनों बच्चों को धमधमा कर पीट देतीं और भनभनाती रहतीं। माया तीन भाइयों की अकेली बहन। थी तो तीनों से छोटी, पर इंटर पास करते पिता शादी की तलाश में चारों तरफ भटक रहे थे। बड़े भाई की शादी हो चुकी थी और वह दो बच्चों का पिता, घर का एकमात्र सरकारी नौकरीवाला आदमी। ठीक-ठाक कमा लेता था और छुट्टियों में घर आता। पति की बेरुखी से बड़ी बहू का स्वभाव कर्कश हो गया था। कारण, वह जितना शहर ले जाने को कहती, वह अगली बार और देर से घर आता। सास समझदार औरत थीं। खूब समझती थीं बहू की ख्वाहिशें, सो उसकी भनभनाहट का कोई प्रतिउत्तर नहीं देतीं और अक्सर जब वह शुरू होती, वह बाहर निकल जातीं।

हमारी तरफ जवान बेटियों के पेट में दर्द के कई अर्थ होते थे उन दिनों। ज्यादा बढ़ा तो अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती थी। माया की मां खासी चिंतित, चुपचाप जाकर सोहरा माई के मंदिर में बैठ गर्इं- ‘हे भगवती! तुम जगत भवानी, लड़की से कोई ऊंंच-नीच न हुई हो।’ रोते हुए पिंडी पर कपार पटक कर आंचल फैला कर मनौती भी मांग लीं की नारियल, चुनरी का प्रसाद चढ़ाएंगी, जो लड़की इज्जत से अपने घर चली गई। उनको लड़की की बीमारी से ज्यादा इज्जत की चिंता थी। उधर से चौके की बेवा अनारो फुआ गुजरीं, पूरे गांव की खबरी, देखते आकर बगल में बैठ गर्इं- ‘का हो रामजी बो! काहें मुंह थपुआ जइसन छितराए बैठी हो।’ जानती थीं कि लड़की के ब्याह की चिंता है। समझाने लगीं- ‘देखो! अब लड़की है तो अभी तुम्हारी चावल ही, भात सीझने में अभी समय है। चिंता काहें करती हो। एतनी सुघर लड़की का कहीं बियाह रुकता है।’ माया की माता जी की जान में जान आई। अनारो फुआ उड़ती चिरई की पीठ पर हरदी लगा आती थीं, लड़कियां उन्हें देखते रास्ता बदल लेतीं। क्योंकि कोई सजी-सवरींं दिख गई, तुरंत ज्ञान की शीशी ऊंढ़ेल देतीं- ‘आप रूप भोजन पराय रूप सिंगार ही ठीक लगता है ए बहिनी, नाहीं त नाक छेदाते देर नहीं लगती।’ कहते वह बहुत अश्लील इशारा करतीं। मेरा खून उबल जाता- ‘काहें हो फुआ, सिंगार काहें दूसरे के मन का? अपना मन कुछ नहीं होता है क्या? वह लहर जातीं, जैसी विष से मादी नागिन- ‘कह लो, बेटी कह लो, देसी कुत्ती मरेठी बोल। तुम्हारी मां भी बित्ता भर का जबान चलाती रही, तो तुम काहें कम रहोगी।’ व्यंग्य में ताली पीट कर कहतीं- ‘जइसन खेती वइसन बीया, जइसन माई वइसन धीया।’ मन में आता कि लेकर लाठी कुत्ते की तरह इस अपमान पर दुरदुरा दूं, पर गांव था, गांव के नियम और वह सबके घर की लड़कियों की अघोषित संरक्षक।

खैर, फुआ का चरित्र प्रमाण-पत्र पा माया की मां ने एक बार फिर पिंडी पर जोर से कपार पटका और फुआ को घर ले आर्इं। देखते माया कि सिट्टी-पिट्टी गुम। वह सबको गुमराह कर सकती थी, फुआ की दिव्यदृष्टि को नहीं। वह भरपूर अभिनय करती रही। फुआ भी गच्चा खा गर्इं। अंत में दो मोटरसाइकिलों से माया, फुआ, माया की माता जी और दो लड़कों संग अंधेरा घिरते-घिरते ब्लॉक के अस्पताल में पहुंची। नाटक इतना प्रचंड था कि बिना अस्पताल के निवारण का रास्ता दिख ही नहीं रहा था। बेचारी माया अंदर से भयभीत, जैसे कंपाउंडर दिखा, फुआ हाथ पकड़ ले आर्इं, यहां अस्पताल के बेड पर कब्जा पहले होता था, पर्ची बाद में कटती थी। कंपाउंडर बीस से पच्चीस के बीच का बड़ा ही सुंदर, गबरू जवान लड़का था। पास के गांव का। मृतक आश्रित में मां की जगह नौकरी लगी थी। अभी मुश्किल से चार महीने हुआ था। फुआ उसे खींचे लिए बेड के पास आकर रुकीं- ‘ए भइया! बहिनी बड़ी दरद में है, कौनो सूई-दवाई दे के ठीक करा। लड़की पेट के बल लेटी थी। कंपाउंडर ने नब्ज पकड़ी, लड़की ने धीरे से आह! कहा। वह मुस्कुराया और कहते निकल गया- अभी ठीक हो जाएगा।
वह गया और तुरंत उलटे पैर लौटा। हाथ में इंजेक्शन था, लड़की चीखने लगी, तो फुआ ने कस के हाथ पकड़ लिया और सुई लगवाया। इस पकड़ा-पकड़ी में ही इशारों में दोनों में कुछ बातें हो गर्इं। रात भर माया अस्पताल में रही। कंपाउंडर बार-बार आकर देख जाता। फुआ की दिव्यदृष्टि धीरे-धीरे खुल रही थी और माजरा समझने का प्रयास चल रहा था। सुबह लड़की के पेट का एक्सरे हुआ। उसने एकांत पाकर कहा- ‘बड़े निरमोही हैं, फट से सूई कोंच दिए।’ लड़का हंस पड़ा- ‘अरे पगली, ऊ बिटामिन का सूई था। अब एतना डरामा पर कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।’ एक्सरे में पेट में थोड़े बहुत कीड़े दिखे और दवा देकर डॉक्टर ने घर भेज दिया। प्रेम आदमी को निर्भीक बना देता है। माया की महामाया बढ़ती गई और वह हर पंद्रह दिन पर ब्लॉक घूम आती। बिटामिन की सुई लगवा चंगी हो घर लौट आती। फुआ का पेट फूल रहा था। इधर माया की माता जी कंउरू-कमक्षा सब पूज आर्इं कि बेटी का दर्द दूर हो जाए और दर्द था कि हर पंद्रह दिन पर उमेठ देता। धीरे-धीरे माया रोगिहाइन घोषित होती गई। शादी इस आरोप पर कटती रही और वह थी कि कुसुम कली-सी खिलती जा रही थी। गरमी के दिन थे, इस बरस खूब लगन पड़ी थी। हर घर में एक न एक ब्याह होना तय था। माया भी बीए दूसरे साल में आ गई थी और अभी तक कहीं शादी की बात नहीं बनी। हमारे घर भी बड़े पिताजी की लड़की की शादी थी और रिश्तेदारों से घर भरा पड़ा था। गांवों में कुछ हो न हो, सुख-दुख सबके साझे होते हैं। एक शाम इधर हमारे घर ब्याह के गीत गाए जा रहे थे कि अचानक बगल के आंगन से माया का रुदन सुनाई दिया। सब काम छोड़ कर लोग उधर भागे। बाबूजी चाचा को डांट रहे थे- ‘कहा था पछिलिए बार कि शहर ले आओ, बढ़िया डॉक्टर को दिखा देता हूं, तो तुम हो कि इन साले फर्जी डॉक्टरों के चक्कर में पड़े हो।’ खैर, अनारो फुआ ने बचाव किया। एक बार फिर लाद-फाद कर माया ब्लॉक पर पहुंची। कंपाउंडर मुस्कुराते हुए इंजेक्शन लगा गया। वह आता और बेबात माया का हाथ पकड़ हाल-चाल ले जाता। अबकी साथ में माया की बड़ी भाभी और मेरी माता जी भी गई थीं। मेरी मां ने कंपाउंडर के अच्छे व्यवहार को देख कर गांव-घर सब पूछ डाला। लड़का बताता रहा, बातों से पता चला कि वह अभी कुंवारा है। माता जी की बांछें खिल गर्इं। घर में अभी तीन लड़कियां कुंवारी थीं। अम्मा ने उसके जाते फुआ से कहा- ‘ए जीजी! अपनी रानी के लिए कैसा रहेगा यह लड़का।’ माया के मुंह से सुनते चीख निकल गई… अरे बाप रेऽऽऽ।

‘का हुआ बच्ची?’ अम्मा ने पूछा। वह रोने लगी। किसी ने कंपाउंडर को खबर दी और वह सुई लिए भागता हुआ आया। माया की भाभी को माजरा समझ आ रहा था। सरकारी व्यवस्था में कर्मचारी इतने भी चुस्त नहीं होते कि मरीज की परिक्रमा हर एक घंटे पर कर जाएं और इधर था कि कम्पाउंडर उमड़-घुमड़ कर मरीज का ध्यान रख रहा था। माया उसे देख आहऽऽऽ उऽऽऽह करती और वह बोल-बतिया कर चला जाता। बगल के बिस्तर पर लेटी एक वृद्धा ने फुआ से पूछा- ‘का हुआ है लड़की को, कुछ ऊपर-झापर बुझाता है।’ फुआ कुछ कहतीं उससे पहले माया की भाभी ने मुंह चमका कर जवाब दिया। ‘ऊपर-झापर ना हो आजी… बहुत भीत्तर का रोग है ई… नाम सुनी हैं- ‘सलमबाई’।’ अम्मा ने अंभित हो पूछा- ‘ई कौन बाई ह हो दुल्हनिया?’ फुआ ने ताली पीट कर ठहाका लगाते हुए कहा- ‘सनम की जब बाई चढ़ती है तो सलमबाई होती है और पूरे घर को पाद पदा देती है भौजी।’ मुड़ी झोर कर माया की भाभी को दाद दिया- ‘खूब चिन्ही माधोपुरवाली, ई ‘सलमबाइए’ है।

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