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पढ़ने चले परदेस

पिछले कुछ सालों में भारतीय छात्रों में विदेश जाकर पढ़ने की ललक काफी तेजी से बढ़ी है। हर साल लाखों विद्यार्थी विदेशी संस्थानों में दाखिला लेते और अरबों रुपए हर साल भारतीय मुद्रा के रूप में खर्च करते हैं। विदेशी संस्थानों में दाखिले की होड़ के पीछे कई वजहें हैं। उनमें एक तो यह कि भारत में अभी तक विश्वस्तरीय संस्थान नहीं खड़े हो पाए हैं। दूसरा, कि भारतीय संस्थानों में पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं। विदेशों में रोजगार की संभावनाएं अधिक हैं। भारतीय छात्रों की इसी ललक का लाभ उठाते हुए कई ऐसी एजेंसियों ने अपने पांव पसार लिए हैं, जो रोजगार का झांसा देकर फर्जी और कम गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालयों में दाखिले का कारोबार चलाती रहती हैं। विदेशों में पढ़ाई के प्रति बढ़ते आकर्षण का जायजा ले रही हैं दर्शनी प्रिय।

Author May 12, 2019 6:12 AM
हाल ही में अमेरिका में ‘पे एंड स्टे’ गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। वहां एक फर्जी विश्वविद्यालय के सहारे चल रहे एक इमिग्रेशन रैकेट का पता चला है।

दर्शनी प्रिय

बीते कुछ दशकों में भारतीय छात्रों ने पढ़ाई के लिए तेजी से गैर-मुल्कों का रुख किया है। भूमंडलीकरण ने भारतीय छात्रों के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों के दरवाजे खोल दिए हैं। यूनेस्को के आंकड़ों के मुताबिक 2013 तक विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या करीब एक लाख बयालीस हजार थी। इसमें वर्ष 1999 से 2006 के बीच भारी इजाफा दर्ज किया गया। एसोचैम के मुताबिक देश की लगभग पंद्रह अरब मुद्रा परोक्ष रूप से हर साल विभिन्न माध्यमों से विदेशी खातों में जा रही है। इतने बड़े पैमाने पर पलायन स्वाभाविक रूप से भारतीय कॉलेजों की क्षमता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है। विश्व की बड़ी शैक्षिक आधारभूत संरचना वाला देश, जहां छह सौ विश्वविद्यालय और चौंतीस हजार कॉलेज हैं और जहां हर साल लगभग सत्रह करोड़ विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाता है। करीब पांच करोड़ छात्र स्नातक की डिग्री लेकर हर साल बाहर निकलते हैं। वहां इतने व्यापक स्तर पर छात्रों का पलायन देश की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश अपने यहां प्रतिभा पलायन रोकने में अक्षम है। यह बात चौंकाती है।

एक अनुमान के अनुसार आने वाले दशक में लगभग सौ करोड़ भारतीय छात्रों के पलायन की संभावना है। इस संकटग्रस्त स्थिति में सरकारों और शैक्षिक संस्थानों की चुप्पी खलती है। शैक्षिक संस्थानों की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां सत्तर प्रतिशत से ज्यादा कॉलेज गुणवत्ता के मानकों पर खरे नहीं उतरते। इसी के चलते हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन सरीखे देश भारतीय छात्रों के पंसदीदा ठिकाने बन गए हैं। दूसरे क्रम में चीन और जर्मनी जैसे देश अपनी बढ़त बनाए हुए हैं। इस सूची में अमेरिका सबसे ऊपर है, जहां के विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान भारतीय छात्रों से सबसे ज्यादा गुलजार रहते हैं। 2010 से 2017 के बीच यूएस जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में बयालीस फीसद की बढ़त आंकी गई। इसी तरह अन्य देशों में भी भारतीय छात्रों की लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। वर्ष 2013-14 के दौरान लगभग चौंतीस हजार भारतीय छात्रों को ऑस्ट्रेलियाई वीजा जारी किए गए। अन्य यूरोपीय देशों में भी भारतीय छात्रों के पलायन की दर कमोबेश यही रही। गौरतलब है कि 2009 में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हुई नस्ली हिंसा की घटनाओं ने पलायन के सिलसिले को थोड़ा कमजोर जरूर किया, लेकिन छात्रों की आवाजाही यथावत बनी रही।

शिक्षा के रथ में बजट का पहिया
आज तमाम ऐच्छिक आवश्यकताओं के साथ शिक्षा (रोजगारपरक और व्यावसायिक) सामान्य जन-जीवन की आनुषंगिक अंग बन गई है। तेजी से बदलते समय ने शिक्षा के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। जनसांख्यिकीय दबाव ने संबंधित ईकाइयों को भारी निवेश के लिए अग्रसर किया, जिससे शिक्षा बदलते परिवेश में पूरी तरह व्यावसायिक और अल्पग्राही बन गई। पर आंकड़े बताते हैं कि स्कूल जाने वाले बच्चों में से उनसठ प्रतिशत ऐसे हैं, जो नियमित रूप से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष पूरे देश में पांचवीं कक्षा तक आते-आते करीब तेईस लाख छात्र-छात्राएं स्कूल छोड़ देते हैं। बुनियादी शिक्षा पर शिक्षा के कुल बजट का पचास प्रतिशत हिस्सा खर्च होता है, लेकिन समस्या यह है कि इस बार बजट में सिर्फ बत्तीस फीसद माध्यमिक शिक्षा के लिए दिया गया है। कटु सत्य है कि सरकारी स्कूलों में संसाधनगत सुविधाओं की भारी कमी के चलते अभिभावक निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं। पहले से ही कुशल और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी झेलते हजारों ऐसे स्कूल हैं, जहां शौचालय तो क्या, बच्चों के बैठने तक की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में नौनिहाल खुले में पढ़ने को विवश हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में अब भी अठारह सौ स्कूल ऐसे हैं, जो पेड़ों के नीचे या टेंटों में लग रहे हैं। एक कड़वी सच्चाई है कि आधे से अधिक प्राथमिक विद्यालयों में कोई शैक्षणिक गतिविधि नहीं होती। विडंबना है कि वृहद शिक्षा प्रणाली का दम भरने वाले देश में अब तक तकरीबन इकसठ लाख बच्चों तक शिक्षा की रोशनी नहीं पहुंची है। राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद का शोध बताता है कि भारत के नबबे फीसद कॉलेजों और सत्तर फीसद विश्वविद्यालयों का शैक्षिक स्तर बहुत कमजोर है। मसला सिर्फ बदहाल शिक्षण संस्थानों का नहीं, बल्कि देश में शिक्षकों की दयनीय हालत का भी है। जहां एक ओर कुशल और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है, वहीं शिक्षा मित्र जैसी योजनाओं के नाम पर अशिक्षित और अकुशल शिक्षकों की भरमार है। फिर नियमित शिक्षकों को वेतन न मिल पाना भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की राह का एक बड़ा रोड़ा है।

अनुकरणीय पहल
केरल और दिल्ली जैसे राज्यों ने यह साबित कर दिया है कि अगर निष्ठा और कृतसंकल्प होकर किसी कार्य को किया जाए, तो उसमें आशातीत सफलता मिल सकती है। इस तरह किसी भी क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। केरल ने स्कूलों के भवन और आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए अपनी स्पेशल इन्वेस्टमेंट वीकल (केआईआईएफबी) के जरिए फंड जुटाने का काम शुरू किया है। इससे वहां के स्कूलों का कायापलट हो गया है। इसी तरह दिल्ली सरकार ने शिक्षा में बड़ा निवेश करके प्राथमिक और बुनियादी शिक्षा की दिशा और दशा और ही बदल दी है। कुशल प्रबंधन तंत्र, सक्रिय प्रयास और दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते इन राज्यों ने अन्य राज्यों के लिए एक नजीर पेश की है। शिक्षा की बदरंग तस्वीर को बदलने के लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इस दिशा में समेकित प्रयास करने होंगे। सुधार के हर स्तर पर हर सूक्ष्म पहलू को दृष्टिगत करते हुए समावेशी शिक्षा का उन्नयन इस दिशा में एक सार्थक पहल होगी। खासकर बुनियादी शिक्षा की नींव को मजबूत आधार देकर इस लक्ष्य की ओर आसानी से अग्रसर हुआ जा सकेगा। इसके अलावा कौशल विकास, रोजगारपरक शिक्षा, व्यापक ढांचागत सुविधा, प्रशिक्षित स्तरीय शिक्षक आदि के विकास के लिए अतिरिक्त बजट का प्रावधान करना होगा। साथ ही बुनियादी शिक्षा की समस्या को सिरे से समझना होगा, क्योंकि उच्च शिक्षा की नींव बुनियादी शिक्षा के मजबूत कंधों पर ही टिकी होती है।

फर्जी विदेशी संस्थान
हाल ही में अमेरिका में ‘पे एंड स्टे’ गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। वहां एक फर्जी विश्वविद्यालय के सहारे चल रहे एक इमिग्रेशन रैकेट का पता चला है, जिसमें अमेरिका के आव्रजन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन विभाग ने विश्वविद्यालय के एक सौ तीस भारतीय छात्रों को भी गिरफ्तार किया है। ऐसे हजारों मामले हैं, जहां भारतीय छात्र फर्जीवाड़े में या तो बुरी तरह फंसे हुए हैं या उससे उबरने की दिशा में लगातार हाथ-पैर मार रहे हैं। दरअसल, जब छात्र बिना ठीक से छानबीन किए आनन-फानन में विदेश जाने के लालच में जुगाड़तंत्र का सहारा लेते हैं, तब वे अनजाने में ही अपंजीकृत ऐजेंटों के मकड़जाल में फंस जाते और अपना भविष्य चौपट कर बैठते हैं। ऐसे रैकेटों में संलग्न बिचौलियों द्वारा छात्रों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उन्हें मान्यताप्राप्त और प्राधिकृत यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलाया जाया जाएगा, लेकिन असल में होता इसके उलट है। यह कड़वी सच्चाई है कि देश में छात्रों और युवाओं को अमेरिका या अन्य देशों में पढ़ने या नौकरी करने के लिए अवैध तरीके से भेजने का धंधा कई जगहों पर धड़ल्ले से चल रहा है। विदेशों में ऐसे गैर-पंजीकृत संस्थानों की भरमार है, जो गुणवत्ता और वैधता के मानदंड पर कहीं खरे नहीं उतरते। ये संस्थान अपने अपंजीकृत ऐजेंटों और बिचौलियों के जरिए ठगी के गोरखधंधे को अंजाम देते हैं। भोले-भाले छात्र बिना किसी पुख्ता जानकारी के इनके चंगुल में आसानी से फंस जाते हैं और श्रम से अर्जित अपना धन और बहुमूल्य समय दोनो बर्बाद करते है। साथ ही अपने भविष्य को अंधेरे के गर्त में धकेल देते हैं।

इन फर्जी संस्थानों पर नकेल कसने के लिए जरूरी है कि इस क्षेत्र में सक्रिय संबंधित इकाइयां कड़े निर्णय लेकर देश से प्रतिभा पलायन को रोकने के कारगर कदम उठाएं। छात्रों को शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करा कर इस काम को आसानी से अंजाम दिया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि वह विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए पलायन कर रहे युवाओं को प्रवेश संबंधी एक एडवाइजरी जारी करे। साथ ही जनसंचार के विभिन्न माध्यमों के जरिए समय-समय पर प्रवेश संबंधी दिशा-निर्देश प्रेषित करे। संभव हो तो काली सूची में डाले गए विश्वविद्यालयों की अद्यतन सूची छात्रों तक पहुंचाए। इतना ही नहीं, विदेशी विश्वविद्यालयों के एक्रिडिएशन, गुणवत्ता, वैधता और शीर्षता की जानकारी हेतु एक अलग महकमे का गठन किया जाए। तभी भोले-भाले छात्रों को ऐजेटों के चंगुल से बचाया जा सकता है। फर्जीवाड़े को रोकने में यह सार्थक पहल होगी।

सजग रहें छात्र
छात्र भी ऐसे फर्जी विश्वविद्यालयों से बचने के लिए अपनी एक चेक लिस्ट तैयार करें। प्रवेश के लिए प्रक्रिया की अद्यतन जानकारी अपने स्तर पर एकत्रित करें। भाषा और प्रवेश संबंधी सामान्य परीक्षाओं की आधारभूत जानकारी और कॉलेज की साख की जानकारी आपको सुरक्षित रखती है, वहीं आईईएलटीएस, टीओईएफएल, पीटीई जैसे भाषायी जांच मापदंड, जहां आपको मजबूती से तैयार करते हैं, वहीं उनके लिए बाहर जाने का वैध रास्ता भी खोलते हैं। ज्यादातर विश्वविद्यालय इन्हीं मानकों के आधार पर अपने यहां प्रवेश देते हैं। वहीं जीमैट, जीआरई, एलएसएटी, एसएटी जैसी सामान्य परीक्षाएं विदेशों में जाने की राह आसान बनाती हैं। कॉलेज की एकेडमिक रैकिंग, शैक्षणिक साख, भारतीयों छात्रों की संख्या, जी फैक्टर यानी (ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैकिंग) संबंधी सूचना पहले ही प्राप्त कर लें।

विदेश जाने से पहले की तैयारी
इन सबके अलावा ऑनलाईन वीजा अप्लाई, वर्क परमिट ओटीपी (ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग), अस्थायी रोजगार अनुमति, सीपीटी (करीकुलम प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, कोर्स अवधि के दौरान इंटर्नशिप) आदि की पक्की और पुख्ता जानकारी छात्रों को इस मकड़जाल से बचा सकती है। अलग-अलग देशों में शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश संबंधी नियम और शर्ते अलग-अलग हैं। मसलन, यूके के ज्यादातर विश्वविद्यालय यूसीएएस या यूकेपीएएसएस प्रणाली के तहत ही अपने यहां आवेदन लेते हैं। इसी तरह आस्ट्रेलिया यूएसी वेबसाइट के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर के छात्रों को अपने एजुकेशन एडवाइजर और ऐजेटों के माध्यम से अपने विश्वविद्यालयों में प्रवेश संबंधी सूचनाएं उपलब्ध कराता है। इसके अलावा उच्च शिक्षा के लिए ए ऐंड क्यू फ्रेमवर्क के जरिए भी आस्ट्रेलिया में शिक्षा प्राप्त करने की स्पष्ट जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसी क्रम में चीन में सीयूसीएएस (सेल्फ एप्लीकेशन प्लेटफार्म) और सीयूएसी (चाईना यूनिवर्सिटी एप्लीकेशन सेंटर) द्वारा छात्रों से आवेदन मंगाए जाते हैं।

पलायन के कारण
छात्रों के देश छोड़ कर बाहर जाने के कई कारण हैं, जिनमें देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी, व्यावहारिक प्रयोग के संसाधनों की कमी, आधारभूत संरचना और डिग्री के बाद भी रोजगार की अनुपलब्धता आदि प्रमुख हैं। सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा हमारे आईटी पेशेवरों में रोजगार की योग्यता की कमी से संबंधित रिपोर्टों और विश्वविख्यात आईएमडी बिजनेस स्कूल स्विट्जरलैंड द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टैलेंट रैंकिग 2018 से चिंताजनक संकेत सामने आ रहे हैं। आईएमडी बिजनेस स्कूल की रिपोर्ट में भारत तिरसठ देशों की सूची में पिछले वर्ष के इक्यावनवें स्थान से दो पायदान फिसल कर तिरपनवें स्थान पर आ गया है। परेशानी की बात यह है कि शैक्षणिक प्रणाली की गुणवत्ता और विकास के मामले में भारत इस सूची में काफी पीछे है। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत में इक्यानबे फीसद आईटी पेशेवर नौकरी के योग्य ही नहीं हैं। ऐसे में जरूरी है कि हमारे युवाओं को डिग्री के साथ-साथ टेक्निकल और प्रोफेशनल दक्षता से भी लैस किया जाए। साथ ही रोजगार सृजन की दिशा मे संबंधित ऐजेसियों द्वारा सार्थक पहल की जाए। हैरानी की बात है कि शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता पर न तो सरकारी ऐजेसिंयों का ध्यान है, न ही देश के कर्ता-धर्ताओं का। विश्व के सौ श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से छियालीस अति प्रभावशाली विश्वविद्यालय अकेले यूएस में हैं। एशियाई देशों के खाते में मात्र ग्यारह विश्वविद्यालय हैं। इस प्रतिस्पर्धा में चीन हमें कड़ी टक्कर दे रहा है। न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार चीन हर साल ढाई सौ अरब ह्यूमन कैपिटल में निवेश कर रहा है। टाइम्स हायर एजुकेशन रिपोर्ट के अनुसार चीन के दो विश्वविद्यालयों ने टॉप ग्लोबल 50 में अपनी जगह पक्की कर ली है, जबकि भारत उस सूची में कहीं नहीं है। आईआईई के अनुसार 2020 तक चीन, यूएस और यूके के बाद 3.28 अंतराष्ट्रीय छात्रों के साथ विश्व का बड़ा एजुकेशनल हब बनने की तैयारी में है। भारत में पलायन की दर जहां दिन-ब-दिन तीव्र होती जा रही है, वहीं अंतरराष्ट्रीय छात्रों की आवक अनपेक्षित रूप से लगातार सिकुड़ रही है। वर्ष 2012 तक भारत में सिर्फ सताईस हजार विदेशी छात्र आए। कुछ वर्ष पहले तक चीन की भी कमोबेश यही स्थिति थी, जो आज भारत की है। पर शिक्षा के क्षेत्र में क्षमता विकास और गुणवत्ता जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों पर ध्यान केंद्रित कर उसने खुद को इस स्थिति से उबार लिया। भारत को चीन से सबक लेते हुए अपनी तकनीकी कुशलता में विस्तार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, क्षमतावर्धक उच्च कौशल प्रशिक्षण में विकल्पों की खोज, प्रौद्योगिकी प्रोन्नयन, आधारभूत संरचना में सुधार के जरिए प्रतिभा पलायन को रोकना होगा।

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