ताज़ा खबर
 

कला का बाजार, बाजार में कला

कलाकार की हसरत होती है कि उसका काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाए। मगर वहां तक पहुंचने के रास्ते में कई सीढ़ियां हैं, जिनमें मुख्य सीढ़ी कला दीर्घाएं होती हैं।

Author January 27, 2018 10:57 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

चित्रकला का बाजार लगातार विस्तृत हो रहा है। विभिन्न शहरों में कला मेले आयोजित होने लगे हैं, चित्रकला प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं, हर बड़े शहर में नई कला दीर्घाएं खुल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीलामी घर हैं, जो दुनिया भर के कलाकारों के चित्रों की नीलामी करते हैं। इस तरह हर कलाकार की हसरत होती है कि उसका काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाए। मगर वहां तक पहुंचने के रास्ते में कई सीढ़ियां हैं, जिनमें मुख्य सीढ़ी कला दीर्घाएं होती हैं। ये कला दीर्घाएं किस तरह चित्रकारों को प्रोत्साहित करती, प्रश्रय देती हैं, कला का बाजार रचती-बनाती हैं, बता रहे हैं ज्योतिष जोशी।

यह बात सच है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय नीलामी कंपनियों के आने के बाद निरंतर कला को व्यावसायिक बनाने की कोशिश हुई है। क्रिस्ती और सुदबी जैसी कंपनियों ने ज्यों-ज्यों भारतीय कलाकारों की कृतियों की कीमतें तय की हैं और उन्हें नीलामी दायरे में लिया है, वैसे-वैसे यहां कलादीर्घाओं के खुलने में बढ़ोतरी हुई है। कुछ भारतीय दीर्घाओं ने अपनी एजेंसियां भी शुरू कर दी हैं, जो कला की कीमत तय करें और उनकी नीलामी हो। एमएफ हुसेन जैसे कलाकार भी क्रिस्ती और सुदबी का गुणगान करते हुए कहते रहे कि इन संस्थाओं ने ही उन जैसे कलाकारों की कृतियों की बड़ी कीमतें तय कीं, जिससे वे देश में ही नहीं, विश्व में भी अपनी पहचान बनाने में सफल हो सके।

इसी धारणा ने भारत में कला को एक विस्तृत बाजार में बदल दिया है, जिसमें कला केवल एक ‘बाजारू वस्तु’ की तरह देखी जाने लगी है। केवल दिल्ली को देखें, तो पिछले कुछ वर्षों में यहां कलादीर्घाएं जाल की तरह बिछ गई हैं। ऐसी दीर्घाएं देश के महानगरों में धड़ल्ले से खुली हैं, पर इनका काम कला को संरक्षण देकर विकसित करना नहीं, बल्कि मोटी कमाई करना हो गया है। इनमें से अधिकतर कलादीर्घाएं नए कलाकारों को बड़ी बारीकी से लोभ देकर अपने जाल में फंसाती और प्रेरित करती हैं कि वे उनके यहां प्रदर्शनियां करें। कलाकार जब वहां प्रदर्शनी करता है तो उसकी बिकी हुई कृति पर दीर्घाएं तीस से चालीस प्रतिशत तक कमीशन लेती हैं। कई बार कलाकारों की कृतियों की कीमत कलादीर्घाएं ही तय करती हैं। कुछ कलादीर्घाएं बिक्री से बची कृतियां कलाकारों से प्रदर्शनी के बाद ले लेती हैं और कहा जाता है कि इनकी बिक्री हो जाने के बाद यहां से हिसाब ले लें। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी कलाकारों को कृतियों का हिसाब मिलना तो दूर, कलादीर्घाओं के मालिकों के दर्शन भी नहीं होते।

इसी प्रसंग में एक कलादीर्घा के मालिक ने बताया कि ‘उसने कलादीर्घा खोलने में बड़ी पूंजी इसलिए लगाई है कि वह इससे अच्छी-खासी कमाई कर सके। कमाई न हो तो वह इस कलादीर्घा का क्या करेगा, सट्टे में पैसा लगाएगा या कोई धंधा शुरू करेगा। कला की सेवा से उसे क्या लेना-देना! सच पूछिए तो कलाकार क्या-क्या बनाते हैं और उसे कला कहते रहते हैं, मेरी समझ में नहीं आता।’ हैरानी की बात यह है कि कुछ कलादीर्घाएं प्रसिद्ध भारतीय कलाकारों की चर्चित कृतियों की नकल बनवा कर विदेशी बाजारों में बेचती हैं और कलाकारों को मामूली पैसे देकर एक तरह से उन्हें नष्ट करने का उद्यम करती हैं। इन दीर्घाओं का विदेशी नीलामी कंपनियों से गहरा रिश्ता होता है और उनकी मांगों का भी वे खयाल करती हैं। भारतीय लोककला से जुड़ी अनेक माध्यमों की कृतियां भी ये दीर्घाएं औने-पौने दामों में नीलाम करती रहती हैं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। कुछ दीर्घाओं का रसूख इतना है कि वे कलाकारों को सरकारी स्कॉलरशिप, फेलोशिप दिलवाने से लेकर अनेक संस्थाओं से पुरस्कार दिलवाने और सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम के तहत विदेश भेज कर प्रदर्शनियां लगवाने तक में समर्थ हैं। अपने इन्हीं प्रभावों की वजह से ये दीर्घाएं लगातार फूलती-फलती रही हैं और अब समांतर कलाकेंद्र के रूप में भी उभरी हैं, जिनकी कला के बाजार पर भी पकड़ बन रही है।

नया कलाकार भ्रमित है कि वह क्या करे! दूसरी ओर, ये दीर्घाएं उसके भ्रम को बढ़ाते हुए उसके दोहन का रास्ता बनाती हैं। ऐसी दीर्घाओं के पीछे सरकारी तंत्र तो है ही, बड़े-बड़े कलाकार भी होते हैं, जो उनकी मनमानी पर कुछ नहीं कहते। अब देखना यह भी है कि इनमें से कौन हुसेन, तैयब मेहता, रजा या रामचंद्रन को पीछे छोड़ता है और कब। कला में बाजार के प्रभाव और नई-नई तकनीकों का असर यह हुआ है कि आज कला और शिल्प में फर्क करना मुश्किल हो गया है। कम्प्यूटर डिजाइन, डिजिटल प्रिंट से लेकर वीडियो क्लिपिंग और दूसरे अनेक माध्यमों से निर्मित शिल्प और दूसरे अनेक अनगढ़ प्रकारों को कला-बाजार में कला का दर्जा प्राप्त होता जा रहा है, जो अलग चिंता का कारण है। इस भयानक विकृति में कला की राष्ट्रीय संस्थाएं भी न केवल नकारा साबित हुई हैं, बल्कि वे निहित स्वार्थी तत्त्वों के हाथों का खिलौना बन कर नकलचियों को असल कलाकार होने का प्रमाण-पत्र भी देती हैं।

कला को एक बड़ा बाजार और कलाकारों को उनकी कृतियों का खरीदार मिले तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन कला को ही जब बाजार की वस्तु में तब्दील कर दिया जाएगा तो कला के नाम पर क्या बचेगा। यह सार्वजनिक चिंता का प्रश्न है। भारत में इस चिंता का वाजिब पहलू यह है कि बहुराष्ट्रीय निगमों के आने के बाद जिस तरह समूची संस्कृति को अपने ढंग से निर्धारित करने की होड़ मची है, वह समय रहते काबू में नहीं आई तो उसके बहुत घातक परिणाम होंगे। हम खुशफहमी में हैं कि हमने अकूत स्वाधीनता अर्जित कर ली है, हम विश्वग्राम में शामिल हो गए हैं। हम अब विश्व-नागरिक हैं, पर हमने यह सोचना जरूरी नहीं समझा कि जब तक अपनी बुनियाद को स्थिर नहीं रखते, तब तक हम कहीं के नहीं हैं। संस्कृति का प्रश्न हमारे होने से जुड़ा है और कला का हमारी चेतना और संस्कारों से। कला को अगर इसी तरह प्रायोजित वस्तु में बदल दिया गया और कलादीर्घाओं को मनमानी करने की छूट दे दी गई तो एक दिन वे भारतीय आधुनिक कला और समकालीन कला को तो विकृत करेंगी ही, हमारी प्राचीनतम धरोहरों के लिए भी खतरा बन जाएंगी।

आवश्यक है कि कला को सृजन ही रहने दिया जाए, मांग या उपयोग से उसे तौलने की कोशिश न हो। कलाकार अपनी प्रतिभा से परिकल्पित विषय पर काम करके कृतियां संभव करें। दीर्घाएं उसे प्रोत्साहन न दें, उसकी कला को विकसित होने का अवसर दें। और अपनी तुच्छ मानसिकता से ऊपर उठें। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बड़ा अनर्थकारी होगा और आने वाली पीढ़ियों से कला के खत्म होने की जवाबदेही कलादीर्घाओं पर ही होगी। कलादीर्घाएं अपने को व्यवसाय केंद्र बनाने से रोक कर और अपने अनेक अनर्गल कार्यों को बंद कर एक बेहतर कला-वातावरण के निर्माण में योग दे सकती हैं। मगर सवाल है कि क्या वे इसके लिए तैयार हैं?

कला बाजार की कलाबाजी

आज कला पर बात करनी हो, तो आपको उसके बाजार पर पहले बात करनी पड़ेगी। कला की राजनीति और कला का बाजार आज कला से ज्यादा चर्चित है। यह सवाल उठता जरूर है कि आखिर यह कला है किसके लिए! क्या सिर्फ समाज के उस ‘प्रभु वर्ग’ के लिए, जो कला की समझ के कारण नहीं, बल्कि उससे भविष्य में मिलने वाले लाभ के कारण उसे खरीदता है? क्या कला का आम आदमी से कुछ लेना-देना है या फिर यह कला सिर्फ कलादीर्घाओं, कॉरपोरेट घरानों और अकादमियों में टांगे जाने के लिए ही है? वास्तव में ये सवाल कला के बाजार के लिए कोई महत्त्व नहीं रखते। उसके लिए महत्त्वपूर्ण है कला से धन की उगाही। कला के अंतरराष्ट्रीय बाजार सहित भारतीय बाजार की भी यही स्थिति है। हम कह सकते हैं कि भूमंडलीकरण के इस दौर में भारतीय कला को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रित करने की कोशिशें जारी हैं।

भूमंडलीकरण और कला

कला के भूमंडलीकरण की बात के पीछे झांकें तो पता चलेगा कि यह सिर्फ गरीब देशों की कला को नष्ट करने की साजिश है। जबसे क्रिस्ती और सुदबी जैसे अंतरराष्ट्रीय नीलाम घरों ने कला को संरक्षित करने की अपनी तथाकथित मुहिम शुरू की है, उन्होंने कीमत को कला और कलाकार से बड़ा बना दिया है। आज ये अंतरराष्ट्रीय नीलाम-घर ही कला और कलाकार की कीमत तय करते हैं। इन्हीं की देखादेखी भारत में नीलाम-घर उग आए हैं, जो अपनी मर्जी से कला को नियंत्रित करने में लगे हैं। वे कलाकार को चुनते हैं और उसकी कीमत तय करते हैं। भूमंडलीकरण की बात उनके लिए सिर्फ एक ढाल है कला को कालाबाजार में पहुंचाने की। सच तो यह है कि हुसेन, रजा और तैयब जैसे कलाकारों को इस अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो कीमत मिलती है, वह नए कलाकार को बाजार के हाथों में खेलने के लिए उकसाती है। इसे प्रेरणा कहना गलत होगा। वे देखते हैं कि बड़े कलाकार अपनी खरीद से दुखी नहीं होते। बाजार उन्हें अपनी जड़ों से काट रहा है, यह बात उन्हें परेशान नहीं करती। आखिरकार नए कलाकार भी इन्हीं रास्तों पर चल पड़ते हैं। लेकिन इस रास्ते पर चलने के जोखिम भी हैं। इसी प्रसंग में मध्यप्रदेश के आदिवासी कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम की मृत्यु को याद किया जा सकता है। जापान में जनगढ़ की आत्महत्या, कला के बाजार में बैठ जाने से पैदा होने वाली क्रूरता से परदे उठाती है। श्याम मंडला जिले के पाटनगढ़ के बेहतरीन कलाकार थे। उन्हें जगदीश स्वामीनाथन की खोज माना जाता था। श्याम जापान स्थित मिथिला म्यूजियम, उसके संचालक हासिगावा के निमंत्रण पर जापान गए थे। वहां वर्षों तक उनका शोषण हुआ। उनकी कलाकृतियों को बेच कर पैसे बनाए जाते रहे और उन्हें भारत आने से रोका जाता रहा। आखिर में श्याम ने क्षुब्ध होकर आत्महत्या कर ली। क्या यह सच नहीं है कि कला के अंतरराष्ट्रीय बाजार ने ही श्याम को बंधुआ बनाया और आखिरकार उनकी जान तक ले ली?

अपने ही देश में जरा गौर करें, तो पता चलेगा कि भूमंडलीकरण की बातों के पिछले बीस सालों में कला के पारंपरिक केंद्र बदल गए हैं। गांवों और कस्बों से कला व्यावसायिक नगरों में आ गई है। दिल्ली कला का केंद्र कभी नहीं रही। यही हाल मुंबई का है। कोलकाता का जरूर अपना कला इतिहास है। आज इन महानगरों में सैकड़ों कलादीर्घाएं खुल गई हैं। दीर्घाओं के संरक्षक, संचालक शुद्ध व्यवसायी हैं। ये कलाकारों की प्रदर्शनियां लगवाने के नाम पर सौदा करते हैं, उनकी कृतियों की बिक्री में कमीशन खाते हैं, वे बड़ी सफाई से कलाकारों के लिए पुरस्कार, फेलोशिप और विदेश यात्राओं की व्यवस्था भी कराते हैं। कलाकार इन्हें कला का संरक्षक मानते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ये व्यवसायी कला का जितना अहित करते हैं, उतना कोई नहीं करता।

मौलिकता का क्या मतलब

कलादीर्घाओं की व्यावसायिक मानसिकता के विरोध में ही जब 1917 में मार्शल डूसां ने चीनी मिट्टी से एक यूरिनल को न्यूयॉर्क की एक कलादीर्घा में प्रदर्शनी के लिए भेजा था तो विश्वकला में एक बड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। डूसां ने अपने जवाब में कहा था कि जब कलाकार से वस्तु की मांग हो रही है, जो मांग पर आधारित है तो कलाकृति की मौलिकता का मतलब ही क्या है। उनका यह भी तर्क था कि मांग पर निर्मित कला से अच्छा तो वह ‘यूरिनल’ है, जो सबके उपयोग का है। इसका शीर्षक उन्होंने रखा था ‘फव्वारा’। प्रतिरोध की यह प्रक्रिया संग्रहालयों और कला के व्यावसायिक निगमों के विरुद्ध पिछले सौ वर्षों से जारी है।

संग्रहालय बंद करने की मांग

1970 में अनेक कलाकारों ने न्यूयॉर्क के एक संग्रहालय की सीढ़ियों पर धरना देकर यह मांग की थी कि संग्रहालयों को बंद कर दिया जाए। इन कलाकारों में रॉबर्ट मॉरिस और कार्ल आंद्रे भी शामिल थे। लंदन, पेरिस, मास्को आदि नगरों में भी ऐसे प्रदर्शन खूब हुए हैं, जिनमें कलाकारों की ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘अस्मिता’ पर हावी होते बाजार तंत्र का जबर्दस्त प्रतिरोध किया गया है। डाकुमेंटा प्रतिष्ठान, जो विश्वकला की कथित समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय कला-संवाद का एक मंच है, कई बार कलाकारों का कोपभाजन बना है। कलाकार उससे इसलिए कुपित हो रहे हैं कि वह उन्हीं अंतरराष्ट्रीय निगमों के अनुदान पर चलता है जो कला को ‘बाजारू चीज’ बना देने पर आमादा हैं।

कमाल पैसे और प्रचार का

समकालीन कला के सामने सबसे बड़े संकट के रूप में दो कारक खड़े हैं- पैसा और प्रचार। भूमंडलीकरण के दबाव में कलाकारों का एक बड़ा वर्ग बहुराष्ट्रीय कंपनियों का क्रीतदास बनता जा रहा है। कलाकार को पैसा चाहिए तो निगमों को मांग की कला। इस प्रक्रिया में प्रचार का एक भयानक तंत्र विकसित हो गया है, जिसमें प्रचार की नीति अख्तियार कर कलाकार लगातार बाजार का ध्यान आकृष्ट करने में लगा रहता है। यह प्रवृत्ति भारतीय कला में आज मौजूद चार पीढ़ियों में एक साथ विद्यमान है। इससे कला के क्षेत्र में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X