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शख्सियत: सेवा को समर्पित जीवन ठक्कर बाप्पा

ठक्कर बाप्पा ने 1914 में "भारत सेवक समाज" के संस्थापक गोपालकृष्ण गोखले से समाज सेवा की दीक्षा ली और जीवनपर्यंत लोकसेवा में ही लगे रहे। उनके जीवन पर महात्मा गांधी का भी गहरा असर था।

social serviceगांधीवादी और समाजसेवी ठक्कर बाप्पा।

भारत ने एक लंबे संघर्ष के बाद स्वाधीनता जरूर हासिल की, पर बात अगर जीवन और समाज की करें तो धर्म से लेकर संस्कृति तक तमाम क्षेत्रों में शील और आदर्श की ऊंचाई हमने देश में औपनिवेशिक सत्ता के अंत से पहले ही प्राप्त कर ली थी। ठक्कर बाप्पा ऐसा ही एक बड़ा नाम है, जिसने अपने जीवन को सेवा का पर्याय बनाकर भारतीय समाज के सामने एक प्रेरक और अनुकरणीय आादर्श रखा। उनकी सेवा-भावना का स्मरण करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, “जब-जब निस्वार्थ सेवकों की याद आएगी, ठक्कर बाप्पा की मूर्ति आंखों के सामने आकर खड़ी हो जाएगी।”

ठक्कर बाप्पा का जन्म 29 नवंबर, 1869 को गुजरात में काठियावाड़ के भावनगर नामक स्थान पर हुआ था। उनका मूल नाम अमृतलाल ठक्कर था। सेवा-कार्य में प्रसिद्धि ने उन्हें ठक्कर बाप्पा के रूप में विख्यात कर दिया। उनके पिता विट्ठलदास लालजी ठक्कर एक साधारण व्यक्ति थे। पर न सिर्फ अपने पुत्र बल्कि पूरे समाज के बच्चों की शिक्षा की ओर उनका विशेष ध्यान था। पिता की सेवावृत्ति का प्रभाव ठक्कर बाप्पा के जीवन पर भी पड़ा था। उस समय समाज में छुआछूत कलंक बुरी तरह से फैला हुआ था। ठक्कर के अंदर इसके प्रति विरोध का भाव बचपन से ही पैदा हो चुका था।

ठक्कर बाप्पा ने छात्रवृत्ति मिलने पर पुणे से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की थी। उन्होंने कुछ समय तक शोलापुर और भावनगर में रेलवे की नौकरी की। पर अन्य अधिकारियों की भांति रिश्वत न लेने के कारण वे अधिक समय तक इस नौकरी में नहीं रह सके। फिर ठक्कर बाप्पा ने बढ़वण और पोरबंदर में काम किया। युगांडा (अफ्रीका) जाकर एक रेलवे लाइन बिछाई। लौटने पर कुछ दिन सांगली राज्य में नौकरी करने के बाद उन्हें मुंबई नगरपालिका में उस रेलवे में काम मिला जो पूरे शहर का कचरा बाहर ले जाती थी। वहां ठक्कर बाप्पा ने देखा कि कूड़ा उठाने का काम पाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। इससे उनके अंदर हरिजनों की सेवा का भाव और भी जाग्रत हुआ।

ठक्कर बाप्पा ने 1914 में “भारत सेवक समाज” के संस्थापक गोपालकृष्ण गोखले से समाज सेवा की दीक्षा ली और जीवनपर्यंत लोकसेवा में ही लगे रहे। उनके जीवन पर महात्मा गांधी का भी गहरा असर था। हरिजन उद्धार और खादी के प्रसार का कार्य उन्होंने महात्मा के रचनात्मक कार्यक्रमों से प्रभावित होकर ही किया। उन्होंने काठियावड़ में खादी के कार्य को आगे बढ़ाया, उड़ीसा के अकाल में लोगों की सहायता की, देशी रियासतों में लोंगों पर होने वाले अत्याचारों का विरोध किया।

ठक्कर बाप्पा ने 1922 से आगामी दस वर्ष भीलों की सेवा करते हुए गुजारे। हरिजनों की सेवा और उनके उद्धार का कार्य तो उन्होंने बहुत पहले शुरू कर दिया था। भारत का शायद ही कोई प्रदेश होगा, जहां किसी न किसी सेवा-कार्य से ठक्कर बाप्पा न पहुंचे हों। जब महात्मा गांधी की प्रेरणा से “अस्पृश्यता निवारण संघ” बना, जो बाद में “हरिजन सेवक संघ” कहलाया, ठक्कर बाप्पा उसके मंत्री बनाए गए।

1933 में जब हरिजन कार्य के लिए महात्मा गांधी ने पूरे देश का भ्रमण किया तो ठक्कर बाप्पा उनके साथ थे। उन्होंने हरिजनों के मंदिर प्रवेश तथा जलाशयों के उपयोग के लिए गांधी के चलाए गए आंदोलनों को आगे बढ़ाया। 1946-1947 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान वे बापू की नोआखाली यात्रा में भी उनके साथ थे। देश की स्वाधीनता के बाद बाप्पा कुछ समय तक संसद के भी सदस्य रहे थे। 20 जनवरी, 1951 को उनका देहांत हुआ।

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