ताज़ा खबर
 

संस्कृति- प्रासंगिक अमृता

पाकिस्तान में पच्चीस जनवरी से अमृता प्रीतम की बहुचर्चित कृति ‘पिंजर’ पर एक धारावाहिक का प्रसारण होने जा रहा है।

Author January 21, 2018 5:59 AM
‘पिंजर’ पर आधारित यह धारावाहिक ‘घुग्घी’ नाम से आएगा।

पिछले कुछ दिनों से अमृता प्रीतम एक बार फिर चर्चा में हैं। भारत और पड़ोसी पाकिस्तान में भी। अमृता को अब भी पंजाबी भाषा के समीक्षक उतना महत्त्व नहीं देते, जितने की वे हकदार हैं। वे शायद भूल जाते हैं कि इस उपमहाद्वीप में अब भी उनकी कृतियां लाहौर से दिल्ली तक पढ़ी जाती हैं और जिक्र भी खूब होता है। इस बार भी नई दिल्ली के पुस्तक मेले में उनके चाहने वालों ने उनकी कृतियों के अंग्रेजी और हिंदी अनुवाद जम कर खरीदे। पाकिस्तान में पच्चीस जनवरी से अमृता प्रीतम की बहुचर्चित कृति ‘पिंजर’ पर एक धारावाहिक का प्रसारण होने जा रहा है। वहां के एक बहुचर्चित अभिनेता अदनान सिद्दीकी ने इसका निर्माण किया है। ‘पिंजर’ पर आधारित यह धारावाहिक ‘घुग्घी’ नाम से आएगा। इसे भारत में भी देखा जा सकेगा, इसकी भी व्यवस्था है। अदनान का दावा है कि ‘घुग्घी’ भारत-पाक सीमा के दोनों तरफ उड़ेगी और उन सीमाओं का अतिक्रमण करेगी, जो इंसानों ने इकहत्तर वर्ष पूर्व खींच डाली थीं।
‘पिंजर’ उपन्यास 1950 में लिखा गया था। यह अगस्त 1946 में घटी एक घटना पर आधारित है। इस कथानक में एक हिंदू लड़की की सगाई एक डॉक्टर से हो चुकी होती है। मगर विभाजन-पूर्व की हिंसा के बीच अमृतसर से एक मुसलमान उसका अपहरण कर लेता है। इस लड़की की जिंदगी में उस समय एक तूफान उमड़ता है जब विभाजन की लकीरें खिंच जाती हैं। उसे अब नए बने एक मुल्क में रहना होता है, क्योंकि उसके अपने उसे छोड़ चुके होते हैं। अदब बंटा, अदीब बंटे। ऐसे बंटी बंटी शख्सियतों में अमृता प्रीतम भी शामिल थीं। ‘अज आखां वारिसशाह नूं, कितों कब्रां विच्चो बोल’ नामक कविता आज भी उनकी विशिष्ट पहचान है और सीमा के आरपार दोनों देशों में लाखों लोगों को जुबानी याद है।

पाक-पंजाब के गुजरांवाला शहर में जन्मी अमृता कौर, ब्रजभाषा के विद्वान और अपने समय के चर्चित कवि कर्तारसिंह हितकारी की बेटी थी। हितकारी एक पत्रिका भी चलाते थे। सिख धर्म के प्रचारक थे और ब्रजभाषा के विद्वान माने जाते थे। अमृता की उम्र ग्यारह बरस थी, जब मां चल बसी थी। तभी दोनों बाप-बेटी लाहौर चले आए और इस शहर में 1947 तक उनका ठौर-ठिकाना बना रहा।अमृता का पहला काव्य संग्रह ‘अमृता लहरां’ सत्रह साल की उम्र में छप गया था। वैसे सोलह साल की उम्र में ही उनकी शादी लाहौर के अनारकली बाजार के एक मशहूर होजरी व्यापारी के बेटे और पेशे से पत्रकार प्रीतम सिंह से हो गई थी। तभी से नाम के साथ प्रीतम जुड़ गया। निजी जिंदगी के अनेक उतार-चढ़ावों के बावजूद वह नाम कटा नहीं। 1936 से 1943 की अवधि में उनके छह कविता संकलन आ गए। रूमानी संसार से अमृता का झुकाव प्रगतिशील लेखक आंदोलन की ओर हुआ। 1944 में ‘लोक-पीड़’ नाम से संकलन आया। उसमें बंगभंग की पीड़ा और द्वितीय विश्वयुद्ध से उपजे आर्थिक-सामाजिक संत्रास का बयान था। इसी बीच उसे लाहौर रेडियो स्टेशन पर उद्घोषक की नौकरी मिल गई। वे प्राय: अदबी कार्यक्रम प्रस्तुत करती थीं। आज भी लाहौर रेडियो स्टेशन के एक स्टूडियो में अन्य अदीबों के साथ अमृता का भी चित्र टंगा है।

विभाजन से पूर्व साहिर लुधियानवी से उनकी मुलाकात हो चुकी थी। मगर दोनों के निकट संबंधों की चर्चा 1960 के आसपास हुई थी। इसी साल अमृता अपने पति से अलग हो गई थीं। साहिर के साथ अपने संबंधों को उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में स्वीकार किया। इसी बीच उन दिनों की चर्चित सिने गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ साहिर के प्रेमप्रसंग की चर्चा होने लगी। मगर अमृता ने साहिर के साथ अपने संबंधों को कभी नहीं नकारा। उन्हीं दिनों उनकी जिंदगी में इमरोज का प्रवेश हुआ और लगभग चालीस वर्ष तक यह संबंध चलता रहा। अमृता की अंतिम सांस तक इमरोज ने इस अघोषित और अपरिभाषित संबंध को निभाया। एक अलग किस्म का रिश्ता रहा था दोनों के बीच। 1972-73 में मुझे आकाशवाणी उदयपुर से एक निमंत्रण मिला था। अमृता से एक लंबा साक्षात्कार करना था। उस दिन इमरोज भी साथ थे। लेकिन साक्षात्कार के समय वे कुछ समय के लिए घूमने निकल गए थे। अवसर मिलते ही मैंने सवाल कर डाला था, ‘आप इमरोज के साथ संंबंधों को क्या नाम देंगी?’ उनका उत्तर था- यह संबंध, सधे-सधाए चालू प्रकार के संबंधों के दायरे से बाहर है। इसे समझना बेहद आसान भी है और बहुत मुश्किल भी। कुछ संबंध ऐसे होते हैं, जिन्हें परिभाषित करना या शब्दों में बांधना मुश्किल होता है। इन संबंधों को जानने के लिए उन्हें महसूस करना होता है। मैंने कुछ और कुरेदना चाहा, तो उन्होंने मुस्कुरा कर टाल दिया और कहा, ‘और भी बहुत कुछ होगा पूछने के लिए। चलिए इस छोटे दायरे से बाहर निकल कर अदब की बातें करें।’

अमृता 1961 तक आकाशवाणी दिल्ली में सेवारत रहीं। बाद में तैंतीस बरस ‘नागमणि’ का संपादन-प्रकाशन किया। ‘साहित्य अकादेमी’ का पुरस्कार उन्हें 1956 में मिला था उनकी कृति ‘सुनेहे’ (संदेशे) पर। 1982 में ‘कागज और कैनवस’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1969 में पद्मश्री, 2004 में पद्मविभूषण, उसी साल साहित्य अकादेमी फैलोशिप आदि ढेरों सम्मान मिले। कुछ सम्मान तब मिले जब वे लगभग होश खो बैठी थीं। ‘पंजाब-रत्न’ का सर्वोच्च सम्मान तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हौजखास जाकर खुद भेंट किया था, लेकिन तब तक वे सुध-बुध खो चुकी थीं। हालांकि प्रीतम सिंह से औपचारिक संबंध विच्छेद हो चुके थे, मगर जब प्रीतम सिंह अंतिम दिनों में गंभीर रूप से बीमार हुए, तो अमृता और इमरोज दोनों ने उनकी खूब खिदमत की। अतीत के संबंधों के निर्वहन का यह अनूठा रूप था। फैज साहब के साथ गया था, तो फैज साहब ने पूछा था- ‘अमृता! लाहौर याद नहीं आता?’ जवाब था, ‘याद का सवाल तब हो, जब कुछ भूला हो।’ फैज साहब ने लाहौर आने का निमंत्रण दिया तो बोलीं, ‘डर लगता है। इसीलिए कभी गई ही नहीं। डर यह है कि कहीं पुरानी बातें फिर वहीं न रख लें। वैसे भी आखिरी दिनों की वहशत इतने सालों से जेहन पर हावी है कि उन गलियों, कूचों में जाने पर पुराने जख्मों के हरा होने का डर सताता है।’

अमृता 1986 से 1992 तक राज्यसभा की मनोनीत सांसद भी रहीं। उम्र के आखिरी दिनों में पाकिस्तान की पंजाबी अकादमी ने उन्हें अपना सर्वोच्च सम्मान दिया और उन्हें वहां के पंजाबी शायरों ने वारिसशाह की मजार से छुआ कर एक चादर और ढेरों उपहार उन्हें भेजे। तब अमृता की प्रतिक्रिया थी, ‘बड़े दिनों बाद मायके को मेरी याद आई।’ 2007 में ‘अमृता: गुलजार की आवाज में’, नामक आडियो एलबम भी आया। अब उनकी जिंदगी पर एक फिल्म बनाने की भी तैयारी है। जीवन के अंतिम मोड़ पर अमृता अध्यात्म और दर्शन की ओर मुड़ गई थीं। ओशो की अनेक पुस्तकों (विशेष रूप से एक ओंकार) की भूमिकाओं का लेखन और ‘कालचेतना’, ’अज्ञात का निमंत्रण’, ‘अक्षरों के साए’ आदि कृतियां इसी बदलाव का संकेत थीं।  विभिन्न विधाओं और संबंधों के विभिन्न आयामों को जीने का यह सिलसिला भारत और पाकिस्तान में समान रूप से चर्चा में रहा। पाकिस्तान से आने वाले हर लेखक, कलाकार के लिए अमृता से मुलाकात ‘जियारत’ की तरह होती थी। मगर अमृता के जाने के बाद का किस्सा बेहद पीड़ादायी रहा। उनका वह घर जो अदीबों और साहित्यकारों के एक वर्ग के लिए ‘जियारत’ का केंद्र था, एक प्रॉपर्टी डीलर ने खरीद लिया। इमरोज टूटे मन से वहां से एक फ्लैट में रहने चले गए। मकान के स्थान पर वहां एक व्यापारिक केंद्र बन गया। सिर्फ पैंतीस या अड़तीस लाख में बिकी उस ‘जियारतगाह’ से प्राप्त राशि बेटे के काम भी नहीं आई। उसका भी अंत बेहद पीड़ादायी परिस्थितियों में हुआ। अमृता की नज्में आज भी भारत और पाकिस्तान के हजारों बाशिंदों को जुबानी याद हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर में अब भी उनकी कृतियां पाठ्यक्रम का भाग हैं। मगर अमृता, विभाजन के बाद एक बार भी लाहौर जाने का साहस नहीं जुटा पार्इं। ल्ल

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App