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चाय-चाय…

‘यूं ही कुछ शगले सुख़न के वास्ते रिंदों के बीच, केतली में चाय लेके शैख़ मयखाने चले...। मैंने देखा नहीं कोई मौसम, चाहा है तुम्हें चाय की तरह...।’ ,‘शायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पर बुलाया है...।’ चाय सिर्फ चाय नहीं है। यह दो लोगों के बीच रिश्ते की बुनियाद है। भारत में चाय का सफर अंग्रेजों के आने के साथ शुरू हुआ। कभी अंग्रेजों का पेय रही चाय भारत के नक्शे के हर हिस्से पर अपना स्वाद रच चुकी है। चे ग्वेरा से लेकर दीनदयाल टी स्टॉल तक बताते हैं कि इसके बिना सियासत अधूरी। देश में चाय का कारोबार लगातार बढ़ रहा है और अब युवा भी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर स्टार्टअप के मद्देनजर आधुनिक तरीके से चाय का स्टॉल लगा रहे हैं। भारत के अलावा चीन व जापान से लेकर अमेरिका तक में चाय पर चर्चा हो रही है और बड़े-बड़े मसले हल हो रहे हैं। चाय के बड़े उत्पादकों में शामिल भारत में पानी के बाद सबसे ज्यादा अगर कोई पेय पिया जाता है तो वह चाय है। चाय के इसी लहराते परचम की चर्चा कर रहे हैं गजेंद्र सिंह।

युवाओं के लिए बना स्टार्टअप।

गजेंद्र सिंह

अपने-अपने स्वाद के हिसाब से चाय की एक अदद प्याली के बिना आधे भारत का पूरा दिन ही बेकार हो जाता है। नाश्ते से लेकर दोपहर की बैठकों और शाम की गप्पों वाली चाय का इंतजार रोजमर्रा की जिंदगी में हर किसी को होता है। बनारस की अड़ी हो या फिर किसी बड़े शहर के ऑलीशान होटल और रेस्त्रां। चाय हर जगह मिलेगी, बशर्ते दाम में जमीन-आसमान का फर्क जरूर आ सकता है। चाय की लोकप्रियता का ही असर है कि इसे राष्ट्रीय पेय बनाने की चर्चा भी आए दिन छिड़ ही जाती है। पानी के बाद दूसरे नंबर पर चाय ही है जो भारत में सबसे अधिक पी जाती है। भारत में हर व्यक्ति अपने-अपने स्वाद के मुताबिक 750 ग्राम चाय का सेवन प्रतिदिन करता है। यानी एक महीने में साढ़े 22 किलोग्राम चाय का सेवन अकेले एक व्यक्ति करता है।

जारी है सफर
दुनियाभर में चाय की शुरुआत को लेकर काफी विरोधाभास है। चाय की मौजूदगी को लेकर अलग-अलग तर्क दिए जाते हैं। कैमेलिया सेनेसिस पौधे की पत्तियों से बने इस पेय पदार्थ के बारे में कहा जाता है कि इसकी शुरुआत सबसे पहले चीन में हुई। इसके बाद यह दुनियाभर में प्रचारित हुई। 2737 ईसा पूर्व चीन के सम्राट शैन नुंग ने उबले पानी में गिरी कुछ सूखी पत्तियों के रस को पिया तो उसका स्वाद और रंग उन्हें पसंद आया। लखनऊ में इतिहासकार योगेश प्रवीण के मुताबिक, चीनी यात्रियों के सदियों पहले नालंदा विश्वविद्यालय में आने और चाय की पत्तियों को साथ लाने का उल्लेख मिलता है। 1610 में एक डच व्यापारी चाय को चीन से यूरोप ले गया। इससे चाय पूरी दुनिया में फैली। माना जाता है कि 750 ईसा पूर्व में चाय भारत आई। 16वीं शताब्दी में भारत में सब्जी से बने व्यंजनों में चाय की पत्तियां, लहसुन और तेल डालकर चाय बनाई जाती थी। इसके बाद ब्रिटिश लोगों ने इसका नवीन अविष्कार किया। भारत में चाय लाने का श्रेय अंग्रेजी हुकूमत को ही जाता है। वे इसे चीन से लाए थे। 1750 में वे कई पाउंड चाय प्रतिवर्ष चीन से खरीदा करते थे। 1815 में असम में अंग्रेज यात्रियों का ध्यान कुछ पत्तियों पर गया। 1820 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बड़े स्तर पर असम में चाय का उत्पादन शुरू किया। 1853 में भारत ने 183.4 टन चाय का निर्यात किया। 1870 में यह बढ़कर 6700 टन पहुंच गया और 1885 में चाय निर्यात 35274 टन तक गया। आज स्थिति यह है कि चीन से ज्यादा भारत में लोग चाय पीते हैं।

बहुरंगी हुई फिरंगी चाय
भारतीयों के लिए चाय कोई साधारण पेय पदार्थ नहीं है। सुबह से लेकर शाम तक और हर खासो-आम की दिनचर्या में इसका अहम योगदान है। ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद भारत में चाय का बाजार भी आया, लेकिन आजादी के बाद चाय के बड़े-बड़े बागानों को संभालने के लिए सरकार को आगे आना पड़ा। तब क्या पता था कि भारत चाय के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर आ जाएगा। भारत में चाय के बागानों को देखते हुए 1953 के अनुच्छेद-4 के प्रावधानों के अनुरूप भारतीय चाय बोर्ड की स्थापना की गई। यह बोर्ड चाय से जुड़े उद्योगों के विकास और वित्तीय मामलों को देखता है। वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आने वाले इस बोर्ड के पास भारतीय चाय बागानों की पूरी जानकारी होती है। 1947 में भारत में चाय का उत्पादन 250 फीसद बढ़ा और चाय बागान क्षेत्र 40 फीसद। उत्तर और दक्षिण भारत में कुल 577.48 हजार हेक्टेयर में फैले चाय बागानों में हर साल 1250.49 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन होता है। असम इस मामले में सबसे आगे है। वहां अकेले 282.05 हजार हेक्टेयर में 657.24 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन किया जाता है। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 142.09 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 357.39 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन होता है। उत्तर भारत के कई राज्यों में कुल 476.60 हजार हेक्टेयर में चाय क्षेत्र है और यहां प्रतिवर्ष 1043.11 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन हो रहा है। दक्षिण भारत में 100.82 हजार हेक्टेयर में 207.38 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन होता है। भारत में चाय का निर्यात करने वाली कंपनियों में 50 से अधिक बड़ी कंपनियां शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में चाय का कारोबार बढ़ रहा है और श्रमिक वर्ग खुश है। कई दिक्कतों की वजह से 2006 से 2016 तक केरल में तीन और पश्चिम बंगाल में 10 चाय के बागानों में काम बंद हो गया। इससे करीब 9969 कामगारों का काम छूटा। भारतीय चाय में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली दार्जिलिंग, असम, कांगड़ा, नीलगिरि, मुन्नार और त्रावणकोर की चाय है।

जो रिश्ते बनाए
भारत में चाय बनाने वाली कंपनियों ने लोगों की भावनाओं की ऐसी नब्ज टटोली है कि उसमें चाय का महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया। कंपनियों ने भी अपने ब्रांड के नाम के साथ ‘चाय जो रिश्ते बनाए’ का पंचलाइन लगाकर यह साबित करने की कोशिश की कि चाय भारत के हर घर में एक जरूरी स्थान रखती है। शायद इसीलिए भारतीय घरों में माना जाता है कि किसी मेहमान के आ जाने पर भले ही आप उसे स्वादिष्ट शरबत और जूस पिला दीजिए, लेकिन अगर चाय नहीं पिलाई तो मेहमानवाजी अधूरी है। भारतीय घरों में बनने वाली चाय में सबसे ज्यादा काली पत्ती की चाय पसंद की जाती है। यह अन्य चाय की अपेक्षा सस्ती होती है और इसका स्वाद भी बेहतरीन होता है। फिर इसी काली चाय में लोग दूध, अदरक, इलायची, काली मिर्च, दालचीनी, लौंग मिलाकर इसे मसाला चाय बना देते हैं। अगर दूध का इस्तेमाल नहीं करना होता है तो नींबू और शहद से हल्की चाय बनाते हैं। भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक चाय को अलग-अलग नाम से जाना जाता है और इसका स्वाद और बनाने का तरीका भी अलग है। कश्मीर की नून चाय जो राजस्थान और नेपाल में भी पी जाती है। इसे कश्मीरी चाय भी कहते हैं। मक्खन वाली चाय याक के दूध से बने मक्खन से बनाई जाती है। इस चाय को नेपाल और भूटान में पसंद करते हैं। तिब्बत में इस पो-चा कहते हैं। इसका स्वाद कुछ हद तक नमकीन होता है। इसके अलावा अब तो ग्रीन टी का चलन काफी बढ़ गया है। इसे सेहत के लिहाज से भी अच्छा माना जा रहा है। श्रीलंका और चीन में पसंद की जाने वाली सफेद चाय कच्ची पत्तियों से बनती है जो भारत में कम लोकप्रिय है। इसी तरह हर्बल चाय गुड़हल, लेमन ग्रास, बेल, धनिया के बीज, दालचीनी, लौंग, नींबू व अदरक से बनाई जाती है। पिछले कुछ समय में देश के अलग- अलग राज्यों में एक खास किस्म की तंदूरी चाय का परिचय लोगों से हुआ है। पुणे में इस चाय को लेकर ज्यादा चर्चा है और अब कई शहरों में यह पीने को मिल जाएगी। तंदूरी चाय बनाने के लिए मिट्टी के कुल्हड़ को तंदूर में खूब गर्म करते हैं और इसके बाद बनी हुई चाय को इसी गर्म कुल्हड़ में डालते हैं, जिससे कुल्हड़ का सौंधापन उस चाय में अंदर तक घुल जाता है। इसमें स्वाद के अनुसार इलायची और अदरक भी मिलाया जाता है। इसी तरह ईरानी चाय की भी अलग दीवानगी है। गर्मियों में चाय भारतीय घरों से दूर हुई तो कुछ कंपनियों ने ठंडी चाय बनाकर इसका भी तोड़ निकाल लिया। अब लोग गर्मी में चाय में बर्फ के टुकड़े डालकर आइस टी के रूप में पीते हैं।

हो रहे नए प्रयोग और शोध
चाय घर-घर में लोकप्रिय है और इसका स्वाद अब लोगों की जरूरत बन गया है। इसे देखते हुए अब वैज्ञानिक भी चाय पर शोध कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि सीमैप (सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिशनल एयरोमेटिक प्लांट) के वैज्ञानिक ऐसी चाय बना रहे हैं जो बुढ़ापे को कम करने में मदद करेगी। निमेटोड यानी सूतकृमि की मदद से बनने वाली यह चाय बढ़ती उम्र को रोकने में मददगार साबित होगी। इस पर अभी शोध चल रहा है और बताया जा रहा है कि जल्द ही इसका परिणाम भी सामने आएगा। लखनऊ के इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं कि भारत में चाय अंग्रेजों के समय में आई और हमने इसे स्वीकार किया। अगर चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित कर दिया जाए तो इसमें कोई बुुराई नहीं है। भट्ट कहते हैं कि वैसे तो अंग्रेजों के आने से पहले कहीं भी चाय का जिक्र नहीं मिलता है, लेकिन जब अंग्रेज आए और चाय का काम शुरू हुआ तो लोगों को चाय की लत लगाने के लिए बाजारों में मुफ्त मेंं चाय बांटी जाती थी। जब लोग चाय के आदी होने लगे तो उन्हें सिर्फ चाय की पत्तियां दी जाने लगीं और बनाने का तरीका भी बताया जाने लगा। भट्ट बताते हैं कि इसका भी कहीं जिक्र नहीं है और यह सिर्फ मौखिक इतिहास है जो उनकी मां उनको बताया करती थीं और उनकी किताब में इसका जिक्र है। इतिहासकार योगेश प्रवीण इसी को आगे बढ़ाते हंै कि बीसवीं शताब्दी में जब सरकारी स्तर पर गली-गली में चाय पिलाने का चलन शुरू किया गया तो बड़े लोग इसका विरोध करते थे। माना जाता था कि अंग्रेज भारतीय बच्चों और नई पीढ़ी को कमजोर करने की नीयत से यह मुहिम चला रहे हैं ताकि उनके खिलाफ कोई बगावत न कर सके। चाय की लोकप्रियता राजनीतिक क्षेत्र में भी इससे पहले यूं सार्वजनिक कभी नहीं हुई थी। नेताओं की चाय पार्टी के बाद अब समय चाय पर चर्चा का है। देश-विदेश में भी अब चाय पर चर्चा हो रही है। भारत में तो चाय को अलग-अलग नामों से जानते हैं। जैसे असमिया में साह, बांग्ला में चा, मैथिली में चाह और मराठी में चहा कहा जाता है। नेपाल में चाय को चिया कहते हैं।

साहित्य से सिनेमा
चाय का इतिहास देश में कम लिखा गया, लेकिन फिल्मी गानों में और साहित्कारों की कविताओं में चाय का अंश या फिर पूरी की पूरी इबारत ही चाय की वकालत करती नजर आई। बॉलीवुड की बात करें तो जब 1983 में राजेश खन्ना ने टीना मुनीम के साथ गाना गाकर यह बताया था कि मम्मी ने शादी की बात करने के लिए चाय पर बुलाया है तो घरों में रिश्ते के लिए चाय को ही आधार बना लिया गया। ऐसा माना जाने लगा कि अगर किसी घर में लड़के को लड़की के मां-बाप ने चाय पर बुलाया है तो चाय के बहाने कई बातें हो जाएंगी। अनु मलिक का गीत ‘एक गरम चाय की प्याली हो’ भी खूब प्रचलित हुआ था। पिछले दिनों आई आमिर खान और अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’ वैसे तो फ्लॉप रही। लेकिन इसके एक दृश्य ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। साल 1795 के सेट पर बनी इस फिल्म के निर्देशक को चाय से इतना लगाव है कि उन्होंने फिल्म के शुरुआती दृश्यों में बेग और क्लाइव को चाय पीते हुए दिखाया। जबकि चाय की खेती 1800 के बाद शुरू हुई है। ‘कुंदन’ फिल्म में भी एक गीत ‘आओ हमारे होटल में चाय पियो जी गरम-गरम बिस्कुट खा लो नरम-नरम’ खूब पसंद किया गया।’ साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत और समोसे व तितली जैसे विषयों पर कविता लिखने वाले साहित्यकार वीरेन डंगवाल ने चाय पर तो कोई कविता नहीं लिखी, लेकिन समोसे पर लिखी गई उनकी कविता चाय के बिना पूरी नहीं हुई। विष्णु नागर ने मालिक आपकी चाय तैयार है से पति को सोचने पर मजबूर कर दिया। केदारनाथ अग्रवाल ने खाली जेब और चाय का प्याला लिखी। अज्ञेय ने चीनी चाय पीते हुए पिता और पुत्र के संबंधों को बताया। वह कविता में अपने पिता के बारे में सोचते हैं। लखनऊ के इतिहासकार डॉ योगेश प्रवीण बताते हैं कि लखनऊ में तो चाय का एक शेर बहुत ही मशहूर है। ‘यूं ही कुछ शगले सुख़न के वास्ते रिंदों के बीच, केतली में चाय लेके शैख़ मयखाने चले’।

युवाओं के लिए बना स्टार्टअप
चाय के नाम पर जब राजनीति में चर्चा होने लगी तो लोगों ने भी इसे हाथों-हाथ लिया। पढ़ाई में कमजोर रहने वाले बच्चों को अक्सर उनके माता-पिता फटकार लगाते दिखते थे कि पढ़ोगे नहीं तो कहीं चाय का ठेला लगाओगे। युवाओं ने इसे बड़ी गंभीरता से लिया और आज चाय स्टार्टअप के रूप में बड़ा कारोबार बन चुका है। आइआइटी से पढ़े और बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरी छोड़कर युवाओं ने चाय के कारोबार को चुना। पुणे में चाय का काम करने वाला एक युवा तो 12 लाख रुपए सालाना कमा रहा है। इसी तरह कई चाय स्टार्टअप को भारत और विदेशी कंपनियां भी आर्थिक रूप से सहयोग दे रही हैं। टी बॉक्स, चायोस, चाय ठेला, टी पॉट, चाय गरम जैसे नामों से युवा चाय का कारोबार चला रहे हैं। इनके यहां सिर्फ चाय ही नहीं मिल रही है बल्कि चाय पर आविष्कार करके नए-नए स्वाद भी खोजे जा रहे हैं। चाय की दीवानगी का ही असर है कि चाय सिर्फ पिलाई ही नहीं जा रही है बल्कि उसको गरमा-गरम घर और कार्यालय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी निभाई जा
रही है।

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