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अंधविश्वास का परदा

आज जहां टीवी धारावाहिक ‘डर सबको लगता है’ के नारे के साथ भूत-प्रेत, नाग-नागिन के साथ दर्शकों को मनोरंजन की खुराक पेश कर रहे हैं, वहीं ‘गंगा’ जैसे धारावाहिक पहले तो दावा करते हैं कि वे बाल विवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ धारावाहिक ला रहे है..

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 12:16 AM
टीवी धारावाहिक ‘डर सबको लगता है’ की प्रस्तुति में बिपाशा बसु

मार्च, 2013 की घटना है। राजस्थान के गंगापुर सिटी में एक परिवार अपने घर में टीवी पर अगर कुछ देखता था तो सिर्फ एक देवता शिव पर केंद्रित धारावाहिक- ‘देवों के देव महादेव!’ एक दिन परिवार ने इसी धारावाहिक को देखा और फिर शिव के आने का इंतजार करते हुए आराधना में लग गया। शाम तक कोई नहीं आया, तो समूचे परिवार ने खुद शिव से मिलने की ठानी और स्वर्ग जाने की बातचीत करते हुए बहुत सहज भाव से सबने जहर खा लिया। आठ में से तीन तो किसी तरह पड़ोसियों के आ जाने से बचाए जा सके, लेकिन पांच की मौत हो गई। यह घटना अपने आप में बताने के लिए काफी है कि समाज में पहले से पसरे अंधविश्वासों के बीच कोई टीवी धारावाहिक किस कदर लोगों के सोचने-समझने की क्षमता को खत्म कर दे सकता है।

दिल्ली में छब्बीस साल की युवती आस्था के पति की एक हादसे में मौत हो चुकी है। हाल ही में उसकी छह साल की भतीजी निन्नी ने कहा- ‘बुआ, आप सफेद साड़ी क्यों नहीं पहनती हैं और जलेबी क्यों खाती हैं! आप तो विधवा हैं!’ यह बात सुन कर आस्था अवाक रह गई। निन्नी की मां भी उसे हैरत भरी नजरों से देख रही थी। लेकिन निन्नी को लगा कि इन बड़े हो चुके ‘बेवकूफों’ ने उसकी बात नहीं समझी! निन्नी ने अपनी मां और बुआ को ‘कलर्स’ टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘गंगा’ की मिसाल देते हुए समझाया कि गंगा मेरी जितनी छोटी बच्ची है और उसका पति मर गया है, इसलिए वह सफेद साड़ी पहनती है और जलेबी नहीं खाती है। आस्था के मायके वाले उसे एक सामान्य जिंदगी की ओर मोड़ने की कोशिश में जुटे हैं। तभी उसके सामने निन्नी का खौफनाक सवाल खड़ा हो उठता है।

निन्नी एक आधुनिक समाज में तमाम आधुनिक तकनीकों से लैस, संसाधनों से संपन्न घर की बच्ची है। अपने घर में वह चालीस इंच के एलइडी टीवी पर ‘गंगा’ नाम का टीवी धारावाहिक देखती है। इसमें छोटी बच्ची गंगा अपने वैधव्य के नियमों का जिस तरह से पालन करती दिखाई जाती है, उसे देख रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गंगा बच्ची है, लेकिन वह अकेले में भी जलेबी नहीं खाती, क्योंकि उसे दादी के सामने ‘मिसाल’ बनना है। वह जिस आधुनिक वकील के घर में रहती है, वह गंगा के बाल-वैधव्य की मजबूती को देख कर बाग-बाग हो जाता है। हां, गंगा को पढ़ाई करते और खेलते हुए भी दिखाया जाता है, लेकिन उसके वैधव्य के ‘संन्यास का ग्लैमर’ बड़े-बड़ों से लेकर छह साल की निन्नी को भी अपील करता है।

खैर, टीवी वाली गंगा तो अब बड़ी हो चुकी है, लेकिन धारावाहिक में उसके बाल-वैधव्य का संन्यास की छवि समाज में अपनी जमीन पर जी रही निन्नी के बाल-मन पर गहरा असर डाल चुकी है। इस मानस के साथ बड़ी होने पर डॉक्टर उसे व्रत-उपवास करने से मना करे तो अब शायद वह डॉक्टर को धर्म और संस्कृति की विरोधी माने और थोड़े दिनों तक बाजार से भुलाई जा चुकी और टीवी पर पुरजोर वापसी कर चुकीं ‘संतोषी माता का व्रत’ करने को ही अपने जीवन का ध्येय माने।

आज जहां टीवी धारावाहिक ‘डर सबको लगता है’ के नारे के साथ भूत-प्रेत, नाग-नागिन के साथ दर्शकों को मनोरंजन की खुराक पेश कर रहे हैं, वहीं ‘गंगा’ जैसे धारावाहिक पहले तो दावा करते हैं कि वे बाल विवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ धारावाहिक ला रहे हैं, लेकिन वे कथा-वस्तु ऐसी परोसते हैं कि वैधव्य के नियमों का कड़ाई से पालन करने वाली लड़की ही उनकी हीरोइन बन बैठती है। कहानी के संवादों में इस कुप्रथा की मुखालफत गुम है और जो है, वह यह कि घर के बड़े-बुजुर्गों को खुश करने के लिए विधवा को पहले से बने-बनाए नियमों का पालन करने के लिए किसी भी हद तक जाना होगा। हर एपिसोड के अंत में उसका हर कठोर नियम को पूरा करके पार कर जाना ही उसका ‘हीरोइक एक्ट’ बन जाता है। नई बन रही पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी की रिवायतों की झंडाबरदार बन बैठती है।

धारावाहिकों के किरदार परदे पर रोंगटे खड़े करने वाला कारनामा करते हैं। लेकिन इतनी हीरोगीरी के बाद भी अपनी पसंद की लड़की से शादी करने से इसलिए इनकार कर देते हैं कि मरने से पहले मां-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची ने मना कर दिया था। जिंदा लोगों की जिंदगी को तड़पा कर कब के मर चुके लोगों से वादा निभाना ही आज की हीरोगीरी हो गई है। आज के किरदार बगावत करके अपनी नई जिंदगी चुनने के बजाय चोरी से संबंध बनाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी’ के बजाय ये नए विज्ञान को खारिज कर पुराने अंधविश्वासों को संस्कृति पर किए जाने वाले गर्व का हिस्सा बना कर पेश कर रहे हैं। और इन्हीं विखंडित किरदारों पर तड़का लग रहा है तंत्र-मंत्र, काला जादू और नागिन का।

धारावाहिक ‘चक्रवर्तिन सम्राट अशोक’ की कहानी में बिंदुसार की बड़ी रानी चारुमित्रा के ‘काला जादू’ को सफल होते दिखाया जा रहा है तो ‘कलर्स’ पर इच्छाधारी नागिन ग्लैमरस अवतार में बदला लेने उतरी है। ग्लैमर से भरपूर एक महिला पात्र के रूप में ‘नागिन’, तंत्र-मंत्र और काली पूजा का यह पैकेज खूब टीआरपी बटोर रहा है। इसी तरह ‘स्टार प्लस’ पर ‘मोहब्बतें’ में शगुन का भूत इशिता का चैन उड़ा चुका है, तो ‘संतोषी मां’ की भक्त के साथ जो कारनामे हो रहे हैं और ‘स्वर्ग की देवियां’ जिस तरह धरती पर तू-तू मैं-मैं करती हैं, वह भी खूब दर्शक बटोर रहा है।

’कलर्स’ पर ‘डर सबको लगता है’ तो भूत-प्रेत और अंधविश्वास की सारी हदें पार कर चुका है। ‘ऐंड’ टीवी पर ‘हमारी अधूरी कहानी’ भी भुतहा फार्मूले पर है। इसी चैनल पर ‘भाभीजी घर पर हैं’ भी वयस्क चुटकुलों के साथ ‘चुड़ैल’ के ट्रेंड को भुनाने में पीछे नहीं रहा और दो एपिसोड ग्लैमरस चुड़ैल को समर्पित कर दिए। हालांकि इसमें कुछ दर्शकों को थोड़ी उम्मीद रही होगी कि एपिसोड के अंत में ये कलाकार हंसते हुए कहेंगे कि चुड़ैल, भूत सब कुछ नहीं होते… वो तो ये था…! लेकिन नहीं! इसमें बाकायदा ‘चुड़ैल’ को सर्वमान्य ग्लैमरस खलनायिका स्थापित किया गया। ‘कलर्स’ पर ही एक और धारावाहिक ‘ससुराल सिमर का’ में तो इतनी ‘डायनों’ की एंट्री हुई है कि दर्शक गिनती भी भूल गए हैं।

जिस दौर में सड़कों पर महिला अधिकारों के लिए आवाज अपनी जमीन बनाने की कोशिश में है, उसी में घरों में लगे टीवी के परदे पर किसी धारावाहिक में किसी महिला को अजीब तरह से आंखों में काजल लगाए, होठों में लिपस्टिक पोते, विचित्र तरीके की बालों की सज्जा, अस्वाभाविक हावभाव के साथ बनावटी जुबान में बोलती और कुल मिला कर एक खौफ पैदा करती काया के साथ दिखाया जाता है, तो यह केवल कारोबार नहीं होता। यह स्त्री अधिकारों की तमाम लड़ाइयों को मुंह चिढ़ाते हुए महिलाओं की गुलामी की यथास्थिति की जमीन को बनाए रखने की कोशिश होती है।

कैसा लगता है जब इक्कीससवीं सदी के दूसरे दशक में देश और दुनिया के वैज्ञानिक ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को खोजने में रोज नई ऊंचाइयां छू रहे हैं, टीवी परदों के जरिए हर रोज दर्जनों तरह के अंधविश्वास घरों में नजरें गड़ा कर इस तरह के धारावाहिक देखने वालों के दिमाग में गहरे उतर रहे हैं?

दरअसल, इस तरह के धारावाहिकों का हासिल हमें सैकड़ों साल पीछे की ओर लौटा रहा है। इसके बरक्स जरा याद करें ‘बीस साल बाद’ जैसी भुतहा फिल्में या नब्बे के दशक में सीमित दूरदर्शन पर चले धारावाहिक। ऐसे तमाम धारावाहिक हैं, जिनके अंत में यही दिखाया जाता था कि भूत-प्रेत जैसा कुछ नहीं होता और कुछ ‘होशियार’ ठग वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर भूत या चुड़ैल के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाते हैं।

लेकिन आज उसके करीब दो-ढाई दशक बाद ‘फूंक’ या ‘डरना मना है’ जैसे फिल्मों का अंत एक वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति को यह मानने पर मजबूर कर देता है कि भूत-प्रेत होते हैं और जो उसमें यकीन नहीं करेंगे, वे मारे जाएंगे। और यही डरावना, लेकिन किसी भी सभ्य समाज के लिए लिए त्रासद अंत एक खौफनाक सोच की शुरूआत है। इसी सोच के तहत ‘बिग बॉस’ जैसे कथित रियलिटी शो में भी मानव कंकाल रख कर भूत-भूत का खेल खेला गया।

टेलीविजन विज्ञान की देन है। विज्ञान की बुनियाद वैज्ञानिक सोच है। इसलिए विज्ञान के साधनों से यह स्वाभाविक उम्मीद होगी कि वह अंधविश्वासों पर से परदा उतारे, इसका खात्मा करे। लेकिन इससे बड़ी विडंबना यह है कि विज्ञान के साधनों का ही इस्तेमाल अंधविश्वासों और फर्जी पारलौकिक अवधारणों को और ज्यादा फैलाने में किया जा रहा है। आज हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि टेलीविजन ने देश-दुनिया की दूरी कम की है, लोगों को कई स्तरों पर जागरूक बनाया है।

लेकिन टेलीवीजन का कारोबार बढ़ने के साथ अब इसमें शुद्ध मुनाफा का तत्त्व भी शामिल हो चुका है। ‘बुद्धू बक्से’ पर हम आज भी देश-दुनिया को देख रहे हैं, लेकिन उसी तरह से, जितना मुनाफे का कारोबार हमें ‘बुद्धू’ बनाते हुए दिखाना चाहता है। मनोरंजन के बहाने दर्शकों के सामने कुछ नया पेश करने के बहाने धारावाहिकों में अब वे चीजें दिखाई जा रही हैं, जिनसे आजादी पाने के लिए समाज में कितनी लड़ाइयां लड़ी गई हैं। अंधविश्वासों के खिलाफ मुहिम चलाने वाले नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे जैसे लोगों को अपनी जान देनी पड़ी है।

सवाल है कि क्या धारावाहिक बनाने वाले इस बात से बेखबर हैं कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, पुनर्जन्म, नाग-नागिन की दुश्मनी से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है? लेकिन तब क्या किया जाए जब जड़ता का यही नया टेस्ट बड़े मुनाफे का मसाला बन जाए। रोजाना खासतौर पर सुबह, लेकिन दिन में कई बार जब टीवी पर बैठा कोई ज्योतिषी भविष्य बांचता है, हस्तरेखाओं और राशि के हिसाब से काल्पनिक फायदे परोसता है, तो वे कार्यक्रम केवल टीवी का मनोरंजन नहीं होते। वे एक साथ लाखों लोगों की आस्था का शोषण करके अंधविश्वासों के अंधकार में बनाए रखने की करतूतें होती हैं।

इन दिनों अंधविश्वासों और पारलौकिक धारणाओं को केंद्र में रख कर बनाए गए ज्यादातर टीवी धारावाहिकों में विज्ञान और प्रगतिशील सोच को हारते और काला जादू या तांत्रिकों को जीतते दिखाया जाता है। हमारा समाज जो एलईडी टीवी और डिश एंटीना तक पहुंचने से पहले हजारों सालों तक काला जादू और भूत-प्रेतों के चंगुल में रहा है, उससे निकलने की कोशिश में समाज और राज को न जाने कितना जद्दोजहद करना पड़ा है, आज फिर विज्ञान के ही आधुनिकतम संसाधनों का सहारा लेकर उसे फिर उसी अंधेरे में वापस झोंकने की कवायद खुलेआम चल रही है।

मकसद सिर्फ यह है कि किसी तरह समाज को सोचने-समझने और सवाल उठाने की प्रक्रिया में जाने से रोका जाए। सवाल है कि समाज को इस तरह रोकने से किसका फायदा है? कौन हैं वे जो विज्ञान और तकनीकी के सहारे चमत्कारों और तकदीर बताने की दुकान चला रहे हैं? समाज के समूचे सोचने-समझने की ताकत को अंधविश्वासों के जाल में उलझा कर रखने के खेल से क्या टीवी चैनलों को आर्थिक फायदा होता है? इससे समाज की बौद्धिकता और वैज्ञानिक सोच को कितना नुकसान पहुंचता है, समाज कितना पीछे जाता है, इसका हिसाब किसी भी होशमंद व्यक्ति को दहला देने के लिए काफी होगा। इसके बावजूद लोगों को काले जादू के जाल में बांधने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है।

सही है कि देश-दुनिया के बहुत सारे सवालों का सामना कराने में टीवी चैनलों की अहम भूमिका रही है। लेकिन जब तक इन सवालों के साथ लोगों के बीच किसी घटना के विश्लेषण की ताकत का विकास नहीं होता, तब तक इसका क्या हासिल!

क्यों लोग इसी टीवी के परदे पर अंधविश्वास भरे कार्यक्रम देखते हैं और अपने चेतना में भीतर कहीं बैठी ऐसी ही धारणाओं को तुष्ट होता हुआ पाते हैं? आखिर किन वजहों से यह सब टीवी पर देखते हुए लोग ऐसे कार्यक्रमों के अच्छे-बुरे, झूठ और सच के विश्लेषण की प्रक्रिया में जाते हैं? आखिर किसने उनकी यह ताकत छीन ली। तो क्या यह मीडिया की सीमा है कि वह कुछ ‘नया’ देने के नाम पर हमें और पीछे धकेल रहा है? क्या टीवी चैनल पर इस तरह के कार्यक्रम या धारावाहिक परोसने वाले इस बात से अनजान हैं कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, प्रलय-चमत्कार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है?

अफसोसनाक यह है कि अंधविश्वास फैलाने का एजेंडा केवल ‘साधना’ या ‘संस्कार’ जैसे चैनलों तक नहीं सिमटा है। कुछ घंटों तक प्रगतिशील मुद्दों पर बहस चलाने वाले चैनल भी दर्शकों को तंत्र-मंत्र की शरण में लाकर उनके दिमाग के दरवाजे बंद करने की होड़ में जुटे हैं और टीवी पर एक ऐसा ‘अंधा युग’ ला रहे हैं, जहां तर्क और विज्ञान के वे सारे दरवाजे बंद हैं, जिनसे होकर कोई समाज प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ता है।

लीक बनाने वाली ‘नागिन’: भारतीय टेलीविजन के कारोबार में एकता कपूर ट्रेंड सेटर रही हैं। सास-बहू की कहानी को घर-घर तक पहुंचाने वाली एकता के नक्शे-कदम पर पूरा उद्योग चलता है। सास-बहू से दर्शकों के बोर होने के बाद एकता कपूर ने खौफ और अंधविश्वास के बाजार की नब्ज पकड़ी। पहले अपने सारे धारावाहिकों के नाम अंगरेजी के ‘के’ अक्षर से रखने वाली एकता कपूर ने सार्वजनिक मंचों पर बेहिचक कहा कि मैं अंधविश्वासी हूं। एकता कहती हैं कि आपके लिए जो अंधविश्वास है, वह मेरे लिए नहीं है। बकौल एकता, अगर मैं किसी बात में विश्वास करती हूं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई और क्या सोच रहा है। अब वे अगर इंडस्ट्री की ट्रेंड सेटर ‘नागिन’ लेकर आई हैं तो दर्शकों को और भी नागिनों और नागराज के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि एकता मुनाफे का जो नया ट्रेंड शुरू करती हैं, छोटे खिलाड़ी बाद में उसी के पीछे दौड़ते हैं। फिलहाल एकता ‘नागिन’ का मुनाफा बटोर रही हैं, देश और समाज भले अकल्पनीय नुकसान के अंधेरे में चला जाए।

बेमानी होती हदबंदी: ब्रॉडकास्टिंग कंटेट्स काउंसिल (बीसीसी) ने हाल ही में टीवी चैनलों को निर्देश दिए हैं कि वे भूत-प्रेत और अंधविश्वास पर लगाम लगाएं। काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस मुकुल मुद्गल की ओर से जारी बयान में कहा गया कि शिकायतें मिली हैं कि इन धारावाहिकों में जादू-टोना और औरतों की नकारात्मक छवि दिखाने की हद पार हो चुकी है। इसलिए धारावाहिकों की कलात्मक आजादी को ध्यान में रखते हुए काउंसिल का निर्देश है कि ऐसे सीन बढ़ा-चढ़ा कर नहीं दिखाए जाने चाहिए। और अगर कहानी की मांग के हिसाब से दृश्य दिखाना जरूरी है तो टीवी चैनल को खास दृश्य के समय पट्टी चलानी होगी कि दिखाया जा रहा दृश्य काल्पनिक है। (यों धारावाहिकों के दृश्य काल्पनिक ही होते हैं)। इसके साथ ही इस तरह के शो देर रात (रिस्ट्रक्टिेड व्यूइंग आवर्स) में दिखाए जाएं। लेकिन टीवी का परदा कोई छिपा हुआ खेल नहीं है। सारे निर्देश ताक पर हैं और सब कुछ चल रहा है धड़ल्ले से!

‘जिंदगी’ की ताजगी: सास-बहू और भूत-प्रेत के बीच जीटीवी के ‘जिंदगी’ चैनल पर दिखाए गए पाकिस्तानी धारावाहिकों को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। जिंदगी के धारावाहिक एक आम हिंदुस्तानी के दिमाग में बसे स्टीरियोटाइप पाकिस्तान का भी खात्मा करता है। शिक्षा, प्रेम, निकाह, तलाक, नौकरी, बाल-बच्चों की परेशानियों के इर्द-गिर्द घूमते पाकिस्तानी किरदार और हमारे घर जैसा अहसास दिलाते सेट दर्शकों का दिल जीत चुके हैं। खासकर इसमें बोली जाने वाली उर्दू इतनी आमफहम है कि दर्शकों को इसकी मीठी जुबान से प्यार हो गया। ‘काला जादू’ और नाग-नागिन के अवतार परोसते हमारे टीवी चैनल के नियंता क्या यह यह सब देखते होंगे…?

उम्मीद का कोना: सोनी पर दिखाया जाने वाला ‘क्राइम पेट्रोल’ सच्ची अपराध कथाओं को तो दिखाता ही है, लेकिन इसका सबसे बेहतरीन अंश होता है अनूप सोनी का नेरेशन। अनूप सोनी हर अपराध कथा के साथ जिस तरह सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास पर हल्ला बोलते हैं, वह दर्शकों को अपील करता है। अंधविश्वास का कारोबार करते दूसरे धारावाहिकों के बीच यह धारावाहिक वैज्ञानिक सोच-समझ वालों को थोड़ी उम्मीद और राहत की कुछ खुराकें जरूर देता है।

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