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कहानीः कशमकश

कुंती और उमा बाई उठने लगीं तो भूदेव बोले, ‘आप हायर सेकेंड्री पास हैं न?’ कुंती ने कहा, ‘जी हां।’ भूदेव बोले, ‘विधानसभा चुनाव आने वाले हैं, मेरे पास एक समन्वयक का पद खाली है। आपकी परिस्थिति को देखते हुए मैं समन्वयक का वह अंतिम पद आपको दे सकता हूं।’ कुंती ने संदेह करते हुए पूछा, ‘तो क्या वह पद चुनाव बाद समाप्त हो जाएगा?’

Author July 14, 2019 12:58 AM
उस दिन, सरंडी गांव की साप्ताहिक हाट थी। मुनादी पिटने लगी कि दोपहर ठीक चार बजे पलाश समूह की नक्सल अदालत लगेगी, जिसमें नक्सलियों की मुखबिरी करने वालों को सबके सामने कठोर सजा दी जाएगी।

जहीर कुरेशी

सारंडी निवासी उमा बाई धु्रवे के इकलौते बेटे मुरमू की नक्सलियों ने इसलिए हत्या कर दी थी, क्योंकि उन्हें उस पर मुखबिरी का शक था। जब नक्सली कमांडर पलाश सोनसाय को पक्का विश्वास हो गया कि मुरमू की मुखबिरी के कारण ही गट्टाकाल कांड हुआ है, तो पलाश के नक्सली गिरोह ने तय किया कि मुरमू को उसके कर्मों की सजा सरंडी हाट में अदालत लगा कर दी जाए। उस समय तक मुरमू की पत्नी कुंती और मां उमा बाई को पता भी नहीं था कि मुरमू पुलिस के लिए मुखबिरी करता है। वे दोनों केवल इतना जानती थीं कि मुरमू किसी निजी कंपनी में गाइड है और जंगल के चप्पे-चप्पे तक लोगों को ले जाता है। उसके एवज हर महीने कंपनी उसे पांच-पांच सौ के चालीस नोट देती है। पैसों वाली बात भी केवल कुंती जानती थी। उमा बाई जब भी बीमार पति की दवाइयों के लिए बेटे से पैसे मांगती थी, थोड़ी हील-हुज्जत के बाद उसे मिल जाते थे।

उस दिन, सरंडी गांव की साप्ताहिक हाट थी। मुनादी पिटने लगी कि दोपहर ठीक चार बजे पलाश समूह की नक्सल अदालत लगेगी, जिसमें नक्सलियों की मुखबिरी करने वालों को सबके सामने कठोर सजा दी जाएगी। मुनादी पिटने तक भी कुंती और उमा बाई को कल्पना नहीं थी कि आज उनके परिवार पर बिजली गिरने वाली है।

लगभग पांच बजे हलालु दौड़ता हुआ आया और उसने भौजी कुंती को नक्सली समूह द्वारा मुरमू को फांसी पर टांग कर पुलिस मुखबिरी की सजा देने की बुरी खबर सुनाई। कुंती और उमा बाई को हलालु की बात पर विश्वास नहीं हुआ। दोनों दौड़ती हुईं हाट में खड़े नीम के उस वृक्ष तक पहुंचीं- सबके सामने जिस पर टांग कर नक्सलियों ने आधा घंटे पहले मुरमू को फांसी की सजा दी थी। सजा देने के बाद नक्सली अथाह जंगल में गायब हो गए। हाट में ही रोती-बिलखती उमा बाई और अन्य दो बुजुर्ग औरतों ने कुंती की चूडियां तोड़ कर परोक्ष रूप से उसे विधवा घोषित कर दिया। कुंती समझ नहीं पा रही थी कि नक्सलियों द्वारा मनमाना फैसला लेकर एक क्षण में कैसे उसका संसार नष्ट कर दिया गया। यह कैसी अदालत थी, जिसमें न कोई बहस, न वकील! केवल संदेह के आधार पर मुरमू जैसे गबरू जवान की सार्वजनिक हत्या कर दी गई थी।

नक्सलियों द्वारा दंड दिए जाने के कारण, हलालु और उसके दो-तीन दोस्तों के अलावा सरंडी गांव में किसी ने ध्रुवे परिवार का साथ नहीं दिया। बीमार पिता स्वयं उमा बाई के भरोसे था। पूरा परिवार ही मुरमू की कमाई पर पल रहा था। नक्सल समूह के भय के बीच कुंती और उमा बाई को समझ नहीं आ रहा था कि अब आगे का जीवन कैसे चलेगा? छत्तीसगढ़ के समाचार पत्रों में खबर छपने के बाद, सबसे पहले मुख्य विपक्षी दल के तीन-चार नेता सरंडी आए, जो धु्रवे परिवार को शब्दों द्वारा सहानुभूति और आश्वासन के अलावा नकद पांच हजार रुपए भी देकर गए। उसके एक दिन बाद पुलिस के आला अफसरों के साथ सत्ता पक्ष के एक मंत्री मरकाम और उनके समर्थकों ने कुंती और उमा बाई से आकर भेंट की। सहायता के रूप में, मंत्री ने कुंती को एक लाख रुपए का चैक सौंपा। उमा बाई के यह कहने पर कि नक्सलियों द्वारा हमारी जान को खतरा है, मंत्री ने तुरंत आदेश दिया कि धु्रवे परिवार को कोयलीबेड़ा गांव में बसाया जाए। कुंती के यह बताने पर कि वह बारहवीं बोर्ड की परीक्षा पास है, मंत्री ने मौखिक रूप से अधीनस्थों को उसकी अनुकंपा नियुक्ति के आदेश भी दिए।
आनन-फानन ध्रुवे परिवार सरंडी छोड़ कर कोयलीबेड़ा गांव जा बसा। जहां उसे शासन ने सरकारी जमीन पर झोंपड़ी बनाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की। कोयलीबेड़ा की उसी सरकारी जमीन पर धु्रवे परिवार की तरह आठ-दस झोंपडियां और बनी थीं- जिनके परिवार के किसी न किसी सदस्य की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उन दस झोंपड़ियों की सुरक्षा के लिए यों तो तीन आरक्षकों को तैनात किया गया था, लेकिन, बारी-बारी से आता कोई एक आरक्षक ही था, जो प्राय: थोड़े-बहुत प्रश्न, थोड़ी-बहुत जानकारियां जुटा कर एक-दो दिन के लिए गायब हो जाता था। आजीविका चलाने के लिए कुंती ही थोड़े हाथ-पैर मारती थी। लेकिन, रस के लोभी भंवरे आजीविका के नाम पर उसका दूसरी तरह से उपयोग करना चाहते थे। यह बात उमा बाई भी जानती थी। अपनी कड़क छवि के कारण, अभी तक कुंती अपनी इज्जत बचाए हुई थी। लेकिन, उसे दैनिक मजदूरी का काम कभी-कभार ही मिल पाता था।

उधर रायपुर जाकर, कुंती ने अपनी हायर सेकंडरी की अंक सूची लगाते हुए पुलिस विभाग में आरक्षक के पद की अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर दिया। वहां भी उसे जल्द ही नियुक्ति का आश्वासन मिला। लेकिन, जमीन पर कुछ भी नहीं उतरा। दिन गुजरते रहे और इस प्रकार दो वर्ष बीत गए।
कोयलीबेड़ा में एक दिन अपनी सहेली की झोंपड़ी में कुंती ने दैनिक अखबार में छत्तीसगढ़ के ग्यारह नक्सलियों के समर्पण की खबर पढ़ी। खबर के ग्यारह नक्सलियों में एक नाम कमांडर पलाश सोनसाय का भी था, जिसने ढाई वर्ष पहले उसका सुहाग उससे छीन लिया था। उस रात झोंपड़ी में कुंती सास के सामने मुरमू को याद करके खूब रोई। पहली बार बहू के खुल कर रोने पर बीमार ससुर और उमा बाई की भी आंखें भीग गईं।

इधर अनुकंपा नियुक्ति की प्रतीक्षा में कुंती धु्रवे के सब्र का बांध टूट रहा था। लगभग एक महीने बाद, उसने सहेली के घर आए दैनिक अखबार में ही पढ़ा- छत्तीसगढ़ शासन ने समर्पण करने वाले चार नक्सलियों को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरियां दीं। पलाश सोनसाय को सब इंस्पेक्टर पुलिस, कांकेर बनाया गया। समाचार पढ़ कर, कुंती के सीने पर सांप लोट गया।

अगले दिन, उसने अपनी सास उमा बाई सहित रायपुर जाने का निश्चय किया। रायपुर पहुंच कर सास-बहू ने सीधे मंत्रालय में डेरा डाला- जहां कुंती ने मंत्री मरकाम से मिलना तय किया। लिखत-पढ़त की सारी कार्यवाही करने के बाद, आगंतुक कक्ष में कुंती और उमा बुलावे की प्रतीक्षा करने लगीं। बड़ी मुश्किल से कुंती और उमा को दस मिनट मंत्री के सामने अपनी बात रखने का अवसर मिला। चैंबर में घुसते ही मंत्री को तीन वर्ष पहले सरंडी ग्राम में हुए हत्याकांड और धु्रवे परिवार को मरकाम द्वारा दिए गए आश्वासनों की याद दिलाई गई। कुंती बोली, ‘सर, छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखबिर के रूप में जिस नक्सल समूह द्वारा मेरे पति की हत्या की गई, उसको छत्तीसगढ़ शासन इनाम-इकराम बांट रहा है!’ तल्ख लहजे में मरकाम ने पूछा, ‘क्या मतलब?’ आग सीने में दबाए कुंती बोली, ‘दो महीने पहले मेरे पति के हत्यारे नक्सली पलाश सोनसाय ने आपकी सरकार के सामने समर्पण किया और उसे आप लोगों ने सब इंस्पेक्टर पुलिस बना दिया! मेरे पति की जान क्या इतनी सस्ती थी? ढाई-तीन वर्ष बाद भी उसकी विधवा को अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिली। क्या यही है आपकी सरकार का इंसाफ!’
चुनाव सिर पर आते देख मुकुंद मरकाम तल्ख नहीं हुआ। उसने पूछा, ‘रिमाइंडर लाई हो?’ कुंती ने चुपचाप आवेदनन दे दिया। मरकाम बोला, ‘एक महीने के अंदर तुम्हारे अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरण पर फैसला हो जाएगा। अब तुम्हें रायपुर आना नहीं पड़ेगा। तुम्हारा नियुक्ति पत्र तुम्हारे घर कोयलीबेड़ा पहुंच जाएगा।’

मंत्री की ओर से पूरी तरह आश्वस्त होकर सास-बहू मरकाम के चैंबर से बाहर निकल आए। उस समय शाम के साढ़े पांच बजे थे। बहू द्वारा कोयलीबेड़ा लौटने के प्रश्न पर उमा बाई ने कहा, ‘मोहल्ला रावतपारा में मेरी बहिन की बेटी रहती है। चल कर देख लेते हैं। अगर मिल गई तो कल लौटेंगे, वरना रात में ही चलना पड़ेगा।’ संयोग की बात, जब कुंती और उमा बाई सरस्वती के घर पहुंचे, तो वह आॅफिस से लौटी ही थी। बरसों बाद, अपने द्वारे मौसी और उसकी बहू को देख कर प्रसन्न हो गई। सरस्वती, उसके बेटे और बेटी ने जिस श्रद्धा-भाव से दोनों का स्वागत किया, एक प्रकार से उनका रायपुर रात रुकना तय हो गया। उमा बाई ने सरस्वती के पति के विषय में पूछा तो पता चला- आज ही भोपाल गए हैं।

रात के भोजन के बाद, सोने से पहले बातों के पुलिंदे खुले। कुंती ने बताया कि वह मंत्री मरकाम से मिलने क्यों आई थी। सोने से पहले, सरस्वती ने कुंती को सलाह दी, ‘लौटने से पहले, कल आप लोग नेता विपक्ष भूदेव सिंह से और मिल लो। उनके दल का आॅफिस मेरे आॅफिस के सामने ही है। आप लोग मेरे साथ चलना। भूदेव समय के पाबंद हैं- ठीक ग्यारह बजे आ जाते हैं। एक बजे तक लोगों से मिलते हैं। जनता की समस्याएं सुनते हैं, सुलझाते हैं। अगर भूदेव ने फोन कर दिया, तो आपका अनुकंपा नियुक्ति वाला काम तुरंत हो जाएगा।’ अपना सामान लेकर कुंती और उमा दस बजे सरस्वती के साथ ही घर से बाहर निकले। सरस्वती अपने आॅफिस चली गई, ये लोग भूदेव सिंह के प्रादेशिक कार्यलय में प्रवेश कर गए।

लगभग साढ़े ग्यारह बजे कुंती का नाम पुकारा गया। कुंती ने प्रभावशाली तरीके से संपेक्ष में भूदेव जी को अपनी करुण गाथा सुनाई। भूदेव ने कुंती से आवेदन मांगा तो उसने तुरंत दे दी। भूदेव ने कहा, ‘मैं नियुक्ति के विषय में बोल दूंगा।’ कुंती और उमा बाई उठने लगीं तो भूदेव बोले, ‘आप हायर सेकेंड्री पास हैं न?’ कुंती ने कहा, ‘जी हां।’ भूदेव बोले, ‘विधानसभा चुनाव आने वाले हैं, मेरे पास एक समन्वयक का पद खाली है। आपकी परिस्थिति को देखते हुए मैं समन्वयक का वह अंतिम पद आपको दे सकता हूं।’ कुंती ने संदेह करते हुए पूछा, ‘तो क्या वह पद चुनाव बाद समाप्त हो जाएगा?’

भूदेव- ‘नहीं-नहीं। पार्टी ऑफिस में पक्की नौकरी है। रायपुर से कहीं तबादला भी नहीं होगा।’
कुंती ने हिम्मत करके पूछ लिया, ‘तनखा कितनी मिलेगी?’
भूदेव- ‘बीस हजार मासिक। रहने के लिए वन बीएचके फ्लैट। रायपुर से बाहर जाने पर नियमानुसार टीए-डीए।… आप सोच लीजिए। पंद्रह-बीस दिन में मेरे ऑफिस के लैंड लाइन नंबर पर मुझे बता भी दीजिए, ताकि मैं अग्रिम कार्यवाही कर सकूं।… और हां, मैं आपके विषय में मंत्रालय में बोल दूंगा।’
भूदेव सिंह के चैंबर से निकलते हुए कुंती अपने आप को बहुत आश्वस्त महसूस कर रही थी। लेकिन, उमा बाई सरकारी नौकरी के ही पक्ष में थी।
कोयलीबेड़ा पहुंच कर कुंती ने नए सिरे से समन्वयक और आरक्षक की नौकरियों की तुलना की, फिर एक क्षण को उसके मन में इस प्रश्न ने भी सिर उठाया, ‘भूदेव सिंह मुझ पर इतना मेहरबान क्यों हो रहा है?’

रायपुर से लौट कर एक सप्ताह और बीत गया। कुंती धु्रवे के नाम से सोमवार को मंत्रालय की ओर से एक स्पीड पोस्ट लिफाफा प्राप्त हुआ। उमा बाई की उपस्थिति में धड़कते दिल से कुंती ने वह लिफाफा खोला, जो उसके नाम का नियुक्ति पत्र था। लेकिन, यह क्या- कुंती धु्रवे को आरक्षक के स्थान पर भृत्य पद के लिए नियुक्ति दी गई थी, थाना कोयलीबेड़ा में। नियुक्ति पत्र से कुंती बहुत आहत हुई। सास बोली, ‘कोयलाबेड़ा में ही नौकरी से हमें कहीं और नहीं जाना पड़ेगा, बहू!’ बीमार ससुर ने भी सासू के सुर में सुर मिलाया। निर्णय कुंती को करना था।

कुंती ने हिसाब लगाया- आज की तारीख में भृत्य को भी पंद्रह हजार मासिक मिलेंगे। कोयलीबेड़ा में बैठ कर पंद्रह हजार रुपए कमाना भी कोई कम नहीं!
तय हुआ- मंगलवार को ही थाने जाकर ड्यूटी ज्वाइन कर ली जाए।
मंगलवार को नियुक्ति पत्र और ज्वाइनिंग एप्लीकेशन बैग में रख कर कुंती दस बजे कोयलीबेड़ा थाने पहुंची। थाने में सिर्फ एक-दो सिपाही दिखाई दे रहे थे। कुंती थानेदार साहब के चैंबर तक पहुंची। लेकिन, यह क्या- सब इंस्पेक्टर पुलिस पदनाम के ऊपर नाम लिखा था पलाश सोनसाय का। नाम पढ़ कर कुंती का सिर घूम गया- मेरे मरद का हत्यारा!
कुंती ने सामने खड़े सिपाही से पूछा, ‘पलाश सोनसाय ने कब ज्वाइन किया?’
सिपाही बोला, ‘एक हफ्ते पहले कांकेर से ट्रान्सफर होकर आए हैं।’
उत्तर सुन कर कुंती थाने में एक क्षण भी नहीं रुक पाई, लौट कर घर आ गई।
इतनी जल्दी घर लौट आने पर उमा बाई ने पूछा, ‘जौन कर आर्इं?’
कुंती ने दृढ़ता के साथ कहा, ‘नहीं! और ज्वाइन करूंगी भी नहीं! मेरे धनी के हत्यारे के अधीन मैं काम नहीं कर सकती!’
ससुर बोले, ‘तो क्या पक्की सरकारी नौकरी छोड़ दोगी?’
‘छोडूंगी क्यों, आरक्षक की योग्यता है, आरक्षक की पदस्थापना के लिए लड़ती रहूंगी।… तब तक, मैं रायपुर में पार्टी के प्रादेशिक कार्यालय में समन्वयक की नौकरी कर लेती हूं।’

उमा बाई ने पूछा- ‘तो क्या हमें कोयलीबेड़ा छोड़ना पड़ेगा?’
कुंती ने शांत स्वर में कहा, ‘अगर हम सरंडी गांव छोड़ कर कोयलीबेड़ा बस सकते हैं, तो कोयलीबेड़ा छोड़ कर राजधानी रायपुर बसने में क्या बुराई है? रायपुर में रह कर मैं अपनी आरक्षक पद की लड़ाई आसानी से लड़ सकती हूं। रायपुर में ससुर जी का भी माकूल इलाज हो सकेगा।’
माकूल इलाज की बात सुन कर ससुर जी ने रायपुर के लिए हामी भर दी। सासू ने भी सोचा, दुश्मन के साथ रोज आठ घंटे काम करना कुंती के प्रति अन्याय होता!

मंगलवार को ही हिम्मत करके सुबह ठीक साढ़े ग्यारह बजे कुंती ने लैंड लाइन नंबर पर नेता प्रतिपक्ष भूदेव सिंह को फोन लगा दिया। अपना परिचय देते हुए बोली, ‘सर, कल मैं आपके कार्यालय में समन्वयक के पद पर ज्वाइन करने रायपुर आ रही हूं।’
भूदेव सिंह हंस कर बोले, ‘आ जाओ बेटी! पद आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।’

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