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कहानी: हेराफेरी

अभी मि. सिंह अपना वाक्य पूरा नहीं कर पाए थे कि थानेदार बीच में बोल पड़ा, ‘सर आप क्या बोल रहे हैं... ट्रैफिक कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा सर। पुलिस बदनाम हो जाएगी, वह अलग।... मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं।... उनके बिना सब अधिकारी नाराज हो जाएंगे। मंत्री के घर तक सब्जियां इन्हीं के कारण जाती हैं। साहब...’

Author January 22, 2017 12:02 AM

गंगाराम राजी

गर्मी की एक सुबह वह उठा और बिना हेलमेट के स्कूटर को फर्रांटे से दौड़ाता हुआ जा ही रहा था कि उसे लगातार सीटी सुनाई देने लगी। उसने स्कूटर के शीशे में देखा, तो पीछे से मोटर साइकिल पर दो सिपाही उसका पीछा करते हुए उसे रोकने के लिए सीटी बजा रहे थे। वह डर गया। पहली बार पुलिस का सामना जो करना पड़ा था। उसे समझने में देर नहीं लगी कि उसने हेलमेट नहीं पहना है।
उसने स्कूटर तेजी से दौड़ाना चाहा, पर न जाने वह क्यों रुक गया। पुलिस कांस्टेबल ने अपनी मोटर साइकिल उसके स्कूटर के आगे खड़ा कर लिया।
‘अपना लाइसेंस… तुम इतना तेज स्कूटर चला रहे हो।…’
‘तेज कहां… ’ घबराते हुए उसने जवाब देना चाहा।
‘अच्छा जल्दी से अपना लाइसेंस…’
इतने में उसने लाइसेंस निकाल कर उसे थमा दिया। लंबे से हवलदार ने लाइसेंस पर एक नजर डाली और अपनी चालान बुक निकाल ली। ‘तुम्हारा नाम?’
‘रामगोपाल बहादुर सिंह…’
‘इतना लंबा नाम… अच्छा तुम्हारा चालान कर रहा हूं, दो हजार रुपए बिना हेलमेट के जुर्माना होता है, मालूम है तुम्हें?’
‘मुझे सब मालूम है, लेकिन मुझे इतने जरूरी काम से जाना था कि मैं हेलमेट ही लेना भूल गया।’
‘क्या जरूरी काम था?’
‘मुझे पॉटी आई थी।’
‘अब रुक गई?’
‘नहीं, पाजामे में ही हो गई।’ बुरा-सा मुंह बना कर रामगोपाल बहादुर सिंह ने उसे देखा।
‘अच्छा, जल्दी से पांच सौ ही निकाल।’
‘मेरे पास तो कुछ नहीं है।’
तभी सड़क पर उन्हें एक ट्रक आता दिखाई दिया। एक हवलदार उसे रोकने आगे निकल गया, ‘जल्दी से इस लड़के से सौ रुपए लेकर ही आ जा। मैं ट्रक रोकता हूं।’ और वह वहीं से ट्रक को रोकने के लिए सीटी बजाने लगा।
‘जल्दी से निकाल सौ रुपए। तेरे को बड़ी छूट मिली है। जल्दी कर हमारी दूसरी सामी आ गई है।’
‘कहा न, मेरे पास कुछ भी नहीं है।’ सिंह भी अकेले सिपाही को देख बड़ी तल्खी से बोला।
दूर से दूसरा उसे हाथ से जल्दी आने का इशारा कर रहा था। उसका इशारा देख हवलदार ने जल्दी से सिंह की जेब में हाथ डाला और पचास का एकमात्र नोट निकाल लिया। नोट को आगे पीछे देख कर जल्दी से अपनी जेब के हवाले किया और दूसरे साथी की ओर चलने से पहले, ‘देखो लड़के, अगली बार हेलमेट के बिना आया तो पैंट उतार लूंगा। समझे। छोड़ दिया, भाग यहां से…।’ कह कर वह जल्दी से दूसरे साथी के पास चला गया था।
इस घटना का सिंह पर बहुत प्रभाव पड़ा। उसे धक्का-सा लगा। सोचने लगा कि यह सब देश में क्या हो रहा है। करप्शन को पकड़ने वाले खुद उसी रंग में रंगे जा रहे हैं। यह सब वह अपने दोस्तों से सुनता आ रहा था, पर आज उसे खुद भोगना पड़ा।
अब जब भी सिंह घर से निकलता, उन दोनों सिपाहियों पर एक नजर जरूर डालता। वे हमेशा की तरह किसी ट्रक, कार या फिर बिना हेलमेट के मोटर साइकिल चालक को रोके हुए होते। पहले वे चालक को जुर्माना करने के बहाने डराते, फिर उसे चालान बुक खोलते, अपनी कलम को जरा हिलाते, तो चालक बड़ी सिरदर्दी से बचने के लिए उनसे समझौता कर ही लेता और चालान बुक बंद हो जाती।
इसी बीच सिंह के पिता का तबादला दूसरी जगह हो गया। उसे भी अपने परिवार के साथ वहां जाना पड़ा। सिंह के मन में पुलिस के हवलदारों का चित्र यहां भी दिमाग के पटल पर चलता रहा। वह यहां भी यही हालत देख अपनी पढ़ाई की ओर अधिक ध्यान देने लगा।
यही उसकी जिंदगी का टर्निंग पाइंट बन गया। बारहवीं में पढ़ते समय ही सिंह ने तय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो, वह आइपीएस की परीक्षा पास करेगा। सिंह ने देश में पुलिस में फैले करप्शन और शक्ति के दुरुपयोग की संस्कृति को दूर करना अपना उद्देश्य बना लिया।
उसकी मेहनत काम आई। पांच वर्ष बाद उसकी आइपीएस की जिद पूरी हुई। मसूरी और हैदराबाद की कठिन ट्रेनिंग के बाद वह आइपीएस बन गया। अब वह मिस्टर सिंह बन गया। अपने कंधे पर आइपीएस का बैज और स्टार का अनुभव कर वह देश में फैल रहे अपराध को जड़ से उखाड़ने का संकल्प लेकर अपने को धन्य समझने लगा।
आज वह सशक्त आइपीएस अधिकारी है। आज उसके पास बहुत से अधिकार हैं, जिनका प्रयोग वह देशहित के लिए करना चाहता है। अब वह मि. रामगोपाल बहादुर सिंह आइपीएस बन गया है। वह आज भी उन दो पुलिस कांस्टेबलों को नहीं भूल पाया। वह एक ओर खड़े उन दो कांस्टेबलों को याद करने लगा, जिनकी सोच के कारण वह आइपीएस बनने की सोचने लगा था। इत्तफाकन उसकी पोस्टिंग भी उसी जिले में हो गई, जहां उन दो पुलिस वालों से उसका पाला पड़ा था। उन्हें ढूंढ़ने की इच्छा हुई। उसने सोचा कि सबसे पहले वह उनको ढूंढ़ निकालेगा।
एक दिन वह सरकारी बंगले से निकला ही था। सरकारी गाड़ी फर्रांटे से अभी कुछ ही दूरी पर पहुंची होगी कि उसकी नजरें एक ओर ट्रक और मोटर साइकिल की पंक्ति पर पड़ी। कुछ लोग सिपाही से बहस में लगे थे। मि. सिंह ने गाड़ी रुकवाई।
‘यह क्या हो रहा है?’ अपने ड्राइवर से पूछा।
‘साहब सिपाही ट्रैफिक की जांच कर रहे हैं। उसी का शोरगुल है।’
‘चलो।…’
अपने ड्राइवर को चलने के लिए तो बोल दिया, पर उसे अपने दोनों हवलदारों का खयाल आ गया, तो एक उड़ती नजर सिपाहियों पर पड़ ही गई।
‘अरे, ये तो वही हवलदार हैं!’ उसके मुंह से निकला।
‘सर!…’ ड्राइवर ने पूछा।
‘नहीं नहीं, कुछ नहीं। तुम चलते रहो।…’ बोलते हुए मि. सिंह ने एक नजर और उन पर डाली। उसे यकीन हो गया कि वे दोनों वही हैं। आज तो उनके साथ कुछ और सिपाही और एएसआइ भी हैं, पूरा नाका लगाए हुए हैं।
जीप अब आॅफिस पहुंच चुकी थी।
पता चला कि वे दोनों सिपाही पिछले दस वर्षों से ट्रैफिक कंट्रोल का ही काम कर रहे हैं। उनके अधिकारी भी उनसे खुश हैं। मि. सिंह ने सिटी थानेदार को अपने पास बुला लिया।
‘सर अजमल और कुलभूषण ट्रैफिक कंट्रोल के माहिर हैं। इनके बिना ट्रैफिक कंट्रोल करना बड़ा मुश्किल काम होगा। इन दोनों की जोड़ी पर तो पुलिस डिपार्टमेंट को नाज है। अजमल का आज और कुलभूषण का कल जोड़ कर इनको सब लोग आजकल के नाम से जानते हैं। शहर के लोग भी इन्हें इसी नाम से जानते हैं।… आप तो नए-नए हैं, आपको सब पता चल जाएगा।… और साहब ये अफसरों की सेवा-टहल भी तो करते रहते हैं… यह भी इनकी एक अलग ड्यूटी…।’
मि. सिंह अभी अपने प्रोवेशनल पीरियड में ट्रेनिंग पर था। थानेदार हावी होना चाहता था और अपने तजुर्बे की बात से मि. सिंह पर छाप छोड़ना चाहता था, फिर भी वह जानता था कि मि. सिंह जल्दी ही उसका साहब बनने वाले हैं।
‘कल से ही आजकल को ट्रैफिक से हटाओ…।’
अभी मि. सिंह अपना वाक्य पूरा नहीं कर पाए थे कि थानेदार बीच में बोल पड़ा, ‘सर आप क्या बोल रहे हैं… ट्रैफिक कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा सर। पुलिस बदनाम हो जाएगी, वह अलग।… मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं।… उनके बिना सब अधिकारी नाराज हो जाएंगे। मंत्री के घर तक सब्जियां इन्हीं के कारण जाती हैं। साहब…’
मंत्री का नाम सुन कर मि. सिंह को गुस्सा आ गया। तुरंत बोला, ‘आपको यहां कितनी देर हुई है?’
यह सुन कर थानेदार चुप हो गया।
‘आप कहते हैं तो… ठीक है…’
‘आप जा सकते हैं।’
थानेदार ने सैल्यूट मारा, हल्का-सा मुंह किए बाहर चला गया। सोचने लगा, मेरे घर की सब्जियों का खर्चा इन्हीं ने तो चलाया हुआ है। चलो, दूसरे आएंगे तो वे भी…
दो दिन बाद मि. सिंह जब अपने काम पर जाने के लिए घर से निकलने तो पत्नी बोली, ‘इधर दो सिपाही सामने खच्चरों के कान स्केल से मापते रहते हैं और खच्चर वाला उनके आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता है। क्या मामला है। आओ इधर से देखो।…’
मि. सिंह ने सब कुछ देखा। सोचने लगा ‘ये हवलदार तो वही आजकल हैं। अच्छा, इन्हें यहां पर भेज दिया है।’
‘आप क्यों सोच में पड़ गए हैं?’
‘कुछ नहीं। पुलिस का काम हर जगह होता है। पुलिस के बिना सरकार एक कदम आगे नहीं चल सकती। कानून-व्यवस्था ठीक रखना उसका काम है।…’ कह कर मि. सिंह चले गए।
मि. सिंह समझ गए कि ‘इन दोनों को यहां इसलिए लगाया है कि कोई भी रिश्वत न ले सके। यहां अब वे इन खच्चर वालों से क्या कहने जा रहे हैं या कुछ मांगने जा रहे हैं।’ मि. सिंह यह जानने के लिए अपनी गाड़ी एक किनारे खड़ी करवा कर खुद उन खच्चर वालों से मिलने चले गए। आज साधारण कपड़ों में तो थे ही।
‘क्यों भई, आप यहां पर खच्चरों को खड़ा कर क्या कर रहे हैं।’ मि. सिंह ने खच्चर के मालिकों से पूछा।
‘क्या बताएं इन पुलिस वालों को, कहते हैं कि अंगरेज सरकार के समय से ही एक कानून है कि उसी खच्चर को लादा जा सकता है, जिसका कान चौदह इंच का होगा। कहते हैं, सब कानून तभी से हैं। आजाद सरकार को भी अंगरेजों के ही कानून लागू करने हैं, तो इस सरकार की क्या जरूरत है? पुलिस वाले जानवरों के साथ ज्यादती का मामला दर्ज करने की धमकी दे गए हैं। हमारा खयाल है कि कोई भी खच्चर चौदह इंच के कान वाला नहीं होगा। बाहर से ही कोई नस्ल लानी पड़ेगी। सरकार को भी…’
‘तो आप लोगों ने क्या सोचा?’
‘साहब अब हमने यही फैसला किया है कि इन हवलदारों को कुछ पैसे देते हैं, काम तो करना ही है, पेट जो भरना है, टब्बर पालना है… और फिर इन पुलिस वालों को रिश्वत की आदत होती है, इसीलिए सब कानून हैं। सब ऊपर से नीचे… नेता भाषण तो देता है, पर खुद अमल नहीं करता।…’ और वे सरकर और पुलिस वालों को भला-बुरा कहने लगे।
‘देखो, आप अपना काम करो, आपको कुछ कोई नहीं करेगा।’
‘आप कौन हो जनाब, वे तो हमें अंदर तक करने की धमकी दे गए हैं। बड़े आए साले, जिस दिन हम बिदक गए तो देख लेना कोई नहीं बचेगा।…’ अब वह गुस्से में बोलने लगा था।
मि. सिंह ने उन्हें कुछ समझा कर काम पर लगा दिया, पर अपना पता नहीं दिया। आॅफिस जाते ही मि. सिंह ने उनकी बदली फिर से ऐसी जगह करा दी, जहां रिश्वत नाम की कोई चीज हो नहीं सकती।’ करें भी तो क्या करें, कोई उनके विरुद्ध गवाही भी देने को तैयार नहीं। उन्हें ऐसी सड़क पर गश्त पर लगा दिया, जो कच्ची थी। वहां बैलगाड़ियां ही अधिक चलती थीं।
कुछ दिनों के बाद मि. सिंह जिले के एसपी बन गए। उनको पद संभालते ही आजकल का खयाल आया। सोचा कि उन पर एक नजर डाल आनी चाहिए। साधारण कपड़ों और अपनी निजी कार में उसी कच्ची सड़क पर चल पड़े। अभी कुछ ही दूर गए थे कि सामने दो-चार बैलगाड़ियां खड़ी मिलीं। मि. सिंह ने वहीं एक ओर गाड़ी खड़ी कर दी और बैलगाड़ियों की ओर चल पड़े।
वहां पर देख कर मि. सिंह हैरान रह गए। आजकल उन बैल गाड़ियों को रोके खड़े थे।
‘चाचा ये पत्थर, तुम्हें साहब की कोठी पर छोड़ने होंगे, फिर आगे जा सकते हो।’
‘हवलदार जी ये पत्थर एक तो हमारे छकड़े पर रखे नहीं जाएंगे, दूसरा इन्हें अगर रख भी दिया तो ये इतने भारी हैं कि हमारे बैल बचेंगे ही नहीं।…’ हाथ जोड़ कर बैलगाड़ी वाले विनती कर रहे थे।
‘क्या करूं चाचा, ऊपर का आर्डर है। एक काम करो, सौ-सौ रुपए देते जाओ और अपने काम पर जाते जाओ। हम सरकार को बोल देंगे कि यहां पर कोई बैलगाड़ी नहीं आती है।’
मि. सिंह सामने से अनभिज्ञ-सा देख रहे थे। बैलगाड़ी के मालिक भी पचास का नोट उसे थमाते हुए बोलने लगे, ‘अगर इससे काम चलता है तो रख लो, नहीं तो हम पूछते हैं सरकार को।…’
‘चलो, आप लोग इतने ही दे दो। दूसरों को मत बताना, नहीं तो हमारा रेट खराब हो जाएगा। हमें भी तो बच्चे पालने हैं।’
‘ऐसे करोगे तो बच्चे पल जाएंगे? उनको भी इसी लाइन में डालना है क्या?’ एक बैलगाड़ी वाले ने कहा।
इतने में आजकल की नजर मि. सिंह पर पड़ गई। उन्हें शक हुआ, ‘अरे सामने साहब हैं।’
‘अच्छा अच्छा तुम जाओ, आज रहने दो, चलो जल्दी से। सड़क के एक ओर चला करो।’ अजमल इस तरह से बोलने लगा जैसे उन्होंने साहब को देखा ही नहीं और अनदेखा कर वे भी बैलगाड़ी के पीछे चलने लगे।
मि. सिंह वहीं एक ओर चट्टान पर बैठ गए। अपने सिर पर हाथ रख कर सोचने लगे कि ‘जिस आदमी को हेराफेरी करनी है, वह जहां भी जाएगा, हेराफेरी छोड़ नहीं सकता। कहां से कहां इनकी ट्रांसफर कराता रहा, पर वे वैसे के वैसे ही रहे। इनके बचाव में कोई न कोई आता ही रहा। कभी किसी नेता का फोन, तो कभी अपने ही साथी का।… न मालूम ये दोनों किस-किस को कैसी-कैसी घुट््टी पिलाते रहते हैं।…’ इस बात का समाधान सोचते हुए जब बहुत देर हो गई, तो गाड़ी मोड़ कर आॅफिस की ओर चल पड़े।
आज प्रदेश की राजधानी में मि. सिंह को आइजी का पदभार संभालते ही अपने आॅफिस में बैठ कर आजकल की याद फिर आने लगी। ‘अरे, उन दोनों का पता करना चाहिए। वे कहां होंगे। कहीं रिटायर तो नहीं हो गए होंगे या होने वाले होंगे।… पता चला कि अभी रिटायर नहीं हुए हैं, होने वाले हैं। बस मि. सिंह चल पड़े उन्हें देखने। वे इसी शहर में अपनी पुरानी ड्यूटी ट्रैफिक कंट्रोल पर तैनात थे।
चलते-चलते सामने ही मोटर साइकिल, स्कूटर वालों की लाइन लगी हुई थी और आजकल एक-एक चालान बुक लिए हुए उनसे अपना हिसाब-किताब करने में लगे थे। साहब की नजर उनकी बाजुओं पर पड़ी। उन पर तीन फीत्तियां देख साहब दंग रह गए। एक फीत्ती पर उन्हें देखा था, उन्हें उनके नेक काम के लिए प्रमोशन भी मिलती गई। दोनों मोटे और पेट भी आगे की ओर बहुत बढ़ा हुआ अपने पुराने धंधे में व्यस्त लग रहे थे। ठीक ही किसी ने कहा है, चोर चोरी से जाए पर हेराफेरी से न जाए। ‘कैसे सुधर सकेगा इंसान, हमारा डिपार्टमेंट, हमारी ऊपर से नीचे तक की व्यवस्था?’
वे स्टूडेंट से आइजी के पद पर पहुंच कर भी उनका कुछ नहीं कर सके। इन्हें ही ठीक करने वे आइपीएस में आए थे। ‘यह करप्शन आदमी की फितरत में बस गई है। कानून से नहीं, एक साफ सुथरा वातावरण बनाना होगा क्या? कैसे…?’
वहीं पर वे एक ओर रुक कर खड़े देखने क्या लगे, आजकल की नजर भी आइजी की गाड़ी पर पड़ते ही उनके मुंह में पड़ी ट्रैफिक सीटी बजने लगी। तीन फीत्तियों वाले हाथ मोटर साइकिल वालों को जाने का इशारा करने में लग गए। समर्थ होते हुए असमर्थ-सा साहब उन्हें देखता रह गया।

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