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विचार बोध: द्वैत-अद्वैत और संत

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के बाद विनोबा को 125 साल बाद याद करना एक प्रेरक संयोग है। जो लोग भारतीय संत परंपरा में विनोबा को आखिरी बड़ी कड़ी के तौर पर देखते हैं, वे उनके आध्यात्मिक ज्ञान का लोहा मानते हैं।

Author Updated: January 24, 2021 12:18 AM
motivational incidentसमाज, संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में बहुत कुछ देने वाले संत विनोबा भावे। (फाइल फोटो)

रोहित कुमार

आज हम ऐसे दौर में हैं जब समाज, संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में बड़ा योगदान देने वाले कई महापुरुषों की स्मृति का शतकीय पर्व मना रहे हैं। इस लिहाज से महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के बाद विनोबा को 125 साल बाद याद करना एक प्रेरक संयोग है। जो लोग भारतीय संत परंपरा में विनोबा को आखिरी बड़ी कड़ी के तौर पर देखते हैं, वे उनके आध्यात्मिक ज्ञान का लोहा मानते हैं।

विनोबा का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था और उनके जीवन पर दो लोगों का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ा। मां से मिले संस्कारों के कारण उनका झुकाव स्वाभाविक रूप से अध्यात्म की तरफ बढ़ता गया। मां ने उन्हें संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम के प्रति बचपन में ही काफी आस्थावान बना दिया था। तरुणाई की ओर बढ़ते हुए विनोबा न संत ज्ञानेश्वर को भूल पाए न तुकाराम को।

ये दोनों ही उनके आदर्श थे। संत तुकाराम के अभंग तो वे बड़े ही मनोयोग से गाते। तुकाराम का अपने आराध्य से लड़ना-झगड़ना, नाराज होकर कुछ से कुछ कहना, रूठना-मनाना उन्हें बहुत अच्छा भाता। संतों के प्रति उनकी आस्था संत रामदास से लेकर शंकराचार्य तक सघन विस्तार लिए थी। दर्शन उन्हें आगे के दिनों में खींचता चला गया।

दर्शन और संन्यास के सम्मोहन का आलम उनके लिए ऐसा था कि जब से उन्होंने होश संभाला तभी से हिमालय उनके सपनों में आता था। वे अपनी कल्पना में स्वयं को सत्य की खोज में गहन कंदराओं में तप-साधना करते हुए पाते। हिमालय की निर्जन, बर्फ से ढकी दीर्घ-गहन कंदराएं उन्हें परमसत्य की खोज में लीन हो जाने के लिए प्रेरित करती थीं।

विनोबा के बारे में प्रसिद्ध है कि स्कूल की पढ़ाई के बाद जब यह प्रश्न सामने आया कि आगे क्या पढ़ा जाए तो वैज्ञानिक प्रवृत्ति के उनके पिता और अध्यात्म में डूबी रहने वाली मां का वैचारिक द्वंद्व सामने आ गया। पिता का आग्रह था कि बेटा फ्रेंच पढ़े तो मां का कहना था कि ब्राह्मण का बेटा संस्कृत न पढ़े, यह कैसे संभव है! कमाल बेटे का कि उसने मां-पिता दोनों का मन रखा। इंटर में उन्होंने फ्रेंच को चुना और संस्कृत का अध्ययन निजी स्तर पर जारी रखा।

दिलचस्प है कि उन दिनों फ्रेंच ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हो रही क्रांति की भाषा थी। सारा परिवर्तनकामी साहित्य फ्रेंच में ही रचा जा रहा था। उस दौरान विनोबा बड़ौदा में थे और वहां का पुस्तकालय दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों के खजाने के लिए पूरे देश में विख्यात था। विनोबा ने उस पुस्तकालय को अपना दूसरा ठिकाना बना लिया था। विद्यालय से जैसे ही छुट्टी मिलती, वे पुस्तकालय में जाकर अध्ययन में डूब जाते।

फ्रांसीसी साहित्य ने युवा विनोबा का परिचय जहां पश्चिमी देशों में हो रही वैचारिक क्रांति से कराया, वहीं संस्कृत के ज्ञान ने उन्हें वेदों और उपनिषदों में गहराई से पैठने का अवसर दिया। ज्ञान का स्तर बढ़ा, तो उनकी ललक भी बढ़ती गई पर मन से न तो हिमालय का आकर्षण गया, न संन्यास की साध। वैराग्यबोध भी बढ़ता गया।

विनोबा के जीवन का वह हिस्सा दिलचस्प है जब वे ब्रह्म की खोज, सत्य की खोज, संन्यास लेने की साध में यहां-वहां भटक रहे थे। गृहत्याग के बाद उनकी हिमालय की ओर यात्रा जारी थी। बीच में काशी का पड़ाव आया। मिथकों के अनुसार भगवान शंकर की नगरी। हजारों सालों तक धर्म-दर्शन का केंद्र रही काशी। जिज्ञासुओं और ज्ञान-पिपासुओं को अपनी ओर आकर्षित करने वाली पवित्र धर्मस्थली।

शंकराचार्य तक खुद को काशी-यात्रा के प्रलोभन से नहीं रोक पाए थे। काशी के गंगा घाट पर जहां नए विचार पनपे तो वितंडा भी अनगिनत रचे गए। उसी गंगा तट पर विनोबा भटक रहे थे। अपने लिए मंजिल की तलाश में। गुरु की तलाश में जो उन्हें आगे का रास्ता दिखा सके।

एक दिन भटकते हुए वे काशी में एक स्थान पर पहुंचे जहां कुछ सत्य-साधक शास्त्रार्थ कर रहे थे। विषय था अद्वैत और द्वैत में कौन सही। प्रश्न काफी पुराना था। सैकड़ों साल पहले भी इस पर निर्णायक बहस हो चुकी थी। उस बहस में द्वैतवादी मंडन मिश्र और उनकी पत्नी का शंकराचार्य से सारस्वत आमना-सामना हुआ था। वही विषय फिर उन सत्य-साधकों के बीच आ फंसा था। या यों कहें कि वक्त काटने के लिए दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ वितंडा रच रहे थे। इसी दौरान बहस को समापन की ओर ले जाते हुए अचानक घोषणा कर दी गई कि अद्वैतवादी की जीत हुई है।

विनोबा इस घोषणा पर थोड़ा चौंके। उन्होंन हल्की हंसी के साथ एतराज जताया- ‘नहीं, अद्वैतवादी ही हारा है।’ विनोबा के मुंह से यह बयान बेसाख्ता निकल पड़ा। उनका यह कहना था कि सब उनकी ओर देखने लगे। एक सामान्य सा दिखने वाला युवक दिग्गज विद्वानों के निर्णय को चुनौती दे रहा था। सवाल पूछा गया, ‘यह तुम कैसे कह सकते हो, जबकि द्वैतवादी सबके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर चुका है।’

विनोबा ने कहा, ‘नहीं यह अद्वैतवादी की ही पराजय है।’ विनोबा अपने निर्णय पर अडिग थे। प्रश्न फिर पूछा गया, ‘कैसे?’ विनोबा ने कहा, ‘जब कोई अद्वैतवादी द्वैतवादी से शास्त्रार्थ करना स्वीकार कर ले, तो समझो कि उसने पहले ही हार मान ली है।’ तर्क की उनकी यही क्षमता आगे अध्यात्म की नई व्याख्या और दृष्टि के रूप में सामने आई।

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