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रविवारी विमर्श: नए साहित्य सिद्धांत की जरूरत

पिछले कुछ दशक में दुनिया की तस्वीर बदली है, और बदली है साहित्य की दुनिया भी। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि नवजागरण की प्रक्रियाओं ने सोलहवीं शताब्दी के ज्ञानोदय काल के बाद पूरी दुनिया की तस्वीर बदल दी थी और आधुनिक समाज की नींव रखी थी, जिसने धीरे-धीरे पूरी दुनिया से राजतंत्र को खत्म किया और लोकतंत्र जैसा एक नया उपहार समाज को दिया।

Author Published on: November 25, 2018 2:58 AM
प्रतीकात्मक फोटो

देवेंद्र चौबे

पिछले कुछ दशक में दुनिया की तस्वीर बदली है, और बदली है साहित्य की दुनिया भी। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि नवजागरण की प्रक्रियाओं ने सोलहवीं शताब्दी के ज्ञानोदय काल के बाद पूरी दुनिया की तस्वीर बदल दी थी और आधुनिक समाज की नींव रखी थी, जिसने धीरे-धीरे पूरी दुनिया से राजतंत्र को खत्म किया और लोकतंत्र जैसा एक नया उपहार समाज को दिया। खास बात यह है कि उस आधुनिक समाज और शासन तंत्र ने धीरे-धीरे कई क्रांतियों और युद्धों से गुजरते हुए मशीनों के साथ जुड़ कर अपने को और अधिक प्रजातांत्रिक बनाया तथा सामाजिक विकास के अनेक वैकल्पिक मार्ग सामने रखे। आधुनिक समाज के समांतर साहित्य ने भी अपनी दुनिया का विस्तार किया और वह आम जन को नायक बना कर दुनिया की कथा कहने लगा। लेकिन पिछली सदी में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिस तरीके से आधुनिकतावाद सहित अन्य विचारधाराओं को समझने के प्रयास सबार्ल्टन विचारकों के अलावा नव-मार्क्सवादियों सहित फ्रांसीसी अस्तित्ववादियों-संरचनावादियों के साथ पूरी दुनिया के लेखकों ने किया, उसने साहित्य की दुनिया को भी पूरी तरह से झकझोर दिया।

1944 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जिस तरह पूरी दुनिया में शीतयुद्ध के साथ-साथ एक नए तरह के दौर की शुरुआत सन साठ के बाद हुई, उसने सामाजिक विकास और उसके आकलन के सारे मानदंड बदल दिए। भारत में जहां सांप्रदायिकता, हाशिए के समाज का मुख्यधारा में आना और नई बाजार व्यवस्था का बनना- ये तीन तरह के बदलाव क्रमश: 1947, 1967 और 1990 के आसपास हुए और इसके समांतर शासन-सत्ता के विश्लेषण और मूल्यांकन में वर्चस्व तथा पारंपरिक इतिहास के नकार और उसके बरक्स नए इतिहास की शुरुआत हुई, वह समकालीन दुनिया के लिए एक बड़ी परिघटना थी। नतीजतन, इससे पहले तो समाज में धारणात्मक स्तर पर बदलाव आए, उसके बाद साहित्य सहित अन्य वैचारिक संरचनाओं में भी संरचनात्मक स्तर पर बदलाव आने शुरू हो गए। बदलाव की ये प्रक्रियाएं पूरी दुनिया में परिघटित हुर्इं और लोगों ने अपने को पूर्व की तरह याचक नहीं, इतिहास का कर्ता मानकर स्थापित प्रतिमानों को चुनौती देना शुरू कर दिया। यह साहस पहले के साहित्य या लोगों में दिखाई नहीं देता है।

मसलन, इसे हिंदी के चार उपन्यासों को ध्यान में रख कर देखा जा सकता है- प्रेमचंद का 1936 का गोदान, फणीश्वरनथ रेणु का 1954 का मैला आंचल, मन्नू भंडारी का 1978 का महाभोज और मैत्रेयी पुष्पा का 1997 का चाक। शुरू के दोनों उपन्यासों में गांव की जिंदगी है। एक आजादी के पहले की और दूसरा बाद की। पर, फर्क यह है कि गोदान में न तो कोई गतिशील राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई राजनीतिक हलचल; जबकि मैला आंचल में सारी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां मौजूद हैं और पूरा उपन्यास राजनीतिक गतिविधियों से भरा पड़ा है। बाद के दोनों उपन्यास स्त्री कथाकारों द्वारा रचे गए हैं। इनमें मन्नू भंडारी के महाभोज में जहां सामाजिक संघर्ष और जातीय हिंसा है, वहां मैत्रेयी पुष्पा के चाक में गांवों में हो रही हिंसा और चुनाव हैं। स्पष्टत: प्रेमचंद के अलावा शेष तीनों गंभीर राजनीतिक उपन्यास हैं, जिनमें समकालीन भारत के गांवों में हो रहे परिवर्तनों को समझने की कोशिश कथाकारों ने की है। यानी साहित्य के माध्यम से समकालीन भारतीय गांवों के साथ-साथ यहां की जातीय और जनजातीय संरचनाओं को इन उपन्यासों के जरिए जाना जा सकता है। फ्रांसीसी समाजशास्त्रीय चिंतक इप्पोलित तेन जब साहित्य को समाज का दस्तावेज कहते थे तो कहीं न कहीं उनका यही आशय था कि साहित्य में आंकड़े सामाजिक दस्तावेज ही होते हैं। इसलिए, साहित्य के आधार पर समाज का अध्ययन किया जा सकता है।

सवाल है कि इस दौर में पूरी दुनिया और वहां के साहित्य में ऐसा क्या हो रहा था, जिसे जाने बिना समकालीन विश्व साहित्य, यानी 1945 से 2010 के समय और साहित्य का विश्लेषण और मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है? प्रगतिशील इतिहासकार मानते हैं कि जिस तरह भारत में समकालीनता या समकालीन भारत की शुरुआत 1947 से देश की आजादी से होती है, उसी प्रकार समकालीन विश्व की शुरुआत 1945 के बाद, द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद होती है। यानी जिस तरह समकालीन भारतीय साहित्य की प्रारंभिक सीमा 1947 से मानी जा सकती है, वैसे ही समकालीन विश्व साहित्य की शुरुआत 1945 के बाद। यह दौर, पूरी दुनिया में मार्क्सवाद के प्रभाव के समानांतर फ्रांस में ज्यां पांल सात्र और अल्वेयर काम्यू के अस्तित्ववाद के उदय का है, जिसे शीघ्र ही सन 1962-66 तक आते-आते संरचनावादी विचारकों में लेविस्त्रास, रोलां बार्थ, मिशेल फूको, जाक देरिदा, जाक लाकां आदि अपने हाथों में ले लेते हैं। उसके बाद तो उनका जो वैचारिक आतंक पूरी दुनिया में फैलता है, वह 1970 तक आते-आते फूको और देरिदा के कारण उत्तर-आधुनिकतावाद के रूप में साहित्य और समाज विज्ञान में हो रहे विमर्शों को एक नया अर्थ देना शुरू कर देता है।

इससे थोड़ी मुक्ति 1990 में तब मिलती है, जब आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रियाओं ने एक नई बाजार-व्यवस्था को जन्म दिया, जिस पर आज के साहित्य और विचारधारा की दुनिया टिकी हुई है। इस क्रम में, जिस नए विचारक ने साहित्य और विचारधारा की दुनिया को इधर प्रभावित करना शुरू किया, वह है, स्लोवाकियाई विचारक स्लावोज जिजेक, जिसने पूंजीवाद के वैश्विक खतरे आदि की चर्चा करते हुए जिस गहरी संवेदना के साथ पूर्व के विचारों को परस्पर मिलाते हुए एक नया तर्क गढ़ कर हमारे समय के सच का बयान किया है, वह अब घीरे-धीरे दुनिया के बुद्धिजीवियों को प्रभावित करने लगा है। जाहिर है, आने वाला साहित्य भी ऐसे चमत्कृत कर देने वाले विचारों से प्रभावित होगा, जैसा कि एक समय मार्क्सवाद, सबार्ल्टन विचारधारा, अस्तित्ववाद, संरचनावद और उत्तर आधुनिकतावाद ने नए बुद्धिजीवियों को किया। यानी कि समकालीनता का जो संदर्भ साहित्य को समझने के लिए बन सकता है, वह मोटे तौर पर 1945 से 2010 के बीच, दुनिया में हाने वाली घटनाओं को लेकर है, जिससे मनुष्य समाज प्रभावित होता है और अगर मनुष्य समाज प्रभावित होता है, तब कहीं न कहीं उसकी चिंतन प्रक्रिया भी प्रभावित होगी!

कहना न होगा कि मानव समाज की यह वही चिंतन प्रक्रिया है, जिसने 1945 के बाद के साहित्य और विचारधारा की दुनिया को एक सीमा के बाद प्रभावित किया है। पर, खास बात यह है कि 1945 के बाद शीतयुद्ध के इस प्रारंभिक दौर में हुए तकनीकी विकास ने एक ओर जहां अमेरिका, जापान और जर्मनी को एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने का मौका दिया, वहीं दूसरी ओर एशिया और अफ्रीका में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से संघर्ष करते हुए स्वतंत्र राष्ट्रों का उदय भी हुआ, जिसका नतीजा था कि 1960 के बाद दुनिया में आंतरकि स्तर पर अनेक तरह के परिवर्तन हुए। इस बीच शुरू हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने भी दुनिया में हो रहे तनाव को कम करने और उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा नस्लवाद को कम कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकास के मुद्दे सामने लाने में मदद की।

इस दौरान जिन दो-तीन घटनाओं ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और जिनसे साहित्य भी प्रभावित हुआ, वे हैं 1966 में चीन में सांस्कृतिक क्रांति, 1967 के बाद भारत, जापान, फ्रांस में छात्रों द्वारा सत्ता के वर्चस्व के खिलाफ कई तरह के आंदोलन और 1990 तक आते-आते सोवियत संघ का विघटित हो जाना। उसके बाद, पूरी दुनिया में एक नए तरह के आतंकवाद का उदय का होना भी इस दौर की एक बड़ी परिघटना है। इन सारी घटनाओं का असर शब्दों की दुनिया पर गहरा पड़ा और संबंधित देशों के लेखकों ने इन परिघटनाओं को लेकर मार्मिक रचनाएं लिखीं।
इन सबका आकलन और सैद्धांतिकीकरण करना अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है; लेकिन यह सच है कि इस दौर ने एक नए प्रकार के साहित्य को जन्म दिया। वह साहित्य क्या है, उसके सवाल क्या हैं और वह किस तरह शब्दों के जरिए आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व कर रहा है; वह इस दौर के लेखकों की रचनाओं में देखा जा सकता है।

दरअसल, पूरी दुनिया को देखने का जो नजरिया है, वह आमतौर से पांच हिस्सों में बंटा हुआ है- एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया। इन देशों में 1945 के बाद अनेक लेखक आए, जिन्होंने अपने लेखन के जरिए दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। इसे समझने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि पुरस्कृत लेखकों की एक सूची बनाई जाए और उनके आधार पर समकालीन विश्व साहित्य के बारे में बात की जाए; पर सच यह भी है कि अधिकतर पुरस्कृत लेखकों ने कभी अपने समाज या साहित्य का प्रतिनिधित्व नहीं किया है। इसलिए, पुरस्कारों को लेकर विवाद होते रहे हैं। लेकिन कुछ लेखक ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने अपने लेखन से सामाजिक विकास की प्रक्रियाओं को समझते हुए मानव समाज के संघर्ष और उनके आत्म-सम्मान के सवाल को लेखन का लक्ष्य बनाया।

दरअसल, बिना इतिहासबोध के किसी भी दौर की रचनाशीलता को समझना एक जटिल कार्य है। पर, यह सच है कि जिस गहरी संवेदना, उदात्त मानसिकता और प्रतिबद्धता के साथ 1945 के बाद के लेखकों ने मानवीय सभ्यता के सवालों को उठाते हुए समकालीन सत्ता के चरित्र और जनता के संघर्ष को साहित्य का हिस्सा बनाया है, वह मूल्यांकन के लिए अब एक नए प्रकार के साहित्य सिद्धांत की मांग करता है। कारण, यहां इतने प्रकार के सवाल और संदर्भ हैं कि उनका पूर्ण मूल्यांकन न तो मार्क्सवाद के आधार पर हो सकता है, और न ही संरचनावाद के आधार पर। खासकर, समकालीन साहित्य के तीसरे दौर का साहित्य जो 1990 के बाद लिखा गया, वह संरचनात्मक और कथ्य की दृष्टि से बिल्कुल भिन्न किस्म का है। अब उस पर नए तरीके से बातचीत करने की जरूरत है।

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