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रविवारी: सहूलियत से बड़ी मुसीबत

सूचना और संचार क्रांति के इस दौर में हमारे बहुत सारे काम कम्प्यूटरीकृत उपकरणों पर निर्भर होते गए हैं। इनमें मोबाइल फोनों की उपयोगिता सर्वाधिक है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि और उनसे संबंधित इलेक्ट्रानिक उपकरणों की बिक्री में हर साल तेजी देखी जाती है। इनमें ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खराबी या टूट-फूट के बाद मरम्मत नहीं होती, वे कबाड़ में फेंक दिए जाते हैं। इस तरह दुनिया भर में ई-कचरा एक बड़ी मुसीबत बन कर उभरा है। इस कचरे के निपटान में निकलने वाली जहरीली गैसें और घातक रसायन मानव स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डाल रहे हैं। ई-कचरे की समस्या के बारे में बता रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

Author November 25, 2018 2:29 AM
प्रतीकात्मक फोटो (Source: flickr.com)

अभिषेक कुमार सिंह

देश नए डिजिटल दौर में है। तरक्की को जो डिजिटल पांव मिले हैं, उनसे उम्मीद लगाई गई है कि उससे हर खासोआम की जिंदगी पहले से बेहतर और तेज हो जाएगी। कई मायनों में ये उम्मीदें सिर चढ़ कर बोलती और कामयाब होती भी दिखाई दे रही हैं। लोग अपने मोबाइल फोन के जरिए, लैपटॉप-कंप्यूटर से खरीदारी कर रहे हैं, पैसे का डिजिटल लेनदेन कर रहे हैं। सिर्फ बातचीत नहीं, फोटो खींचने से लेकर ईमेल भेजने, फाइलों के पीडीएफ बनाने जैसे काम अब तो स्कूली बच्चे भी स्मार्टफोन के जरिए करने लगे हैं। स्मार्टफोन के अलावा लोगों की जिंदगी में कई और इलेक्ट्रॉनिक चीजें हैं। इंटरनेट से चलने वाले स्मार्ट टीवी हैं, ईयरफोन-हेडफोन हैं, स्पीकर हैं, माउस हैं। वॉशिंग मशीनें भी सिर्फ अब कपड़ों की धुलाई नहीं करतीं, वे हमारे इशारों को समझ कर काम करने लगी हैं। कारों में भी ऐसी ही स्मार्ट डिवाइसें लगी हैं। घड़ियां भी महज समय बताने का साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि वे हमारे चले गए कदमों को गिनती हैं, हमारी सेहत पर नजर रख कर अलर्ट करती हैं, हमारे फोन के संदेश बता देती हैं।

ई-कचरे में आमतौर पर हटाए गए कंप्यूटर मॉनीटर, मदरबोर्ड, कैथोड रे ट्यूब (सीआरटी), प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी), मोबाइल फोन और चार्जर, कॉम्पैक्ट डिस्क, हेडफोन के साथ लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले (एलसीडी)/ प्लाज्मा टीवी, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर शामिल होते हैं। शहरी सभ्यता तो जैसे इनके आगे नत-मस्तक हो गई है। मुमकिन है कि आने वाले वक्त में शहरी बाशिंदे हाड़-मांस के बजाय तरह-तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से घिरे एक ऐसे पुतले की शक्ल में नजर आएं, जिन्हें अगर भीतर से टटोला जाएगा तो अंदर तमाम सर्किटों, तारों, बैटरियों आदि का जंजाल मौजूद मिलेगा। इस इलेक्ट्रॉनिक घेरेबंदी के कोई चाहे जितने फायदे गिनाए, लेकिन एक नुकसान फिलहाल साफ नजर आ रहा है। इस नुकसान को इलेक्ट्रॉनिक कबाड़, ई-वेस्ट या ई-कचरा कहा जाता है, जो इन तमाम इलेक्ट्रॉनिक इंतजामों के खराब होने, काम के नहीं रहने या यों ही पुराना पड़ने पर शौकिया बदलने के कारण रोजाना पैदा हो रहा है। इससे हम इंसान महफूज नहीं हैं, क्योंकि यह ई-कचरा पहले तो हमारी जमीन, हवा और पानी को दूषित करता है और फिर हमारी सेहत के लिए मुसीबत बन जाता है।

मोबाइल बिकते दिखे, फेंके जाते नहीं
मुमकिन है कि हम कोई टेलीविजन पांच-दस साल में बदलें या फिर हो सकता है कि पूरी जिंदगी एक ही टीवी के सहारे काट लें। वॉशिंग मशीन, माइक्रोवेव, फैक्स मशीन, फोटो कॉपी, डिजिटल कैमरे, लैपटॉप, प्रिंटर, इलेक्ट्रॉनिक खिलौने और गैजेट, एयर कंडीशनर, थर्मामीटर आदि कभी-कभार ही खरीदे जाते हों, अलबत्ता ये सारी चीजें इलेक्ट्रॉनिक्स की देन हैं और किसी रोज खराब होकर फेंके जाने के बाद ई-कबाड़ के रूप में ही सामने आती हैं। पर जिस एक चीज (गैजेट) ने हर रोज नई-नई शक्ल में आकर पुराने को फेंकने और नए को अपनाने की जरूरत पैदा की है, वह मोबाइल या कहें कि आज का स्मार्टफोन है। कंप्यूटर क्रांति के साथ शुरू हुई ई-कबाड़ की समस्या में आज एक बड़ी भूमिका मोबाइल फोन की बन गई है, क्योंकि अब मोबाइल फोन सिर्फ बातचीत करने और एसएमएस भेजने का साधन मात्र नहीं रह गया है। बल्कि उससे फोटो, सेल्फी भी खींची जाती हैं, ईमेल भी किए जाते हैं, उसमें दस्तावेज भी सहेजे जाते हैं और फेसबुक-ट्विटर जैसे सोशल मंचों के इस्तेमाल के अलावा वे गेम खेलने के काम भी आते हैं। ऐसे में ज्यादा क्षमता वाली बैटरी, ज्यादा गति वाले इंटरनेट कनेक्शन, ज्यादा साफ तस्वीर लेने वाले कैमरे वालों स्मार्टफोनों की मांग हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है। मानव इतिहास की नजर से देखें तो दुनिया में मोबाइल फोनों की संख्या इंसानी आबादी से ज्यादा हो चुकी है। बड़ी आबादी वाले देशों- भारत और चीन- में मोबाइल और स्मार्टफोन एक क्रांति ही ले आए हैं, सिर्फ इस्तेमाल करने वालों की संख्या के रूप में नहीं, बल्कि इन्हें बनाने और बेचने के मामले में भी यहां नए से नए कीर्तिमान बन रहे हैं।

बीती दीपावली के साथ देश में आॅनलाइन खरीदारी का जो उत्सव शुरू हुआ था, बताते हैं कि उस दौरान देश में स्मार्टफोन की बिक्री ने नया आंकड़ा बना दिया है। देश के इतिहास में यह पहला मौका है, जब एक ही साल के अंदर देश में करीब पांच करोड़ मोबाइल फोन बेचे गए हैं। देश में इस वक्त एक अरब से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं और दुनिया में फिलहाल ऐसा करिश्मा करने वाले चीन और भारत ही दो ऐसे देश हैं। हालांकि भारत में मोबाइल फोन इंडस्ट्री को अपने पहले दस लाख ग्राहक जुटाने में करीब पांच साल लग गए थे, पर अब भारत-चीन जैसे आबादी बहुल देशों की बदौलत पूरी दुनिया में मोबाइल फोनों की संख्या इंसानी आबादी के आंकड़े यानी सात अरब को भी पीछे छोड़ चुकी है। यह आंकड़ा इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन (आईटीयू) का है। आईटीयू के मुताबिक, भारत, रूस, ब्राजील समेत करीब दस देश ऐसे हैं, जहां मानव आबादी के मुकाबले मोबाइल फोनों की संख्या ज्यादा है। रूस में पच्चीस करोड़ से ज्यादा मोबाइल हैं, जो वहां की आबादी से 1.8 गुना ज्यादा हैं। ब्राजील में चौबीस करोड़ मोबाइल हैं, जो आबादी से 1.2 गुना ज्यादा हैं। इसी तरह मोबाइल फोनधारकों के मामले में अमेरिका और रूस को पीछे छोड़ चुके भारत में भी स्थिति यह बन गई है कि यहां करीब आधी आबादी के पास मोबाइल फोन हैं।

भारत जैसे देश की विशाल आबादी और बाजार में सस्ते से सस्ते मोबाइल हैंडसेट उपलब्ध होने की सूचनाओं के आधार पर इस दावे में कोई संदेह भी नहीं लगता। यह भी गौरतलब है कि 2जी से 3जी, 3जी से 4जी और अब अगले साल यानी 2019 में 5जी क्रांति के शुरू होने पर नए सिरे से ज्यादा क्षमता वाले स्मार्टफोन बनाने और बेचने की होड़ लगेगी। यही नहीं, नया और पहले के मुकाबले ज्यादा स्मार्ट मोबाइल फोन लोगों को इतना आकर्षित करता है कि वे उसे जरूरत न होने पर भी शौकिया बदल लेते हैं। मोटे तौर पर दुनिया में लोग ग्यारह महीने में मोबाइल फोन बदलने लगे हैं, क्योंकि इतने वक्त में फोन बनाने वाली कंपनियां बाजार में नए फीचर्स के साथ नया स्मार्टफोन, नए दावों के साथ उतार देती हैं। अब तो हाल यह है कि स्मार्टफोन की अग्रणी कंपनी- एप्पल अपने मशहूर ब्रांड आईफोन का नया संस्करण किसी साल बाजार में न लाए, तो कंपनी में किसी गड़बड़ी के अंदाजे लगाए जाने लगते हैं। यों ये सारे तथ्य और आंकड़े एक तरफ यह आश्वस्ति जगाते हैं कि अब गरीब देशों के नागरिक भी जिंदगी में बेहद जरूरी बन गई संचार सेवाओं का लाभ उठाने की स्थिति में हैं, वहीं यह इलेक्ट्रॉनिक क्रांति दुनिया को एक ऐसे खतरे की तरफ ले जा रही है जिस पर अभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह खतरा है इलेक्ट्रॉनिक कचरे यानी ई-वेस्ट का।

सावधान, आगे खतरा है
असल में यह तरक्की हमें इतिहास के एक ऐसे अनजाने मोड़ पर ले आई है, जहां हमें पक्के तौर पर मालूम नहीं है कि आगे कितना खतरा है। हालांकि इस बारे में थोड़े-बहुत आकलन-अनुमान अवश्य लगाए गए हैं। वर्ष 2013 में इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नीकल एजूकेशन एंड रिसर्च (आईटीईआर) द्वारा मैनेजमेंट ऐंड हैंडलिंग आॅफ ई-वेस्ट विषय पर आयोजित सेमिनार में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वैज्ञानिकों ने एक आकलन करके बताया था कि भारत हर साल आठ लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा कर रहा है। इस कचरे में देश के पैंसठ शहरों का योगदान है, पर सबसे ज्यादा ई-वेस्ट देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में पैदा हो रहा है। हम अभी यह कह कर संतोष जता सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर हमारा पड़ोसी मुल्क चीन इस मामले में हमसे मीलों आगे है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन दुनिया का सबसे बड़ा ई-वेस्ट डंपिंग ग्राउंड है। उल्लेखनीय है कि जो टीवी, फ्रिज, एयर कंडीशनर, मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि चीन में बना कर पूरी दुनिया में सप्लाई किए जाते हैं, कुछ वर्षों बाद चलन से बाहर हो जाने और कबाड़ में तब्दील हो जाने के बाद वे सारे उपकरण चीन या भारत लौट आते हैं। भारत-चीन जैसे देशों में गरीबों को इस ई-कचरे से कीमती चीजें निकालने का काम मिल जाता है, जिससे वे इसके खतरे की तरफ नहीं देखते। असल में तकरीबन सभी विकसित देशों ने ई-कचरे से निपटने के प्रबंध पहले ही कर लिए हैं। दूसरे, वे ऐसा कबाड़ हमारे जैसे गरीब मुल्कों की तरफ ठेल रहे हैं, ताकि उनके समाजों का स्वास्थ्य इनकी वजह से खराब न हो। जाहिर है, हमारे लिए चुनौती दोहरी है। पहले तो हमें देश के भीतर ही पैदा होने वाली समस्या से जूझना है और फिर विदेशी ई-वेस्ट के उस सतत प्रवाह से निपटना है, जिसे लेकर कोई ज्यादा बेचैनी भारत और चीन समेत दूसरे कई गरीब-विकासशील देशों में नहीं दिखाई देती।

हमारी चिंताओं को असल में इससे मिलने वाली पूंजी ने ढांप रखा है। विकसित देशों से मिलने वाले चंद डॉलरों के बदले हम यह मुसीबत खुद ही अपने यहां बुला रहे हैं। यदि हम इस तरह के विषैले इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ की विश्वव्यापी समस्या की तरफ एक नजर तो दौड़ाएं, तो पता चलेगा कि क्यों हमें ऐसे व्यापार से मिलने वाली पूंजी से मुंह फेरना चाहिए और क्यों हमें अपनी संचार क्रांति और दूसरे आधुनिक विकास की बाबत कुछ देर रुक कर सोचना चाहिए।

दर्द झेलते भारत-चीन
ई-कचरे का सबसे ज्यादा दर्द झेलने वालों में चीन और भारत हैं। दक्षिणी चीन का शहर गुईयू तो दुनिया की सबसे बड़ी ई-कचरा मंडी है। भारत भी इसमें पीछे नहीं है और हमारा देश ई-कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में शुमार होता है। एसोचैम-नेक द्वारा 2018 में कराए गए एक अध्ययन पर बनाई गई इस लिस्ट में चीन शीर्ष पर है, उसके बाद अमेरिका, जापान और जर्मनी का नंबर आता है, जबकि भारत पांचवें नंबर पर है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में अब हर साल बीस लाख टन ई-कचरा पैदा होता है, जिसमें से कुल 4,38,050 टन कचरा सालाना रिसाइकल किया जा रहा है। एसोचैम-नेक द्वारा भारत में इलेक्ट्रिकल्स ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग पर किए गए संयुक्त अध्ययन के मुताबिक, अगले दो-तीन साल में यानी वर्ष 2021 तक ई-कचरे की मात्रा देश में 5.52 करोड़ टन तक पहुंचने की आशंका है। भारत में महाराष्ट्र ई-कचरा यानी इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ में सबसे ज्यादा 19.8 फीसद का योगदान करता है और मात्र 47,810 टन सालाना रिसाइकल करता है।

सवाल है कि ई-कचरा हम इंसानों और पर्यावरण को नुकसान कैसे पहुंचाता है। असल में, भारत-चीन समेत ज्यादातर देशों में गरीब बच्चे और बेरोजगार ई-कबाड़ को तोड़ने और गलाने का काम करते हैं। कचरा गलाने के लिए खतरनाक रसायन इस्तेमाल में लाए जाते हैं। कचरा गलाते समय उपकरणों से क्रोमियम, सीसा और पारे जैसी नुकसान पहुंचाने वाली धातुएं और हानिकारक गैसें निकलती हैं। इनसे पहले तो आबो-हवा खराब होती है, नदी-नालों का पानी प्रदूषित होता है, फिर संपर्क में आने वाले इंसानों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। एसोचैम-नेक के अध्ययन में कहा गया है कि असुरक्षित ई-कचरे की रीसाइकलिंग के दौरान उत्सर्जित रसायनों/प्रदूषकों के संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र, रक्त प्रणाली, गुर्दे और मस्तिष्क विकार, श्वसन संबंधी विकार, त्वचा विकार, गले में सूजन, फेफड़ों का कैंसर, दिल, यकृत को नुकसान पहुंचता है। मोबाइल फोन की ही बात करें, तो कबाड़ में फेंके गए इन फोनों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और विकिरण पैदा करने वाले कल-पुर्जे सैकड़ों साल तक जमीन में स्वाभाविक रूप से घुल कर नष्ट नहीं होते हैं। सिर्फ एक मोबाइल फोन की बैटरी छह लाख लीटर पानी दूषित कर सकती है। इसके अलावा एक पर्सनल कंप्यूटर में 3.8 पौंड घातक सीसा तथा फास्फोरस, कैडमियम और मरकरी जैसे तत्त्व होते हैं, जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं और विषैले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। कंप्यूटरों के स्क्रीन के रूप में इस्तेमाल होने वाली कैथोड रे पिक्चर ट्यूब जिस मात्रा में सीसा (लेड) पर्यावरण में छोड़ती है, वह भी काफी नुकसानदेह होती है। जल-जमीन यानी हमारे वातावरण में मौजूद ये खतरनाक रसायन कैंसर आदि कई गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं।

वैसे तो उपाय यह है कि ई-कचरे का नियंत्रित ढंग से निष्पादन हो और उन्हें इसके लिए बनी सुरक्षित फैक्ट्रियों में तोड़ा-पिघलाया जाए। जैसे कि आॅस्ट्रेलिया में ऐसा कचरा बड़ी-बड़ी फैक्टरियों में रीसाइकिल किया जाता है। वहां भी ई-कचरे को जलाने से जहरीला धुआं पैदा होता है, लेकिन वे फैक्टरियां इस सारे जहर से निपटने के इंतजाम करती हैं, सो इसके लिए मोटी रकम लेती हैं। चूंकि ई-कचरे की रीसाइकिल विकसित देशों में बेहद महंगी है, लिहाजा उसे भारत-चीन को ठेला जाता है। पर्यावरण स्वयंसेवी संस्था ग्रीनपीस ने अपनी रिपोर्ट ‘टॉक्सिक टेक: रीसाइक्लिंग इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट्स इन चाइना एंड इंडिया’ में साफ किया है कि जिस ई-कबाड़ की रीसाइक्लिंग पर यूरोप में बीस डॉलर का खर्च आता है, वही काम भारत-चीन जैसे मुल्कों में महज चार डॉलर में हो जाता है। भारत, बांग्लादेश, विएतनाम और चीन आदि देश पुराने जहाजों से लेकर खराब हो चुके कंप्यूटरों, मोबाइल फोनों, लैपटॉप कंप्यूटर, बैटरियों, कंडेंसर, कैपिसिटर्स, माइक्रो चिप्स, सीडी, फैक्स और फोटोस्टेट मशीनों का कबाड़ अपने यहां मंगाते हैं, ताकि उनसे निकाली गई चीजों से धन कमाया जा सके। वैसे तो हमारे देश में ई-कबाड़ पर रोक लगाने वाले कानून हैं। खतरनाक कचरा प्रबंधन और निगरानी नियम 1989 की धारा 11(1) के तहत ऐसे कबाड़ की खुले में रीसाइक्लिंग और इसके आयात पर रोक है, लेकिन कायदों को अमल में नहीं लाने की लापरवाही की वजह से अकेले दिल्ली की सीलमपुर, जाफराबाद, मायापुरी, बुराड़ी आदि बस्तियों में संपूर्ण देश से आने वाले ई-कचरे का चालीस फीसद हिस्सा रीसाइकिल किया जाता है। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियां अपने उपभोक्ताओं से खराब हो चुके सामान वापस लेने का जहमत नहीं उठाती हैं, क्योंकि ऐसा करना खर्चीला है और सरकार की तरफ से इसे बाध्यकारी नहीं बनाया गया है। इसी तरह उपभोक्ता भी इन बातों को लेकर सजग नहीं हैं कि खराब थर्मामीटर से लेकर सीएफएल बल्ब और मोबाइल फोन आदि यों ही कबाड़ में फेंक देना कितना खतरनाक है। हमारी तरक्की ही हमारे खिलाफ न हो जाए और हमारा देश दुनिया के ई-कचरे के डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होकर नहीं रह जाए, इस बाबत सरकार और जनता, दोनों स्तरों पर जागृति की जरूरत है, अन्यथा चंद पैसों की यह चाहत हमारे ही गले की फांस बन जाएगी।

देखन में छोटन लगे…
मोबाइल फोन चाहे जितना छोटा दिखे, लेकिन उसमें सिर्फ प्लास्टिक और कांच के संग दो-चार इलेक्ट्रॉनिक सर्किट मात्र नहीं होते। अगर आपके पास कोई अच्छा स्मार्टफोन है, तो यकीन मानिए कि उसमें कांसा, प्लेटिनम, पैलेडियम और सोना-चांदी भी हो सकता है। एक अनुमान है कि करीब दस लाख मोबाइल फोनों से लगभग सोलह टन तांबा, 350 किलो चांदी, 34 किलो सोना और 15 किलोग्राम पैलेडियम निकाला जा सकता है। यही धातुएं एक मोबाइल फोन को महंगा बनाती हैं, बल्कि अब जिस रफ्तार से आधुनिक स्मार्टफोन की मांग बढ़ रही है, उससे यह आशंका भी बन गई है कि आने वाले वक्त में जब ये धातुएं खदानों में नहीं बचेंगी, तो स्मार्टफोन खुद एक बेशकीमती चीज में बदल जाएगा। अगर एक उदाहरण आईफोन का लें, तो उसमें करीब 0.034 ग्राम सोना, 0.34 ग्राम चांदी, 0.015 ग्राम पैलेडियम, 15 ग्राम तांबा, और 25 ग्राम अल्युमिनियम होता है। इनके अलावा लेंटेनम, वाईट्रियम, टर्बियम, गैडोलिनियम जैसी कई दुर्लभ धातुओं का इस्तेमाल भी आईफोन में होता है।

स्मार्टफोन में लगाई जाने वाली धातुओं का एक दिलचस्प आकलन यह भी है कि एक टन सोने के अयस्क से जितना सोना निकलता है, उससे तीन सौ गुना सोना, कबाड़ हो चुके एक टन आईफोन से निकाला जा सकता है। इसी तरह एक टन चांदी के अयस्क के मुकाबले एक टन आईफोन से साढ़े छह गुना चांदी मिल सकती है। ये धातुएं स्मार्टफोन की रीसाइकिलिंग का आकर्षण पैदा तो करती हैं, लेकिन इसकी एक सच्चाई यह भी है कि महज दस फीसद मोबाइल फोनों से ही कीमती धातुओं को पूरी तरह अलग किया जा पाता है। यही नहीं, उनके सिर्फ दस फीसद पुर्जों का ही दोबारा इस्तेमाल हो पाता है, क्योंकि रीसाइकिलिंग के दौरान धातुएं काफी हद तक गल जाती हैं और पुर्जे टूट-फूट जाते हैं।

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