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रविवारी कविताएं: हौसला

पढ़ें तरसेम गुजराल की लिखी कविताएं

Author November 25, 2018 3:15 AM
प्रतीकात्मक फोटो

तरसेम गुजराल

हौसला
प्रेम के हाथ में
कच्चा घड़ा था
और उसमें दरिया पार करने का हौसला था
हौसला था नन्हे दीप में
समुद्र भर अंधकार पीने का

चर्चाओं से नहीं पैदा होता हौसला
भीतर लावा की तरह रहता है मौजूद
तानाशाह की आंख में रड़कता है
नन्ही-सी कविता का हौसला
ध्वंस से नहीं यातना से नहीं
उम्र भर तकलीफें सह कर
टूटता नहीं जीने का हौसला।

आत्मा की गवाही

चांद को आकाश चाहिए था
जमीन को हरियाली
दुख की सुलगन को भाषा चाहिए भी
भाषा को वह मौन
जिसके अर्थ गंूजने का अवकाश पाएं
तभी तो हर सच्ची रचना
जीवन का विस्तार होती है
वह दिल के खून से लिखी जाती है
एकदम खरी खरी
आत्मा की गवाही के साथ।

संभावना

इधर जो पतझर आया है
जुल्मी की तरह आया है
उदास होकर भी
वसंत की संभावना पर संवाद करूंगा

वह जो हत्यारा आया है
जीवन ने पशु के रूप में उगला है उसे
हमारी इंसानियत से भयभीत है
पतझर वार कर रहा है
हत्यारा हत्या
युद्धखोर युद्ध के लिए बनाता
घातक हथियार
हम अपने भीतर के
उस बीज से कैसे इनकार कर दें
जिसमें पेड़ होने
और हरापन फहराने की
जबर्दस्त संभावना है।

वास्तव कितना वास्तव

‘वास्तव में’ कहने के लिए बुलाया गया मुझे
वास्तव में क्या घटा कहने से पहले
जरा ठहर गया मैं
पट्टी उतरनी थी जख्म की
ताजा होना था बेदर्द दर्द फिर से।

वे वास्तव में सुनना नहीं चाहते थे
ठने हुए का मजाक उड़ाना चाहते थे
अदृश्य चाबुक या उनकी निगाहों में
जहां से वास्तव में लौटना पड़ा मुझे

मैंने भीतर के अलाव से
बर्फ नहीं हटने दी
जानता था जीवन एक नदी
काल समुद्र में मिलना था आखिर
पर वास्तव में वास्तविकता कहते
थम गया था उस पल
बहरों के आगे बांसुरी की टेर नहीं

एक और महफिल की तलाश में निकल आया
जहां दिल में दर्द हो
कान सुनते हों हर राग
आंखे कतराएं न जख्मों से
वास्तव में कहने के लिए नहीं बुलाया गया मुझे।

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