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कविताएं: सूप

रविवारी कविताएं।

Author November 4, 2018 11:38 PM
प्रतीकात्मक फोटो

उद्भ्रांत

सूप
वह सूप
जिसमें जनमते ही
उसे लिटाया दाई ने
और पंडित ने
मंगल-ध्वनियों के बीच
जिसमें बांधा एक लाल धागा;

बरस-दर-बरस जिस धागे में
एक-एक गांठ बांधती थी मां
सूप में झुलाते हुए,
निरंतर बड़े होते हुए भी
दांए पांव से
हल्का स्पर्श करवाते सूप को।

घर से जब रहता था बाहर वह
उस विशेष दिन, तो भी-
मां नहीं कभी भी भूलती थी
उसी रीति-रिवाज के संग
मनाना उसका जन्मोत्सव।

पिछले बरस
मां के जाते समय
क्रूर समय ने
उसे रहने दिया उसके पास नहीं,
वरना वह मां से पूछता अवश्य-

कहां है वह सूप
जिसमें पांव उसका रख
टीका लगाते हुए माथे पर
मां उसका करती मुंह मीठा;

और रखती सिक्के या रुपए कुछ
हाथ में-
हजारों कमाने वाले बेटे के;

गाते हुए मंगलगीत
अपने मधुर स्वर में?

सूप यदि अभी भी
होगा सुरक्षित कहीं तो
उसमें सत्तावन के बाद
अट्ठावनवीं
गांठ क्या लगी होगी?

और कल प्रात: को
किसने लगाई होगी
गांठ उनसठवीं?

क्या उसका दिल ही अब
बरस-दर-बरस
लगाएगा
खुद ही गांठ?

स्मृति के सूप में
झूलते हुए झूला?

और उसकी प्रकृति मां
उसे सुनाएगी गीत मांगलिक,
चिड़ियां उसे
पुनर्जीवन देने चहचहाएंगी
आसपास के सारे वृक्ष उसे देखकर
गाएंगे-झूमेंगे,
सैकड़ों पत्तों से अपने
बजाते हुए एक साथ तालियां।

मनाएंगे उसके जन्म का उत्सव
कहते हुए उससे- न उदास हो,
दूर अपने घर में बैठी मां तेरी
उसी तरह से लाल धागों में
लगा चुकी है गांठ उनसठवीं
सूप को झुला रही,
गीत मंगल गा रही।

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