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दाखिले का दंगल, परेशानी की वजहें

इन दिनों देश भर के विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया चल रही है। हालांकि कुछ पाठ्यक्रमों के लिए पात्रता परीक्षा ली गई है, पर ज्यादातर विश्वविद्यालयों में अंकों के प्रतिशत के आधार पर दाखिले हो रहे हैं। इस साल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में बहुत सारे विद्यार्थियों ने नब्बे फीसद से ऊपर अंक अर्जित किए हैं। ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय ने दाखिले के लिए अंक प्रतिशत भी ऊंचे रखे हैं, जिसके चलते ज्यादातर बच्चे दाखिले से वंचित रह जाएंगे। दूसरे शिक्षा बोर्डों से पढ़े विद्यार्थियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में उन्हें निजी विश्वविद्यालयों या फिर दूरस्थ शिक्षा का रुख करना पड़ेगा। उच्च शिक्षा में दाखिले को लेकर भागदौड़ का विश्लेषण कर रहे हैं सुशील राघव।

Author July 14, 2019 12:17 AM
अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए नौकरी बदल कर सपरिवार पलायन तक कर जाते हैं। हर साल बारहवीं पास होने वाले एक-तिहाई से अधिक विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए दाखिला नहीं मिल पाता है। आधे जो दाखिला पाते भी हैं, तो उनमें से बड़ी संख्या दूरस्थ्य या मुक्त शिक्षा प्रणाली में चले जाते हैं।

देश में इस समय लगभग सभी विश्वविद्यालयों और विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले की प्रक्रिया चल रही है। विश्वविद्यालयों की ओर से जारी की जा रही ऊंची कटऑफ और प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ियों ने दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को तनाव में डाल रखा है। हर विद्यार्थी और उसके अभिभावक सिर्फ एक सीट की चाहत रखते हैं। लेकिन 851 विश्वविद्यालयों (47 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 383 राज्य के सरकारी विश्वविद्यालय, 295 राज्य के निजी विश्वविद्यालय, 123 डीम्ड विश्वविद्यालय और राज्य कानून से बने तीन संस्थान) और इकतालीस हजार से अधिक महाविद्यालयों के बावजूद पढ़ने की चाह रखने वाले देश के हर युवा को वह एक ‘सीट’ नहीं मिल पाती है। अपने बच्चे को सीट दिलाने के लिए अभिभावक हर तरह की कोशिश करते हैं। कई बार वे अपने राज्य को छोड़ कर दूसरे राज्य तक में जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। इतना ही नहीं, कई बार ऐसा भी देखा गया है कि अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए नौकरी बदल कर सपरिवार पलायन तक कर जाते हैं। हर साल बारहवीं पास होने वाले एक-तिहाई से अधिक विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए दाखिला नहीं मिल पाता है। आधे जो दाखिला पाते भी हैं, तो उनमें से बड़ी संख्या दूरस्थ्य या मुक्त शिक्षा प्रणाली में चले जाते हैं। इसके अलावा विद्यार्थियों का एक बड़ा हिस्सा निजी विश्वविद्यालयों का रुख कर लेता है।

मांग और आपूर्ति में अंतर
भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मांग और पूर्ति में बड़ा अंतर है। यानी जितने बच्चे हर साल बारहवीं पास करते हैं, उसके मुकाबले स्नातक स्तर की सीटें बहुत कम हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 2018 में उच्च शिक्षा में 3.66 करोड़ से अधिक विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इनमें से 2.90 करोड़ विद्यार्थी स्नातक स्तर पर पढ़ रहे हैं। वहीं, 2018 में 1.54 करोड़ विद्यार्थी बारहवीं में पंजीकृत थे। ऐसे में साफ है कि स्नातक स्तर पर नब्बे लाख से कुछ अधिक सीटें हैं, जबकि इच्छुक विद्यार्थियों की संख्या डेढ़ करोड़ के आसपास है। मांग और पूर्ति में इस बड़े अंतर की वजह से काफी विद्यार्थियों को दाखिला नहीं मिल पाता है और वे उच्च शिक्षा से हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।

बोर्ड की मूल्यांकन पद्धति अलग-अलग
भारत में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई), काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (सीआइएससीई) और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआइओएस) सहित उनतीस बोर्ड कार्यरत हैं। सभी परीक्षा बोर्ड अलग-अलग मूल्यांकन पद्धति का उपयोग करते हैं। इनमें से कुछ ऐसे बोर्ड हैं जो अपने विद्यार्थियों को बढ़ा-चढ़ा कर अंक देते हैं और कुछ वास्तविक अंक प्रदान करते हैं। सीबीएसई और सीआइएससीई पर हमेशा से आरोप लगता रहा है कि वह अपने विद्यार्थियों को बढ़ा-चढ़ा कर अंक देता है। इस बार सीबीएसई की बारहवीं कक्षा में अव्वल आने वाली दोनों छात्राओं हंसिका शुक्ला और करिश्मा आरोड़ा के 500 में से 499 अंक आए। इसी तरह सीआइएससीई की बारहवीं कक्षा में शीर्ष पर रहने वाले देवांग कुमार अग्रवाल और विभा स्वामिनाथन ने 400 में से 400 अंक हासिल कर इतिहास रचा। वहीं, बिहार बोर्ड की बारहवीं कक्षा में अव्वल आने वाली रोहिणी प्रकाश और पवन कुमार के 500 में से 473 अंक आए।

अलग-अलग मूल्यांकन पद्धति की वजह से कुछ बोर्डों के बच्चे हमेशा पीछे रह जाते हैं, जबकि अन्य कुछ बोर्डों के विद्यार्थी स्नातक स्तर पर दाखिला लेने में सफल हो जाते हैं। सभी को एक समान मौका देने के उद्देश्य से पूरे देश में एक तरह की मूल्यांकन पद्धति को लागू किया जाना चाहिए। नहीं तो कुछ बोर्डों के विद्यार्थियों के साथ हमेशा अन्याय होता रहेगा और कुछ बोर्डों के विद्यार्थी लगातार आगे बढ़ते रहेंगे।

पाठ्यक्रम में अंतर
देश के परीक्षा बोर्डों के बीच सिर्फ मूल्यांकन पद्धति का अंतर नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को पढ़ाए जाने वाले पाठ्यचर्या में भी भारी अंतर है। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वालीं प्रवेश परीक्षाएं सीबीएसई के पाठ्यक्रम पर आधारित होती हैं। फिर चाहे वह इंजीनियरिंग की संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) मेन हो या मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) हो। यही वजह है कि सीबीएसई के पाठ्यक्रम के आधार पर प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अधिक बच्चे इन परीक्षाओं में सफल होते हैं, जबकि अन्य राज्य बोर्डों के बच्चे ज्यादातर पीछे ही रह जाते हैं। इस समस्या के निदान के लिए जरूरी है कि देश के सभी बोर्ड एक जैसा पाठ्यक्रम रखें। कम से कम कक्षा दस और उसके बाद तो ऐसा कर ही सकते हैं। इससे सभी राज्यों के विद्यार्थियों को प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा और वे भी इंजीनियरिंग, मेडिकल, वास्तुकला, विधि सहित विभिन्न पेशेवर संस्थानों में दाखिला लेने में सक्षम हो सकेंगे।

प्रवेश परीक्षाओं का खराब स्तर
हमारे देश में प्रवेश परीक्षाओं का स्तर अभी उतना सही नहीं है। राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी (एनटीए) के आने के बाद स्थिति में कुछ सुधार की उम्मीद जगी है, लेकिन अभी इसमें समय लगेगा। प्रवेश परीक्षाओं के दौरान कई तरह की समस्याओं का विद्यार्थियों को सामना करना होता है। इनमें सबसे अधिक परेशानी कंप्यूटर आधारित प्रवेश परीक्षाओं में आ रही है। एक सवाल के एक से अधिक सही उत्तर होना, सवालों का पाठ्यक्रम के बाहर से आना, प्रश्नों का गलत होना, परीक्षा में कंप्यूटर का सही काम नहीं करना आदि समस्याओं से विद्यार्थियों को दो-चार होना पड़ता है। नीट-2019 को लेकर भी विद्यार्थियों ने ऐसे ही आरोप लगाए हैं। इनमें से कुछ विद्यार्थी अदालत की शरण में भी पहुंचे थे। प्रवेश परीक्षाओं के खराब स्तर की वजह से सही उम्मीदवार दाखिले के दरवाजे तक पहुंच ही नहीं पाता है। हालांकि एनटीए ने प्रवेश परीक्षाओं में धीरे-धीरे कुछ सुधार करने की कोशिश शुरू की है। इसमें अभी कुछ साल लग सकते हैं।

नहीं मिलता पसंद का पाठ्यक्रम
शिक्षा ग्रहण करने के दौरान विद्यार्थियों की रुचि किस विषय या गतिविधि में है, इसका बहुत महत्त्व होता है। भारत में विद्यालय स्तर पर कुछ हद तक इस पर ध्यान भी दिया जाता है। लेकिन विश्वविद्यालय स्तर पर हमारे देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जहां रुचि के आधार पर पढ़ाई को आगे बढ़ाने की सहूलियत विद्यार्थियों को मिलती हो। ऐसे में कला या साहित्य विषयों में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को कॉमर्स और नाटक पसंद करने वाले विद्यार्थियों को इंजीनियरिंग में प्रवेश लेना पड़ता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले अधिकतर विद्यार्थी असमंजस में रहते हैं। उन्हें समझ ही नहीं आता है कि वे कॉलेज को प्राथमिकता दें या फिर पाठ्यक्रम को। देखा गया है कि इस असमंजस में विद्यार्थी कॉलेज को प्राथमिकता देते हैं, जिससे उन्हें रुचि का पाठ्यक्रम नहीं मिल पाता है। दाखिला मिलने के कुछ समय बाद उन्हें अहसास होता है कि उन्होंने गलत फैसला ले लिया। हालांकि तब तक काफी देर हो जाती है। ल्ल

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