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रविवारीः ये आग कब बुझेगी

हजारों साल पहले आग का इंसान के हाथ लगना उसकी जिंदगी को क्रांतिकारी ढंग से बदलने वाला करिश्मा था।

गरमी का मौसम शुरू होते ही हर साल शहरों में कहीं न कहीं आग की बड़ी घटना हो जाती है। हालांकि आजकल भवन निर्माण में अग्नि शमन संबंधी अत्याधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाने लगा है, आग से बचने के उपायों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, पर शहरों के पुराने इलाकों, कारखानों आदि में इस समस्या पर काबू पाना चुनौती बना हुआ है। जब भी आग की कोई भीषण घटना होती है, सारा दोष नगर निगम और दमकल विभाग के मत्थे मढ़ दिया जाता है। पर हकीकत यह भी है कि लोग खुद इस समस्या को न्योता देने से परहेज नहीं करते। अग्नि शमन संबंधी नियम-कायदों का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते। शहरों में आग लगने की घटनाओं और इसके पीछे की वजहों का विश्लेषण कर रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह। 

हजारों साल पहले आग का इंसान के हाथ लगना उसकी जिंदगी को क्रांतिकारी ढंग से बदलने वाला करिश्मा था। जंगलों में शिकार कर कच्चा मांस खाने वाला इंसान आग की मेहरबानी से ऐसी ताकत पा गया था, जिसने उसे दूसरी जीव जातियों पर प्रभुत्व हासिल करने और जीने का एक बेहतरीन तरीका हासिल करने में मदद की। पर यह आग अब खुद हमें झुलसा रही है। आधुनिक शहरों के रूप में कंक्रीट के जो जंगल इंसान ने खड़े किए हैं, वे अफसोसजनक ढंग से ऐसी चिंगारियां पैदा कर रहे हैं, जिनसे इंसानी जानों और कीमती सामान का बेइंतहा नुकसान हो रहा है।

कुछ अरसा पहले दिल्ली के बवाना इंडस्ट्रियल इलाके में स्थित अवैध पटाखा फैक्ट्री में लगी आग से लेकर हाल में सुल्तानपुरी के रिहाइशी इलाके में स्थित अवैध जूता फैक्ट्री में हुए अग्निकांडों ने साबित किया है कि कैसे नियमों की अनदेखी और छोटी-छोटी लापरवाहियां भयानक हादसों में बदल जाती हैं। बीते कुछ महीनों में मुंबई के कमला मिल्स इलाके के रेस्तरां मोजो और वन अबव और बंगलुरु के पब समेत कई ऐसी घटनाएं हैं, जो साबित करती हैं कि खराब शहरी नियोजन और प्रबंधन भी ज्यादातर शहरी इमारतों-जगहों में आग लगने की एक वजह है। यह प्रबंधन इमारतों को मौसम के हिसाब से ठंडा-गर्म रखने, वहां काम करने वाले लोगों की जरूरतों के मुताबिक आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान जुटाने में तो दिलचस्पी रखता है, पर जिन चीजों से विनाशकारी आग पैदा होने या उसे रोकने का प्रबंध किया जा सकता है- उस पर उसका रत्ती भर ध्यान नहीं होता। कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके आधुनिक शहर भी आग को इस वजह से न्योता देते हैं कि वहां किसी मामूली चिंगारी को भयावह अग्निकांड में बदलने वाली कई चीजें और असावधानियां मौजूद रहती हैं। मुंबई स्थित रेस्तरां वन-अबव और मोजो में लगी आग ने इसी ओर एक बार फिर इशारा किया था। दर्जन भर से ज्यादा जानें लीलने वाली आग से हुई कितना नुकसान हुआ, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जिस युवती का जन्मदिन उस रेस्तरां में मनाया जा रहा था, वही युवती अपना जीवन खो बैठी। शहरों में आग के कई हालिया उदाहरण हैं। कुछ ही महीने पहले मुंबई में ही मशहूर आरके स्टूडियो का एक अहम हिस्सा जल कर खाक हो गया था। इस आग पर स्टूडियो के संस्थापक राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर ने कहा था कि आरके फिल्मों की यादों को आग ने छीन लिया है।

मुंबई ही नहीं, दुनिया के कई अन्य बड़े शहरों में आग से जुड़े हादसे हाल के कुछ ही वर्षों में हुए हैं। ब्रिटेन के बेहतरीन शहर लंदन का चौबीस मंजिला ग्रेनफेल टावर देखते-देखते राख हो गया था। पिछले एक-डेढ़ साल के अंतराल में अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना से लेकर दिल्ली में द्वारका स्थित पांच सितारा होटल और दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस स्थित अंतरिक्ष भवन, आईटीओ स्थित एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र समूह की इमारत और नोएडा की फैक्टरियों में लगी भयानक आग ने यही साबित किया है कि आज हर आधुनिक शहर ऐसी वजहें पैदा कर रहा है, जिनके चलते मजबूत कंक्रीट से बनी इमारतें भी आग के सामने टिक नहीं पा रही हैं।

असल में, आधुनिक वक्त के निर्माण का जो सबसे चिंताजनक पहलू इधर कुछ वर्षों में निकल कर सामने आया है, वह शहरी इलाकों में लगने वाली आग का ही है। मुंबई के रेस्तरां में आग लगने की हालिया घटना हमें कब तक याद रहती है, पता नहीं, लेकिन अगर इससे अब भी पूरे देश में सबक नहीं लिया गया, तो नतीजे भयावह हो सकते हैं, क्योंकि शहरीकरण तेज रफ्तार पकड़ चुका है और नियमों को धता बता कर घर, दफ्तर, मकान, बाजार आदि बनाने के मामले में हर कोई आगे है। ज्यादातर मामलों में आग किसी बेहद छोटे कारण से शुरू होती है। जैसे मामूली शॉर्ट सर्किट या बिजली के किसी खराब उपकरण का आग पकड़ लेना। यह बात कई सौ साल पहले समझ में आ गई थी, पर अफसोस है कि ऐसी मामूली वजहों की असरदार रोकथाम अब तक नहीं हो सकी। जैसे, चार सौ साल पहले 1666 में लगी ग्रेट फायर आॅफ लंदन के बारे में कहा जाता है कि इस शहर को बेहद ‘तुच्छ’ वजहों से उठी चिंगारी ने बर्बाद किया था। ‘ग्रेट फायर आॅफ लंदन’ के पीछे जो वजह बताई जाती रही है, उसके मुताबिक वह आग लंदन की पुडिंग लेन स्थित एक छोटी बेकरी शॉप में शुरू हुई थी। इसी तरह अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित ओकलैंड वेयरहाउस में एक प्रायोजित म्युजिक कंसर्ट के आयोजन के वक्त लगी आग एक रेफ्रिजरेटर की देन बताई जाती है। आज की आधुनिक रसोइयों में रखे फ्रिज-माइक्रोवेव से लेकर एसी, कंप्यूटर जैसे उपकरण और फाल्स सीलिंग के भीतर की जाने वाली वायरिंग महज एक शॉर्ट सर्किट के बाद काबू नहीं किए जा सकने वाले आग के शोले पैदा कर रही है। यह सिर्फ इत्तफाक नहीं है कि लंदन के ग्रेनफेल टावर की आग के पीछे इस इमारत के एक फ्लैट में रखे रेफ्रिजरेटर में हुए विस्फोट को अहम वजह माना गया था, वहीं मुंबई के रेस्तरां की आग शॉर्ट सर्किट की देन बताई गई।

दोष किसका है
समस्या यह है कि आधुनिक शहरीकरण की जो मुहिम पूरी दुनिया में चल रही है, उसमें सावधानियों और आग से बचाव के उपायों पर ज्यादा काम नहीं किया गया है। आज प्राय: इमारत ऐसे बिल्डिंग मैटीरियल से बन रही है, जिसमें आग को निमंत्रित करने वाली तमाम चीजों का इस्तेमाल होता है। आंतरिक साज-सज्जा के नाम पर फर्श और दीवारों पर लगाई जाने वाली सूखी लकड़ी, आग के प्रति बेहद संवेदनशील रसायनों से युक्त पेंट, रेफ्रिजरेटर, इनवर्टर, माइक्रोवेव, गैस का चूल्हा, इलेक्ट्रिक चिमनी, एयर कंडीशनर, टीवी और सबसे प्रमुख पूरी इमारत की दीवारों के भीतर बिजली के तारों का संजाल (इनटर्नल वायरिंग) है, जो किसी शॉर्ट सर्किट की सूरत में छोटी-सी आग को बड़े हादसे में बदल डालते हैं। इस सभी चीजों को आग से बचाने के इंतजाम भी प्राय: या तो किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, जैसे एमसीवी आदि के हवाले होते हैं या फिर फायर अलार्म के सहारे, जो अक्सर ऐसी सूरत में काम करते नहीं मिलते हैं, क्योंकि उनकी समय-समय पर जांच नहीं होती।

बिजली के तारों का जंजाल
बिजली न होना बेशक एक समस्या है, पर जिस समस्या की तरफ शायद किसी सरकार की नजर नहीं गई है, वह शहरों की सड़कों के बीचोंबीच झूलते तारों की है, जो ज्यादातर शहरवासियों के जी का जंजाल बन गई है। दिल्ली का अति व्यस्त और बेहद पुराना चांदनी चौक-चावड़ी बाजार इलाका तो ऐसी झूलती तारों की मिसाल बन गया है। यहां पता ही नहीं चलता कि बिना तारों के जंजाल के खुला आसमान भी कहीं से दिख सकता है। पर क्या लखनऊ, क्या दिल्ली, क्या कानपुर और क्या लुधियाना- देश के हर छोटे-बड़े अनियोजित ढंग से बसे शहर का यही हाल है कि वहां की आम सड़कों और गली-मोहल्लों के बीच बिजली के अलावा टेलीफोन, केबल नेटवर्क आदि के तारों के समूह एक ही जगह से होकर गुजरते हैं। देखा गया है कि इन जगहों पर बिजली के एक ही खंभे से दर्जनों घरों और दुकानों को कनेक्शन दिए जाते हैं। कई छोटे शहरों में तो घनी आबादी वाले इलाकों में घरों-बाजारों के बीच से हाईटेंशन लाइन भी गुजरती है, जिससे बड़े हादसे की आशंका हमेशा बनी रहती है। देखा गया है कि शहरों की जिन संकरी गलियों में पैदल चलना भी आसान नहीं होता, वहां आसमान में चारों ओर तारों का ऐसा जंजाल फैला होता है मानो वह जाल न बनाया गया, तो आसमान ऊपर से हम पर गिर पड़ेगा।

गैरकानूनी ढंग से एक के बाद एक घर और दुकान को बिजली के एक ही खंभे से दिए गए कनेक्शन बिजली आपूर्ति का दबाव बनाते हैं, जिससे कभी भी शॉर्ट सर्किट होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे हादसे होते भी हैं। शॉर्ट सर्किट की वजह से जब तारों में आग लगती है तो वह जरा-सी देर में आसपास के घरों और दुकानों तक पहुंच जाती है। वहां आग बुझाना भी आसान नहीं होता, क्योंकि संकरी गलियों में दमकल की गाड़ियों का पहुंच पाना तकरीबन नामुमकिन होता है। बारिश के दिनों में इन्हीं तारों के जंजाल से कई बार करंट घरों में रहने वाले लोगों तक जा पहुंचता है और अचानक किसी हादसे का कारण बन जाता है। दिल्ली के मशहूर चावड़ी बाजार में बिजली के झूलते तारों की वजह से करंट फैलने और शॉर्ट सर्किट की सैंकड़ों घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन प्रशासन यहां हाथ नहीं डालता। बताते हैं कि इसकी वजह बिजली के अवैध कनेक्शन हैं जो तारों को हटाने पर काटने पड़ सकते हैं। चूंकि विद्युत विभाग के कर्मचारियों को इन अवैध कनेक्शनों से हर महीने मोटी कमाई होती है, इसलिए वे तारों का जंजाल काटने की कोई मुहिम शुरू नहीं करते। जाहिर है कि दूसरे शहरों में भी ऐसी बदइंतजामी के पीछे कुछ ऐसे ही कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।
यह देखते हुए कि हमारी सरकार स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत शहरीकरण की एक नई मुहिम शुरू कर चुकी है, पुराने बसे शहरों में बिजली के तारों जैसी अराजकता दम घोंटने वाली प्रतीत होती है। इस पर अफसोस यह कि ऐसी विराट समस्याओं का हमारी सरकारें और योजनाकार कोई गंभीर नोटिस तक नहीं लेते हैं। इसी का नतीजा है कि आज देश के ज्यादातर शहर बेकाबू और अनियोजित फैलाव के शिकार हो गए। रोजी-रोटी के मौके देने के लिहाज से ये बेरोजगारों के स्वर्ग कहे जाते हैं, पर अराजक शहरीकरण ने इन्हें असल में कहीं का नहीं छोड़ा।

ऊंची है बिल्डिंग…
हमारे देश में लापरवाहियों की लंबी फेहरिस्त है। इस प्रबंध की जांच नहीं होती कि अगर आग लगी तो बचाव के क्या साधन आसपास मौजूद हैं। कोई आपात स्थिति पैदा हो तो वहां निकासी का रास्ता क्या है, क्या वहां मौजूद लोगों को समय पर अलर्ट करने का सिस्टम काम कर रहा है। कुछ और अहम बातें भी हैं जो शहरों में आग को विनाशकारी ताकत दे रही हैं। जैसे, तकरीबन हर बड़े शहर में बिना यह जाने ऊंची इमारतों के निर्माण की इजाजत दे दी गई है कि क्या उन शहरों के दमकल विभाग के पास जरूरत पड़ने पर उन इमारतों की छत तक पहुंचने वाली सीढ़ियां (स्काईलिफ्ट) मौजूद हैं या नहीं। मसलन दिल्ली में दमकल विभाग के पास अधिकतम चालीस मीटर ऊंची स्काईलिफ्टें हैं, पर यहां इमारतों की ऊंचाई सौ मीटर तक पहुंच चुकी है।
यही हाल, इसके एनसीआर इलाके का है। नोएडा में भी अधिकतम बयालीस मीटर ऊंची स्काईलिफ्ट उपलब्ध है, पर यहां जो करीब दो हजार गगनचुंबी इमारतें हैं या जिनका निर्माण चल रहा है, उनमें से कुछ की ऊंचाई तीन सौ मीटर तक है (निर्माणाधीन टावर- सुपरनोवा तीन सौ मीटर ऊंचा होगा)। लगभग यही स्थिति देश के दूसरे बड़े शहरों में है।

अवैध कारखानों का मर्ज
इस साल की शुरुआत में दिल्ली के बवाना में जिस पटाखा फैक्ट्री में आग लगी थी, उसे पटाखे बनाने का लाइसेंस मिलना एक रहस्य बना रहा। मसला यह था कि जिस फैक्ट्री में हादसा हुआ था, उसके पंजीकरण के समय बताया गया था कि वहां सौ मीटर के इलाके में प्लास्टिक के सामान का काम किया जाएगा। हालांकि आग लगने का मुख्य कारण वे पटाखे थे, जिन्हें वहां बनाया जा रहा था। साफ है कि फैक्ट्री में पटाखे अवैध ढंग से बनाए जा रहे थे। इस फैक्ट्री को लाइसेंस देने का मामला हादसे के बाद तब उलझ गया था, जब एमसीडी ने कहा कि लाइसेंस उसकी ओर से जारी नहीं किया गया था। इसी तरह दिल्ली स्टेट इंडस्ट्रियल ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन (डीएसआईआईडीसी) ने यह कह कर हाथ खड़े कर दिए थे कि उसके पास तो फैक्ट्रियों के लाइसेंस जारी करने की पावर ही नहीं है।

डीएसआईआईडीसी ने बवाना हादसे पर अपनी जो प्राथमिक रिपोर्ट दिल्ली सरकार को सौंपी थी, उसमें साफतौर पर कहा गया कि डीएसआईआईडीसी के पास किसी भी तरह की रेगुलेटरी पावर नहीं है। उसे फैक्ट्री भवन या उनके निर्माण के लिए लाइसेंस या आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। लाइसेंसिंग के नियम का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया था कि भवन निर्माण और फैक्ट्री लाइसेंस जारी करने का अधिकार डीएमसी अधिनियम के तहत एमसीडी के पास है। इस अधिनियम के तहत स्वीकृत रूपरेखा योजना के अनुसार एमसीडी किसी भी भवन निर्माण की जांच कर सकती है और अगर कहीं नियमों का पालन नहीं हो रहा है, तो एमसीडी उस परिसर को खाली भी करवा सकती है। यही नहीं, अगर किसी फैक्ट्री में आग लगने की आशंका है, तो एमसीडी कमिश्नर लिखित आदेश जारी कर उस फैक्ट्री को खाली या बंद करवा सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, लाइसेंसिंग नीति 2017 में लिखा है कि डीएमसी अधिनियम के सेक्शन 416 और 417 के तहत एमसीडी ही फैक्ट्री लाइसेंस जारी करती है। भवन के उन सभी तलों के लिए एमसीडी से लाइसेंस लेना जरूरी है, जहां वाणिज्यिक गतिविधि की जानी है। इससे लगता है कि एमसीडी की ओर से ही बवाना मामले में अनदेखी की गई।

आग से बचाव की जांच का सवाल
देश के किसी भी हिस्से में कोई फैक्ट्री या संस्था अग्निशमन विभाग की तरफ से मिले अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) के बिना नहीं चल सकता। यह एनसीओ भी उन्हें सीधे नहीं मिलती। मिसाल के तौर पर दिल्ली में अग्निशमन विभाग को जब एमसीडी, एनडीएमसी या अन्य संबंधित एजेंसियों से इसका आवदेन मिलता है, तो वे उन फैक्ट्रियों या संस्थानों की इमारतों में जाते हैं और जांच करने के बाद संतुष्ट होने पर एनओसी जारी करते हैं। लेकिन इस प्रावधान की खुलेआम अनदेखी होती है। आरोप है कि इन संबंधित विभागों के कर्मचारियों को पता भी रहता है कि किस फैक्ट्री में कौन-सा काम हो रहा है, लेकिन मिलीभगत कर सारी धांधलीबाजी की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं। उल्लेखनीय है कि दिल्ली के सबसे बड़े औद्योगिक इलाके बवाना और नरेला में अठारह हजार से ज्यादा फैक्ट्रियों को करीब सवा साल पहले अग्निशमन विभाग की ओर से फायर सेफ्टी नोटिस मिले थे, लेकिन राजनीतिक दखलंदाजी और कर्मचारियों-अधिकारियों की साठगांठ से तब मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2017 में नरेला और बवाना की लगभग सभी फैक्ट्रियों को एकतरफा फायर सेफ्टी नोटिस जारी किए गए थे। तब उद्योग मंत्री की मध्यस्थता में फैक्ट्री मालिकों को तीन महीने की मोहलत भी दिलाई गई थी, तब भी शुरुआत में सिर्फ बीस फीसद फैक्ट्री मालिक ही एनओसी ले पाए थे।

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