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गहराता संकट

कभी शहर-कस्बों की शान कहे जाने वाले तालाब, बावड़ी, झील और वेटलैंड कहे जाने वाले ऐसे ज्यादातर जलस्रोत लोगों की लापरवाही और सरकारी उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहे हैं। एक वक्त था जब आइटी सिटी के रूप में विख्यात कर्नाटक की राजधानी बेंग्लुरू को बेहतरीन आबोहवा के संदर्भ में भी जाना जाता था। इस शहर को ‘झीलों की नगरी’ की पदवी दी गई थी, लेकिन आज हकीकत यह है कि बेंग्लुरू मरती हुई झीलों का शहर बन गया है।

Author April 2, 2017 1:39 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अभिषेक

श हरों में बढ़ती आवासीय-भूख सिर्फ झीलों-तालाबों और बावड़ियों के खात्मे के रूप में ही नहीं दिख रही है, बल्कि पानी की छीनझपट भी इस पानीदार ग्रह पर हमारा जीवन नए संकट में डाल रही है। शहरों की आबादी बढ़ रही है और पेयजल के उनके अपने संसाधन घट रहे हैं। ऐसे में पानी राज्यों के बीच राजनीति और मोलभाव का हथियार बन गया है। हरियाणा के जाट समुदाय को यह बात सख्त नापसंद है कि पड़ोसी राज्य दिल्ली यमुना का सारा पानी पी जाए। पिछले साल तो हरियाणा के जाट आंदोलनकारियों ने दिल्ली को पेयजल सप्लाई करने वाली अहम मुनक नहर तक तोड़ दी थी। पंजाब-हरियाणा और कर्नाटक-तमिलनाडु के बीच पानी के बंटवारे के अपने झगड़े हैं, पर दिल्ली के उदाहरणों को सामने रखें तो कहा जा सकता है कि शहरों में किस वजह से पानी का नया संकट पैदा हो जाएगा, इसका अब अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है।

पिछले साल जाट आंदोलनकारियों द्वारा तोड़ी गई मुनक नहर की मरम्मत पूरी होने से पहले यमुना नदी में अचानक बढ़ी अमोनिया की मात्रा ने दिल्ली जल बोर्ड के चार और जलशोधन संयंत्रों को भी बंद करने पर मजबूर कर दिया। जलशोधन संयंत्र तभी तक पानी साफ करते रह सकते हैं जब तक कि नदी से उन्हें मिलने वाले पानी में अमोनिया की मात्रा तय स्तर से ऊपर न जाए। इसके लिए व्यवस्था यह है कि यमुना नदी में मिलने वाले नालों के पानी में प्रदूषण कम हो, लेकिन इसकी शर्तें तय होने के बावजूद दिल्ली के नजदीक पानीपत में यमुना में मिलने वाले नाले अत्यधिक प्रदूषित हैं। इससे यमुना में अमोनिया खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है।

मांगें मनवाने की राजनीति और प्रदूषण नहीं रोक पाने की लापरवाही ने पानी के मामले में दिल्ली के निवासियों की जिंदगी नरक बना दी है। पानी का यह ऐसा संकट है जिसके बारे में आज कोई बड़ा शहर गारंटी नहीं दे सकता कि ऐसे नजारे वहां उपस्थित नहीं होंगे। मुद्दा सिर्फ सरकारों या आंदोलनकारियों का रवैया नहीं है, बल्कि यह भी है कि आखिर शहरों ने पानी के संकट से निपटने के अपने क्या इंतजाम किए हैं और शहरवासी खुद पानी की सार-संभाल को लेकर कितने चिंतित हैं? जैसे दो साल पहले 2015 में महाराष्ट्र के नासिक में आयोजित महाकुंभ में स्नान पर्वों के दौरान नजदीक के गंगापुर बांध से कई हजार क्यूबिक अतिरिक्त पानी छोड़ने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि शाही स्नानों के लिए अतिरिक्त पानी छोड़ने का फैसला अवैध है। किसी धार्मिक आयोजन पर दी जा रही सहूलियतों के संबंध में अमूमन हर कोई टीका-टिप्पणी करने से बचता है क्योंकि इससे धार्मिक भावनाओं के आहत होने का खतरा होता है, लेकिन उस वक्त महाराष्ट्र सूखे की मार झेल रहा था। वहां के खेत पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण सूखे पड़े थे। इसीलिए अदालत ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया था। अकेले महाराष्ट्र में ही आईपीएल के सोलह मैचों का आयोजन के दौरान हर मैदान को दुरुस्त रखने के मकसद से करीब 21.6 लाख लीटर पानी खर्च होने का अनुमान लगाया गया था।

पानी के उपयोग की प्राथमिकता भी कई सवाल खड़े करती रही है। उद्योग को अहमियत देने वाली सरकारें आम जनता से ज्यादा कारखानों की फिक्र करती रही हैं। महाराष्ट्र देश का अकेला राज्य है जहां पानी मुहैया कराने के मामले में औद्योगिक इकाइयों को कृषि के मुकाबले ज्यादा तरजीह दी गई है। इसकी मिसाल यहां की सिंचाई परियोजनाएं हैं जिनका प्राथमिक उद्देश्य औद्योगिक और शहरी जरूरतों की पूर्ति करना है। राज्य के सर्वाधिक सूखाग्रस्त जिलों में से एक अमरावती में प्रधानमंत्री राहत योजना के अंतर्गत अपर वर्धा परियोजना बनाई गई। राज्य सरकार के एक निर्णय के तहत उसका पानी एक थर्मल पावर प्रोजेक्ट को दे दिया गया।

महाराष्ट्र और देश के अन्य इलाकों के संदर्भ में हालात की विकटता का सहज ही अंदाजा हो जाएगा। पिछले कई वर्षों से यह देखा जा रहा है कि जलाशयों का पानी किसानों और आम लोगों को पेयजल व सिंचाई के लिए देने की बजाय या तो बूचड़खानों और बड़ी कोल्ड ड्रिंक कंपनियो को सप्लाई किया जा रहा है या ऐसे आयोजनों में भेजा जा रहा है जहां वह सिर्फ बर्बाद होता है। एक अनुमान के मुताबिक मुंबई में चेंबूर के नजदीक देवनार में स्थित देवनार बूचड़खाने, आंध्र प्रदेश में हैदराबाद स्थित अल कबीर एक्सपोर्ट लिमिटेड और कोलकाता के मोरी गांव स्थित बूचड़खाने में ही हर दिन हजारों पशुओं को काटे जाने के बाद उनकी सफाई में करीब तीन लाख लोगों के उपयोग के बराबर पानी खर्च कर दिया जाता है। देश के अन्य हजारों बूचड़खानों में पानी की ऐसी ही बर्बादी होती है। यही हाल शीतलपेय बनाने वाली कंपनियों का है जो हर साल लगभग सात हजार करोड़ लीटर पानी बर्बाद कर डालती है। इस साल यह मसला केरल और तमिलनाडु में जोरशोर से उठ रहा है जहां स्थानीय दुकानदारों ने नामी कंपनियों के ठंडे पेयों को यह कह कर बेचने से इनकार किया है कि ये कंपनियां उनकी जमीन के पानी को प्रदूषित कर रही हैं और उसका अतिशय दोहन कर रही हैं।

शहरों में आम लोगों द्वारा बर्बादी के अलावा पानी के वितरण की नाकाम व्यवस्थाएं, सप्लाई में लीकेज और पानी की चोरी जैसी समस्याएं कोढ़ में खाज हैं। बारिश के पानी को जमा करने (वाटर हार्वेस्टिंग) और भूजल रिचार्ज करने वाली तकनीकों पर गंभीरता से अमल न करके पानी को राजनीति का टूल बनने का मौका दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मत है कि अगर यमुना पर बांध और बैराज बनाकर व बारिश के पानी को सहेजकर रखा जाए तो कितना भी संकट हो, दिल्लीवासियों को छह महीने तक पानी की सप्लाई आराम से हो सकती है।
दिल्ली इस मामले में अकेला उदाहरण नहीं है बेंग्लुरू से लेकर अमदाबाद और सूरत से लेकर कानपुर तक तकरीबन हर बड़े शहर में पानी को बचाने व सहेजने के बारे में एक-सा लापरवाह रवैया अपनाया गया है। भविष्य में ऐसे संकट न हों, इसके लिए जरूरी है कि देश के हर गांव और शहर के हर घर में पानी के संरक्षण के लिए वहां की परिस्थितियों के अनुसार जल संग्रहण का काम होना चाहिए। हर गांव का हर घर अपने एक खेत को पानी के संरक्षण के लिए समर्पित कर पानी की स्थानीय स्तर पर व्यवस्था कर सकता है। भूमिगत जल को वर्षा जल से रिचार्ज करने की जरूरत है ताकि वर्षा का पानी तत्काल बहने से रोका जा सके और उसे प्राकृतिक जल चक्र से जोड़ा जा सके। तालाबों व कुओं को वर्षा जल से जीवित करने और उन्हें लगातार रिचार्ज करने रहने की भी जरूरत है। शहरों की पानी की जरूरत को आसपास की नदियों के बजाय जल संरक्षण की उन व्यवस्थाओं से जोड़ने की जरूरत है जो वर्षा जल का संग्रह करके पूरे साल पानी की सप्लाई दे सकती है। ऐसे प्रबंध बड़े पैमाने पर हों, तो न तो मानसून सीजन में कम बारिश का भय सताएगा और न ही मुनक आदि नहर को बांधने से पीने के पानी के संकट की बात किसी अनहोनी की तरह लगेगी। -अभिषेक

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