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कहानी- वह लौटेगा एक दिन

पढ़ाई-लिखाई की प्रेरणा लेता, मेरे शहरी जीवन से प्रभावित रहता, शहर जाने को लगभग लालायित। मेरा कहा उसके लिए गुरुमंत्र होता। अपनी मां के कड़े अनुशासन में रह कर वह अपने सभी बहन-भाइयों सहित ठीकठाक पढ़ता-लिखता। इस बार मैं कई बरस बाद गांव आई, तो मंजर कुछ अलग-सा दिखा।

Author January 27, 2018 11:15 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

निर्देश निधि

कोई भूल सकता हो, पर मैं नहीं भूल सकता, डांडे वाले खेत की डौल पर खड़े शीशम के पेड़ पर बंधे अंगोछे से गर्दन के बल लटकते, जीवन हारे हुए अपने पिताजी को। उसी दिन निश्चय किया था मौसी कि इस छोटी खेती को अपनी आजीविका कभी नहीं बनाऊंगा। हां, अगर कभी कुछ ज्यादा जमीनें खरीद पाया और अपने बच्चों को सही से सैटल कर पाया, तो जरूर लौटूंगा गांव, नए साधनों के साथ।

मित्रो जीजी एक खुशमिजाज, दबंग महिला और उनके पति आदर्श ग्रामीण पुरुष थे। उनके पांच बेटे, एक बेटी में सबसे छोटा बेटा आनंद था। मैं जब भी गांव जाती, वह सदा मेरे आसपास घूमता रहता। पढ़ाई-लिखाई की प्रेरणा लेता, मेरे शहरी जीवन से प्रभावित रहता, शहर जाने को लगभग लालायित। मेरा कहा उसके लिए गुरुमंत्र होता। अपनी मां के कड़े अनुशासन में रह कर वह अपने सभी बहन-भाइयों सहित ठीकठाक पढ़ता-लिखता। इस बार मैं कई बरस बाद गांव आई, तो मंजर कुछ अलग-सा दिखा। बहुत बरसों से जीजा जी तो थे ही नहीं। मित्रो जीजी की बेटी राजो अपने घरबार की हो गई थी। पांच लड़कों में से कोई भी गांव में रहने को राजी नहीं था।

मित्रो जीजी के आंसू नहीं थमे थे, यह कहते हुए कि ‘सहर तो ऐसे हो गए गांव के आदमियों के लिए… एक बार कोई जाए तो फेर आनाई ना चाहता।’ फिर मुझसे बोली थीं, ‘बाकी चारों लड़के तो दूर हैं, रोज गांव से आ-जा न सकते, पर आनंद तो धोरई रह रया। सात-आठ मील ही तो है, चाहे तो हेंर्इं यानी घर से भी जा सकै है रोज अपने ओफिस। कल आवगा इतवार कू, तू उसे समझइए तो सई बिट्टो। बचपन में तेरी सलाह बौहत मान्ने करै था, क्या पता अब भी मान ले।’ उन्हें कैसे समझाती कि जब वो अपनी मां के इन बेशकीमती आंसुओं की ही नहीं माना, तो मैं किस खेत की मूली भला। यों भी अब बचपन की बात रही ही कितनी होगी उसमें। आनंद आया। शहरी अंदाज में ही सही, ढेर-सी आत्मीय बातें हुर्इं। यह भी कि बचपन में जो मैं कह देती वह कभी टालता ही नहीं था, जिस पर वह खूब हंसा था। मैं अपने सारे प्रश्न उसके आगे ले बैठी। सोचा कि इनके माध्यम से उसे गांव में रहने को राजी कर लूंगी।

‘आनंद, इस बार मुझे यहां आकर लगा कि कोई भी युवा गांव में रहना ही नहीं चाहता। यहां कुछ अच्छे स्कूलों, बाजारों, अस्पतालों का खुलना समस्या सुलझा सकता है क्या?’ ‘हरगिज नहीं, गांव कभी शहर नहीं बन सकता। दो-चार किलोमीटर पर ही धरती आसमान का अंतर हो जाता है।’ उसने दृढ़ता से कहा। ‘कहीं ऐसा न हो आनंद कि हमारे युवाओं के खेती में रुचि न लेने की वजह से एक दिन हमारी खेती विदेशी कंपनियों के हाथों में चली जाए।’ ‘जाएगी तो जाए, पर खेती में हम जैसे छोटे किसानों के लिए कोई संभावना है नहीं। खेतों में जितनी पैदावार होती है, लगभग उतनी ही लागत भी लग जाती है आंटी जी।’ ‘अरे! आंटी किसे कह रहे हो? शहरी हो गए हो ठीक है, पर रिश्तों में तो अंग्रेजी मत घोलो।’ मैंने उसे टोका।

वह अपनी भूल सुधारते हुए बोला, ‘सॉरी मौसी, पर यह भी तो देखिए कि बीज, खाद महंगे, नलाई-गुड़ाई-बुवाई के लिए मजदूर महंगे। डीजल महंगा तो जुताई भी महंगी। फसल जब तक किसान की, दो कौड़ी की। वही फसल व्यापारी की होते ही सोना हो जाती है। जैसे सरकारें किसानों को गरीब ही रखना चाहती हों।’ ‘हां, सो तो है।’ बस इतना बोल सकी मैं, क्योंकि बहुत ज्यादा जानकारी मुझे थी नहीं इस विषय की।

‘गन्ने की फसल है, जो थोड़ा पैसा उगाहती है। उसमें भी शुगर मिलों की चकल्लस देखिए, गन्ना लेती रहीं, खुद पैसा भेजती रहीं गन्ना समिति के पास। गन्ना समिति हफ्तों लगाती उसे बैंक भेजने में, फिर बैंक के लगाते रहिए चक्कर, जानने को कि पैसा पहुंचा या नहीं। कई बार तो दो-दो, तीन-तीन साल तक गन्ने का पैसा नहीं मिल पाया। अब कह रहे हैं कि हाथों-हाथ मिलेगा पैसा, देखिए कब तक देते हैं हाथों-हाथ।’

जान कर मुझे बहुत कोफ्त हुई। क्योंकि ग्रामीणों के खर्चे अब सब वही हैं, जो शहरी लोगों के। उन्हें भी शैंपू चाहिए, पेट्रोल-डीजल चाहिए, सिनेमा बाजार चाहिए, कपड़े-लत्ते भी स्टाइल वाले चाहिए, मोबाइल-डीटीएच चाहिए। बैठकें खत्म हो चुकी हैं गांवों से, अब वहां भी ड्राइंग रूम की सुंदर साज-सज्जा चाहिए। मसलन, वह सभी कुछ चाहिए, जो शहरों को चाहिए। वह फिर बोला, ‘सारी दुनिया के व्यापारियों का वह सामान, जिसे मौसम हानि पहुंचा सकता है सुरक्षित रहता है तिजोरियों या गोदामों में, किसान ही है जिसकी सारी मेहनत खेतों में पड़ी रहती है। मौसम भी अदबदा कर उसी से दुश्मनी निभाता है। जब बारिश की जरूरत होती है तो होती नहीं, जब जरूरत नहीं होती तब वह अकेली नहीं आती, हष्ट-पुष्ट ओले भी साथ लिए आती है, किसान की दिन-रात की मेहनत का दम निकाल कर चलती बनती है।’ कह कर वह हंसा।

‘पर आनंद, सरकार आर्थिक मदद करती है। लोन देती है किसानों को अपने काम करने और इन आपदाओं से निपटने के लिए, और जरूरत पड़ने पर कर्ज माफी भी करती ही है।’
मेरी इस बात पर तो वह बहुत जोर से हंसा- ‘क्या आपको लगता है कि फसलों की बरबादी के बदले कुछ सौ रुपए प्रति बीघा दे देने से नुकसान की भरपाई हो जाती होगी? सरकार कितने भी लोन देने और उन्हें माफ कर देने की ‘महानता’ क्यों न दिखा ले, बेचारा छोटा किसान तो आकंठ कर्जे में ही डूबा रहता है।’
‘तुम महानता इस तरह व्यंग्य में क्यों कह रहे हो।’

‘बताता हूं, छोटा किसान इस स्थिति में आ ही नहीं पाता कि सरकार का दिया लोन समय पर चुका सके। वह सरकार का चुकाने के लिए साहूकार से ऋण लेता है। कर्जे की वसूली के क्रूर तरीके से भयभीत हुआ किसान आत्महंता तक बन बैठता है। यदाकदा कुछ सरकारी कर्जे माफ भी होते हैं, जैसे किया था हाल ही में। दो सौ, चार सौ किराया लगा कर पहुंचे किसान को दस-बीस रुपए तक की कर्ज माफी के सर्टिफिकेट थमा दिए गए थे। क्या घटिया मजाक किया गया बेचारों के साथ।’

वह फिर भड़का, ‘ऐसे में अगर कोई लड़का शहर जाकर कमा सकता है तो गांव में ही रह कर भूखों मरना कहां की बुद्धिमत्ता है। जमीनों का क्या वह तो हर नई पीढ़ी के साथ बंट जाती हैं, सौ की पचास, पचास की पच्चीस, वगैरह। हम भाइयों के हिस्से में छह-छह बीघे रह गर्इं हैं बस। अगर मैं भी यहीं रहता, तो क्या खिलाता अपने परिवार को आज?’

‘लो मौसी-बेटे को बहस से फुर्सत हो तो ये हारे का कढ़ा हुआ दूध पियो।’ मित्रो जीजी हारे में पक कर गुलाबी हुआ दूध ले आई थीं। उसने जीजी की बात पर प्रतिक्रिया दिए बगैर दूध का गिलास पकड़ा और फिर शुरू हो गया, ‘नए लड़कों का शहर पलायन निश्चित है, चाहे खेती विदेशी कंपनियों के हाथों दासी बने या रहे।’

‘तो सरकार को अपनी नीतियां किसानों के लिए सहयोगी रखनी चाहिए।…’ मैंने कहा।
‘सरकार को लगता है कि वह है सहयोगी, सरकार में तो किसान की बात सही तौर पर पहुंचाने वाला भी शायद ही कोई है मौसीजी।’ वह मुझे रोक कर बोला।
‘तो क्या अब हमारा देश कृषि प्रधान नहीं रहेगा?’
‘अब यह तो वे लोग जानें, जो यह रिसर्च कर रहे हों।’
‘तुम जैसे शिक्षित ग्रामीण इसका उत्तर नहीं देंगे तो और कौन देगा?’
‘जो भी हो, पर इस परिस्थिति में किसी का भी सिर्फ किसान बने रहना असंभव है। वैसे भी गांव के बच्चे शहर की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं, शहरी लोग उन्हें गंवार कहते हैं। मैंने यह खुद सहा है पढ़ाई के दौरान, मनोबल बनाए रखना मुश्किल होता है।’
‘पर यहां गांव में बुजुर्ग कितने उदास और अकेले दिखाई देते हैं। जीजी यानी अपनी मां को ही ले लो, पहले ये कितनी खुशमिजाज हुआ करती थीं।’
‘हां, मां थक गर्इं। पहले पिता जी का दुनिया से चले जाना, फिर हम सबका शहर चले जाना बहुत परेशान करने वाला था उनके लिए। हम छह बहन भाई हैं, मां का मन जिसके पास लगे उसके पास रह सकती हैं। हमारे यहां वो समस्या नहीं है कि मां को साथ नहीं ले जाना चाहते। वही नहीं जाना चाहती।’
‘कैसे जाएंगी वे। यहां आकर जो शुद्ध वायु मेरे फेफड़ों में जाती है उसे छोड़ कर मेरा ही मन नहीं करता, यहां से जाने को। बस काम की मजबूरी है वरना…।’
‘जी हां बिलकुल, ऐसी ही मजबूरी हमारी भी है।’
‘पर आनंद, गांव की आबो-हवा तो शुद्ध है। खाने-पीने की सभी चीजें शुद्ध हैं, गांव में स्वस्थ रहा जा सकता है।’
‘जी वो ठीक है, पर आबो-हवा तो किसी का पेट नहीं भर देती, शिक्षित नहीं करती, रोजगार नहीं दे देती।… अगर पलायन ही रोकना है तो उन डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का रोका जाए, जिन पर सरकार लाखों रुपए खर्च करती है, इस आशा में कि वे पढ़-लिख कर अपने देश की सेवा करेंगे और वे विदेश जाकर उनकी चाकरी में जुट जाते हैं। हम हैं तो कम से कम अपने देश में ही।’
मैं चुप रही, अंत में उसने जो बोला उसके उत्तर में मेरे क्या, किसी के पास कुछ नहीं था बोलने को।
‘मैं कैसे भूल सकता हूं कि पैसे की कमी के रहते हम सबका पालन-पोषण ठीक-ठीक न कर पाने की वजह से मेरे पिता हर वक्त बेचैन रहते थे। एक बरस बारिश और आंधी ने गेहूं की पूरी फसल बर्बाद कर दी थी और जब धान की फसल का नंबर आया तो एक बूंद नहीं टपकी थी आसमान से। घर में खाने के भी लाले पड़ गए थे। मेरे और बाकी भाइयों की फीस न दे पाने के कारण कैसे अपराधी महसूस करते थे पिताजी खुद को। अवसाद में ही डूबते चले गए। जीजी की शादी के समय लिया गया कोई भी सरकारी या गैरसरकारी कर्जा चुका नहीं सके थे। कोई भूल सकता हो, पर मैं नहीं भूल सकता, डांडे वाले खेत की डौल पर खड़े शीशम के पेड़ पर बंधे अंगोछे से गर्दन के बल लटकते, जीवन हारे हुए अपने पिताजी को। उसी दिन निश्चय किया था मौसी कि इस छोटी खेती को अपनी आजीविका कभी नहीं बनाऊंगा। हां, अगर कभी कुछ ज्यादा जमीनें खरीद पाया और अपने बच्चों को सही से सैटल कर पाया, तो जरूर लौटूंगा गांव, नए साधनों के साथ।’
‘पापा प्लीज चलो न, मॉम कह रही हैं, मेरा ट्यूशन मिस हो जाएगा।’ उसकी बेटी उसे बुलाने चली आई थी। और आनंद शहर लौट गया। उसकी सब बातों को संपादित कर बस यही बताया था मैंने मित्रो जीजी को कि, ‘थोड़ा इंतजार करो जीजी, आनंद जरूर लौटेगा।’ मित्रो जीजी के चेहरे की शिथिल लकीरों में एक युवा तरंग दौड़ी और पल भर में ओझल भी हो गई थी। शायद अपने इंतजार कर पाने की अवधि की सीमा पर ध्यान चला गया हो उनका।…

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