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कहानी: मरु में दबी पीड़ा

जब दादी रजाई के अंदर होती तो आवाज देती, ‘ले रानू! या बड़ी वाली चाबी से गोल वाला ताला खुली और या छोटी चाबी से छोट वाला और पीतल की चाबी से पीतल वाला। जा दरवाजा के बगल मा मोर दवाई के शीशी धरी है ले आव। सुन याहें वाहें हाथ न लगये।... चीनी-मिट्टी के कंटर के तरफ हेरे भी न।... जल्दी आए।’ देर होने पर चिल्ला पड़तीं, ‘का करथिया जल्दी आव!’ अब दादी नहीं रही। जा चुकी है।

Author April 21, 2019 3:27 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

मीना गुप्ता

दादी के कमरे की चाबी रानू के हाथ में आ चुकी थी। आज सुबह ही मरणासन्न अवस्था में पड़ी दादी ने एकांत पाकर उसे इशारे से बुलाया और इशारे से ही समझाया- ‘इस चाबी को किसी और को मत देना।’  मई की तपती गर्मी। रानू तरबतर हो रही है। भीड़ बढ़ती जा रही है। तिल रखने की जगह न देख उसे खयाल आया कि क्यों न दादी का कमरा खाली कर दूं। चाबी तो मेरे पास है ही, लेकिन दादी ने यह बात उजागर करने से मना किया है।

दादी का कमरा बाहर से ही बड़ा रहस्यमय लगता था। उसमें पड़े तीन बड़े-बड़े ताले अंदर किसी बड़े खजाने का अहसास कराते थे। हर कोई उसके अंदर जाने के बहाने और मौके ढूंढ़ता था। जब दादी मायके जाती थी, तब तालों की संख्या चार हो जाती थी। अक्सर सर्दियों की ठंडी रातों में जब दादी रजाई के अंदर होती तो आवाज देती, ‘ले रानू! या बड़ी वाली चाबी से गोल वाला ताला खुली और या छोटी चाबी से छोट वाला और पीतल की चाबी से पीतल वाला। जा दरवाजा के बगल मा मोर दवाई के शीशी धरी है ले आव। सुन याहें वाहें हाथ न लगये।… चीनी-मिट्टी के कंटर के तरफ हेरे भी न।… जल्दी आए।’ देर होने पर चिल्ला पड़तीं, ‘का करथिया जल्दी आव!’ अब दादी नहीं रही। जा चुकी है।

सुबह चार बजे वाली गाड़ी से दिल्ली वाली बुआ आ गई थीं। आते ही अपनी मां को पूछा। रानू ने सारी कहानी बताई, ‘जिस दिन फालिज मारा था, उसी दिन दादी को हम लोग मंदिर वाले घर से ले आए थे। इलाज कराया, मगर ठीक नहीं हुई। खून कम था शरीर में। हम सब मिल कर उन्हें इधर से उधर रखते रहे। घर में थी, सब सही था। एक दिन सुनहरा अवसर जान पिताजी ने दादी को न जाने क्या पढ़ाया कि उन्होंने शाम तक मंदिर जाने की रट लगा दी, ‘मोहि मंदिर में छोड़ आव। चार आदमी देखई।’ सुनते ही उन्होंने रिक्शा बुलाया और दादी को मंदिर ले गए। दूसरे दिन जब मैं गई तो देखा कि दादी के बदन से सारे जेवर गायब थे। नीचे का होंठ कटा था। मार-पीट कर पैसा लेकर भाग गया था उनका बेटा। उनके कमरे के सारे ताले तो बहुत पहले ही तोड़ डाले थे।’

रानू जानती थी कि दादी ज्यादा दिन नहीं बचेगी। उस दिन कॉलेज से लौटते वक्त अनायास उसे लगा जैसे दादी उसे बुला रही है। उसके कदम मंदिर की तरफ अपने आप ही चल पड़े। कड़ी दोपहरी में मंदिर की चौहद्दी पर पड़ी चारपाई में बैठी दादी आसमान को ताकती कुछ बड़बड़ा रही थी। उसने आवाज दी, ‘दादी अम्मा क्या कर रही हो?’ रानू को देखते ही रो पड़ी, ‘का करिहों? भगवान से गुहार लगावथों। कबे मोर सुध लेई। कष्ट दैके भूल गा है। अब को है मोर। पास मोहल्ला वाले कबे लगे करिहें। खाना तो दई जाथें। मगर या नरक को देखी।… वा को करी!’ चारपाई के चारों तरफ मक्खियां भिनभिना रही थीं, जिन्हें दादी बार-बार भगाती।  रानू ने साथ ले गई पूरियां दी, तो बोली, ‘मैं अन्न जल त्याग दीन्हें हौं। अब तो मौत आ जाय।’ कह कर आंखें बंद कर ली।
रानू पुकारती रही। अपनी बेवशी पर रोती हुई वापस आ गई।

उस दिन मंदिर पहुंचते ही देखा, दादी मंदिर की चौहद्दी से उठा कर टिन की छत वाले कमरे में रख दी गई थी। उनकी सांसों के उठने और फिर गिर जाने के क्रम में लग रहा था जैसे इस बार जो सांस ली है, अब वह वापस नहीं आएगी और किसी अनंत आकाश में जा मिलेगी। हाथ-पैर नीले पड़ चुके थे। चेहरे और शरीर के अन्य खुले हिस्सों में मक्खियां बैठी थी, मगर दादी बेखबर थी। पहले किसी बर्तन पर मक्खी बैठ जाने पर उसे दस बार धोने वाली दादी को उन मक्खियों के अपने शरीर से लिपटे होने का अहसास भी नहीं हो रहा था। संज्ञाहीन हो चुकी थी। दादी की बेजान काया को उठवा कर रिक्शे में रखा गया। घर पहुंचते ही उन्होंने इशारे से गंगाजल और तुलसी मांगी। गंगाजल-तुलसी मिलते ही अंतिम लफ्ज फूटा- ‘भैया!’ अपने बेटे को बुला रही थी। बेटा आया और दादी के प्राण-पखेरू उड़ गए। दादी का दैत्य बेटा गरज उठा, ‘मेरे मां-बाप दोनों चले गए, अब मेरे पास कुछ नहीं है। आग देने के सिवा मैं कुछ नहीं कर सकता।’
रानू सब सुन और समझ रही थी। उसे चिंता सताने लगी। ‘आगे के सारे खर्च कैसे उठेंगे। दादी का चले जाना तो उनके लिए मुक्ति है और उसका दिल भी कितना हल्का है! पिछले छह महीने से वह दोनों वक्त की दुआ में दादी की मुक्ति की कामना करती रही है।… मगर अब!’
किसी ने कहा, ‘अरे! सेठानी को धरती पर लिटा कर कपड़े से ढक दो।’

रानू पड़ोस की दुकान से सफेद कपड़ा ले आई। झिझकते हुए उनसे कुछ पैसे भी मांग लिए, ‘बड़े भैया! दादी नहीं रही। आप तो जानते ही हैं कि घर में पिताजी को कोई मतलब ही नहीं है। भाई अभी छोटे हैं। बुआ लोगों ने भी हाथ पीछे कर लिए हैं। कहती हैं, हमारी मां ने तुम्हारे नाम तीस हजार जमा किया है। अब तुम नहीं करोगी तो कौन करेगा!’ दादी को नहलाने और उनकी अंतिम तैयारी का समय आ गया। उनका भारी शरीर जब मां से नहीं उठा, तब रानू आगे बढ़ी। दादी के पास से आ रही विषाक्त बदबू उसके नथुनों में भर गई। उसका हाथ नथुनों तक आते-आते रुक गया। दादी ने इतने दिनों सड़न और बदबू झेली। मैं थोड़ी देर नहीं झेल सकती! देखूं तो सही, दादी की पीड़ा कितनी गहरी थी!

दादी के पूरे शरीर पर मां ने घी का लेप किया। रानू ने सफेद साड़ी पहनाई। आज दादी वैसी ही लग रही थी जैसी वह दादा के न रहने पर दादा की अस्थियां गंगा में प्रवाहित कर इलाहाबाद से सफेद साड़ी में लिपटी हुई आई थी और फफक पड़ी। उस दिन दादी को सफेद साड़ी में देख रानू विगलित हो रो पड़ी थी। मगर आज उसकी आंखें कोरी बनी रहीं। अर्थी सज गई तब भी वह निर्निमेष बैठी उन्हें जाते देखती रही।

उसे चिंता थी कि इतने मेहमानों का खाना कैसे बनेगा! कडूभात के लिए चार दाने चावल भी तो नहीं हैं घर में! सोचती हुई रानू का हाथ कुरते की जेब में गया। सुबह पड़ोस से एक हजार लाई थी, उसमें से तीन सौ ही बचे थे। इतने पैसों में आज के खाने का इंतजाम तो हो जाएगा। उसने मां से थैला लिया और बाजार की तरफ निकल गई। बिखरे बाल और सूखे होठ लिए चौक पर पहुंची। सामने ही बरफ का पानी देख उसे याद आया, कल से उसने पानी नहीं पिया। गटागट दो गिलास पानी पी गई। अब उसे लगा, जैसे शरीर में जान आ रही है। मां ने रानू से कहा, तुम भी खा लो दादी के नाम के कडू भात। आज सच में चावल कड़वे लग रहे थे।

थोड़ी देर में सभी को सोया देख रानू अपनी किताब पकड़ छत पर पहुंची ही थी कि बड़ी बुआ आदेश कर उठी, ‘शाम की चाय का इंतजाम कर लो।’ कुरते की जेब में पड़ा एकमात्र पचास का नोट भी गया। वह नीचे न उतरी तो बड़ी बुआ चिल्ला उठी, ‘बड़ी आई पढ़ने वाली। घर में गमी है और इस लड़की की आंख में एक आंसू नहीं। उस पर किताब ले छत पर चढ़ गई है।’ रानू समझ गई, चाय का टाइम हो गया है।

शाम की चाय भी बन गई। रात का खाना भी हो गया। इस तरह मेहमानों का आना-जाना लगा रहा और रानू उनकी आवभगत में लगी रही। आवभगत से बचे समय को पकड़ वह चिलचिलाती धूप में छत पर चढ़ जाती। किताब में मन लगाने की कोशिश करती। बीच-बीच में मन अशांत होता- ‘आगे का खर्च कौन उठाएगा! कल उसके थर्ड इयर का तीसरा पेपर है। अच्छे प्रतिशत नहीं आए तो बीएड में प्रवेश कैसे होगा!’
इतने में दादी के दैत्य बेटे की आवाज फिर गरजी, ‘कल शुद्धि है। उसका प्रबंध कौन कर रहा है? मुझसे उम्मीद मत करना।’ उनका मंतव्य जान रानू फिर से पड़ोस में पहुंच गई।

पड़ोसन ने कहा, ‘रानू! पहले खुद को तो देखो, क्या हाल हो रहा है तुम्हारा! एक हफ्ते में तुम कैसी हो गई हो। तुम्हारे बाप का वश चले तो तुम लोगों को बेच कर खा जाए। तुम्हारी आंख में तो आंसू भी सूख गए से लगते हैं। थोड़ा रो लो अच्छा लगेगा।’ वह बोली, ‘नहीं आंटी मेरे पास अभी रोने का समय नहीं। आप बस मेरे ऊपर इतनी मेहरबानी कर दीजिये। दादी का आखिरी काम है।’

शुद्धि हो गई। दादी का बेटा अब अपनी जगह से हिल सकता था, इसलिए वह कूद रहा था। पिछले छह दिन की कसर निकाल रहा था। दिन भर घर में होने वाली महाभारत से यह अंदाजा हो गया कि तेरहवीं के इंतजाम की रानू को ही चिंता करनी पड़ेगी।  रानू और छोटी वाली ने बैंक से दस हजार निकाल चाचा के हाथ रख दिए। तेरहवीं भी हुई और मेहमान जाने लगे। बड़ी बुआ जाते समय बोली, ‘देखो! इस लड़की को; अम्मा सबसे ज्यादा इसे ही प्यार करती थीं, मगर इसकी आंख से एक आंसू नहीं टपका। पत्थर हो गई है।’ पहले घर से किसी की विदाई पर रो-रोकर सारा घर सिर में उठा लेने वाली रानू आज निर्निमेष जाने वालों को देख रही है। मेहमानों के जाते ही घर में सन्नाटा बोलने लगा।

रानू ने गहरी राहत की सांस ली। फुर्सत मिलते ही उसका ध्यान दादी के कमरे की ओर गया। मगर कमरा खोला तो वह स्तब्ध रह गई! दादी के कपड़े, बड़ा संदूक, तांबे के बरतन, फूल की कटोरियां, घी का बड़ा बर्तन आदि सारी चींजें गायब हो चुकी थीं। अब वहां सिर्फ रोशनी थी, जिसमें चीनी मिट्टी के दो मर्तबान चमक रहे थे, जिनसे दादी का विशेष स्नेह था। जब कोई उनके कमरे में जाता तो कहती, ‘चीनी मिट्टी वाले बर्तन मा हाथ न लगए।’ अगर पूछते, क्यों? तो कहती, ‘आम का अचार है। खराब होई जई।’

दादी ने अचार तो जाने कब से नहीं डाला था, फिर इन चीनी मिट्टी के खाली बर्तनों के लिए ही कमरे में ताला डाल रखा था! उत्सुकता में उसने पहले मर्तबान में हाथ डाला। हाथ से एक पोटली टकराई, ‘मां देखो! इस पोटली में क्या है?’ ‘क्या होगा! रह ही क्या गया था! सब तो तुम्हारे बाप ने मार-मार छीन लिया था।’
उसने कांपते हाथों से पोटली खोली। पोटली खुलते ही उसकी आंखें चकमका गर्इं। पोटली में सोने के झुमके, गले की चेन और दो अंगूठियां थीं।
‘देखो, दादी ने जाते-जाते तुम्हारी मदद कर दी। इन तेरह दिनों में जो खर्च हुआ है, वापस आ गया।’ मां ने कहा।

उसे याद आया, एक दिन दोपहर में दादी ने बच्चू सुनार को बुलाया था। उससे धीरे-धीरे कुछ कह रही थी। हो न हो, उन्हीं से बनवाया हो। यह सोच कर वह बच्चू सुनार के पास पहुंची। सुनार देखते ही बोला, ‘हां, करीब एक साल पहले सेठानी ने मेरे यहां से बनवाया था।’
रानू बोली, ‘… आप इन्हें ले लीजिए, मुझे पैसों की सख्त जरूरत है।’ सुनार बोला, ‘सेठानी तो चली गई हैं। उनकी निशानी समझ रहने दो। बुजुर्ग भले भर पेट न खाएं, मगर अपने बच्चों के लिए संभाल कर रखते हैं। ये सामान जब सेठानी के पास लेकर मैं गया था, तो कह रही थीं- बच्चू भैया! रानू की शादी के लिए कुछ इकट्ठा कर रही हूं। उसका बाप तो नालायक है। पोती की शादी न कर सकी। लाचार हो गई हूं। जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं। मगर उसके लिए कुछ तो कर जाऊं।… शादी न करेगी तो पढ़ाई में काम आ जाएगा।

बहुत प्यार करती थीं तुम्हें। जब सामान लेकर गया, तो बोली, ‘मेरी तीन पोतियों में उसी की चिंता ज्यादा रहती है। बेचारी! बचपन से मेरे साथ रही है।… एक पल साथ नहीं छोड़ती थी। उसके दादा के न रहने के बाद गुमसुम बनी रहती है। कुछ पूछो तो जवाब भी नहीं देती। सदमा खा गई है मेरी रानू।’
सुन कर जरूरतों और अभावों की मरुभूमि में सूख चला सोता फूट पड़ा। तेरह दिनों से सूखी पड़ी आंखों से परनाले बह चले। सामान को वापस पोटली में डाल वह फूट-फूट कर रोने लगी।

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