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कहानी : गुमनाम उजाले

शाम गहरी होती जा रही थी। त्रिवेंद्रम एक्सप्रेस अभी उज्जैन प्लेटफार्म पर आकर रुकी थी। वह अलसुबह कोटा से रवाना हुई थी। उतरने वाले अभी उतरे भी नहीं थे कि चढ़ने वालों में धक्कामुक्की प्रारंभ हो गई..

Author नई दिल्ली | December 21, 2015 18:58 pm

शाम गहरी होती जा रही थी। त्रिवेंद्रम एक्सप्रेस अभी उज्जैन प्लेटफार्म पर आकर रुकी थी। वह अलसुबह कोटा से रवाना हुई थी। उतरने वाले अभी उतरे भी नहीं थे कि चढ़ने वालों में धक्कामुक्की प्रारंभ हो गई। ट्रेन यहां मात्र पांच मिनट रुकती थी।

संत ज्ञानदेव जैसे-तैसे कोच में घुसे ही थे कि उनके पीछे वाला व्यक्ति बदहवास प्लेटफार्म पर तेजी से गिरा। शायद उसका पांव फिसल गया था। ट्रेन अब तक सरकने लगी थी। ट्रेन में चढ़ने वाले सभी यात्री यहां तक कि जवान-मुस्टंडे भी तटस्थ भाव से खड़े रहे। बिजली की गति से रास्ता बनाकर ज्ञानदेव ट्रेन से उतरे और गिरने वाले व्यक्ति को संभाला। उसे पहले ट्रेन में चढ़ाया, फिर हांफते हुए खुद चढ़े।

ट्रेन के अन्य सहयात्री अपलक नेत्रों से इस दृश्य को देखते रह गए। जवान-मुस्टंडों ने मन ही मन अपने यौवन और अन्यों ने अपनी संवेदनहीनता को धिक्कारा। परोपकार का सुअवसर क्या बार-बार मिलता है?

ट्रेन अब गति पकड़ चुकी थी। ज्ञानदेव उसे साथ लेकर कोच में आगे बढ़े। साथ चढ़ने वाला व्यक्ति भी लंगड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था। जिस तरह दायां हाथ बार-बार आगे करके वह चल रहा था, उससे लगता था कि उसे दिखाई भी कम देता है। गिरने के कारण वह लंगड़ाने और लग गया था। प्लेटफार्म पर वह सिर के बल गिरा था, उसकी खोपड़ी से खून बहकर गर्दन तक आ रहा था। खून उसके सफेद बालों को लाल करते हुए टपटप गिरने लगा था।

पसीने से तरबतर ज्ञानदेव ने उस व्यक्ति का हाथ थामे याचक आंखों से खचाखच भरे डिब्बे के एक सेक्शन की ओर देखा। सेक्शन से दो युवक उठे और उन्होंने ज्ञानदेव और घायल को स्थान दिया। सीट पर बैठने से दोनों को राहत मिली।

ज्ञानदेव ने अपना बैग खोला, उसमें से एक कपड़ा निकाला और तुरंत घायल व्यक्ति के सिर पर रख दिया। चोट ज्यादा तो नहीं थी पर हां, उसकी सुश्रुषा आवश्यक थी। सेक्शन में बैठे सभी व्यक्यिों का ध्यान अब घायल पर था। किसी ने रुई दी तो किसी ने टिंचर। ज्ञानदेव ने पट्टी बांधी। एक औरत ने अपनी केतली से ठंडा पानी लेकर दोनों को पीने के लिए दिया।

किसी तरह एक घंटा बीता। ट्रेन अब फिर धीरे होने लगी थी। कुछ यात्री बोले-इंदौर आ रहा है। कोच में फिर खटपट बढ़ने लगी थी। इंदौर में ट्रेन आधी खाली हो गई। कहां उज्जैन में इतनी भीड़ थी, कहां अब आधा खाली डिब्बा। कोच के बल्ब अब जल चुके थे। पतली जालियों के पीछे धीमी रोशनी बिखेरते जीरो वॉट के बल्ब ऐसे लग रहे थे मानो असंख्य कर्मबंधनों में बंधी आत्माएं देह धारण कर अपनी-अपनी यात्रा पर जा रही हों। कोच में बमुश्किल बीस यात्री होंगे। ज्ञानदेव वाले सेक्शन में तो मात्र ज्ञानदेव और घायल ही रह गए थे। दोनों अब आमने-सामने बैठे थे। घायल व्यक्ति ने खिड़की की ओर पीठ कर अपने पांव फैला दिए।
वह अब तक व्यवस्थित नहीं हो पाया था। दोनों व्यक्ति साठ पार थे।

बाहर सर्वत्र अंधियारा था। दोनों के पेट में अब चूहे कूदने लगे थे। घायल व्यक्ति के पास खाने को कुछ नहीं था। ज्ञानदेव उसे ताड़ गए। उन्होंने बैग से पीतल का एक डिब्बा निकाला। दो मोटी रोटी पर भाजी रखते हुए उन्होंने घायल व्यक्ति की ओर हाथ बढ़ाया। उसका संकोच और गहरा गया। उसने संत की ओर देखा, फिर न जाने क्या सोचकर रोटी ले ली। दोनों ने भरपेट भोजन किया। पानी पीकर मूंछ और दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए घायल व्यक्ति आभार प्रकट किए बिना नहीं रह सका।

‘आज मैंने आपको बहुत तकलीफ दी है।’ उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में मानो संत का उपकार समा नहीं रहा था।
‘अरे तकलीफ कैसी! यह तो मेरा फर्ज था।’ ज्ञानदेव सकुचाते हुए बोले।
‘कहां जा रहे हो?’ घायल व्यक्ति ने वार्ता को गति दी।
‘मुंबई! वहां संतों का अधिवेशन है, उसी में मुझे जाना है।’
‘आप अकेले जा रहे हैं।’
‘मैं अपने साथ चेले-चपाटे नहीं रखता।’ संत मुस्कराते से बोले।

घायल ने बताया कि उसका नाम रामसिंह है और वह भी मुंबई जा रहा है। ज्ञानदेव ने भी उसे अपना नाम बताया।
दोनों कुछ देर मौन बैठे रहे। रामसिंह ने अटपटा-सा प्रश्न किया-‘आप संत क्यों बन गए? क्या संसार रास नहीं आया?’

ज्ञानदेव को हजार बिच्छुओं ने एक साथ डंस लिया। सीने में दफन इस राज की वे किसी से चर्चा नहीं करते थे। लेकिन जाने क्यों वे रामसिंह को बताने लगे-
‘ वर्षों पहले मेरी भी गृहस्थी थी। मैं भरतपुर में रहता था। एक सद्गृहस्थ पत्नी और पांच वर्ष का बेटा भी था। मेरा आढ़त का कार्य था। कारोबार बहुत अच्छा चल रहा था। मेरे आंगन में सातों सुख पसरे थे। एक रात उस इलाके का मशहूर डाकू माधोसिंह मेरे घर में घुस आया। मैं और मेरा परिवार उसके सामने असहाय खड़ा था। उस आततायी ने उस रोज मेरे घर को ही नहीं लूटा, मुझे बांधकर मेरी ही आंखों के सामने मेरी पत्नी से बलात्कार किया। वह जाते-जाते मेरे पुत्र और पत्नी की हत्या कर गया। मुझे भी गोली मार दी थी, पर उपचार के बाद मैं बच गया। काश! मैं मर जाता। बदला लेने के लिए मैं उस आततायी को ढूंढ़ता रहा पर वह नहीं मिला। बाद में एक संत के संपर्क में आया और मैं भी संन्यासी हो गया।’ कहते-कहते ज्ञानदेव का चेहरा आंसुओं से नहा गया।

कुछ देर शांत रहे फिर उसकी ओर देखकर बोले, ‘भाग्य की आंधी मेरी छोटी-सी, सुखी गृहस्थी को सूखे पत्तों की तरह उड़ा ले गई।’

रामसिंह का चेहरा भी एक अजीब वेदना से भर गया। आगे और जानने का उसमें साहस ही नहीं रहा।

प्लेटफार्म की दुर्घटना और संत की कहानी सुनने के बाद वह और गंभीर हो गया। ज्ञानदेव ने चुप्पी तोड़ी, उसकी ओर देखकर बोले, ‘तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?’

रामसिंह कुछ देर अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता रहा। ज्ञानदेव के प्रश्न ने उसे असमंजस में डाल दिया। उसके माथे पर पड़ते बल उसके मन की उलझन बयां करने लगे थे। कुछ देर रुककर बोला, ‘आप ठीक कह रहे हैं। मैं एक सजायाफ्ता कैदी हूं। दो माह पूर्व चोरी करते हुए पकड़ा गया था। मुझे एक वर्ष की कैद हुई थी। कल मेरी बेटी की मुंबई में शादी है। वह मेरी आंख की पुतली है, मैं उसे बहुत प्यार करता हूं। इस अवसर को मैं किसी कीमत पर खोना नहीं चाहता। मेरे लाख कहने पर भी कोर्ट ने मुझे पेरोल नहीं दिया, इसलिए जेल से भागकर आ रहा हूं। पुलिस मेरे पीछे पड़ी है।’

उसने अभी बात पूरी भी नहीं की थी कि ट्रेन में दो पुलिस वाले कोच के उस छोर से प्रविष्ट हुए। दोनों के कंधों पर बंदूकें थीं। वे एक-एक आदमी को गौर से देख रहे थे। रामसिंह ने पुलिस वालों को अपनी ओर आते देखा और तुरंत चादर से मुंह ढककर लेट गया।

पुलिस वाले धीरे-धीरे चलकर ज्ञानदेव के पास आए। दोनों ने उन्हें नमस्कार किया। शायद वे ज्ञानदेव को जानते थे। उनमें से एक ने रामसिंह की ओर इशारा करते हुए पूछा, ‘यह कौन है?’

‘यह मेरे शिष्य सनातन देव है, थके हुए थे, जल्दी सो गए।’ ज्ञानदेव सहज भाव से कहा।

अविश्वास और संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी। भला संत भी कभी झूठ बोलते हैं ?

पुलिस वाले आगे बढ़ गए। जाते हुए उनमें से एक बोला, ‘बाबा! ध्यान रखना। खतरनाक डाकू माधोसिंह आज इंदौर जेल से भाग गया है।’

ज्ञानदेव सकते में आ गए। अब जानने को कुछ भी शेष नहीं बचा था।  प्रतिशोध का एक तेज बवंडर उनके अंतस से उठा, लेकिन पलक झपकते ही एक और बड़ा बवंडर आया और पहले बवंडर को ले उड़ा।

पुलिस के जाते ही रामसिंह ने मुंह से चादर हटाई और ज्ञानदेव के सामने बैठ गया। ज्ञानदेव उसे पहचान गए थे।
ज्ञानदेव ने कहा कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।
इतना कहकर ज्ञानदेव चादर तानकर सो गए।
कुछ देर बाद कोच में पिस्तौल छूटने की एक तेज आवाज गूंजी।
रामसिंह ने अपनी इहलीला खत्म कर ली थी।

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